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रात खूं आलूदा हो गयी

रात खूं आलूदा हो गयी चांदनी ख़फ़ा हो गयी रो दिए तुम,बाद उसके शाम ग़मज़दा हो गयी दोस्त जब से तुम गए ज़िंदगी बेमज़ा हो गयी कंही चैन मिलता नहीं हर बात बेमज़ा हो गयी इक बार बता तो जाते मुझसे खता क्या हो गयी  मुकेश इलाहाबादी ----

गुलाल बन के महफ़िल में आपही उड़े होगे

गुलाल बन के महफ़िल में आपही उड़े होगे वरना शाम बड़ी उदास उदास और सादी थी मुकेश इलाहाबादी ----------------------------

सफरे हयात पे निकल पड़ा हूँ मै

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सफरे हयात पे निकल पड़ा हूँ मै तेरे घर की ज़ानिब चल पड़ा हूँ मै राहे ईश्क पे अब भटके न कोई राह में मील के पत्थर सा गड गया हूँ मै जानता हूँ है ज़माना दुश्मन अपनी दोस्ती का पर अपनी ज़िद पे अड़ गया हूँ मै फ़ितरते गुल ले कर कब तक खिला रहता ? हर सिम्त धूप ही धूप थी मुरझा गया हूँ मै मुकेश इलाहाबादी -------

रिश्तों में थोड़ी तो आंच बचाये रखिये,

रिश्तों में थोड़ी तो आंच बचाये रखिये, सिलसिला मुलाक़ात का बनाए रखिये बहार तो तुम्हारे घर भी आ जायेगे, बस मुहब्बत के दो चार फूल खिलाये रखिये साँझ से ही घर में अँधेरा अच्छा नहीं कम से काम इक चराग जलाये रखिये नफरत की आग सब कुछ झुलसा देगी मुहब्बत का इक दरिया बहाये रखिये मुकेश होठों पे तुम कोई भी तराना रखो दिल में मगर सब के लिए दुआएं रखिये मुकेश इलाहाबादी ---------------------

पहचान छुपा कर आ जाओ

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पहचान छुपा कर आ जाओ नक़ाब पहन कर आ जाओ गर बादल सा उड़ना है तो क़फ़स तोड़ कर आ जाओ ज़माना तो मिलने न देगा कोई बहाना कर आ जाओ हुआ है मौसम आशिकाना दोस्त समझ कर आ जाओ तुम ख़फ़ा खफा क्यूँ बैठे हो गुस्सा थूक कर आ जाओ मुकेश इलाहाबादी -------

तुम्हारी बातों में सच्चाई है

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दोस्त बड़े गुस्से में लगते हो तल्ख़ तेवर में बात करते हो तुम्हारी बातों में सच्चाई है गैर देश के वासी लगते हो नीली -२  झील सी आखों में तुम किसके सपने बुनते हो तुम  मुझे अपना पता दे दो शहर में  तुम कहाँ रहते हो तुमसे दोस्ती करना चाहूँगा तुम मुझे अच्छे लगते हो मुकेश इलाहाबादी ---------

सुई पटक सन्नाटा है

सुई पटक सन्नाटा है चौराहे पे बम फटा है शहर घर में  दुपका है बाहर पुलिस का डंडा है बस्ती महफूज़ है पर रहज़नी का ख़तरा है किसी बहन - बेटी का फिर चीर -हरण हुआ है ग़ज़ल का मज़मून भी अखबार जैसा हो गया है  मुकेश इलाहाबादी -----

सड़क और कारखाना बना रहे हैं

सड़क और कारखाना बना रहे हैं विकास का झुनझुना बजा रहे हैं चेहरे की ये कालिख नहीं दिखती मगर घर और गाड़ी चमका रहे हैं जिस खेत में  अनाज उगा करते थे आज मॉल औ एपार्टमेंट बना रहे हैं पेरेंट्स इस बात से खुश हो रहे हैं उनके बच्चे ऐप् व  नेट चला रहे हैं मुकेश इस बात को लेकर दुखी है ये किस विनास की ओर जा रहे हैं मुकेश इलाहाबादी ------------------------

वही रात वही ख्वाब पुराने

वही रात वही ख्वाब पुराने वही बस्ती वही लोग सयाने वही सितार और वही तम्बूरा वही  साज़ वही  नगमे पुराने हमारे घर आज भी मुहर्रम है वो गया चाँद संग ईद मनाने फिर वही दर्द  वही ज़ख्म है सूखने में जिसे लगे ज़माने कोई नया क़लाम हो तो छेड़ो लगे वही पुरानी ग़ज़ल सुनाने मुकेश इलाहाबादी ---------

रेत् के बंज़र खेत में बिरुवा उगता हूँ

रेत् के बंज़र खेत में बिरुवा उगता हूँ पानी की सतह पर  नज़्म लिखता हूँ   सयानों की महफ़िलों में जाता नहीं,,, सीधे सादो को अपनी ग़ज़लें सुनाता हूँ मुकेश इलाहाबादी ----------------------