महाभारत — आश्रमवासिकपर्व - भाग 2 : वन में पहला पड़ाव
महाभारत — आश्रमवासिकपर्व - भाग 2 : वन में पहला पड़ाव
हस्तिनापुर पीछे छूट चुका था।
धृतराष्ट्र, गांधारी और कुन्ती अब उस जीवन से दूर जा रहे थे जिसमें कभी सत्ता, परिवार और संघर्ष उनके अस्तित्व का केंद्र रहे थे। उनके साथ संजय भी थे, जो वर्षों से धृतराष्ट्र के निकट रहे थे।
राजमहल से वन तक की यात्रा बाहर से जितनी सरल दिखाई देती थी, भीतर से उतनी ही गहरी थी।
धृतराष्ट्र अब राजा नहीं थे। गांधारी अब राजमाता की भूमिका से मुक्त थीं। कुन्ती ने भी अपने पुत्रों के जीवन की अंतिम बड़ी जिम्मेदारी पूरी कर दी थी।
वन में प्रवेश करते ही जीवन का ढाँचा बदल गया।
न कोई सभा थी, न राजकीय आदेश, न सेवकों की भीड़, न राजभवन की सुरक्षा। भोजन सीमित था, दिनचर्या सरल थी और रातें प्रकृति के मौन में बीतने लगीं।
यही परिवर्तन इस पर्व को विशिष्ट बनाता है।
महाभारत यहाँ वन को केवल भौगोलिक स्थान नहीं बनाता। वन उस मानसिक अवस्था का भी प्रतीक है जहाँ मनुष्य धीरे-धीरे सामाजिक पहचान से अलग होकर स्वयं को देखने लगता है।
धृतराष्ट्र के लिए यह विशेष रूप से कठिन था।
उनके पास देखने के लिए आँखें नहीं थीं, लेकिन अब उनके भीतर देखने के लिए बहुत कुछ था।
दुर्योधन की स्मृति बार-बार आती थी। उसके साथ उसके अन्य पुत्रों की स्मृतियाँ जुड़ जाती थीं। फिर वही प्रश्न सामने आता—
यदि उस समय उन्होंने पुत्रमोह के स्थान पर धर्म को प्राथमिकता दी होती, तो क्या कुरुवंश का विनाश टल सकता था?
इतिहास इस प्रश्न का निश्चित उत्तर नहीं देता।
लेकिन मनुष्य का अन्तर्मन अक्सर ऐसे प्रश्नों से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाता।
यही पश्चात्ताप और प्रायश्चित्त के बीच का अंतर है।
पश्चात्ताप अतीत को बार-बार दोहराता है।
प्रायश्चित्त उसी अतीत को स्वीकार करके वर्तमान के आचरण को बदलने का प्रयास करता है।
धृतराष्ट्र का वनवास इसी परिवर्तन की दिशा में पहला कदम था। गांधारी का तप भी मौन था।
उन्होंने अपने सौ पुत्रों को खोया था। युद्ध के बाद उन्होंने कृष्ण तक को अपने शाप का भागी बनाया था। लेकिन अब क्रोध की अग्नि धीरे-धीरे तप की अग्नि में बदल रही थी।
कुन्ती की स्थिति और भी सूक्ष्म थी।
उन्होंने धृतराष्ट्र और गांधारी का साथ केवल इसलिए नहीं चुना कि वे वृद्ध थे। उनके भीतर युद्ध और उससे पहले की पूरी कथा का एक गहरा व्यक्तिगत पक्ष भी था।
उनका ज्येष्ठ पुत्र कर्ण था—जिसे उन्होंने जन्म तो दिया, पर जीवन के आरम्भ में स्वीकार नहीं किया।
कुरुक्षेत्र में वही कर्ण उनके अन्य पुत्रों के सामने खड़ा था। यह रहस्य युद्ध के बाद सामने आया था।
इसलिए कुन्ती का वनगमन केवल वृद्धावस्था का निर्णय नहीं था। यह उन स्मृतियों से भी दूरी बनाने का प्रयास था जिन्हें राजमहल में रहते हुए भुलाना सम्भव नहीं था।
वन में तीनों के जीवन की गति अत्यन्त संयमित हो गई।
धृतराष्ट्र तप करने लगे। गांधारी उनके साथ साधना में रहने लगीं। कुन्ती भी उसी कठोर जीवन का अनुसरण करने लगीं।
यहाँ महाभारत एक महत्वपूर्ण बात कहता हुआ दिखाई देता है—
त्याग का मूल्य बाहरी वस्तुओं की संख्या से नहीं, आसक्ति की गहराई से निर्धारित होता है।
राजा का वन में चले जाना अपने आप में वैराग्य नहीं है।
यदि मन अभी भी सिंहासन में बँधा है, तो वन भी राजमहल बन सकता है।
और यदि मन आसक्ति से मुक्त होने लगे, तो राजमहल में रहते हुए भी मनुष्य भीतर से वनवासी हो सकता है।
इसलिए आश्रमवासिकपर्व का वास्तविक वन बाहर नहीं, भीतर बनता है।
समय बीतता गया।
उधर हस्तिनापुर में युधिष्ठिर को अपने माता-पिता की अनुपस्थिति खलने लगी। वे समय-समय पर वन में जाकर उनका समाचार लेते।
राजा होने के बाद भी उनके भीतर पुत्र का भाव समाप्त नहीं हुआ था।
एक अवसर पर पाण्डव वन में धृतराष्ट्र, गांधारी और कुन्ती से मिलने पहुँचे।
वन की सादगी और राजमहल की सम्पन्नता के बीच का अंतर उनके सामने स्पष्ट था।
लेकिन धृतराष्ट्र अब उस पुराने जीवन में लौटना नहीं चाहते थे।
उन्होंने अपने जीवन के अंतिम चरण को तप और आत्मसंयम के लिए स्वीकार कर लिया था।
यह दृश्य महाभारत की उस मूल धारा को आगे बढ़ाता है जिसमें युद्ध के बाद बाहरी विजय का अर्थ धीरे-धीरे बदलता जाता है।
कुरुक्षेत्र में प्रश्न था—कौन जीता?
आश्रमवासिकपर्व में प्रश्न है—जीतने के बाद मनुष्य के भीतर क्या बचा?
राज्य मिल सकता है। सत्ता मिल सकती है। परिवार मिल सकता है। इतिहास में नाम भी रह सकता है।
लेकिन अंततः मनुष्य को अपने भीतर उस स्थान तक पहुँचना पड़ता है जहाँ इन सभी पहचानों का कोई अधिकार नहीं रहता।
वन की नीरवता में धृतराष्ट्र उसी अंतिम यात्रा पर थे। और अभी उनकी यात्रा पूरी नहीं हुई थी।
Comments
Post a Comment