हरिवंशपुराण — भाग ५३-मधु और कैटभ का जन्म

हरिवंशपुराण — भाग ५३ - मधु और कैटभ का जन्म : सृष्टि के भीतर रजस और तमस का संघर्ष

पृथ्वी के स्वरूप और कमलाकार विश्व-रचना के वर्णन के बाद हरिवंशपुराण की कथा अब सृष्टि के भीतर उत्पन्न होने वाले विरोध की ओर बढ़ती है। अब तक वर्णन का केन्द्र सृष्टि का आधार, उसके तत्त्व और उसका विस्तार था; इस प्रसंग में प्रश्न उठता है कि जब सृष्टि का कार्य आरम्भ होता है, तब उसके मार्ग में बाधा डालने वाली शक्तियाँ किस प्रकार प्रकट होती हैं।

भविष्यपर्व के इस अध्याय में मधु और कैटभ नामक दो असुरों का जन्म रजस और तमस गुणों से जोड़ा गया है। कथा उन्हें केवल दो शक्तिशाली विरोधियों के रूप में नहीं रखती, बल्कि उनके माध्यम से सृष्टि में सक्रिय अव्यवस्था, चंचलता और अहंकार का भी चित्र प्रस्तुत करती है।

एकार्णव में दो असुरों का प्राकट्य

वैशम्पायन कहते हैं कि सहस्र युगों के परिवर्तन और सत्ययुग के आरम्भ के प्रसंग में तमोगुण से सम्बद्ध मधु नामक महाअसुर उत्पन्न हुआ। इसके बाद रजोगुण से सम्बद्ध कैटभ का प्राकट्य हुआ। दोनों असुर रूप बदलने में समर्थ थे और उन्होंने एकार्णव के जल को क्षुब्ध करना आरम्भ कर दिया।

पुराण उनके रूप का अत्यन्त प्रभावशाली चित्र खींचता है। वे नीले और लाल वस्त्र धारण किए हुए थे। उनके दाँत उज्ज्वल और भयंकर थे, नेत्र ताम्रवर्ण के थे, भुजाएँ लम्बी और शरीर पर्वतों के समान विशाल था। उनके शरीर की आभा नीले मेघों जैसी तथा मुख सूर्य के समान तेजस्वी बताया गया है। उनकी गतिविधियों से ऐसा प्रतीत होता था मानो समुद्र में उथल-पुथल मच गई हो।

यह वर्णन केवल उनके शारीरिक बल को दिखाने के लिए नहीं है। जिस जलराशि में सृष्टि की पुनर्रचना की भूमिका तैयार हो रही थी, उसी को ये दोनों असुर विचलित करने लगते हैं। सृष्टि की प्रक्रिया के बीच उनका प्रवेश स्थिरता और व्यवधान के टकराव को सामने लाता है।

कमल पर ब्रह्मा और असुरों की चुनौती

उसी समय ब्रह्मा कमल पर स्थित होकर नारायण की आज्ञा से सृष्टि-कार्य में प्रवृत्त थे। उन्हें प्राणियों, देवताओं, समस्त जगत् और अपने मानसपुत्र ऋषियों की रचना करनी थी। मधु और कैटभ ने उन्हें देखा तो उनके भीतर क्रोध और अहंकार जाग उठा।

उन्होंने ब्रह्मा से पूछा—तुम कौन हो? चार मुख और काला मुकुट धारण करके इस कमल पर निश्चिन्त भाव से क्यों बैठे हो? तुम्हारी उत्पत्ति कहाँ से हुई? तुम्हारा रक्षक और सृष्टिकर्ता कौन है? यदि तुम इतने समर्थ हो, तो हमारे साथ युद्ध करो।

यह चुनौती सृष्टि-कार्य में लगे ब्रह्मा को लक्ष्य करके दी गई थी। असुर अपनी शक्ति को सर्वोच्च मानते थे और उन्हें यह स्वीकार नहीं था कि उनके अतिरिक्त भी कोई ऐसी सत्ता हो सकती है, जिसके आधार पर सृष्टि का संचालन होता है।

ब्रह्मा ने उत्तर दिया कि वे उस परम सत्ता से उत्पन्न हुए हैं, जिसे सामान्य जगत् में पूर्णतः जान पाना सम्भव नहीं है, और वे योग में स्थित हैं। इस उत्तर में ब्रह्मा अपनी सत्ता का मूल स्वयं को नहीं बताते; वे अपनी उत्पत्ति का सम्बन्ध उस परम कारण से जोड़ते हैं जो उनसे भी परे है।

रजस और तमस का अहंकार

मधु और कैटभ ने अपनी शक्ति का वर्णन करते हुए कहा कि संसार रजस और तमस से व्याप्त है और वे स्वयं भी इन्हीं गुणों से प्रभावित हैं। उन्होंने दावा किया कि वे प्रत्येक युग में जन्म लेते हैं, संसार को मोहित करते हैं और लोगों की इच्छाओं, सुख, समृद्धि तथा कर्मों पर प्रभाव रखते हैं।

उनका कथन अहंकार की उस स्थिति को प्रकट करता है जिसमें कोई शक्ति अपने प्रभाव को ही सम्पूर्ण सत्य मान बैठती है। वे अपनी उपस्थिति को इतना व्यापक समझते हैं कि उनके लिए किसी उच्चतर सत्ता का अस्तित्व स्वीकार करना कठिन हो जाता है।

ब्रह्मा इसके उत्तर में सत्त्वगुण का उल्लेख करते हैं। वे उस योगियों में श्रेष्ठ, सनातन भगवान् को स्मरण करते हैं जो सत्त्व में स्थित हैं और रजस तथा तमस सहित गुणों के कारण हैं। ब्रह्मा का आशय यह है कि ये दोनों असुर गुणों से प्रभावित हैं, परन्तु गुणों का मूल कारण उनसे परे है। इसलिए उनके बल का विस्तार अनन्त नहीं हो सकता।

यहाँ कथा गुणों के बीच एक दार्शनिक भेद भी सामने रखती है। रजस को गति, प्रवृत्ति और आकांक्षा से तथा तमस को आवरण, जड़ता और अव्यवस्था से जोड़कर समझा जा सकता है। फिर भी मधु और कैटभ को इन गुणों का सम्पूर्ण दार्शनिक अर्थ नहीं मानना चाहिए; वे इस पुराणिक आख्यान में उन गुणों से सम्बद्ध व्यक्तित्व हैं।

भगवान् नारायण के सम्मुख असुर

ब्रह्मा के उत्तर के बाद मधु और कैटभ भगवान् नारायण के पास पहुँचे, जो उस समय एकार्णव में शयन कर रहे थे। उन्होंने स्वीकार किया कि नारायण ही जगत् की उत्पत्ति के एकमात्र कारण हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनका पूर्व व्यवहार भगवान् की महिमा के प्रति एक प्रकार की स्तुति के रूप में समझा जाए।

इसके बाद दोनों असुरों ने भगवान् से वर माँगने की इच्छा व्यक्त की। नारायण ने उनसे पूछा कि वे कौन-सा वर चाहते हैं।

भगवान् ने उन्हें यह वर दिया कि उनका वध केवल उन्हीं के हाथों होगा। इस वर से कथा का तनाव एक नए स्तर पर पहुँचता है। असुर अपनी शक्ति और वीरता पर गर्व करते हैं, फिर भी उनके जीवन और मृत्यु की सीमा अब उसी सत्ता के अधीन है जिसे वे पहचान चुके हैं।

मधु और कैटभ ने इसके उत्तर में एक विचित्र शर्त रखी। उन्होंने चाहा कि उनका वध ऐसे स्थान पर हो जहाँ पहले किसी की मृत्यु न हुई हो और भविष्य के किसी चक्र में वे भगवान् के पुत्रों के रूप में जन्म लें। नारायण ने भविष्य में उनके पुत्ररूप में जन्म लेने की बात स्वीकार की।

यह प्रसंग उल्लेखनीय है, क्योंकि यहाँ असुरों का अन्त केवल पराजय के रूप में नहीं दिखाया गया। कथा उनके लिए भविष्य के सम्बन्ध की सम्भावना भी रखती है। वरदान और मृत्यु, विरोध और निकटता—ये सभी एक ही आख्यान में जुड़ जाते हैं।

असुरों का वध

वर प्रदान करने के बाद भगवान् ने दोनों असुरों को अपनी जाँघों पर रखकर उनका वध किया। इस प्रकार मधु और कैटभ का अन्त उस भगवान् के हाथों हुआ, जिन्हें वे स्वयं जगत् का मूल कारण मान चुके थे।

यहाँ उनके द्वारा माँगी गई शर्त और वध का प्रसंग कथा में संक्षेप से आता है। इस संस्करण में भगवान् द्वारा उन्हें जाँघों पर रखकर मारने का उल्लेख है; इसे अन्य पुराणों में मिलने वाले विस्तृत मधु-कैटभ आख्यानों के साथ मिलाकर अतिरिक्त घटनाएँ जोड़ना उचित नहीं होगा।

प्रसंग का दार्शनिक आशय

मधु और कैटभ का आख्यान सृष्टि-वर्णन में संघर्ष का प्रवेश कराता है। ब्रह्मा सृष्टि की रचना में प्रवृत्त हैं, परन्तु उसी समय ऐसी शक्तियाँ प्रकट होती हैं जो अपनी सत्ता को सर्वोपरि मानती हैं। इससे सृष्टि केवल निर्माण की प्रक्रिया नहीं रहती; वह व्यवस्था और व्यवधान के बीच निरन्तर सम्बन्ध का क्षेत्र भी बन जाती है।

इस कथा का एक अर्थ यह है कि किसी शक्ति का प्रभावशाली होना उसे सर्वोच्च सत्य नहीं बना देता। मधु और कैटभ रजस और तमस से प्रभावित होकर संसार को अपने अधिकार में मानते हैं, लेकिन ब्रह्मा उनके गुणों के कारण को उनसे परे पहचानते हैं। नारायण के सामने उनका अन्त इसी भेद को कथा के स्तर पर स्थापित करता है।

दूसरा अर्थ अहंकार की सीमा से जुड़ा है। असुर पहले ब्रह्मा को चुनौती देते हैं, फिर नारायण की सत्ता स्वीकार करते हैं और उनसे वर माँगते हैं। उनकी शक्ति का दावा अन्ततः उस सत्ता के सामने सीमित हो जाता है, जिसे वे पहले अपने बराबर भी नहीं मानना चाहते थे।

इस प्रकार पृथ्वी और कमल की संरचना के बाद कथा अब सृष्टि के भीतर सक्रिय विरोधी शक्तियों को सामने लाती है। अगले प्रसंग में ब्रह्मा की सृष्टि का विस्तार होगा—जहाँ जगत् के प्राणियों, ऋषियों और अन्य सृष्टिगत वर्गों की रचना का वर्णन इस कथा को आगे बढ़ाएगा।


मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र

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