महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग १३ : तप और संयम — स्वयं पर शासन

 महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग १३ : तप और संयम — स्वयं पर शासन

भीष्म का उपदेश अब बाहरी आचरण से भीतर की ओर लौटता है।

अहिंसा, सत्य, क्षमा, परिवार और दान—इन सबका आधार अंततः वही मनुष्य है जो अपने भीतर उठने वाली इच्छाओं, आवेगों और आकर्षणों को पहचान सके। यदि मनुष्य स्वयं पर शासन नहीं कर सकता, तो बाहरी नियम बहुत देर तक उसे धर्म में स्थिर नहीं रख सकते।

इसीलिए तप और संयम अनुशासनपर्व की विचार-धारा में केवल धार्मिक साधना नहीं, बल्कि आत्म-शासन की प्रक्रिया बन जाते हैं।

तप का अर्थ केवल कष्ट सहना नहीं

तप शब्द सुनते ही शरीर को कष्ट देने, उपवास करने या कठिन साधना करने की छवि सामने आती है।

लेकिन तप का मूल अर्थ इससे कहीं व्यापक है।

जहाँ तत्काल सुख उपलब्ध हो और मनुष्य विवेक के कारण उसे सीमित करे, वहाँ भी तप है।

जहाँ क्रोध का उत्तर देना संभव हो, लेकिन व्यक्ति प्रतिक्रिया को रोककर उचित समय की प्रतीक्षा करे, वहाँ भी तप है।

जहाँ अधिक संग्रह किया जा सकता हो, पर आवश्यकता की सीमा पहचानी जाए, वहाँ भी तप है।

अर्थात् तप शरीर को पीड़ा देना नहीं, इच्छा और विवेक के बीच उचित दूरी बनाना है।

संयम और दमन में अंतर

यहाँ एक सूक्ष्म अंतर समझना आवश्यक है।

दमन में इच्छा को दबाया जाता है।

संयम में इच्छा को समझकर उसके ऊपर विवेक को स्थापित किया जाता है।

दबी हुई इच्छा अवसर मिलने पर अधिक तीव्र रूप में लौट सकती है। संयमित इच्छा मनुष्य की ऊर्जा का रूप बदल सकती है।

इसीलिए भारतीय दर्शन में संयम को केवल निषेध नहीं माना गया। वह ऊर्जा को दिशा देने की प्रक्रिया है।

भूख को समझना और उचित मात्रा में भोजन करना संयम है।

कामना को समझना और उसे संबंध तथा उत्तरदायित्व के भीतर रखना संयम है।

क्रोध को पहचानना और उसे न्यायपूर्ण कर्म में बदलना संयम है।

इस प्रकार संयम जीवन का विरोध नहीं करता; वह जीवन को अव्यवस्था से व्यवस्था की ओर ले जाता है।

तप का सामाजिक पक्ष

तप को यदि केवल व्यक्तिगत साधना मान लिया जाए तो उसका सामाजिक महत्व छूट जाता है।

राजा के लिए संयम का अर्थ है कि वह अपनी शक्ति का मनमाना उपयोग न करे।

धनवान के लिए संयम का अर्थ है कि संपत्ति उसके निर्णयों पर पूरी तरह अधिकार न कर ले।

विद्वान के लिए संयम का अर्थ है कि ज्ञान अहंकार का साधन न बने।

गृहस्थ के लिए संयम का अर्थ है कि व्यक्तिगत इच्छा परिवार के अधिकारों को न कुचले।

और साधक के लिए संयम का अर्थ है कि आध्यात्मिक उपलब्धि भी अहंकार का कारण न बन जाए।

इस प्रकार तप व्यक्ति के भीतर आरंभ होकर समाज तक पहुँचता है।

इंद्रियों पर नियंत्रण या इंद्रियों की समझ?

इंद्रियों को शत्रु मान लेना भारतीय चिंतन की पूरी तस्वीर नहीं है।

देखना, सुनना, स्वाद लेना, स्पर्श करना और अनुभव करना जीवन की आवश्यक प्रक्रियाएँ हैं। समस्या इंद्रियों में नहीं, बल्कि उनके पीछे चलने वाली अनियंत्रित आसक्ति में है।

आँख सुंदर वस्तु देखती है—यह स्वाभाविक है।

मन उस दृश्य को पाने के लिए विवेक खो देता है—यह आसक्ति है।

मनुष्य स्वाद लेता है—यह जीवन है।

स्वाद के कारण आवश्यकता से अधिक खाना—यह असंयम है।

अर्थात् संयम इंद्रियों को नष्ट नहीं करता; वह इंद्रिय-अनुभव और निर्णय के बीच विवेक को सक्रिय रखता है।

यही कारण है कि वास्तविक तप बाहर से देखने पर साधारण जीवन जैसा दिखाई दे सकता है, जबकि भीतर वह निरंतर जागरूकता की प्रक्रिया होता है।

महाभारत में तप की परीक्षा

महाभारत में तपस्वियों की अनेक कथाएँ हैं, लेकिन ग्रंथ तप को केवल जंगल और आश्रम तक सीमित नहीं करता।

कुरुक्षेत्र के योद्धा भी तप की परीक्षा से गुजरते हैं।

अर्जुन के लिए तप अस्त्र प्राप्त करने की साधना है, लेकिन उससे भी अधिक वह अपनी क्षमता को नियंत्रित दिशा में लगाने का अभ्यास है।

भीष्म के लिए तप आजीवन प्रतिज्ञा का अनुशासन है।

विदुर के लिए तप सत्ता के निकट रहते हुए भी विवेक न छोड़ना है।

और युधिष्ठिर के लिए तप उस मानसिक भार के साथ जीना है जिसमें विजय के भीतर भी विनाश की स्मृति उपस्थित है।

इसलिए महाभारत का तप केवल वन में बैठने वाले ऋषि का तप नहीं है।

कर्तव्य के बीच स्वयं को संभालना भी तप है।

शरीर, मन और इच्छा

मानव व्यवहार को आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में देखें तो प्रत्येक इच्छा तत्काल संतुष्टि चाहती है, जबकि विवेक परिणाम को देखता है।

संयम इसी अंतराल में जन्म लेता है।

इच्छा कहती है—“अभी।”

विवेक पूछता है—“इसके बाद क्या?”

तप इसी दूसरे प्रश्न को मजबूत करता है।

इस अर्थ में तप मनुष्य की दीर्घकालिक निर्णय-क्षमता का प्रशिक्षण है।

जो व्यक्ति प्रत्येक इच्छा पर तुरंत प्रतिक्रिया नहीं करता, उसके निर्णय धीरे-धीरे अधिक स्वतंत्र होते जाते हैं।

यही स्वतंत्रता भारतीय चिंतन में आत्म-नियंत्रण का एक महत्वपूर्ण आयाम है।

तप का अंतिम उद्देश्य

यदि तप से अहंकार बढ़ जाए, तो तप अपनी दिशा खो देता है।

यदि संयम के कारण मनुष्य दूसरों को तुच्छ समझने लगे, तो संयम भी अहंकार का रूप ले सकता है।

इसलिए तप की अंतिम कसौटी शरीर की कठिनाई नहीं, व्यवहार की निर्मलता है।

तप के बाद मनुष्य अधिक शांत, अधिक विवेकी, अधिक उत्तरदायी और अधिक करुणाशील होता है या नहीं—यही उसका वास्तविक परीक्षण है।

यहीं अनुशासनपर्व की पूरी यात्रा एक बिंदु पर आकर जुड़ती दिखाई देती है।

अहिंसा ने कर्म को अनुशासित किया। सत्य ने वाणी को। क्षमा ने स्मृति को। दान ने संपत्ति को।

और अब तप तथा संयम मनुष्य की इच्छा-शक्ति को अनुशासित करते हैं।

लेकिन धर्म की सबसे कठिन परीक्षा तब होती है जब दो सही प्रतीत होने वाले कर्तव्यों में संघर्ष हो।

जब एक ओर सत्य हो और दूसरी ओर किसी की रक्षा।

जब न्याय और करुणा आमने-सामने खड़े हों।

जब नियम और परिस्थिति में तनाव उत्पन्न हो।

तब धर्म का निर्णय केवल नियमों से नहीं होता।

यहीं भीष्म अपने उपदेश को उसके सबसे सूक्ष्म क्षेत्र में ले जाते हैं—धर्म की सूक्ष्मता।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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