महाभारत — आश्रमवासिकपर्व - भाग 1 : राजमहल से वन की ओर

 महाभारत — आश्रमवासिकपर्व - भाग 1 : राजमहल से वन की ओर

कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हुए वर्षों बीत चुके थे। हस्तिनापुर में अब युद्ध की धूल नहीं थी, पर उसकी स्मृतियाँ अभी भी जीवित थीं। युधिष्ठिर के शासन में राज्य व्यवस्थित था। प्रजा सुखी थी, राजकोष समृद्ध था और पाण्डवों ने अपने जीवन का अधिकांश भाग उस व्यवस्था को स्थिर करने में लगा दिया था जिसे युद्ध ने लगभग नष्ट कर दिया था।

किन्तु राजमहल के भीतर एक ऐसा मौन था जिसे बाहरी समृद्धि ढँक नहीं सकती थी।

धृतराष्ट्र जीवित थे। उनके साथ गांधारी और कुन्ती भी थीं। वे उसी हस्तिनापुर में रहते थे जहाँ कभी धृतराष्ट्र सम्राट थे और जहाँ से उनके पुत्रों ने उस युद्ध को जन्म दिया था जिसने सम्पूर्ण कुरुवंश को बदल दिया।

युधिष्ठिर धृतराष्ट्र का अत्यन्त सम्मान करते थे। वे जानते थे कि वृद्ध राजा ने अपने जीवन में अनेक भूलें की थीं, किन्तु अब वे एक ऐसे वृद्ध मनुष्य थे जिसके सामने उसका अपना अतीत प्रतिदिन खड़ा रहता था।

धृतराष्ट्र की दृष्टि भौतिक रूप से पहले ही समाप्त हो चुकी थी; अब उनकी चेतना के भीतर स्मृतियों का संसार अधिक तीव्र था।

कभी दुर्योधन की बाल्यावस्था स्मरण आती, कभी भीष्म, द्रोण और विदुर की सभा, कभी पासे का खेल और कभी कुरुक्षेत्र।

युद्ध समाप्त हो गया था, लेकिन स्मृति का युद्ध समाप्त नहीं हुआ था।

यही आश्रमवासिकपर्व का मूल मानवीय प्रश्न है—
क्या बाहरी परिस्थिति बदल जाने मात्र से मनुष्य अपने अतीत से मुक्त हो जाता है?

महाभारत का उत्तर सरल नहीं है।

राजमहल में रहते हुए धृतराष्ट्र का शरीर सुरक्षित था, पर उनका मन अतीत में बँधा हुआ था। वन की ओर उनका प्रस्थान केवल स्थान-परिवर्तन नहीं था। वह राजसत्ता से आत्मस्मृति की ओर यात्रा थी।

समय के साथ धृतराष्ट्र ने अनुभव किया कि जिस राजमहल में वे रह रहे हैं, वह उनके लिए आश्रय कम और स्मृतियों का दर्पण अधिक बन गया है।

युधिष्ठिर उन्हें सम्मान देते थे, पर धृतराष्ट्र के भीतर एक दूसरा भाव भी था—वे उस राज्य में आश्रित की तरह रह रहे थे जिसे कभी उन्होंने स्वयं शासित किया था।

यहीं से आश्रमवासिकपर्व की कथा एक महत्वपूर्ण मोड़ लेती है।

धृतराष्ट्र ने वन जाने का निश्चय किया। गांधारी ने उनका साथ देने का निर्णय किया।

और तभी एक अप्रत्याशित निर्णय सामने आया—कुन्ती भी उनके साथ वन जाने के लिए तैयार हुईं।

यह निर्णय केवल व्यक्तिगत त्याग नहीं था। कुन्ती के जीवन की सम्पूर्ण कथा जैसे इस एक निर्णय में सिमट आई थी।

उन्होंने पुत्रों को जन्म दिया, उन्हें संकटों से बचाया, वनवास देखा, युद्ध देखा और अन्ततः अपने पुत्रों को विजयी देखा। लेकिन विजय के बाद भी उनका जीवन राजमहल में समाप्त होने वाला नहीं था।

कुन्ती ने अपने जीवन में जो कुछ सहा था, अब वह उसे पीछे छोड़कर उस अवस्था में प्रवेश करना चाहती थीं जहाँ कर्तव्य के बाद आत्मचिन्तन आरम्भ होता है।

जब पाण्डवों को यह ज्ञात हुआ कि कुन्ती भी वन जाएँगी, तो उनके लिए यह समाचार अत्यन्त पीड़ादायक था।

विशेषतः युधिष्ठिर के लिए। उन्होंने अपनी माता से आग्रह किया कि वे उन्हें छोड़कर न जाएँ।

पर कुन्ती का निर्णय दृढ़ था।

उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश भाग पुत्रों के लिए जिया था। अब उनका शेष जीवन स्वयं के भीतर लौटने का था।

यहाँ महाभारत एक गहरी जीवन-दृष्टि प्रस्तुत करता है।

जीवन की प्रत्येक अवस्था का अपना धर्म है।

बाल्य में सीखना, युवावस्था में कर्म और उत्तरदायित्व, गृहस्थ जीवन में परिवार और समाज का निर्वाह—और जब ये उत्तरदायित्व पूर्ण हो जाएँ, तब मनुष्य धीरे-धीरे बाहरी विस्तार से भीतर की ओर लौट सकता है।

भारतीय आश्रम-व्यवस्था में यही क्रम वानप्रस्थ के रूप में विकसित हुआ।

इसलिए आश्रमवासिकपर्व केवल तीन वृद्ध व्यक्तियों के वन जाने की कथा नहीं है।

यह उस प्रश्न की कथा है कि—

जब मनुष्य ने संसार के प्रति अपना कर्तव्य पूरा कर लिया हो, तब वह अपने भीतर के संसार के साथ क्या करे?

धृतराष्ट्र के लिए वनगमन पश्चात्ताप और वैराग्य का मार्ग था।

गांधारी के लिए यह स्मृति और तप का मार्ग था।

और कुन्ती के लिए यह त्याग की अंतिम परिणति थी।

तीनों की यात्राएँ एक ही दिशा में थीं, लेकिन उनके भीतर के कारण अलग-अलग थे।

हस्तिनापुर धीरे-धीरे पीछे छूटने लगा।

राजमहल में रहने वाले लोग उन्हें विदा करने के लिए एकत्र हुए। पाण्डव, द्रौपदी और अन्य परिजन उनके साथ थे। भावनाएँ तीव्र थीं, लेकिन इस विदाई में युद्धभूमि जैसी कोई उत्तेजना नहीं थी।

यह जीवन के एक और सत्य की ओर संकेत था— कुछ यात्राएँ विजय के बाद शुरू होती हैं।

कुरुक्षेत्र में मनुष्य ने राज्य के लिए युद्ध किया था।

आश्रमवासिकपर्व में वही मनुष्य स्वयं से मिलने के लिए संसार से दूर जाता है।

वन की ओर बढ़ते हुए धृतराष्ट्र, गांधारी और कुन्ती पीछे हस्तिनापुर छोड़ रहे थे।

लेकिन वास्तव में वे केवल नगर नहीं छोड़ रहे थे।

वे अपनी-अपनी पहचान के उन आवरणों को छोड़ने की ओर बढ़ रहे थे जिनसे उनका सम्पूर्ण जीवन बना था।

राजा, रानी, माता, पुत्र, पत्नी, विजेता, पराजित—इन सबके बाद जो बचता है, आश्रमवासिकपर्व उसी मनुष्य की खोज आरम्भ करता है।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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