महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग १५ : भीष्म की विदाई — शरशय्या से अंतिम यात्रा

महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग १५ : भीष्म की विदाई — शरशय्या से अंतिम यात्रा

कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो चुका था। राजसत्ता पांडवों के हाथ में आ गई थी, लेकिन भीष्म अभी भी जीवित थे।

शरीर बाणों से विदीर्ण था। युद्ध समाप्त हो चुका था, पर उनकी चेतना अभी भी जाग्रत थी।

शरशय्या अब केवल मृत्यु की प्रतीक्षा का स्थान नहीं रही थी। वह एक ऐसे जीवन का अंतिम मंच बन गई थी जहाँ एक व्यक्ति अपने पूरे युग का साक्षी बनकर पड़ा था।

भीष्म ने हस्तिनापुर को बनते देखा था।

उन्होंने उसकी राजनीति देखी थी, उसके राजाओं को देखा था, उसकी महत्वाकांक्षाएँ देखी थीं और अंततः उसी राज्य को अपने ही परिवार के रक्त से भरते देखा था।

अब उनके पास देने के लिए कोई राज्य नहीं था। केवल अनुभव था।

शरशय्या का अंतिम अर्थ

भीष्म की शरशय्या को केवल वीरगति के प्रतीक के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है।

जिस शरीर ने जीवनभर प्रतिज्ञा का भार उठाया, वही शरीर अंत में बाणों पर टिका था।

यह दृश्य महाभारत की एक गहरी विडंबना को सामने लाता है—

मनुष्य अपने आदर्शों के लिए कितना भी कठोर हो जाए, जीवन अंततः उसे अपने कर्मों के परिणामों के सामने खड़ा करता है।

भीष्म ने मृत्यु को तत्काल स्वीकार नहीं किया।

उन्हें इच्छामृत्यु का वर प्राप्त था और उन्होंने उत्तरायण की प्रतीक्षा की।

परंपरा में इसे आध्यात्मिक योग्यता के रूप में देखा गया है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो इसे उस व्यक्ति की असाधारण मानसिक सजगता और शरीर पर नियंत्रण की परंपरागत धारणा के संदर्भ में समझा जा सकता है; आधुनिक विज्ञान ऐसी इच्छा से मृत्यु का समय सचेत रूप से निर्धारित कर पाने की पुष्टि नहीं करता।

इसलिए महाभारत की इस घटना को आस्था और ऐतिहासिक-वैज्ञानिक व्याख्या—दोनों स्तरों पर अलग-अलग पढ़ना अधिक उचित है।

उत्तरायण की प्रतीक्षा

जब सूर्य उत्तरायण की ओर बढ़ता है, तब भीष्म अपने अंतिम प्रस्थान के लिए तैयार होते हैं।

यहाँ उत्तरायण का महत्व केवल खगोलीय घटना नहीं है।

भारतीय चिंतन में सूर्य प्रकाश, गति और चेतना का प्रतीक भी रहा है।

अतः भीष्म का उत्तरायण की प्रतीक्षा करना उस युग की उस धारणा को व्यक्त करता है जिसमें मृत्यु को भी एक सजग संक्रमण माना गया। 

उनकी प्रतीक्षा में भय नहीं है। यह मृत्यु से भागना नहीं, बल्कि मृत्यु के सामने पूर्ण जागरूकता से खड़े होना है।

युधिष्ठिर के लिए अंतिम पाठ

युधिष्ठिर के लिए भीष्म की मृत्यु व्यक्तिगत शोक से अधिक थी।

जिस व्यक्ति से उन्होंने युद्ध के बाद धर्म सीखा था, वही अब उनसे विदा लेने वाला था।

भीष्म ने उन्हें सत्ता मिली है, इसलिए राजा बनने की शिक्षा नहीं दी।

उन्होंने यह समझाया कि सत्ता अपने साथ उत्तरदायित्व लाती है।

राजा का सुख प्रजा के सुख से अलग नहीं हो सकता।

न्याय केवल अपराधी को दंड देने का नाम नहीं; न्याय उस व्यवस्था को बनाने का नाम भी है जिसमें अन्याय कम से कम हो।

और धर्म केवल व्यक्तिगत पवित्रता नहीं; वह शासन, परिवार, संपत्ति, दान, संबंध और निर्णय—सभी में दिखाई देना चाहिए।

युधिष्ठिर के सामने अब शास्त्र नहीं, जीवन की परीक्षा थी।

भीष्म की विदाई

समय पूरा हुआ।

भीष्म ने अपने शरीर से बाणों को हटाने की इच्छा व्यक्त की और अंतिम क्षणों में मन को परम तत्त्व में स्थिर किया।

राजा, पांडव, कृष्ण, ऋषि और अनेक जन उनके पास उपस्थित थे।

जिस योद्धा की उपस्थिति कभी पूरी सभा को प्रभावित करती थी, वह अब शांत था।

युद्धभूमि का सबसे प्रबल योद्धा अंततः मौन हो गया।

लेकिन उसका मौन भी एक शिक्षा बन गया।

भीष्म का जीवन यह बताता है कि मनुष्य की महानता केवल उसकी शक्ति में नहीं होती। उसकी महानता इस बात में भी होती है कि वह अपनी सीमाओं, अपने निर्णयों और अपने युग की जटिलताओं के बीच किस प्रकार जीवन जीता है।

उनकी मृत्यु के साथ कुरुवंश का एक युग समाप्त होता है।

अनुशासनपर्व का अंतिम अर्थ

अनुशासनपर्व को यदि केवल दान, व्रत, तप और आचार के नियमों का संग्रह मान लिया जाए तो उसकी आत्मा छूट जाएगी।

इस पूरे पर्व की यात्रा व्यक्ति को बाहर से भीतर और भीतर से फिर समाज की ओर ले जाती है।

अहिंसा ने कर्म को देखा। सत्य ने वाणी को। क्षमा ने मन को।परिवार ने संबंधों को।दान ने संपत्ति को।तप ने इच्छा को।और धर्म की सूक्ष्मता ने विवेक को।

अंत में भीष्म स्वयं इन सभी शिक्षाओं के सामने एक जीवित प्रश्न बनकर रह जाते हैं।

उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए प्रतिज्ञा की, लेकिन उनका जीवन यह भी दिखाता है कि धर्म केवल प्रतिज्ञा से सुरक्षित नहीं रहता। उसके लिए समय पर विवेकपूर्ण निर्णय आवश्यक है।

यही महाभारत की शक्ति है। यह अपने पात्रों को देवत्व देकर उनके प्रश्न समाप्त नहीं करता।

वह उन्हें मनुष्य बनाए रखता है—उनकी महानता के साथ उनकी जटिलताओं को भी।

और शायद इसी कारण भीष्म की शरशय्या आज भी केवल मृत्यु का दृश्य नहीं लगती।

वह एक प्रश्न करती हुई शय्या है—

मनुष्य जीवन भर जिन निर्णयों को धर्म समझकर जीता है, क्या वह अंत में उन्हें फिर से देखने का साहस रखता है?

भीष्म का शरीर वहीं रह गया। उनकी शिक्षा आगे चली। उनकी मृत्यु के साथ अनुशासन समाप्त नहीं हुआ।

वह युधिष्ठिर के शासन में, आने वाली पीढ़ियों के निर्णयों में और महाभारत के पाठक के भीतर प्रवेश कर गया।

यहीं अनुशासनपर्व समाप्त होता है।

और महाभारत अब उस अंतिम चरण में प्रवेश करता है जहाँ युद्ध की राख, मृतकों की स्मृति और राज्य की नई व्यवस्था के बीच कथा आगे बढ़ती है।

अगला पर्व होगा— आश्रमवासिकपर्व।

जहाँ कथा युद्धभूमि से हटकर उन वृद्ध पात्रों की ओर जाएगी जिन्होंने अपना जीवन, अपना राज्य और अपने संबंध सब पीछे छोड़ दिए हैं—धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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