अचेतन मन को वश में कैसे करें - प्रथम खण्ड — अचेतन मन का स्वरूप अध्याय २ — चेतना क्या है?
शोधग्रन्थ — अचेतन मन को वश में कैसे करें - प्रथम खण्ड — अचेतन मन का स्वरूप
अध्याय २ — चेतना क्या है? अनुभव करने, जानने और स्वयं को पहचानने की क्षमता
मनुष्य जागता है, देखता है, सुनता है, सोचता है और अपने आसपास घटित होने वाली घटनाओं का अनुभव करता है। लेकिन इन सबके पीछे एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रश्न है—मनुष्य को अपने अनुभवों का ज्ञान कैसे होता है?
हम केवल वस्तुओं को देखते ही नहीं, बल्कि यह भी जानते हैं कि हम उन्हें देख रहे हैं। हम केवल दुःख अनुभव नहीं करते, बल्कि कभी-कभी यह भी पहचान लेते हैं कि हमारे भीतर दुःख उत्पन्न हो रहा है। हम विचार करते हैं और फिर अपने विचारों का परीक्षण भी कर सकते हैं।
यही प्रश्न चेतना के अध्ययन का आधार है।
अचेतन मन को समझने के लिए चेतना को समझना आवश्यक है, क्योंकि अचेतन और अवचेतन की चर्चा तभी सार्थक होगी जब हम यह जान सकें कि मानसिक जीवन का कौन-सा भाग हमारी जागरूकता में उपस्थित है और कौन-सा हमारी जानकारी के बिना कार्य करता है।
चेतना का सामान्य अर्थ
सामान्य भाषा में चेतना का अर्थ है—जागरूक होना, अनुभव करना और अपने आसपास या अपने भीतर घटित होने वाली घटनाओं का ज्ञान होना।
जब हम किसी फूल को देखते हैं, उसकी सुगन्ध अनुभव करते हैं और उसके सौन्दर्य पर विचार करते हैं, तब हमारे भीतर कई प्रकार की प्रक्रियाएँ काम कर रही होती हैं।
फूल का दिखाई देना एक संवेदनात्मक अनुभव है। उसकी सुगन्ध का अनुभव दूसरा अनुभव है। उसे सुन्दर मानना एक मूल्यांकन है। और यह जानना कि हम फूल को देख तथा अनुभव कर रहे हैं, आत्म-जागरूकता का एक रूप है।
इस प्रकार चेतना केवल आँखें खुली होने या जागते रहने का नाम नहीं है। कोई व्यक्ति जाग रहा हो, फिर भी उसका ध्यान किसी विचार में इतना उलझा हो सकता है कि आसपास की अनेक घटनाओं का उसे ज्ञान न हो।
इसलिए चेतना और ध्यान में अन्तर करना आवश्यक है। ध्यान चेतना में उपस्थित सूचनाओं के चयन और प्राथमिकता से सम्बन्धित है, जबकि चेतना का प्रश्न इससे व्यापक है—अनुभव का होना ही कैसे सम्भव होता है?
चेतना के विभिन्न स्तर
चेतना को समझने के लिए कुछ सामान्य अवस्थाओं का अध्ययन उपयोगी है। ये अवस्थाएँ एक-दूसरे से पूर्णतः अलग नहीं हैं और इनके बीच अनेक परिवर्तनशील स्थितियाँ हो सकती हैं।
जाग्रत अवस्था
इस अवस्था में व्यक्ति अपने आसपास के वातावरण से सामान्य रूप से परिचित रहता है। वह बातचीत करता है, निर्णय लेता है, काम करता है और घटनाओं पर प्रतिक्रिया देता है।
लेकिन जाग्रत अवस्था में भी उसकी सम्पूर्ण मानसिक गतिविधियाँ सचेत नहीं होतीं। वह चलते समय प्रत्येक कदम के बारे में नहीं सोचता, परिचित शब्दों का अर्थ निकालने के लिए अलग से प्रयास नहीं करता और अनेक परिचित क्रियाएँ सहज रूप से सम्पन्न करता है।
इससे स्पष्ट होता है कि जाग्रत रहना और प्रत्येक मानसिक प्रक्रिया के प्रति जागरूक रहना अलग-अलग बातें हैं।
स्वप्न अवस्था
स्वप्न में मनुष्य ऐसे दृश्य और घटनाएँ अनुभव कर सकता है जो वास्तविक वातावरण में उपस्थित नहीं होते। वह किसी परिचित स्थान पर हो सकता है, किसी मृत व्यक्ति से बातचीत कर सकता है अथवा ऐसी घटनाओं का अनुभव कर सकता है जिनका वास्तविक जीवन में कोई प्रत्यक्ष आधार नहीं होता।
स्वप्न की विशेषता यह है कि उसमें अनुभव की उपस्थिति बनी रहती है, लेकिन सामान्यतः जाग्रत अवस्था जैसी बाहरी परिस्थिति की जाँच और विवेकपूर्ण निर्णय क्षमता उसी रूप में सक्रिय नहीं रहती।
स्वप्नों का अध्ययन अचेतन मन की खोज में उपयोगी है, लेकिन प्रत्येक स्वप्न को किसी गुप्त इच्छा, भविष्यवाणी या दबे हुए अनुभव का निश्चित संकेत मानना उचित नहीं होगा।
सुषुप्ति अवस्था
गहरी निद्रा में सामान्यतः स्वप्न-संबंधी अनुभवों का स्मरण नहीं रहता। व्यक्ति बाहरी वातावरण के प्रति अपनी जाग्रत अवस्था जैसी प्रतिक्रिया नहीं देता।
भारतीय दर्शन में सुषुप्ति का विशेष दार्शनिक अध्ययन हुआ है। माण्डूक्य उपनिषद् में जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति को आत्मा के अनुभव की तीन अवस्थाओं के रूप में समझाया गया है।
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है—यदि गहरी निद्रा में व्यक्ति को सामान्य अनुभवों का स्मरण नहीं रहता, तो क्या उस अवस्था में चेतना बिल्कुल अनुपस्थित होती है?
यह प्रश्न आधुनिक विज्ञान और भारतीय दर्शन में अलग-अलग दृष्टियों से देखा जाता है। आधुनिक विज्ञान निद्रा के दौरान मस्तिष्क की गतिविधियों, अनुभवों और जागने के बाद स्मृति की जाँच करता है। अद्वैत वेदान्त सुषुप्ति को आत्मस्वरूप के विवेचन में एक विशिष्ट स्थान देता है।
दोनों की पद्धतियों को अलग रखते हुए उनका तुलनात्मक अध्ययन करना आवश्यक है।
चेतना और आत्म-जागरूकता में अन्तर
चेतना का अर्थ केवल स्वयं को जानना नहीं है।
मान लीजिए कोई व्यक्ति सड़क पर चल रहा है। वह पेड़ों, वाहनों और लोगों को देख रहा है। उसे इन वस्तुओं का अनुभव हो रहा है। यह सामान्य चेतन अनुभव है।
अब मान लीजिए कि वह चलते-चलते अपने विचारों पर ध्यान देने लगता है। उसे पता चलता है कि वह किसी पुराने विवाद को याद कर रहा है और उसी के कारण उसके भीतर क्रोध उत्पन्न हो रहा है।
यहाँ वह केवल बाहरी संसार का अनुभव नहीं कर रहा, बल्कि अपने मानसिक अनुभव को भी देख रहा है।
इसे आत्म-जागरूकता या आत्मनिरीक्षण कहा जा सकता है।
मनोविज्ञान में इससे सम्बन्धित एक अवधारणा मेटाकॉग्निशन है। इसका अर्थ है अपनी सोच, समझ और मानसिक प्रक्रियाओं के बारे में जानने तथा उनका मूल्यांकन करने की क्षमता।
उदाहरण के लिए, कोई विद्यार्थी पढ़ते समय यह पहचान लेता है कि उसने एक अनुच्छेद पढ़ तो लिया है, लेकिन उसे समझा नहीं है। वह अपनी समझ की कमी को पहचानकर दोबारा पढ़ने का निर्णय करता है।
यह मेटाकॉग्निशन का सरल उदाहरण है।
अचेतन मन के अध्ययन में यह क्षमता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि मनुष्य को पहले अपनी मानसिक प्रक्रियाओं को पहचानना सीखना होगा, तभी वह उनमें परिवर्तन करने का प्रयास कर सकेगा।
चेतना और मस्तिष्क
आधुनिक तंत्रिका विज्ञान चेतना को मस्तिष्क की गतिविधियों के साथ गहरे सम्बन्ध में देखता है।
मस्तिष्क के विभिन्न तंत्र संवेदनाओं, स्मृतियों, भावनाओं, ध्यान और निर्णयों में भाग लेते हैं। चेतन अनुभव किसी एक छोटी-सी जगह पर स्थित नहीं माना जाता। इसके निर्माण और उसके विभिन्न पहलुओं को समझने के लिए अनेक तंत्रिका नेटवर्क और उनकी पारस्परिक गतिविधियों का अध्ययन किया जाता है।
उदाहरण के लिए, जब व्यक्ति किसी परिचित आवाज को सुनता है, तो केवल ध्वनि ग्रहण नहीं होती। मस्तिष्क ध्वनि की विशेषताओं का विश्लेषण करता है, उसे पूर्व स्मृतियों से जोड़ता है और सम्भवतः उस व्यक्ति की पहचान कर लेता है।
कई बार पहचान बहुत तेजी से हो जाती है। व्यक्ति को यह अनुभव होता है कि उसने आवाज पहचान ली है, लेकिन इस पहचान तक पहुँचने वाली सभी प्रक्रियाएँ उसे सचेत रूप से ज्ञात नहीं होतीं।
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक तथ्य सामने आता है—मस्तिष्क की अनेक प्रक्रियाएँ चेतन अनुभव में आने से पहले या उससे अलग भी कार्य करती हैं।
फिर भी चेतना का सम्पूर्ण वैज्ञानिक रहस्य अभी हल नहीं हुआ है। मस्तिष्क की गतिविधियों और अनुभवों के बीच सम्बन्धों को समझने में पर्याप्त प्रगति हुई है, लेकिन यह प्रश्न कि भौतिक तंत्रिका गतिविधियों से व्यक्तिपरक अनुभव कैसे उत्पन्न होता है, अभी भी दर्शन और विज्ञान का गम्भीर विषय है।
चेतना के अध्ययन में प्रमुख वैज्ञानिक सिद्धान्त
चेतना को समझने के लिए आधुनिक विज्ञान में अनेक सिद्धान्त प्रस्तुत किए गए हैं। उनमें कुछ प्रमुख दृष्टिकोण इस प्रकार हैं।
ग्लोबल वर्कस्पेस थ्योरी
इस सिद्धान्त के अनुसार मस्तिष्क में अनेक सूचनात्मक प्रक्रियाएँ समानान्तर रूप से चलती रहती हैं। जब कोई सूचना व्यापक मानसिक नेटवर्क के लिए उपलब्ध हो जाती है, तब वह चेतन अनुभव और विभिन्न संज्ञानात्मक कार्यों में उपयोग की जा सकती है।
उदाहरण के लिए, किसी कमरे में अनेक आवाजें आ रही हैं, लेकिन अचानक कोई व्यक्ति आपका नाम पुकारता है। आपका ध्यान उस आवाज की ओर जाता है और वह सूचना आपके लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
इस सिद्धान्त के अनुसार चेतना को समझने में सूचना की व्यापक उपलब्धता महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इंटीग्रेटेड इन्फॉर्मेशन थ्योरी
यह सिद्धान्त चेतना को किसी तंत्र में एकीकृत सूचना की विशेष संरचना से जोड़कर समझने का प्रयास करता है।
इसका मूल विचार है कि किसी प्रणाली के विभिन्न हिस्सों की सूचनात्मक गतिविधियाँ किस प्रकार मिलकर एक अविभाज्य समग्रता बनाती हैं।
यह सिद्धान्त चेतना के अध्ययन में एक प्रभावशाली दृष्टिकोण है, लेकिन इसके दावों और उनकी जाँच की विधियों पर वैज्ञानिक विवाद भी मौजूद हैं।
हायर ऑर्डर थ्योरी
इस दृष्टिकोण के अनुसार किसी मानसिक अवस्था का चेतन होना केवल उस अवस्था के उपस्थित होने पर निर्भर नहीं करता, बल्कि उस अवस्था के प्रति किसी उच्चतर स्तर की मानसिक जागरूकता भी महत्त्वपूर्ण हो सकती है।
उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को भय हो रहा है। एक स्तर पर भय का अनुभव है। दूसरे स्तर पर उसे यह भी ज्ञात है कि वह भयभीत है।
इस दृष्टिकोण से चेतना और आत्म-जागरूकता के सम्बन्ध को समझने में सहायता मिलती है।
इन सिद्धान्तों में से किसी एक को चेतना की अन्तिम और सर्वमान्य व्याख्या मान लेना अभी उचित नहीं है।
भारतीय दर्शन में चेतना का स्वरूप
भारतीय दर्शन में चेतना का अध्ययन अत्यन्त गहराई से किया गया है। विशेष रूप से उपनिषदों और वेदान्त में चेतना को केवल मानसिक गतिविधि के रूप में नहीं, बल्कि अस्तित्व और आत्मस्वरूप से सम्बन्धित प्रश्न के रूप में देखा गया है।
माण्डूक्य उपनिषद् इस विषय में एक महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।
उसमें आत्मा की चार अवस्थाओं का विवेचन मिलता है— जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय।
तुरीय का अर्थ सामान्य जाग्रत, स्वप्न या गहरी निद्रा की तरह एक और साधारण मानसिक अवस्था नहीं है। अद्वैत वेदान्त की व्याख्या में यह आत्मा का ऐसा स्वरूप है जो इन तीनों अवस्थाओं से परे है।
माण्डूक्य उपनिषद् का सातवाँ मन्त्र कहता है—
नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनम्।न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्। अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यम्।एकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः॥
इस मन्त्र में तुरीय को सामान्य मानसिक अनुभवों की श्रेणी में नहीं रखा गया है। उसे अद्वैत, शान्त और प्रपञ्च के उपशम से सम्बन्धित आत्मस्वरूप बताया गया है।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि भारतीय दर्शन में चेतना की चर्चा का उद्देश्य केवल यह पता लगाना नहीं है कि मस्तिष्क कैसे काम करता है। इसका उद्देश्य यह भी है कि अनुभव करने वाले की वास्तविक प्रकृति क्या है।
योगदर्शन की दृष्टि
पतञ्जलि योगसूत्र में चित्तवृत्तियों के निरोध और द्रष्टा के स्वरूप में प्रतिष्ठित होने की चर्चा मिलती है।
तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥ — योगसूत्र १.३ - अर्थात् तब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित होता है।
यहाँ द्रष्टा और चित्तवृत्तियों के बीच भेद किया गया है। मन में विचार, भावनाएँ और स्मृतियाँ उत्पन्न होती रहती हैं, लेकिन योगदर्शन के अनुसार पुरुष इन चित्तवृत्तियों से भिन्न है।
इस दृष्टि से मनुष्य का मानसिक जीवन केवल विचारों का प्रवाह नहीं है। विचारों को देखने और उनसे असंग रहने की साधना भी सम्भव है।
चेतना और अचेतन मन का सम्बन्ध
अब हम अपने मूल शोध-विषय के निकट पहुँचते हैं।
यदि चेतना का सम्बन्ध अनुभव और जागरूकता से है, तो अचेतन प्रक्रियाओं का सम्बन्ध उन मानसिक कार्यों से है जो हमारी स्पष्ट जागरूकता के बिना भी सम्पन्न हो सकते हैं।
उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से मिलता है और बिना किसी स्पष्ट कारण के उसके प्रति असहज अनुभव करता है।
बाद में उसे याद आता है कि उस व्यक्ति की बोलने की शैली किसी ऐसे व्यक्ति जैसी है जिसके साथ उसका पहले अप्रिय अनुभव रहा था।
यह सम्भव है कि समानता की पहचान पहले स्वचालित रूप से हुई हो और उसका स्पष्ट कारण बाद में समझ में आया हो।
यह उदाहरण बताता है कि हमारी जागरूकता किसी मानसिक प्रक्रिया के परिणाम को अनुभव कर सकती है, जबकि उस परिणाम तक पहुँचने वाली पूरी प्रक्रिया हमारी जानकारी में न हो।
लेकिन प्रत्येक अस्पष्ट भावना को अचेतन स्मृति का परिणाम नहीं माना जा सकता। कभी उसका कारण वर्तमान परिस्थिति, थकान, शारीरिक स्थिति या किसी अन्य सामान्य कारक में भी हो सकता है।
इसलिए अचेतन मन का वैज्ञानिक अध्ययन अनुमान से नहीं, बल्कि व्यवस्थित निरीक्षण और परीक्षण से होना चाहिए।
चेतना को विकसित करने का व्यावहारिक पक्ष
इस शोधग्रन्थ का उद्देश्य केवल चेतना की दार्शनिक परिभाषा देना नहीं है। हमारा उद्देश्य यह भी समझना है कि चेतना और आत्म-जागरूकता को व्यावहारिक जीवन में किस प्रकार उपयोगी बनाया जा सकता है।
इसके लिए कुछ प्रारम्भिक अभ्यास उपयोगी हो सकते हैं।
अपने विचारों का निरीक्षण
प्रतिदिन कुछ मिनट अपने विचारों को देखें। उन्हें रोकने या बदलने का प्रयास न करें। केवल यह पहचानें कि इस समय आपके मन में किस प्रकार के विचार आ रहे हैं।
भावनाओं की पहचान
जब क्रोध, भय, ईर्ष्या या बेचैनी उत्पन्न हो, तो तत्काल प्रतिक्रिया देने के बजाय यह पहचानने का प्रयास करें कि कौन-सी भावना उपस्थित है।
प्रतिक्रिया और निर्णय के बीच अन्तर
किसी परिस्थिति में तुरन्त प्रतिक्रिया देने के बजाय कुछ क्षण रुकें। स्वयं से पूछें कि जो करने जा रहे हैं, वह विवेकपूर्ण निर्णय है या केवल पुरानी आदत की प्रतिक्रिया।
स्वयं की मानसिक स्थिति का परीक्षण
दिन के अंत में देखें कि आज किन परिस्थितियों में आपका ध्यान भटका, कहाँ आपने बिना सोचे प्रतिक्रिया दी और कहाँ आप अपने व्यवहार को समझने में सफल रहे।
इन अभ्यासों का उद्देश्य मन को दबाना नहीं, बल्कि उसके कार्य करने के ढंग को पहचानना है।
इस अध्याय का शोधपरक निष्कर्ष
चेतना मनुष्य के अनुभव का मूल प्रश्न है। इसके माध्यम से हम बाहरी संसार, अपने विचारों, भावनाओं और कभी-कभी स्वयं अपनी मानसिक गतिविधियों को भी जान पाते हैं।
आधुनिक विज्ञान चेतना को मस्तिष्क की जटिल गतिविधियों के साथ जोड़कर समझने का प्रयास करता है। वहीं भारतीय दर्शन में चेतना का सम्बन्ध आत्मा, पुरुष, साक्षी और ब्रह्म जैसे व्यापक दार्शनिक प्रश्नों से भी है।
दोनों दृष्टियों में एक महत्त्वपूर्ण अन्तर है। आधुनिक विज्ञान मुख्यतः अनुभवों और मस्तिष्क की गतिविधियों के बीच सम्बन्धों की जाँच करता है, जबकि भारतीय आध्यात्मिक दर्शन चेतना के अन्तिम स्वरूप और अनुभवकर्ता की वास्तविकता की खोज करता है।
हमारे शोध के लिए दोनों दृष्टियाँ उपयोगी हैं, लेकिन उनके निष्कर्षों को बिना परीक्षण एक-दूसरे में मिला देना उचित नहीं होगा।
इस अध्याय से एक महत्त्वपूर्ण आधार प्राप्त होता है—
मनुष्य के भीतर होने वाली प्रत्येक मानसिक प्रक्रिया उसके सचेत अनुभव में उपस्थित नहीं होती। इसलिए स्वयं को जानने के लिए केवल अपने विचारों को जानना पर्याप्त नहीं है; उन प्रक्रियाओं को भी समझना आवश्यक है जो विचारों, भावनाओं और व्यवहार को हमारी जानकारी के बिना प्रभावित करती हैं।
यहीं से अचेतन मन के वास्तविक अध्ययन का मार्ग खुलता है।
अगला अध्याय — अध्याय ३ : अचेतन मन का स्वरूप — जो काम करता है, पर दिखाई नहीं देता।
इसमें फ्रायड की अचेतन मन की अवधारणा, युंग का सामूहिक अचेतन, आधुनिक संज्ञानात्मक विज्ञान, अप्रत्यक्ष स्मृति, दबी हुई इच्छाएँ तथा स्वचालित मानसिक प्रक्रियाओं का तुलनात्मक और शोधपरक अध्ययन करेंगे।
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