महाभारत — आश्रमवासिकपर्व - भाग 6 : कुरुवंश की स्मृति और श्राद्ध

महाभारत — आश्रमवासिकपर्व

महाभारत — आश्रमवासिकपर्व - भाग 6 : कुरुवंश की स्मृति और श्राद्ध

धृतराष्ट्र, गांधारी और कुन्ती के वनाग्नि में देह त्याग का समाचार हस्तिनापुर पहुँचा तो युधिष्ठिर पर गहरा प्रभाव पड़ा। युद्ध के बाद जिन कुछ वरिष्ठ व्यक्तियों का अस्तित्व कुरुवंश की स्मृति को जीवित रखे हुए था, उनमें से अब कोई भी उनके साथ नहीं था।

कुछ समय तक युधिष्ठिर उस घटना को स्वीकार नहीं कर सके।

उन्हें बार-बार यह विचार आता कि जिन लोगों ने उनके जीवन को दिशा दी, वे एक-एक करके उनसे दूर होते गए। भीष्म शरशय्या पर चले गए थे, विदुर भी देह त्याग चुके थे और अब धृतराष्ट्र, गांधारी तथा उनकी अपनी माता कुन्ती भी संसार से विदा हो चुकी थीं।

राजा के रूप में उनका कर्तव्य अब केवल राज्य चलाना नहीं था।

उन्हें अपने मृत परिजनों के प्रति भी धर्म निभाना था।

इसी भावना से वे ऋषियों और पुरोहितों के साथ उन सभी के लिए आवश्यक संस्कार और श्राद्ध-कर्म करने लगे।

यहाँ महाभारत में श्राद्ध केवल एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में नहीं आता। उसके पीछे स्मृति और उत्तरदायित्व की एक सामाजिक संरचना भी दिखाई देती है।

मनुष्य मर जाता है, लेकिन उसके साथ जुड़ी हुई स्मृतियाँ जीवितों के भीतर बनी रहती हैं। संस्कार उन स्मृतियों को एक व्यवस्थित रूप देते हैं। मृत व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता, परिवार की निरन्तरता और पूर्वजों के प्रति उत्तरदायित्व—इन सबका सम्मिलित रूप श्राद्ध परम्परा में दिखाई देता है।

युधिष्ठिर के सामने अब वही कुरुवंश था जिसने कभी अपने ही भीतर संघर्ष किया था।

एक ओर पाण्डव थे, दूसरी ओर कौरव।

लेकिन मृत्यु के बाद यह विभाजन अर्थहीन हो चुका था।

जो लोग जीवन में परस्पर विरोधी थे, वे अब एक ही स्मृति-परम्परा का हिस्सा बन चुके थे।

यही मृत्यु की एक गहरी सामाजिक शक्ति है।

जीवन में मनुष्य संबंधों को पक्षों में बाँटता है; मृत्यु उन पक्षों की सीमाओं को मिटा देती है।

युधिष्ठिर ने धृतराष्ट्र के पुत्रों और अपने भाइयों—दोनों को एक ही पूर्वज-परम्परा के अंग के रूप में देखा।

यह दृष्टि महाभारत के युद्धोत्तर चिंतन को एक नई दिशा देती है।

कुरुक्षेत्र में धर्म और अधर्म का संघर्ष था। लेकिन युद्ध के बाद बची हुई पीढ़ी को केवल यह तय करके नहीं जीना था कि कौन सही था और कौन गलत।

उसे यह भी सीखना था कि विनाश के बाद समाज को कैसे पुनः जोड़ा जाए।

युधिष्ठिर के सामने यही चुनौती थी।

उन्होंने मृतकों के लिए विधिपूर्वक कर्म किए और उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया।

इस प्रसंग में एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है।

युद्ध के समय मनुष्य अपने शत्रु को सामने खड़े व्यक्ति के रूप में देखता है।

मृत्यु के बाद वही व्यक्ति स्मृति बन जाता है।

स्मृति में उसका सम्पूर्ण जीवन लौटता है—केवल उसका विरोध नहीं।

इसलिए श्राद्ध की प्रक्रिया को महाभारत में केवल मृतक के लिए किया जाने वाला कर्म न मानकर जीवित मनुष्य के भीतर संबंधों के पुनर्संयोजन के रूप में भी समझा जा सकता है।

युधिष्ठिर के लिए यह आत्मिक रूप से भी महत्वपूर्ण था।

उन्हें अब उस पीढ़ी का उत्तराधिकारी बनना था जिसने कुरुक्षेत्र तक की यात्रा की थी।

राज्य उनके पास था। परम्परा उनके पास थी। और अब इतिहास की स्मृति भी उनके पास थी।

इन तीनों को लेकर उन्हें आगे बढ़ना था।

आश्रमवासिकपर्व का यह चरण इसलिए युद्ध की कथा से अलग है। यहाँ शस्त्र नहीं हैं, सेनाएँ नहीं हैं और विजय-पराजय का प्रश्न भी नहीं है।

यहाँ केवल एक प्रश्न बचा है— जो कुछ घट चुका है, उससे अगली पीढ़ी क्या सीखेगी?

महाभारत का उत्तर किसी एक वाक्य में सीमित नहीं है।

वह युधिष्ठिर के जीवन में दिखाई देता है—
राज्य चलाते हुए भी स्मृति को नकारना नहीं,
मृतकों का सम्मान करते हुए भी अतीत में अटकना नहीं,
और अपने पूर्वजों की भूलों को दोहराए बिना परम्परा को आगे ले जाना।

कुरुवंश की अगली यात्रा अब धीरे-धीरे अपने अंतिम ऐतिहासिक चरण की ओर बढ़ रही थी।

और आश्रमवासिकपर्व भी अपने समापन की ओर अग्रसर था।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है