हरिवंशपुराण शोधग्रन्थ - भाग ७९ — विष्णु द्वारा हिरण्यकशिपु का वध
हरिवंशपुराण शोधग्रन्थ - भाग ७९ — विष्णु द्वारा हिरण्यकशिपु का वध हिरण्यकशिपु के अत्याचार और उसके वरदान से उत्पन्न अजेयता के विश्वास का अन्त भगवान विष्णु के नरसिंह-अवतार में होता है। यह आख्यान दैवी शक्ति, अहंकार, भक्त-रक्षा और धर्म की पुनर्स्थापना को एक साथ प्रस्तुत करता है। आख्यान हिरण्यकशिपु ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया था। उस वरदान के कारण उसका विश्वास दृढ़ हो गया था कि कोई भी प्राणी उसका वध नहीं कर सकता। इसी विश्वास ने उसके भीतर अहंकार को बढ़ाया और वह अपने को समस्त लोकों का सर्वोच्च शासक मानने लगा। उसके शासन में देवता और अन्य प्राणी भयभीत थे। वह अपनी इच्छा को ही नियम मानता था और अपनी सत्ता के सामने किसी दूसरे अधिकार को स्वीकार नहीं करना चाहता था। उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त था। प्रह्लाद की विष्णु-भक्ति हिरण्यकशिपु के अहंकार के लिए चुनौती बन गई, क्योंकि उसका पुत्र उस सत्ता को सर्वोच्च मानता था जिसे हिरण्यकशिपु अपना विरोधी समझता था। हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को अनेक प्रकार से अपनी भक्ति छोड़ने के लिए विवश किया, लेकिन प्रह्लाद अपने विश्वास से विचलित...