महाभारत — मौसलपर्व - भाग 4 : यादवों का आत्मविनाश
महाभारत — मौसलपर्व - भाग 4 : यादवों का आत्मविनाश
प्रभास का वातावरण कुछ ही क्षणों में बदल चुका था।
जहाँ थोड़ी देर पहले उत्सव था, वहीं अब क्रोध था। पुरानी शत्रुताएँ फिर सामने थीं और प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर वर्षों से संचित आक्रोश को जैसे बाहर निकाल देना चाहता था।
सात्यकि और कृतवर्मा के विवाद ने जो आग लगाई थी, वह अब पूरे यादवसमुदाय में फैल गई।
यादव एक-दूसरे पर टूट पड़े।
एरक घास हाथों में आते ही कठोर मूसल बन जाती थी। जो वस्तु अभी तक धरती का सामान्य तृण दिखाई दे रही थी, वही अब मृत्यु का साधन बन चुकी थी।
प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, साम्ब और अनेक अन्य वीर इस संघर्ष में खिंच गए।
एक के बाद एक योद्धा गिरने लगे। यह कोई योजनाबद्ध युद्ध नहीं था।
न कोई सेना थी। न कोई सेनापति। न कोई स्पष्ट पक्ष।
यह उस समाज का विघटन था जिसमें संयम की अंतिम रेखा टूट चुकी थी।
श्रीकृष्ण ने परिस्थिति को देखा। उन्होंने भी अस्त्र उठाया।
बलराम भी वहाँ उपस्थित थे, लेकिन इस विनाश को रोकने की दिशा में उनका व्यवहार वैसा नहीं था जैसा किसी सामान्य युद्ध में अपेक्षित होता।
यादवों की शक्ति अब उनके विरुद्ध ही प्रयुक्त हो रही थी।
जो योद्धा कभी कुरुक्षेत्र में दूसरों के सामने अपनी वीरता दिखाते थे, वे अब अपने ही कुल के लोगों को मार रहे थे।
मौसलपर्व की इस घटना को केवल शाप की कथा मानकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं है।
इसके भीतर एक सामाजिक सत्य भी छिपा है।
किसी समुदाय का विनाश केवल बाहरी आक्रमण से नहीं होता।
जब संवाद समाप्त हो जाता है, जब पुरानी स्मृतियाँ वर्तमान पर हावी हो जाती हैं और जब सामूहिक आत्मसंयम टूट जाता है, तब शक्ति स्वयं विनाश का माध्यम बन सकती है।
प्रभास में यही हो रहा था। कुरुक्षेत्र में पाण्डव और कौरव आमने-सामने थे।
प्रभास में कोई बाहरी शत्रु नहीं था।
शत्रु की पहचान समाप्त हो गई थी—क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति दूसरे में शत्रु देखने लगा था।
इसलिए यह युद्ध अधिक भयावह था। किसी ने किसी को युद्ध की औपचारिक चुनौती नहीं दी।
क्रोध ने निर्णय ले लिया और हाथों में आए मूसलों ने उस निर्णय को मृत्यु में बदल दिया।
धीरे-धीरे यादवों की महान शक्ति समाप्त होने लगी। प्रभास का मैदान अपने ही वंश के वीरों के शवों से भर गया।
श्रीकृष्ण के सामने उनका अपना कुल समाप्त हो रहा था।
उन्होंने कुरुक्षेत्र में धर्मयुद्ध का परिणाम देखा था। लेकिन यहाँ कोई धर्मयुद्ध नहीं था।
यह उस शक्ति का अंत था जिसने स्वयं अपनी सीमा खो दी थी।
अन्ततः लगभग पूरा यादववंश इस संघर्ष में समाप्त हो गया।
कृष्ण के लिए यह केवल अपने संबंधियों की मृत्यु नहीं थी।
यह उस युग की समाप्ति थी जिसके वे स्वयं साक्षी और एक अर्थ में नियामक भी रहे थे।
उन्होंने युद्ध को रोका नहीं। क्योंकि अब युद्ध बाहर से थोपा हुआ नहीं था।
वह भीतर से जन्मा था। और भीतर से जन्मी हुई हिंसा को केवल बाहरी शक्ति से रोका नहीं जा सकता।
प्रभास में सूर्य अस्त हो रहा था।
उसके साथ यादवों के गौरव का सूर्य भी अस्त हो चुका था।
लेकिन अभी एक अंतिम अध्याय शेष था। बलराम इस विनाश के बाद संसार से विदा होने वाले थे।
और श्रीकृष्ण—
जो कुरुक्षेत्र में अर्जुन के सारथी थे, जो द्वारका के केंद्र थे, जो यादववंश के सबसे प्रभावशाली पुरुष थे—
अब अपने जीवन के अंतिम क्षणों की ओर बढ़ रहे थे।
मौसलपर्व अब यादवों के विनाश से कृष्ण के महाप्रस्थान की ओर मुड़ रहा था।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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