महाभारत — मौसलपर्व - भाग 5 : बलराम का प्रस्थान
महाभारत — मौसलपर्व - भाग 5 : बलराम का प्रस्थान
प्रभास का विनाश समाप्त हो चुका था।
यादववंश के असंख्य वीर धरती पर पड़े थे। जिस कुल ने अपने पराक्रम से अनेक राजाओं को चुनौती दी थी, उसका अंत अब अपने ही हाथों से हो चुका था।
इस विनाश के बीच बलराम एक ओर चले गए।
वे समुद्र के निकट एक शांत स्थान पर बैठ गए और योग में स्थित हो गए।
उनका मन अब संसार की घटनाओं से अलग हो चुका था।
श्रीकृष्ण ने उन्हें देखा।
दोनों भाई जीवन भर अनेक घटनाओं के साथ रहे थे। कृष्ण ने नीति, राजनीति और धर्म के जटिल संघर्षों में सक्रिय भूमिका निभाई थी; बलराम का स्वभाव अपेक्षाकृत सीधा और अपने सिद्धान्तों में स्थिर रहा था।
अब दोनों के जीवन का अंतिम चरण सामने था।
बलराम ने योग के द्वारा अपने शरीर का परित्याग किया।
महाभारत इस घटना को सामान्य मृत्यु की तरह नहीं प्रस्तुत करता। उनके शरीर से एक विशाल श्वेत नाग के निकलने और समुद्र की ओर चले जाने का वर्णन मिलता है। परम्परा में इसे शेषनाग के रूप में बलराम के स्वरूप से जोड़ा गया है।
इस प्रसंग को दो स्तरों पर पढ़ा जा सकता है।
परम्परागत दृष्टि में बलराम शेषनाग के अवतार माने जाते हैं। इसलिए नाग का प्रकट होना उनके दिव्य स्वरूप की अभिव्यक्ति है।
प्रतीकात्मक दृष्टि से देखें तो यह घटना शरीर और उसके पीछे माने गए सूक्ष्म अस्तित्व के बीच भेद को व्यक्त करती है।
महाभारत के लिए मृत्यु केवल शरीर का समाप्त होना नहीं है।
शरीर प्रकृति में लौटता है।
लेकिन मनुष्य जिस चेतना को अपना वास्तविक स्वरूप मानता है, उसके विषय में भारतीय दर्शन अलग-अलग प्रकार से विचार करता है।
यहीं से कथा इतिहास से दर्शन की ओर मुड़ती है।
बलराम जा चुके थे। अब श्रीकृष्ण अकेले थे।
उनके चारों ओर वही भूमि थी जहाँ उनके वंश का विनाश हुआ था।
द्वारका का वैभव पीछे था। यादवों की शक्ति समाप्त हो चुकी थी।
बलराम भी जा चुके थे।
अब कृष्ण के पास संसार को बचाए रखने के लिए कोई राजकीय भूमिका शेष नहीं थी।
उन्होंने अपने सारथी दारुक को हस्तिनापुर भेजा।
दारुक को निर्देश दिया गया कि वह अर्जुन को सारी घटना बताए और यादव स्त्रियों तथा बचे हुए लोगों की रक्षा के लिए उन्हें द्वारका ले जाने की व्यवस्था करे।
यहाँ कृष्ण का व्यक्तित्व एक बार फिर सामने आता है।
सब कुछ समाप्त हो जाने के बाद भी वे अपने उत्तरदायित्व से विमुख नहीं होते।
यादववंश समाप्त हो चुका था, लेकिन उनके पीछे बची हुई स्त्रियाँ, बच्चे और वृद्ध अभी जीवित थे।
उनकी सुरक्षा अब आवश्यक थी।
कृष्ण ने दारुक को यह भी संकेत दिया कि द्वारका अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रहेगी।
समुद्र उस नगरी को अपने भीतर लेने वाला था। इसलिए अब अर्जुन का आना आवश्यक था।
दारुक हस्तिनापुर की ओर चला गया। कृष्ण वहीं रह गए।
समुद्र की लहरें तट से टकरा रही थीं।
प्रभास की भूमि पर यादवों का रक्त था।
और उस मौन के बीच कृष्ण अपने जीवन की अंतिम अवस्था में प्रवेश कर चुके थे।
कुरुक्षेत्र में उन्होंने अर्जुन से कहा था— “कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्...”
अब वही काल उनके अपने जीवन के सामने खड़ा था।
यहाँ एक गहरा विरोधाभास दिखाई देता है।
जिस कृष्ण ने अर्जुन को मृत्यु के भय से ऊपर उठने का ज्ञान दिया था, वही अब स्वयं उस शरीर से विदा होने वाले थे जिसे संसार ने कृष्ण के रूप में जाना।
कथा अब युद्ध की नहीं थी। यह अवतार, शरीर, काल और चेतना के अंतिम प्रश्न की ओर बढ़ रही थी।
दूर कहीं एक शिकारी अपने लक्ष्य की तलाश कर रहा था।
उसे ज्ञात नहीं था कि उसके सामने कौन बैठा है।
और महाभारत की अगली घटना भारतीय महाकाव्य के सबसे प्रसिद्ध और रहस्यमय प्रसंगों में से एक बनने वाली थी।
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