हरिवंश पुराण - तृतीय खंड — भाग 26 - द्वारका का विस्तार — नगर, समुद्र और राजनीतिक भूगोल मथुरा से पश्चिम की यात्रा हरिवंश के विष्णुपर्व में द्वारका की स्थापना का प्रसंग यादवों की यात्रा से आरम्भ होता है। जरासंध के निरंतर विरोध और मथुरा पर संकट की पृष्ठभूमि में कृष्ण यादवों को पश्चिम दिशा की ओर ले जाते हैं। यात्रा के बाद वे समुद्र के निकट पहुँचते हैं। वहाँ का तटीय प्रदेश, वनस्पति, समुद्री हवा और विस्तृत भूमि कथा में नए नगर के चयन की पृष्ठभूमि बनते हैं। इसके बाद कृष्ण समुद्र के किनारे एक ऐसे भूभाग को देखते हैं जहाँ नगर बसाया जा सकता है। आख्यान में भूमि की प्रकृति, नगर के लिए उसकी उपयुक्तता और समुद्र से उसकी निकटता का वर्णन मिलता है। इस प्रकार द्वारका का जन्म केवल किसी चमत्कारिक नगरी की कल्पना के रूप में नहीं, बल्कि एक स्थान के चयन और वहाँ बसावट की कथा के रूप में भी सामने आता है। इस प्रसंग का पहला महत्त्व भौगोलिक है। कृष्ण-कथा में स्थान परिवर्तन का कारण राजनीतिक संकट है, लेकिन समाधान के लिए चुना गया स्थान अपने प्राकृतिक परिवेश के कारण भी महत्त्वपूर्ण है। समुद्र यहाँ केवल कथा की पृष्ठभूमि नह...
सुंदर
ReplyDeleteकिसी का जाना भी जब उसके आने की खबर देने लगे तब तो उससे विरह संभव ही नहीं
ReplyDeletethnx
Deleteसुंदर
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