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भगवद्गीता प्रथम अध्याय, पञ्चदश श्लोक : एक शोधपूर्ण, रोचक, वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विवेचन

 गवद्गीता प्रथम अध्याय, पञ्चदश श्लोक : एक शोधपूर्ण, रोचक, वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विवेचन मूल श्लोक - पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।-पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥ १.१५ ॥ हृषीकेशः पाञ्चजन्यं दध्मौ, धनञ्जयः देवदत्तं (शङ्खं दध्मौ), भीमकर्मा वृकोदरः महाशङ्खं पौण्ड्रं दध्मौ। सामान्य हिन्दी अर्थ हृषीकेश भगवान श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य शंख बजाया, धनंजय अर्जुन ने देवदत्त शंख बजाया और भयंकर कर्म करने वाले वृकोदर भीम ने महाशंख पौण्ड्र बजाया। अब केवल शंख नहीं, व्यक्तित्व बोल रहे हैं पिछले श्लोक में व्यास ने कहा था कि कृष्ण और अर्जुन ने दिव्य शंख बजाए। अब वे उन शंखों के नाम बताते हैं। पहली दृष्टि में यह सामान्य विवरण लगता है। किन्तु प्रश्न उठता है— यदि केवल युद्ध का वर्णन करना होता, तो शंखों के नाम बताने की आवश्यकता क्या थी? क्योंकि भारतीय परम्परा में नाम केवल पहचान नहीं, स्वभाव का संकेत होता है। यहाँ शंख नहीं बज रहे। यहाँ तीन चेतनाएँ बोल रही हैं— कृष्ण की चेतना, अर्जुन की चेतना ,भीम की चेतना और आश्चर्य यह है कि तीनों के शंख उनके आन्तरिक स्वरूप का परिचय देते हैं...

चिंतन - क्या संदेह आत्मा की पहली सीढ़ी होता है?

  चिंतन -  क्या संदेह आत्मा की पहली सीढ़ी होता है? हमने बचपन से सीखा कि संदेह बुरा है। संदेह विश्वास को तोड़ देता है, संबंधों को कमज़ोर कर देता है, मन को अशांत कर देता है। इसलिए हमें विश्वास करना सिखाया गया, प्रश्न करना नहीं; स्वीकार करना सिखाया गया, परखना नहीं। परंतु कभी-कभी मैं सोचता हूँ—यदि संसार के हर सत्य को बिना संदेह के स्वीकार कर लिया जाता, तो क्या मनुष्य कभी सत्य तक पहुँच पाता? शायद नहीं। क्योंकि हर महान खोज की शुरुआत विश्वास से नहीं, संदेह से हुई है। संदेह का स्वभाव विचित्र है। वह नकार नहीं है; वह सत्य के प्रति ईमानदारी है। वह कहता है— "मैं मानने को तैयार हूँ, पर पहले जानना चाहता हूँ।" यही आग्रह मनुष्य को भीड़ से अलग करता है। भीड़ विश्वास करती है; साधक सत्यापित करता है। इसलिए संदेह को केवल संशय कहना उसके साथ अन्याय होगा। वह चेतना का जागरण भी है। एक शिशु जब पहली बार किसी वस्तु को हाथ में लेकर उसे उलट-पलट कर देखता है, तब वह केवल खेल नहीं रहा होता; वह संसार पर संदेह कर रहा होता है। वह यह स्वीकार नहीं करता कि जो दिखाई दे रहा है, वही उसका संपूर्ण स्वरूप है। उसकी जिज्ञास...

.चिंतन - क्या प्रतीक्षा ही प्रेम का सबसे दीर्घ वाक्य है?

 . चिंतन -  क्या प्रतीक्षा ही प्रेम का सबसे दीर्घ वाक्य है? मनुष्य ने प्रेम की अनेक परिभाषाएँ लिखीं, पर शायद उसकी सबसे सच्ची परिभाषा कभी शब्दों में नहीं आई। वह आई—प्रतीक्षा में। मैं अक्सर सोचता हूँ, प्रेम की पहचान मिलन से कम और प्रतीक्षा से अधिक क्यों होती है? जो सहज उपलब्ध है, वह मन को प्रिय हो सकता है; किंतु जो अनुपस्थित होकर भी भीतर उपस्थित रहे, वही शायद प्रेम है। इसलिए प्रश्न उठता है—क्या प्रतीक्षा ही प्रेम का सबसे दीर्घ वाक्य है? प्रतीक्षा समय को केवल काटती नहीं, उसे अर्थ भी देती है। जिस समय में किसी की प्रतीक्षा न हो, वह केवल घड़ी की सूइयों का चलना है। किंतु जिस क्षण किसी के आने की संभावना मन में हो, वही क्षण अचानक जीवित हो उठता है। तब एक-एक पल अपनी अलग ध्वनि रखने लगता है। समय तब कैलेंडर नहीं रहता, धड़कन बन जाता है। ध्यान से देखिए, प्रकृति का अधिकांश सौंदर्य भी प्रतीक्षा में ही जन्म लेता है। बीज वर्षा की प्रतीक्षा करता है। धरती बादलों की। भोर सूर्य की। चकोर चंद्रमा की। और समुद्र उस नदी की, जो अंततः उसकी ओर लौटेगी। प्रकृति जानती है कि जो बिना प्रतीक्षा के मिल जाए, उसका मू...

चिंतन - क्या मौन भी भीतर का एक शास्त्र है?

  चिंतन -  क्या मौन भी भीतर का एक शास्त्र है? मनुष्य ने बोलना बहुत पहले सीख लिया था, पर मौन को पढ़ना आज तक नहीं सीख पाया। शब्दों का अपना व्याकरण है, अपना कोश है, अपना इतिहास है; किंतु मौन का कोई शब्दकोश नहीं। उसे किसी भाषा में नहीं बाँधा जा सकता। वह लिखा कम जाता है, जिया अधिक जाता है। शायद इसीलिए मैं कभी-कभी सोचता हूँ—क्या मौन भी भीतर का एक शास्त्र है? ऐसा शास्त्र, जिसे पढ़ने के लिए आँखों से अधिक अंतःकरण की आवश्यकता होती है। हमने ज्ञान को प्रायः शब्दों में खोजा है। ग्रंथ लिखे, भाष्य रचे, वाद-विवाद किए। किंतु क्या यह विचित्र नहीं कि सबसे बड़ी अनुभूतियाँ शब्दों के समाप्त होने पर ही घटित होती हैं? प्रेम अपने चरम पर पहुँचकर चुप हो जाता है। शोक अपनी गहराई में पहुँचकर रोना भी छोड़ देता है। प्रार्थना अपने शुद्धतम रूप में शब्दों की याचना नहीं रहती, केवल एक मौन उपस्थिति बन जाती है। मानो शब्द यात्रा हों और मौन गंतव्य। मौन को अक्सर लोग अनुपस्थिति समझ लेते हैं। जैसे कुछ न कहना, कुछ न होना। परंतु मौन रिक्तता नहीं, परिपूर्णता भी हो सकता है। जिस प्रकार आकाश खाली दिखाई देता है, जबकि उसी ...

चिंतन - क्या स्मृतियाँ समय की सबसे धीमी नदी हैं?

  चिंतन -  क्या स्मृतियाँ समय की सबसे धीमी नदी हैं? नदियाँ केवल पृथ्वी पर नहीं बहतीं। कुछ नदियाँ मनुष्य के भीतर भी बहती हैं। बाहर की नदियाँ समुद्र तक पहुँच जाती हैं, भीतर की नदियाँ कभी किसी किनारे तक नहीं पहुँचतीं। वे जीवन भर बहती रहती हैं—कभी दिखाई देती हुई, कभी भूमिगत होकर। उनका नाम है— स्मृति। मैं अक्सर सोचता हूँ कि समय को यदि किसी रूपक में बाँधना हो, तो वह घड़ी नहीं होगी, कैलेंडर भी नहीं। समय शायद एक नदी होगा। और यदि स्मृति को किसी रूपक में समझना हो, तो वह उस नदी का सबसे धीमा प्रवाह होगी। धीमी इसलिए कि वह कभी सचमुच बीतती नहीं। हम मान लेते हैं कि घटनाएँ पीछे छूट गईं। लोग चले गए। घर बदल गए। शहर बदल गए। ऋतुएँ बदल गईं। लेकिन स्मृति का जल किसी अदृश्य घाट पर ठहरा रहता है। वर्षों बाद भी कोई गंध, कोई धुन, कोई शब्द, कोई स्पर्श उस जल में हल्की-सी कंकड़ी फेंक देता है, और सतह पर फिर वही पुरानी लहरें उठने लगती हैं। समय आगे बढ़ जाता है; स्मृति पीछे नहीं रहती। वह भीतर समानांतर बहती रहती है। यही कारण है कि वृद्ध व्यक्ति अपने बचपन को वर्तमान काल में सुनाने लगता है। वह नहीं कहता—"वहाँ एक पे...

चिंतन - क्या प्रश्न भी चेतना के कठफोड़वे होते हैं?

  चिंतन -  क्या प्रश्न भी चेतना के कठफोड़वे होते हैं? कुछ प्रश्न उत्तर पाने के लिए नहीं जन्म लेते; वे भीतर सोई हुई किसी लकड़ी पर लगातार चोंच मारने के लिए आते हैं। मैंने कई बार सोचा है कि प्रश्न आखिर होते क्या हैं? क्या वे केवल भाषा के व्याकरण हैं? केवल जिज्ञासा की आकृतियाँ? या वे हमारी चेतना के ऐसे कठफोड़वे हैं, जो मन के वृक्ष पर तब तक चोंच मारते रहते हैं, जब तक भीतर छिपा हुआ कोई जीवित रस बाहर न आ जाए? वन में कठफोड़वा किसी वृक्ष को नष्ट करने नहीं आता। वह उसकी छाल पर प्रहार करता है क्योंकि उसे विश्वास होता है कि उस कठोर सतह के नीचे जीवन की कोई हलचल है। यदि वृक्ष बिल्कुल मृत हो, तो वह वहाँ अधिक देर नहीं ठहरता। उसके प्रहार में हिंसा नहीं, खोज होती है। प्रश्न भी शायद ऐसे ही होते हैं। वे हमारी निश्चितताओं की छाल पर चोट करते हैं। वे विश्वासों के तनों पर अपनी नुकीली चोंच टिकाकर पूछते हैं—"क्या सचमुच यही सत्य है?" और जब तक भीतर से कोई उत्तर, कोई संशय, कोई नई संभावना बाहर नहीं आती, वे रुकते नहीं। मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह नहीं कि उसके पास उत्तर नहीं हैं। उसका सबसे बड़ा दुर्भाग्...

मुहब्बत का तरीक़ा

  मुहब्बत का तरीक़ा मैंने तुम्हें कभी बाँधने की कोशिश नहीं की। जो परिंदे दिल में घर बना लेते हैं, उन्हें पिंजरों की ज़रूरत नहीं होती। मुकेश ,,,,,,,,,,