अध्याय १ — मन क्या है? मन की प्रकृति, संरचना और कार्य
शोधग्रन्थ — अचेतन मन को वश में कैसे करें - प्रथम खण्ड — अचेतन मन का स्वरूप
अध्याय १ — मन क्या है? मन की प्रकृति, संरचना और कार्य
मनुष्य अपने जीवन में अनेक प्रकार के अनुभव करता है। वह सोचता है, अनुभव करता है, इच्छाएँ करता है, निर्णय लेता है, कल्पनाएँ करता है और कभी-कभी ऐसे व्यवहार भी करता है जिन्हें वह स्वयं पूरी तरह समझ नहीं पाता। इन सभी अनुभवों के बीच एक सामान्य सूत्र दिखाई देता है—मन।
लेकिन मन वास्तव में क्या है? क्या मन मस्तिष्क का ही दूसरा नाम है? क्या मन विचारों का समूह है? क्या इच्छाएँ और भावनाएँ ही मन हैं? अथवा इन सबके पीछे कोई ऐसी व्यवस्था काम करती है जो अनुभवों को ग्रहण करती है, उनका अर्थ निर्धारित करती है और हमारे व्यवहार को दिशा देती है?
अचेतन मन को समझने के लिए इन प्रश्नों का उत्तर आवश्यक है। यदि हम मन की प्रकृति को ही नहीं समझेंगे, तो उसके उन कार्यों को नियंत्रित करने का प्रयास कैसे करेंगे जो हमारी जानकारी के बिना होते रहते हैं?
मन की सामान्य धारणा
दैनिक जीवन में हम मन शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में करते हैं। हम कहते हैं कि आज हमारा मन प्रसन्न है, किसी काम में मन नहीं लग रहा, हमारा मन किसी व्यक्ति से हट गया है अथवा हमारा मन कुछ नया करने के लिए प्रेरित कर रहा है।
इन वाक्यों में मन कभी भावना का नाम है, कभी इच्छा का, कभी ध्यान का और कभी निर्णय लेने की आन्तरिक प्रवृत्ति का।
उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति पुस्तक पढ़ने बैठता है। पुस्तक सामने खुली हुई है, आँखें शब्दों को देख रही हैं, लेकिन उसका ध्यान किसी पुराने विवाद में उलझा हुआ है। कुछ समय बाद उसे अनुभव होता है कि वह कई पृष्ठ पढ़ चुका है, परन्तु पढ़ी हुई बातों को समझ नहीं पाया।
इस घटना में शरीर अपना काम कर रहा था, आँखें अपना काम कर रही थीं, लेकिन ध्यान किसी दूसरे विषय में लगा हुआ था। इससे स्पष्ट होता है कि किसी कार्य का शारीरिक रूप से सम्पन्न होना और उसका मानसिक रूप से सम्पन्न होना एक ही बात नहीं है।
इसी प्रकार, कोई व्यक्ति क्रोध नहीं करना चाहता, फिर भी किसी विशेष परिस्थिति में क्रोधित हो उठता है। बाद में उसे अपनी प्रतिक्रिया पर पछतावा होता है। यहाँ उसकी घोषित इच्छा और वास्तविक व्यवहार में अन्तर दिखाई देता है।
इस प्रकार मन को केवल विचारों का संग्रह मानना पर्याप्त नहीं है। मनुष्य का मानसिक जीवन अनेक परस्पर सम्बद्ध प्रक्रियाओं से निर्मित होता है।
मन और मस्तिष्क का सम्बन्ध
आधुनिक विज्ञान के अनुसार मस्तिष्क तंत्रिका-तंत्र का एक प्रमुख अंग है। इसमें अरबों तंत्रिका कोशिकाएँ तथा उनके बीच जटिल सम्पर्क होते हैं। यही व्यवस्था संवेदना, स्मृति, भाषा, भावनाओं, निर्णय, गति और अनेक अन्य कार्यों में भाग लेती है।
मन शब्द का प्रयोग दूसरी ओर हमारे मानसिक अनुभवों और प्रक्रियाओं के लिए किया जाता है—जैसे विचार करना, भय अनुभव करना, किसी वस्तु को याद करना, निर्णय लेना अथवा किसी विषय पर ध्यान देना।
इसलिए मस्तिष्क और मन को एक ही अर्थ में प्रयोग करना उचित नहीं होगा। मस्तिष्क एक जैविक अंग है, जबकि मन सामान्यतः मानसिक प्रक्रियाओं और अनुभवों को समझने की अवधारणा है। दोनों का गहरा सम्बन्ध है, लेकिन मन की प्रकृति और चेतन अनुभवों की पूरी व्याख्या किस प्रकार की जाए, यह दर्शन और विज्ञान में अब भी अध्ययन का विषय है।
जब किसी व्यक्ति को भय होता है, तो उसके अनुभव में विचार, भावना, शारीरिक परिवर्तन और व्यवहार की तैयारी एक साथ दिखाई दे सकती है। उसका हृदय तेजी से धड़क सकता है, ध्यान खतरे की ओर जा सकता है और वह बचने का प्रयास कर सकता है। इस प्रकार मानसिक और शारीरिक प्रक्रियाएँ अलग-अलग बन्द खानों में काम नहीं करतीं।
अचेतन मन के अध्ययन में यह सम्बन्ध विशेष महत्त्व रखता है, क्योंकि अनेक प्रतिक्रियाएँ ऐसी प्रक्रियाओं पर निर्भर होती हैं जिनके घटित होने का हमें प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता।
मन की प्रमुख प्रक्रियाएँ
मन की कार्यप्रणाली को समझने के लिए उसकी कुछ प्रमुख प्रक्रियाओं को अलग-अलग देखना उपयोगी है। यह वर्गीकरण समझने की सुविधा के लिए है; वास्तव में ये प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से जुड़ी रहती हैं।
संवेदना और प्रत्यक्षीकरण
हमारा शरीर बाहरी और आन्तरिक वातावरण से संकेत ग्रहण करता है। आँखें प्रकाश, कान ध्वनि और त्वचा स्पर्श से सम्बन्धित सूचनाएँ ग्रहण करती हैं। लेकिन केवल सूचना ग्रहण करना पर्याप्त नहीं है। मस्तिष्क इन संकेतों को व्यवस्थित करके उनका अर्थ भी निर्धारित करता है।
एक ही वाक्य किसी व्यक्ति को सामान्य लग सकता है, जबकि दूसरे को अपमानजनक प्रतीत हो सकता है। इसका कारण केवल सुने गए शब्द नहीं हैं; व्यक्ति की अपेक्षाएँ, पूर्व अनुभव और वर्तमान भावनात्मक स्थिति भी उसके अर्थ-निर्धारण को प्रभावित कर सकती हैं।
ध्यान
हमारे सामने अनेक संकेत उपस्थित होते हैं, लेकिन हम सभी पर समान रूप से ध्यान नहीं दे पाते। ध्यान कुछ सूचनाओं को प्राथमिकता देता है और अन्य को पृष्ठभूमि में छोड़ देता है।
यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष समस्या से चिन्तित है, तो उसका ध्यान बार-बार उसी समस्या से सम्बन्धित संकेतों की ओर जा सकता है। इससे उसे संसार का अनुभव भी उसी समस्या के प्रभाव में अधिक होने लगता है।
स्मृति और अधिगम
मनुष्य अनुभवों से सीखता है। कुछ अनुभवों को वह सचेत रूप से याद करता है, जबकि कुछ सीखी हुई क्षमताएँ अभ्यास के कारण सहज हो जाती हैं। साइकिल चलाने, परिचित रास्ते पर चलने या किसी भाषा के सामान्य वाक्य बोलने में सीखे हुए कौशलों का योगदान होता है।
स्मृति केवल अतीत को सुरक्षित रखने का साधन नहीं है। यह वर्तमान को समझने और भविष्य के सम्भावित परिणामों का अनुमान लगाने में भी सहायता करती है।
भावनाएँ
भय, क्रोध, प्रेम, लज्जा, प्रसन्नता और दुःख केवल विचार नहीं हैं। वे हमारे अनुभव, ध्यान, शारीरिक स्थिति और व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।
उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को पहले किसी बैठक में अपमानित किया गया हो, तो अगली बैठक से पहले ही उसमें बेचैनी उत्पन्न हो सकती है। वर्तमान परिस्थिति में कोई अपमान न हुआ हो, फिर भी पुराना अनुभव उसकी प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकता है।
निर्णय और संकल्प
हम कई बार विकल्पों पर विचार करके निर्णय लेते हैं। दूसरी बार निर्णय बहुत जल्दी हो जाता है। कभी हम लाभ-हानि का आकलन करते हैं, तो कभी परिचित आदत या तत्काल भावना के अनुसार प्रतिक्रिया दे देते हैं।
यह अन्तर बताता है कि मनुष्य के व्यवहार में सचेत विचार के साथ-साथ शीघ्र और स्वचालित प्रक्रियाएँ भी योगदान करती हैं।
क्या मन का प्रत्येक कार्य सचेत होता है?
नहीं। मनुष्य अपने सभी मानसिक कार्यों से समान रूप से परिचित नहीं होता।
जब कोई व्यक्ति पहली बार गाड़ी चलाना सीखता है, तो उसे प्रत्येक क्रिया पर ध्यान देना पड़ता है। क्लच, ब्रेक, गति, सड़क और आसपास के वाहनों के बीच तालमेल बैठाना कठिन लगता है। अभ्यास बढ़ने पर कई क्रियाएँ अधिक सहज होने लगती हैं।
इस परिवर्तन का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति का पूरा मन अचेतन हो गया। इसका अर्थ यह है कि अभ्यास से सीखी गई कुछ प्रक्रियाओं को सम्पन्न करने के लिए पहले जितने सचेत प्रयास की आवश्यकता थी, उतनी अब नहीं रह जाती।
इसी प्रकार, हम किसी परिचित व्यक्ति की आवाज पहचान सकते हैं, किसी वाक्य का अर्थ शीघ्र समझ सकते हैं या किसी परिस्थिति में तुरन्त प्रतिक्रिया दे सकते हैं। इन प्रक्रियाओं के सभी चरण हमारे सचेत अनुभव में उपस्थित नहीं होते।
आधुनिक संज्ञानात्मक मनोविज्ञान में ऐसी प्रक्रियाओं को समझने के लिए स्वचालितता, अप्रत्यक्ष अधिगम और अचेतन सूचना-प्रसंस्करण जैसी अवधारणाओं का उपयोग किया जाता है।
यहाँ एक सावधानी आवश्यक है। किसी प्रक्रिया का स्वतः होना और किसी गहरे, छिपे हुए मानसिक भण्डार में उसका सुरक्षित होना एक ही बात नहीं है। प्रत्येक स्वचालित प्रतिक्रिया को किसी दबी हुई स्मृति या गुप्त इच्छा से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा।
मन के बारे में भारतीय दर्शन की दृष्टि
भारतीय दर्शन में मन की चर्चा केवल दैनिक विचारों तक सीमित नहीं रही। विभिन्न दार्शनिक परम्पराओं ने मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त और चेतना के सम्बन्ध को अलग-अलग ढंग से समझाया है।
सांख्य और योग परम्परा में मन, बुद्धि तथा अहंकार को अन्तःकरण की विभिन्न कार्यप्रणालियों के रूप में समझा जाता है। सामान्य रूप में मन विकल्पों और मानसिक गतिविधियों से, बुद्धि निर्णय तथा विवेक से और अहंकार अनुभवों को ‘मैं’ से जोड़ने की प्रवृत्ति से सम्बन्धित माना जाता है।
योगसूत्र में चित्तवृत्तियों की चर्चा मन के अध्ययन के लिए विशेष महत्त्व रखती है। पतञ्जलि का सूत्र है—
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥— योगसूत्र १.२
इसका सामान्य अर्थ है—योग चित्त की वृत्तियों के निरोध का नाम है।
यहाँ निरोध का अर्थ केवल विचारों को जबरन दबाना नहीं समझना चाहिए। योग की व्यापक साधना में चित्त की गतिविधियों को समझना, उनके साथ अपने सम्बन्ध को बदलना और मन को स्थिर करने का अभ्यास सम्मिलित है।
भगवद्गीता में मन को चञ्चल और कठिनता से नियंत्रित होने वाला कहा गया है। अर्जुन की कठिनाई के उत्तर में श्रीकृष्ण अभ्यास और वैराग्य का मार्ग बताते हैं—
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥— भगवद्गीता ६.३५
अर्थात् अभ्यास और वैराग्य के द्वारा मन को वश में किया जा सकता है।
यह कथन हमारे शोध के लिए एक प्रारम्भिक दार्शनिक संकेत देता है। मन पर नियन्त्रण केवल इच्छा व्यक्त करने से नहीं, बल्कि अभ्यास और आसक्ति के प्रति अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन से भी सम्बन्धित है।
फिर भी योगदर्शन के चित्त और आधुनिक मनोविज्ञान के मन को पूर्णतः समान नहीं माना जा सकता। दोनों की अपनी पृष्ठभूमि, उद्देश्य और विश्लेषण की पद्धतियाँ हैं।
मन और साक्षी का प्रश्न
मनुष्य कहता है, “मेरे मन में क्रोध है”, “मेरे मन में भय है” अथवा “मेरा मन आज अशान्त है।”
इन वाक्यों में एक रोचक बात दिखाई देती है। मनुष्य अपने मानसिक अनुभव को पहचान सकता है और उसके बारे में विचार भी कर सकता है। कभी वह क्रोध में बह जाता है; कभी उसे यह भी दिखाई देने लगता है कि उसके भीतर क्रोध उत्पन्न हो रहा है।
इन दोनों स्थितियों में व्यावहारिक अन्तर है।
पहली स्थिति में व्यक्ति अपनी प्रतिक्रिया के साथ इतना तादात्म्य स्थापित कर लेता है कि उसे दूसरा विकल्प दिखाई नहीं देता। दूसरी स्थिति में वह अपनी प्रतिक्रिया को पहचानने लगता है और सम्भवतः उत्तर देने से पहले कुछ क्षण रुक सकता है।
भारतीय दर्शन में इस प्रकार की आत्मनिरीक्षणात्मक स्थिति को समझने के लिए साक्षीभाव की अवधारणा उपयोगी है। लेकिन साक्षी को केवल आधुनिक मनोविज्ञान की मेटाकॉग्निशन—अर्थात् अपनी सोच के बारे में सोचने की क्षमता—का पर्याय नहीं माना जा सकता। दोनों के बीच कुछ व्यावहारिक समानताएँ हो सकती हैं, जबकि उनके दार्शनिक अर्थ अलग हैं।
अचेतन मन को समझने की दिशा में यह भेद महत्त्वपूर्ण है। हम जिस प्रक्रिया से प्रभावित हो रहे हैं, यदि उसे पहचानना सीखें, तो उसके प्रभाव में आने और उसके अनुसार कार्य करने के बीच कुछ दूरी सम्भव हो सकती है।
मन को वश में करने का वास्तविक अर्थ
मन को वश में करने का अर्थ यह नहीं है कि मन में कोई अवांछित विचार कभी उत्पन्न ही न हो। न ही इसका अर्थ सभी भावनाओं को दबा देना है।
विचारों का उत्पन्न होना, भावनाओं का बदलना और स्मृतियों का उभरना मानवीय मानसिक जीवन का हिस्सा है। समस्या तब उत्पन्न हो सकती है जब कोई प्रतिक्रिया इतनी प्रबल या अभ्यस्त हो जाए कि वह हमारे विवेक, सम्बन्धों और व्यवहार को बार-बार हानि पहुँचाने लगे।
उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को क्रोध आता है। वह क्रोध उत्पन्न होने से पहले प्रत्येक बार उसे रोक नहीं सकता, लेकिन वह धीरे-धीरे यह पहचान सकता है कि किन परिस्थितियों में क्रोध बढ़ता है, शरीर में उसके क्या संकेत दिखाई देते हैं और प्रतिक्रिया देने से पहले वह कौन-सा वैकल्पिक व्यवहार अपना सकता है।
इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति काम टालता है, तो केवल स्वयं को आलसी कहने से समस्या का समाधान नहीं होगा। उसे यह देखना होगा कि टालने के पीछे कठिनाई का भय, असफलता की आशंका, कार्य की अस्पष्टता, थकान या कोई अन्य कारण तो नहीं है।
इस दृष्टि से मन पर नियन्त्रण का अर्थ है—अपनी मानसिक प्रक्रियाओं को पहचानना, उनके कारणों की जाँच करना और अपने व्यवहार में अधिक विवेकपूर्ण विकल्प विकसित करना।
इस अध्याय से प्राप्त निष्कर्ष
मन को एक अकेली वस्तु या एक ही प्रकार की प्रक्रिया मानना उचित नहीं है। यह विचार, भावना, स्मृति, ध्यान, निर्णय, अधिगम और स्वचालित प्रतिक्रियाओं से जुड़ी अनेक प्रक्रियाओं का व्यापक नाम है।
मस्तिष्क इन प्रक्रियाओं का जैविक आधार प्रदान करता है, जबकि मन की अनुभूतियों और चेतना की प्रकृति के बारे में वैज्ञानिक तथा दार्शनिक प्रश्न अभी भी महत्त्वपूर्ण हैं।
हमारे सभी मानसिक कार्य सचेत नहीं होते। कुछ प्रक्रियाएँ अभ्यास, पूर्व अनुभव और स्वचालित सूचना-प्रसंस्करण के कारण हमारी स्पष्ट जागरूकता के बिना भी काम करती हैं। लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि हमारे प्रत्येक व्यवहार का कोई एक छिपा हुआ कारण है या अचेतन मन एक स्वतंत्र सत्ता है जो हमें पूरी तरह नियंत्रित करती है।
इस शोध की पहली आधारशिला यही है—मनुष्य को अपने मन की प्रत्येक गतिविधि का ज्ञान नहीं होता, लेकिन वह अपनी मानसिक प्रक्रियाओं को पहचानने और अपने व्यवहार को बदलने की क्षमता विकसित कर सकता है।
इसी आधार पर आगे अचेतन मन का अध्ययन किया जाएगा।
अगला अध्याय — अध्याय २ : चेतना क्या है? अनुभव करने, जानने और स्वयं को पहचानने की क्षमता।
इस अध्याय में जागरूकता, निद्रा, स्वप्न, आत्मबोध, ध्यान और चेतना के वैज्ञानिक तथा दार्शनिक प्रश्नों का अध्ययन होगा। इसके बाद ही अचेतन और अवचेतन के बीच के अन्तर को अधिक स्पष्टता से समझा जा सकेगा।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)
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