हरिवंशपुराण — भाग ४४ - कलियुग का विस्तृत चित्रण

 हरिवंशपुराण — भाग ४४ - कलियुग का विस्तृत चित्रण : 

युग-परिवर्तन, धर्म का क्षय और मानव-आचरण की परीक्षा

इस भाग में हम पिछले भाग में वर्णित कलियुग के लक्षणों को दोहराने के बजाय, हरिवंशपुराण के भविष्यपर्व में आगे आने वाले युग-वर्णन की ओर बढ़ेंगे। यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ब्लॉग के भागों की संख्या हमारी संपादकीय व्यवस्था है; मूल ग्रंथ के अध्यायों की संख्या अलग-अलग संस्करणों में भिन्न हो सकती है।

जनमेजय का प्रश्न : पतन के बाद मनुष्य का रक्षण कौन करेगा?

कलियुग के लक्षण सुनने के बाद राजा जनमेजय का प्रश्न केवल इतना नहीं रह जाता कि उस युग में मनुष्य कैसे होंगे। उनकी जिज्ञासा अब अधिक गहरी है—यदि संसार अधर्म से भर जाएगा, सदाचार दुर्लभ हो जाएगा और शासक भी प्रजा की रक्षा करने में असमर्थ होंगे, तो मनुष्य का सहारा कौन बनेगा?

वे व्यास से पूछते हैं कि उस समय मनुष्य किस प्रकार जीवन बिताएँगे, उनकी आजीविका क्या होगी, उनके प्रयत्न किस दिशा में जाएँगे, उनकी आयु कितनी होगी और वे किन परिस्थितियों से गुजरकर पुनः सत्ययुग तक पहुँचेंगे।

यह प्रश्न भविष्यपर्व के इस अध्याय का केंद्रीय सूत्र है। जनमेजय मानो यह जानना चाहते हैं कि क्या नैतिक पतन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका कोई अंत नहीं, अथवा उसके भीतर से ही सुधार का मार्ग भी निकल सकता है।

व्यास का उत्तर इस प्रश्न को एक नई दिशा देता है। वे कलियुग की कठिनाइयों का वर्णन करते हुए बताते हैं कि पतन के बाद भी परिवर्तन की संभावना समाप्त नहीं होती।

धर्म का क्षय और मनुष्य की दुर्बलता

व्यास के अनुसार, जब धर्म डगमगाने लगता है और सदाचार का लोप होने लगता है, तब मनुष्य की क्षमताएँ भी क्षीण होती जाती हैं। आयु घटती है, बल कम होता है और रोगों का प्रभाव बढ़ता है। जीवन की असुरक्षा मनुष्य के मन में दुःख, पश्चात्ताप और अपनी स्थिति पर विचार करने की प्रवृत्ति उत्पन्न करती है।

यहाँ आख्यान एक महत्त्वपूर्ण क्रम प्रस्तुत करता है—

धर्म का क्षय → जीवन में संकट → पश्चात्ताप → आत्मचेतना → सदाचार की ओर वापसी।

इस क्रम को केवल शारीरिक दुर्बलता की भविष्यवाणी मानकर पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। इसका एक नैतिक अर्थ भी है। जब मनुष्य अपने कर्मों के परिणामों से घिर जाता है, तब वह अपने आचरण की समीक्षा करने के लिए विवश हो सकता है।

किन्तु संकट अपने-आप मनुष्य को श्रेष्ठ नहीं बनाता। संकट से परिवर्तन तभी संभव है, जब व्यक्ति अपनी भूल को पहचाने और उसे सुधारने का प्रयत्न करे। व्यास के कथन का यह विवेचनात्मक अर्थ हमें निराशा के बीच आत्मसुधार की संभावना देखने में सहायता करता है।

ज्ञान का अहंकार और सत्य की खोज

इस अध्याय में व्यास ज्ञान के क्षेत्र में भी दो प्रकार की प्रवृत्तियों का संकेत देते हैं। कुछ लोग धर्म और सदाचार की चर्चा केवल वाणी से करेंगे, पर अपने जीवन में उन्हें स्थान नहीं देंगे। दूसरी ओर, कुछ जिज्ञासु व्यक्ति प्रश्न करेंगे, कारणों की खोज करेंगे और प्रमाण तथा तर्क के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करेंगे।

यह भेद अत्यंत विचारणीय है। ज्ञान का प्रदर्शन और सत्य का अनुसंधान एक ही बात नहीं हैं।

किसी व्यक्ति के पास शास्त्रों की जानकारी हो सकती है, पर यदि वह उस ज्ञान को अपने व्यवहार में नहीं उतारता, तो उसकी विद्वत्ता जीवन को दिशा देने में असफल हो सकती है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति प्रश्न करने, अपने निष्कर्षों की जाँच करने और भ्रम से बाहर आने का प्रयास करता है, वह ज्ञान को आत्मविकास का साधन बना सकता है।

व्यास के वर्णन में ऐसे लोग भी आते हैं जो शास्त्रों का विरोध करते हैं या अपनी विद्वत्ता के अहंकार में उलझ जाते हैं। इस प्रसंग को पढ़ते समय यह भेद बनाए रखना चाहिए कि ग्रंथ का पारंपरिक धार्मिक दृष्टिकोण क्या कहता है और उसके भीतर से निकाली जा सकने वाली व्यापक बौद्धिक शिक्षा क्या है।

इसका विवेकपूर्ण पाठ यह नहीं है कि हर प्रश्न या असहमति अज्ञान है, बल्कि यह है कि न तो अंधस्वीकृति पर्याप्त है, न ही अहंकार से प्रेरित अस्वीकृति। सत्य की खोज में जिज्ञासा, तर्क, प्रमाण और आत्मपरीक्षण—सभी का महत्त्व है।

सामाजिक व्यवस्था का विघटन : आजीविका से लेकर पारिवारिक संबंधों तक

व्यास कलियुग के चित्र में समाज के अनेक स्तरों पर अव्यवस्था का वर्णन करते हैं। आजीविका के साधनों में अस्थिरता, आर्थिक संकट, करों का भार, चोरी, हिंसा, छल और परस्पर अविश्वास इस चित्र के प्रमुख अंग हैं।

अध्याय में ऐसे समय का वर्णन है जब मनुष्य भोजन, वस्त्र और जीवन की सामान्य आवश्यकताओं के लिए भी संघर्ष करता है। चोरी करने वाले दूसरे चोरों की संपत्ति चुराते हैं और हिंसा करने वाले स्वयं हिंसा के शिकार बनते हैं। यह स्थिति किसी स्वस्थ न्याय-व्यवस्था का चित्र नहीं, बल्कि ऐसी अव्यवस्था का संकेत है जिसमें अपराध और भय एक-दूसरे को बढ़ाते रहते हैं।

पारिवारिक जीवन भी इससे अछूता नहीं रहता। पिता-पुत्र, गुरु-शिष्य और परिवार के अन्य सदस्यों के संबंधों में कर्तव्य और सम्मान की जगह स्वार्थ तथा संघर्ष लेने लगते हैं। शिष्य गुरु को कटु वचनों से पीड़ित करता है और परिवार के भीतर परस्पर सहयोग कम होता जाता है।

यहाँ एक सावधानी आवश्यक है। प्राचीन ग्रंथ के सामाजिक आदर्श अपने समय की पारिवारिक और वर्णाश्रम-व्यवस्था से जुड़े हुए हैं। इसलिए उसके प्रत्येक सामाजिक कथन को आज के समाज पर यथावत् लागू करना उचित नहीं होगा। फिर भी छल, शोषण, अविश्वास, आर्थिक अन्याय और संबंधों में संवेदनहीनता की आलोचना आज भी विचारणीय है।

इस प्रसंग का व्यापक प्रश्न है—जब समाज में अधिकार तो बने रहें, पर उनके साथ उत्तरदायित्व न निभाया जाए, तब व्यवस्था कितने समय तक टिक सकती है?

भय, अभाव और पलायन का युग

अध्याय के आगे के वर्णन में अकाल, भूख, भय, रोग और असुरक्षा से पीड़ित मनुष्यों का चित्र सामने आता है। लोग अपने बच्चों को लेकर दूसरे प्रदेशों की ओर जाते हैं और सुरक्षित आश्रय खोजते हैं। कुछ लोग जंगलों, पर्वतीय क्षेत्रों अथवा नदियों के किनारे जीवन बिताने लगते हैं। भोजन के लिए फल, मूल, वन्य जीव और उपलब्ध अन्य साधनों पर निर्भरता बढ़ जाती है।

व्यास का यह चित्रण केवल व्यक्तिगत नैतिकता के संकट तक सीमित नहीं रहता। इसमें जीवन की भौतिक परिस्थितियों का भी स्थान है। जब शासन प्रजा की रक्षा नहीं कर पाता, आजीविका अस्थिर हो जाती है और प्राकृतिक या सामाजिक संकट बढ़ते हैं, तब मनुष्य का जीवन कठिन हो जाता है।

यहाँ ग्रंथ का एक महत्त्वपूर्ण संकेत उभरता है—सामाजिक पतन का मूल्य सबसे अधिक सामान्य मनुष्य चुकाता है। सत्ता और संपत्ति रखने वालों के आचरण का प्रभाव उन लोगों पर पड़ता है जिनके पास संकट से बचने के साधन कम हैं।

इसलिए कलियुग के इस वर्णन को केवल व्यक्तियों के चरित्र-दोषों की सूची बनाकर नहीं पढ़ना चाहिए। इसमें शासन, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और सामुदायिक जीवन के विघटन की चिंता भी निहित है।

क्या पतन के बीच भी धर्म बच सकता है?

यहीं अध्याय का स्वर बदलने लगता है। व्यास बताते हैं कि कठिन समय में भी कुछ लोग सत्य, दान, संयम और धार्मिक आचरण की ओर लौट सकते हैं। जब भोग की वस्तुएँ सहज उपलब्ध नहीं रहतीं, जब शक्ति और अहंकार का सहारा टूटता है, तब मनुष्य अपनी सीमाओं को पहचान सकता है।

यहाँ से एक गहरी व्याख्या संभव है। मनुष्य कभी-कभी समृद्धि में अपने कर्तव्य भूल जाता है, लेकिन संकट उसे जीवन की वास्तविक आवश्यकताओं और अपने आचरण के परिणामों पर विचार करने के लिए प्रेरित कर सकता है। यह परिवर्तन अनिवार्य नहीं है; फिर भी उसकी संभावना बनी रहती है।

व्यास के वर्णन में सज्जनों की सेवा, सत्य का पालन, दान और अपने आचरण को सुधारने की प्रवृत्ति भविष्य के परिवर्तन से जुड़ती है। इस प्रकार धर्म केवल बाहरी व्यवस्था का नाम नहीं रह जाता। वह मनुष्य के भीतर फिर से विकसित होने वाली प्रवृत्ति भी बन जाता है।

इस अध्याय का आशावादी पक्ष यही है कि युग की प्रतिकूलता मनुष्य के विवेक को पूरी तरह नष्ट नहीं कर देती। कुछ लोग परिस्थितियों से सीखकर अपने जीवन को बेहतर दिशा दे सकते हैं।

कलियुग से सत्ययुग : चंद्रमा का रूपक

व्यास सत्ययुग की वापसी को समझाने के लिए चंद्रमा का उदाहरण देते हैं। जैसे शुक्ल पक्ष में चंद्रमा की कलाएँ क्रमशः बढ़ती हैं और कृष्ण पक्ष में घटती हैं, वैसे ही धर्म की वृद्धि और ह्रास के माध्यम से युगों की प्रकृति समझाई जाती है।

यह रूपक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें परिवर्तन को एक क्रमिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पतन और उत्थान दोनों चरणबद्ध हो सकते हैं। किसी समाज में सदाचार एक ही दिन में समाप्त नहीं होता और न ही एक ही दिन में पूरी तरह लौट आता है।

सत्ययुग की वापसी का अर्थ इस प्रसंग में धर्म का पुनः प्रतिष्ठित होना है। जब मनुष्य सत्य, सदाचार और कर्तव्य का पालन करने लगते हैं, तब एक श्रेष्ठतर व्यवस्था की संभावना बनती है।

इस विचार को आधुनिक सामाजिक संदर्भ में देखें तो किसी समाज का सुधार केवल घोषणाओं से नहीं होता। उसके लिए व्यक्ति के आचरण, सामाजिक संस्थाओं और शासन की जिम्मेदारियों—तीनों में परिवर्तन आवश्यक होता है।

धूल से ढका स्वर्ण : आत्मतत्त्व और माया का संकेत

अध्याय के अंतिम भाग में व्यास एक और गहन उपमा प्रस्तुत करते हैं। धूल से ढके स्वर्ण को देखकर कोई व्यक्ति उसे स्वर्ण के रूप में पहचान नहीं पाता। जब धूल हटती है, तब उसी वस्तु का वास्तविक स्वरूप प्रकट हो जाता है।

इसी प्रकार, ग्रंथ के दार्शनिक संकेत में माया और अज्ञान से आच्छादित चेतना को सीमित जीवभाव से देखा जाता है; आवरण हटने पर शुद्ध चेतना का बोध संभव होता है। यह उपमा बाहरी संसार के परिवर्तन से आगे बढ़कर आत्मज्ञान के प्रश्न तक पहुँचती है।

इस प्रसंग का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य के भीतर जो कुछ भी है, वह स्वतः ही पूर्ण ज्ञान के रूप में प्रकट हो जाएगा। उपमा का संकेत यह है कि सत्य का बोध कई बार नई वस्तु प्राप्त करने से नहीं, बल्कि भ्रम और आवरण दूर करने से होता है।

यहाँ कलियुग का सामाजिक आख्यान आत्मचिंतन की दार्शनिक भूमि से जुड़ जाता है। पहले समाज के आचरण में विकृति दिखाई गई; अंत में मनुष्य के ज्ञान और पहचान पर पड़े आवरण की चर्चा सामने आती है।

कर्म, समय और परिस्थिति का संबंध

व्यास आगे यह भी स्पष्ट करते हैं कि कर्मों के फल देश, काल और पात्र के अनुसार भिन्न रूप में दिखाई दे सकते हैं। विभिन्न युगों में जीवन की परिस्थितियाँ, आयु, उपभोग की वस्तुएँ और धार्मिक आचरण समान नहीं रहते।

यह कथन कर्म के फल को केवल एक सरल, तत्काल समीकरण में सीमित नहीं करता। मनुष्य का कर्म एक पक्ष है, जबकि उसके परिणामों की अभिव्यक्ति अनेक परिस्थितियों से प्रभावित हो सकती है।

इसका विवेचनात्मक अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति या समाज की स्थिति को समझते समय उसके कर्मों के साथ-साथ उसकी परिस्थितियों को भी देखना चाहिए। यह दृष्टि उत्तरदायित्व को समाप्त नहीं करती, बल्कि मूल्यांकन को अधिक गंभीर बनाती है।

फिर भी इस कथन को आधुनिक वैज्ञानिक नियम की तरह प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। यह पुराण की दार्शनिक और धार्मिक विश्वदृष्टि का हिस्सा है, जिसमें युग-चक्र, कर्मफल और ब्रह्मांडीय व्यवस्था परस्पर जुड़े हुए हैं।

शोधपरक समीक्षा : इस अध्याय का केंद्रीय संदेश

हरिवंशपुराण के भविष्यपर्व के इस अध्याय में तीन स्तर एक साथ उपस्थित हैं।

पहला, सामाजिक स्तर—शासन की विफलता, आर्थिक संकट, हिंसा, छल और पारिवारिक संबंधों का विघटन।

दूसरा, नैतिक स्तर—सत्य, दान, संयम, सदाचार और आत्मपरीक्षण की ओर लौटने की संभावना।

तीसरा, दार्शनिक स्तर—युगों का परिवर्तन, कर्मफल की विविधता और माया के आवरण से परे चेतना के वास्तविक स्वरूप का प्रश्न।

इन तीनों स्तरों को एक साथ पढ़ने पर अध्याय केवल भविष्य में होने वाली विपत्तियों का वर्णन नहीं रह जाता। वह मनुष्य और समाज के पतन तथा पुनरुत्थान पर एक व्यापक चिंतन बन जाता है।

यहाँ यह स्पष्ट रखना आवश्यक है कि पुराण में वर्णित युग-चक्र धार्मिक-दार्शनिक अवधारणा है; इसे आधुनिक वैज्ञानिक भविष्यवाणी के रूप में प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार, प्राचीन समाज की कुछ व्यवस्थागत धारणाओं की आज आलोचनात्मक समीक्षा आवश्यक है।

फिर भी इसकी व्यापक नैतिक शिक्षा प्रासंगिक बनी रहती है: जब शक्ति उत्तरदायित्व से अलग हो जाए, ज्ञान अहंकार में बदल जाए और संबंध स्वार्थ के अधीन हो जाएँ, तब समाज में संकट उत्पन्न होता है। सुधार की शुरुआत अपनी भूल पहचानने, सत्य का सम्मान करने और व्यवहार में परिवर्तन लाने से हो सकती है।

इस भाग का सार

कलियुग के विस्तृत वर्णन के बीच व्यास केवल पतन की तस्वीर नहीं रखते। वे यह भी बताते हैं कि संकट आत्मचेतना को जन्म दे सकता है, सदाचार पुनः प्रतिष्ठित हो सकता है और अज्ञान का आवरण हटने पर सत्य का बोध संभव है। चंद्रमा की कलाओं और धूल से ढके स्वर्ण की उपमाएँ इसी आशा को रूप देती हैं।

अगले भाग में

अब भविष्यपर्व की कथा एक नए प्रसंग की ओर बढ़ेगी—वपुष्टमा, इन्द्र और जनमेजय के क्रोध का प्रसंग। मनुष्य के आचरण और युग-परिवर्तन पर विचार के बाद कथा देवताओं, राजधर्म और क्रोध के परिणामों से जुड़े आख्यान में प्रवेश करेगी। यह प्रसंग मन्मथनाथ दत्त के अंग्रेज़ी अनुवाद में भविष्यपर्व, अध्याय ५ के अंतर्गत आता है; अन्य संस्करणों में अध्याय-विभाजन अलग हो सकता है।

मुकेश श्रीवास्तव आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र

(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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