महाभारत — आश्रमवासिकपर्व - भाग 3 : वन में पुनर्मिलन

 महाभारत — आश्रमवासिकपर्व - भाग 3 : वन में पुनर्मिलन

समय बीतता गया।

धृतराष्ट्र, गांधारी और कुन्ती ने वन के जीवन को अपना लिया था। राजमहल की सुविधाएँ अब उनके लिए अतीत का विषय थीं। उनका दिन तप, संयम और स्मरण में बीतता था।

हस्तिनापुर में युधिष्ठिर का मन बार-बार उनकी ओर चला जाता।

एक दिन उन्होंने अपने भाइयों, द्रौपदी और अन्य परिजनों के साथ वन जाकर धृतराष्ट्र से मिलने का निश्चय किया। उनके साथ बड़ी संख्या में लोग भी चले। यह यात्रा केवल वृद्ध परिजनों का कुशलक्षेम जानने के लिए नहीं थी; यह उस परिवार का पुनर्मिलन था जिसने युद्ध के बाद अलग-अलग दिशाओं में जीवन को सँभाला था।

वन में पहुँचकर पाण्डवों ने धृतराष्ट्र और गांधारी को देखा।

कभी जिस व्यक्ति के सामने पूरा कुरुवंश खड़ा रहता था, वही धृतराष्ट्र अब तपस्वी जीवन में थे। शरीर दुर्बल हो चुका था, पर उनके भीतर का वैराग्य पहले से अधिक स्पष्ट था।

युधिष्ठिर ने आगे बढ़कर उनका चरण-स्पर्श किया। भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव ने भी प्रणाम किया।

द्रौपदी ने गांधारी और कुन्ती के चरण छुए। कुछ समय तक वहाँ कोई शब्द नहीं था।

यह मौन उन वर्षों का मौन था जिनमें बहुत कुछ घट चुका था और जिसे शब्दों में समेटना सम्भव नहीं था।

धृतराष्ट्र ने पाण्डवों को आशीर्वाद दिया।

उन्होंने उनके राज्य और प्रजा की स्थिति के विषय में पूछा। युधिष्ठिर ने बताया कि राज्य व्यवस्थित है और प्रजा संतुष्ट है।

लेकिन धृतराष्ट्र की रुचि अब राजकाज में पहले जैसी नहीं थी।

उन्होंने अपने जीवन के अनुभव से एक बात समझ ली थी—राज्य व्यवस्था मनुष्य के बाहर की दुनिया को नियंत्रित कर सकती है, पर मनुष्य के भीतर की अशान्ति को नहीं।

इसीलिए वे अपने शेष जीवन को तप में लगाना चाहते थे। पाण्डवों ने वन में कुछ समय उनके साथ बिताया।

उस अवधि में पुरानी घटनाओं की स्मृतियाँ भी सामने आईं। युद्ध में मारे गए पुत्रों की चर्चा हुई। भीष्म, द्रोण, कर्ण और अन्य योद्धाओं की स्मृतियाँ भी जीवित थीं।

लेकिन अब इन स्मृतियों में प्रतिशोध का स्वर नहीं था।

समय कभी-कभी वही घटना लेकर लौटता है, पर उसके प्रति मनुष्य की दृष्टि बदल जाती है।

युद्ध के तुरंत बाद स्मृति पीड़ा थी। वर्षों बाद वही स्मृति जीवन का पाठ बन सकती है।

आश्रमवासिकपर्व इसी परिवर्तन को सामने रखता है।

धृतराष्ट्र ने पाण्डवों से आग्रह किया कि वे अब उनके प्रति अपराधबोध न रखें।

युद्ध में जो होना था, वह हो चुका था। अब जीवित लोगों का धर्म था कि वे शेष जीवन को सही दिशा दें।

यह कथन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि युधिष्ठिर के भीतर युद्ध की स्मृति अभी भी जीवित थी। उन्होंने विजय प्राप्त की थी, लेकिन उस विजय के साथ अनगिनत मृत्यु की जिम्मेदारी भी जुड़ी थी।

धृतराष्ट्र का वनवास इसलिए केवल उनका प्रायश्चित्त नहीं था।

यह युधिष्ठिर के लिए भी एक प्रकार का संदेश था—

अतीत को मिटाया नहीं जा सकता; उसे समझकर उसके पार जाना पड़ता है।

वन में रहते हुए पाण्डवों ने धृतराष्ट्र और गांधारी के तपस्वी जीवन को निकट से देखा।

वहाँ न राजसी भोजन था, न सुख-सुविधाएँ। 

वृद्ध शरीरों के लिए जीवन कठिन था, फिर भी उनके भीतर एक प्रकार की शान्ति दिखाई देती थी।

कुन्ती भी उसी तपस्या में उनके साथ थीं। युधिष्ठिर के लिए यह दृश्य अत्यन्त मार्मिक था।

उन्होंने अपनी माता से पूछा कि उन्होंने ऐसा कठिन जीवन क्यों स्वीकार किया।

कुन्ती ने स्पष्ट किया कि उनका निर्णय केवल शरीर को कष्ट देने के लिए नहीं था। जीवन भर उन्होंने परिवार, पुत्र और परिस्थितियों के अनुसार अपने कर्तव्य निभाए। अब वे शेष जीवन को आत्मसंयम और साधना में बिताना चाहती थीं।

यहाँ महाभारत आश्रम-व्यवस्था के एक गहरे पक्ष को सामने रखता है।

वानप्रस्थ संसार से घृणा नहीं है; संसार के प्रति अपनी आसक्ति को क्रमशः शिथिल करना है।

गृहस्थ जीवन में मनुष्य संग्रह करता है। वानप्रस्थ में वह संग्रह की आवश्यकता को पहचानता है।

संन्यास में वह स्वयं संग्रहकर्ता की पहचान से भी आगे जाने का प्रयास करता है।

इस प्रकार वन केवल निवास नहीं, जीवन की दिशा में परिवर्तन है।

कुछ समय बाद पाण्डवों को हस्तिनापुर लौटना पड़ा। विदाई का क्षण फिर आया।

लेकिन इस बार यह विदाई पहले जैसी नहीं थी। 

अब सभी जानते थे कि धृतराष्ट्र, गांधारी और कुन्ती ने अपना अंतिम मार्ग चुन लिया है।

युधिष्ठिर लौट रहे थे, पर उनका मन वहीं रह गया था।

वन की ओर देखते हुए उन्हें शायद पहली बार यह स्पष्ट अनुभव हुआ कि मनुष्य अपने प्रियजनों को हमेशा अपने साथ नहीं रख सकता।

कुछ संबंधों का अंतिम धर्म उन्हें पकड़कर रखना नहीं, बल्कि उनके चुने हुए मार्ग का सम्मान करना है।

पाण्डव हस्तिनापुर लौट गए।

वन में तीन वृद्ध तपस्वी अपने अंतिम जीवन-अध्याय की ओर बढ़ते रहे।

और महाभारत की कथा अब धीरे-धीरे एक ऐसे प्रसंग की ओर बढ़ रही थी जहाँ स्मृति, तप और प्रकृति एक साथ मिलकर जीवन के अंतिम सत्य को उद्घाटित करेंगे।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है