महाभारत — आश्रमवासिकपर्व - भाग 4 : विदुर का अंतिम मिलन

 महाभारत — आश्रमवासिकपर्व - भाग 4 : विदुर का अंतिम मिलन

वन में धृतराष्ट्र का जीवन अब तप और संयम में बीत रहा था। गांधारी और कुन्ती भी उनके साथ थीं। संजय उनकी सेवा करते थे।

इसी समय एक ऐसा प्रसंग आता है जिसमें महाभारत की कथा फिर हस्तिनापुर से वन की ओर लौटती है—विदुर के अंतिम दिनों का प्रसंग।

विदुर पहले ही राजसभा और सांसारिक जीवन से अलग होकर वन में चले गए थे। वे अत्यन्त कठोर तप कर रहे थे। उनका शरीर तपस्या से अत्यन्त क्षीण हो चुका था।

जब युधिष्ठिर वन में धृतराष्ट्र से मिलने पहुँचे, तब उन्होंने विदुर के विषय में पूछा।

धृतराष्ट्र ने बताया कि विदुर वन में कहीं तप कर रहे हैं। युधिष्ठिर उन्हें देखने के लिए निकल पड़े।

कुछ दूर जाने पर उन्होंने एक अत्यन्त कृशकाय तपस्वी को देखा। वह विदुर थे।

युधिष्ठिर ने उन्हें पहचान लिया और उनके पीछे जाने लगे। विदुर बोल नहीं रहे थे।

वे एक वृक्ष के सहारे खड़े हो गए और युधिष्ठिर की ओर देखने लगे।

फिर उन्होंने अपनी दृष्टि युधिष्ठिर पर स्थिर कर दी।

महाभारत इस दृश्य को अत्यन्त रहस्यमय ढंग से प्रस्तुत करता है।

विदुर ने कोई लम्बा उपदेश नहीं दिया। कोई संवाद नहीं हुआ। उन्होंने केवल युधिष्ठिर की ओर देखा और फिर उनके भीतर जैसे अपना जीवन-बल समर्पित कर दिया।

इसके बाद विदुर का शरीर वृक्ष के सहारे स्थिर रह गया। 

युधिष्ठिर ने इस घटना को देखकर आश्चर्य अनुभव किया।

यह प्रसंग महाभारत के उन अंशों में है जहाँ कथा सामान्य ऐतिहासिक घटना से आगे बढ़कर चेतना और जीवन-ऊर्जा के संबंध की ओर संकेत करती है।

परम्परागत व्याख्या में विदुर को धर्म का अंश माना गया है। इसलिए उनके और युधिष्ठिर के संबंध को केवल गुरु और शिष्य का संबंध नहीं माना जाता। दोनों के बीच एक गहरा आध्यात्मिक संबंध स्थापित किया जाता है।

लेकिन इस प्रसंग को प्रतीकात्मक स्तर पर भी पढ़ा जा सकता है। विदुर ने जीवन भर धर्म को बाहरी सत्ता से ऊपर रखा था।

उन्होंने धृतराष्ट्र को बार-बार सत्य का बोध कराया। उन्होंने दुर्योधन को समझाया।

उन्होंने सभा में अन्याय का विरोध किया।

लेकिन जब सत्ता ने विवेक की बात सुनना बंद कर दिया, तब विदुर ने सत्ता से स्वयं को अलग कर लिया।

उनका अंतिम जीवन उसी स्वतंत्र विवेक की परिणति था।

इसलिए विदुर का वन में विलीन होना केवल मृत्यु का प्रसंग नहीं लगता।

यह उस जीवन-दृष्टि का प्रतीक बन जाता है जिसमें विवेक अंततः सत्ता से नहीं, सत्य से जुड़ता है।

युधिष्ठिर ने लौटकर धृतराष्ट्र को विदुर की स्थिति बताई।

धृतराष्ट्र के लिए यह समाचार अत्यन्त महत्वपूर्ण था। विदुर उनके जीवन के उन विरले व्यक्तियों में थे जिन्होंने कभी भय या स्वार्थ के कारण सत्य को नहीं छोड़ा।

धृतराष्ट्र ने विदुर को खोया नहीं था; उन्होंने अपने जीवन के उस दर्पण को खोया था जिसमें उन्हें बार-बार अपना वास्तविक चेहरा दिखाई देता था।

यही कारण है कि विदुर का चरित्र महाभारत में इतना महत्वपूर्ण है। भीष्म ने व्यवस्था को संभाला। द्रोण ने शस्त्र और शिक्षा दी। कृष्ण ने नीति और धर्म के जटिल प्रश्नों को सामने रखा। 

लेकिन विदुर ने लगातार एक सरल प्रश्न पूछा— जो उचित है, क्या हम उसे करने का साहस रखते हैं?

उनकी शक्ति राजदंड में नहीं थी। उनकी शक्ति थी—विवेक में।

और यही कारण है कि महाभारत के युद्ध के बाद भी विदुर की उपस्थिति समाप्त नहीं होती। उनका जीवन इस बात का प्रमाण बन जाता है कि कभी-कभी इतिहास को बदलने की क्षमता युद्ध करने वाले के पास नहीं, बल्कि सही समय पर सत्य बोलने वाले के पास होती है।

वन में अब एक और चरण पूरा हो चुका था। विदुर चले गए थे।

धृतराष्ट्र, गांधारी और कुन्ती अपने तप में आगे बढ़ रहे थे।

और हस्तिनापुर से दूर, जीवन की अंतिम अवस्था में पहुँच चुके ये पात्र धीरे-धीरे उस सीमा की ओर बढ़ रहे थे जहाँ मनुष्य की व्यक्तिगत कथा प्रकृति की व्यापक गति में विलीन हो जाती है।

आश्रमवासिकपर्व अब अपने सबसे मार्मिक प्रसंग की ओर बढ़ रहा था।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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