शाङ्कर दर्शन - भाग 3 — ब्रह्म क्या है? : शंकराचार्य की ब्रह्म-मीमांसा

 शाङ्कर दर्शन -  भाग 3 — ब्रह्म क्या है? : शंकराचार्य की ब्रह्म-मीमांसा

पिछले भाग में हमने देखा कि शंकराचार्य को समझने के लिए उनके मूल भाष्यों तक पहुँचना ज़रूरी है। उपनिषद्, गीता और ब्रह्मसूत्र को उन्होंने जिस दृष्टि से पढ़ा, उसी से शाङ्कर वेदान्त की विशिष्ट बनावट सामने आती है।

अब हमें उस बनावट के केन्द्र में प्रवेश करना है। वह केन्द्र है: ब्रह्म।

पर "ब्रह्म क्या है?" पूछते ही एक कठिनाई खड़ी होती है। यदि ब्रह्म संसार की किसी वस्तु जैसा है, तो उसे देखा, सोचा और परिभाषित किया जा सकता है। लेकिन यदि वही सबके अस्तित्व का आधार है, तो उसे किसी दूसरी वस्तु की तरह कैसे जाना जाएगा? यही शंकर की ब्रह्म-मीमांसा का पहला प्रश्न है।

"ब्रह्म" शब्द का अर्थ

"ब्रह्म" शब्द बृह् धातु से जुड़ा माना जाता है, जिसका भाव है बढ़ना, विस्तार और महानता। पर वेदान्त में ब्रह्म केवल "सबसे बड़ी वस्तु" नहीं है। वह कोई विशाल आकार का पदार्थ नहीं है, और किसी स्थान पर बैठी हुई सत्ता भी नहीं। यदि ब्रह्म किसी वस्तु जैसा होता, तो वह स्वयं किसी दूसरी सत्ता पर निर्भर होता।

शाङ्कर वेदान्त में ब्रह्म वह है जिसके कारण सबका अस्तित्व सम्भव है, पर जिसका अपना अस्तित्व किसी दूसरे पर निर्भर नहीं। इसीलिए ब्रह्म को समझने के लिए साधारण वस्तु-विचार से आगे जाना पड़ता है।

शोध-टिप्पणी: ब्रह्मसूत्रभाष्य (1.1.1) में शंकर "ब्रह्म" शब्द की व्युत्पत्ति पर कहते हैं कि बृह् धातु के अर्थ से ब्रह्म में नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वभाव का भाव निकलता है। यानी शब्द का अर्थ ही केवल "बड़ा" नहीं, बल्कि पूर्णता और स्वतन्त्रता का संकेत है।

"सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म"

तैत्तिरीय उपनिषद् (2.1.1) का प्रसिद्ध वचन है: "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।"

यह ब्रह्म की साधारण परिभाषा नहीं है। यदि हम "सत्य", "ज्ञान" और "अनन्त" को तीन अलग-अलग गुण मान लें, तो ब्रह्म गुणों वाली किसी वस्तु जैसा बन जाएगा। शंकर की व्याख्या इससे अलग दिशा में जाती है। ब्रह्म ऐसा स्वामी नहीं है जिसमें सत्य और ज्ञान जैसे गुण बाहर से जुड़े हों। वह स्वयं सत्य-स्वरूप, ज्ञान-स्वरूप और अनन्त-स्वरूप है।

इसलिए यहाँ "ज्ञान" का अर्थ किसी विषय की जानकारी रखना नहीं है। ब्रह्म चैतन्य-स्वरूप है।

शोध-टिप्पणी: शंकर के तैत्तिरीय-भाष्य का आशय यह है कि ये शब्द ब्रह्म में कोई नया गुण नहीं जोड़ते, बल्कि उसकी पहचान कराते हैं। वे बताते हैं कि ब्रह्म असत्य नहीं, जड़ नहीं और सीमित नहीं है।

उत्तरवर्ती अद्वैत में पहचान के दो ढंग अलग किए गए: स्वरूप-लक्षण (वस्तु की अपनी पहचान, जैसे "सत्यं ज्ञानमनन्तम्") और तटस्थ-लक्षण (बाहरी सम्बन्ध से पहचान, जैसे "जिससे इस जगत् का जन्म आदि होता है", ब्रह्मसूत्र 1.1.2)। ये दोनों नाम बाद की परम्परा में प्रचलित हुए, पर उनका भाव शंकर के भाष्यों में देखा जा सकता है।

ब्रह्म: ज्ञेय वस्तु नहीं

यहाँ वेदान्त की एक गहरी समस्या सामने आती है।

हम संसार की वस्तुओं को जानते हैं: वृक्ष, नदी, किसी व्यक्ति को, और अपने विचारों को भी। तो क्या ब्रह्म को भी उसी तरह जाना जा सकता है?

यदि ब्रह्म एक ज्ञेय वस्तु है, तो उसे जानने वाला कोई और ज्ञाता चाहिए। फिर प्रश्न उठेगा कि उस ज्ञाता का आधार क्या है? इसलिए ब्रह्म को किसी बाहरी वस्तु की तरह पकड़ना सम्भव नहीं। वेदान्त की दिशा यहाँ वस्तु की खोज से हटकर उस आधार की पहचान की ओर जाती है, जिसके बिना ज्ञाता और ज्ञेय दोनों की सत्ता ही अर्थहीन हो जाती है।

शोध-टिप्पणी: बृहदारण्यक (2.4.14) का प्रश्न इसी बात को पकड़ता है: "विज्ञातारमरे केन विजानीयात्?" यानी जो स्वयं जानने वाला है, उसे किस साधन से जाना जाए? केन उपनिषद् (1.4) भी कहता है कि जिसे वाणी नहीं कहती, पर जिससे वाणी कही जाती है, उसी को ब्रह्म जानो, उसे नहीं जिसकी लोग उपासना करते हैं।

यहाँ एक भेद ध्यान रखने योग्य है: "ज्ञेय वस्तु नहीं" का अर्थ "अज्ञेय" नहीं है। ब्रह्म वस्तु की तरह नहीं जाना जाता, पर वह स्वयं का स्वरूप है, इसलिए श्रुति के उपदेश और अज्ञान के हटने से उसका बोध होता है।

"नेति नेति": ब्रह्म क्या नहीं है?

बृहदारण्यक उपनिषद् (2.3.6) कहता है: "नेति नेति", अर्थात् यह नहीं, यह नहीं।

यह वाक्य ब्रह्म के बारे में अज्ञान की घोषणा नहीं है। यह उस सीमा का संकेत है जहाँ साधारण भाषा और धारणाएँ पहुँचकर रुक जाती हैं। हम किसी वस्तु के बारे में कहते हैं, "यह ऐसी है।" पर ब्रह्म के बारे में हर सीमित विशेषण उसे किसी सीमा में बाँध देता है। इसलिए वेदान्त कभी-कभी निषेध की भाषा अपनाता है:

  • ब्रह्म शरीर नहीं,
  • ब्रह्म मन नहीं,
  • ब्रह्म कोई सीमित पदार्थ नहीं,
  • ब्रह्म किसी आकार या स्थान में बँधा नहीं।

पर "नेति नेति" का अर्थ यह नहीं कि अन्त में कुछ भी नहीं बचता। निषेध के बाद जो शेष रहता है, वेदान्त उसी की ओर संकेत करता है।

शोध-टिप्पणी: ब्रह्मसूत्र (3.2.22) के भाष्य में शंकर समझाते हैं कि "नेति नेति" ब्रह्म का निषेध नहीं करता। वह उस सीमित रूप-विस्तार का निषेध करता है जो पहले बताया गया था, और ब्रह्म को शेष रहने देता है।

"एकमेवाद्वितीयम्"

छान्दोग्य उपनिषद् (6.2.1) में आता है: "एकमेवाद्वितीयम्", यानी एक ही, दूसरा नहीं। यही वाक्य अद्वैत की आधारभूमि बनता है।

पर यहाँ "एक" को गिनती की तरह समझना ठीक नहीं। यदि ब्रह्म "एक वस्तु" है, तो उसके बाहर दूसरी वस्तुओं की सम्भावना बनी रहेगी। अद्वैत का आशय गहरा है: परम सत्ता के स्तर पर ब्रह्म के अतिरिक्त कोई स्वतन्त्र दूसरी सत्ता नहीं है। यहीं से आगे जगत् और उसकी सत्ता का प्रश्न उठेगा।

शोध-टिप्पणी: उत्तरवर्ती अद्वैत में इस वाक्य को तीन प्रकार के भेदों के निषेध से समझाया जाता है। उदाहरण पेड़ का है:

  • सजातीय भेद: एक पेड़ से दूसरे पेड़ का भेद।
  • विजातीय भेद: पेड़ से पत्थर जैसी भिन्न जाति की वस्तु का भेद।
  • स्वगत भेद: पेड़ के अपने भीतर शाखा, पत्ते और जड़ का भेद।

ब्रह्म में ये तीनों नहीं हैं। यह विश्लेषण बाद की परम्परा में अधिक विकसित है, पर "एकमेवाद्वितीयम्" को समझने में बहुत सहायक है।

ब्रह्म और ईश्वर: क्या दोनों एक हैं?

भारतीय धार्मिक जीवन में "ईश्वर" का अर्थ सामान्यतः उस सत्ता से है जो जगत् की रचना करती है, उसका पालन करती है, कर्मों का फल देती है और जीवों का नियमन करती है। तो क्या यही ब्रह्म है?

शाङ्कर दर्शन में इसका उत्तर बहुत सूक्ष्म है। निर्गुण ब्रह्म परम तत्त्व है। जब वही ब्रह्म नाम-रूप की उपाधि (अविद्या या माया) के सम्बन्ध से जगत् के कारण और नियन्ता के रूप में समझा जाता है, तब ईश्वर की धारणा सामने आती है।

इसलिए अद्वैत में ईश्वर का निषेध नहीं है। ईश्वर को स्वीकार करते हुए भी यह पूछा जाता है कि उपाधि से जुड़ी यह स्थिति परम ब्रह्म से किस प्रकार सम्बन्धित है। यह प्रश्न आगे माया और जगत् के विवेचन में निर्णायक होगा।

शोध-टिप्पणी: प्रश्न उपनिषद् (5.2) में "पर" और "अपर" ब्रह्म का भेद आता है, जिसे शंकर अपने भाष्य में समझाते हैं। ब्रह्मसूत्र (3.2.11) के भाष्य का आशय यह है कि उपाधि के कारण ब्रह्म स्वरूप से दो प्रकार का नहीं हो जाता। स्वरूप से वह निर्विशेष है, और सगुण वर्णन उपाधि की दृष्टि से है।

इस श्रृंखला के लिए एक सावधानी भी: शंकर के अपने भाष्यों में अविद्या, नाम-रूप और अव्याकृत जैसे शब्द प्रमुखता से आते हैं। "माया" का प्रयोग भी मिलता है, पर उसका विकसित सिद्धान्त-रूप उत्तरवर्ती परम्परा में अधिक स्पष्ट है। इसका विस्तार माया वाले भाग में होगा।

निर्गुण ब्रह्म का अर्थ

"निर्गुण" शब्द को अक्सर गलत समझा जाता है। यदि इसका अर्थ यह कर दिया जाए कि ब्रह्म में कुछ भी नहीं है, तो अद्वैत शून्यवाद के निकट चला जाएगा। शंकर का आशय यह नहीं है।

निर्गुण का तात्पर्य है कि ब्रह्म सत्त्व, रज, तम जैसे गुणों और सीमित वस्तुगत विशेषताओं से बँधा नहीं है। ब्रह्म को लाल, नीला, छोटा, बड़ा, सुखी या दुःखी कहकर बाँधना उसे वस्तु बना देना होगा। इसलिए "निर्गुण" का अर्थ गुणरहित शून्य नहीं, बल्कि सीमित गुण-निर्धारण से परे परम तत्त्व है।

शोध-टिप्पणी: बृहदारण्यक (3.8.8) में ब्रह्म को "अस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घम्" कहा गया है, यानी न स्थूल, न सूक्ष्म, न छोटा, न लम्बा। यह भाषा अभाव की नहीं, सीमा के निषेध की है। शंकर ने ब्रह्मसूत्र (2.2) के बौद्ध-मत-खण्डन में शून्यवाद का स्पष्ट खण्डन भी किया है, जो इस भेद को और स्पष्ट करता है।

सगुण ब्रह्म और उपासना

मनुष्य के लिए निराकार, निर्गुण ब्रह्म का चिन्तन सहज नहीं है। मन किसी रूप, नाम, गुण या सम्बन्ध के सहारे अधिक आसानी से एकाग्र होता है। यहीं सगुण ब्रह्म और उपासना की भूमिका आती है। ईश्वर को सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, करुणामय और जगत् का नियन्ता मानकर उसकी उपासना की जा सकती है।

शंकर की परम्परा में उपासना का क्षेत्र महत्त्वपूर्ण है। फिर भी अद्वैत का अन्तिम प्रश्न बना रहता है: उपासक और उपास्य के बीच जो भेद है, क्या वह परम सत्य का अन्तिम भेद है? अद्वैत का उत्तर है, नहीं। उपासना साधक को उस बोध की दिशा में ले जा सकती है जहाँ आत्मा और ब्रह्म की अन्तिम अभिन्नता का ज्ञान होता है।

शोध-टिप्पणी: शंकर उपासना और ज्ञान को अलग रखते हैं। उपासना साधक की मानसिक क्रिया है, जबकि ज्ञान वस्तु के यथार्थ स्वरूप के अनुसार होता है। इसीलिए उपासना चित्त को शुद्ध और एकाग्र करती है, पर मोक्ष का साक्षात् साधन ज्ञान माना गया है। यह विषय मोक्ष वाले भाग में विस्तार से आएगा।

ब्रह्म और कारण का प्रश्न

यदि ब्रह्म ही परम सत्य है, तो संसार की उत्पत्ति का कारण क्या है? यहाँ वेदान्त के सामने कठिन समस्या है। जब कोई कारण बदलकर कार्य बनता है (जैसे दूध से दही), तो कारण में परिवर्तन मानना पड़ता है। पर ब्रह्म यदि अपरिवर्तनशील है, तो परिवर्तनशील जगत् उससे कैसे जुड़ेगा?

शंकर इस प्रश्न को बहुत सावधानी से देखते हैं। ब्रह्म को जगत् का कारण मानने का अर्थ यह नहीं कि ब्रह्म किसी पदार्थ की तरह बदलकर संसार बन गया। इसी सन्दर्भ में वेदान्त में विवर्त की चर्चा आती है। रस्सी में साँप का उदाहरण यहाँ उपयोगी है। रस्सी स्वयं साँप में नहीं बदली, फिर भी साँप का अनुभव हुआ। इसी तरह ब्रह्म में वास्तविक परिवर्तन माने बिना जगत् के अनुभव को समझाने का प्रयास किया जाता है। यही वह स्थान है जहाँ "जगत् मिथ्या" की प्रसिद्ध धारणा को समझने की आवश्यकता पैदा होती है।

शोध-टिप्पणी: "विवर्तवाद" नाम से यह सिद्धान्त मुख्यतः उत्तरवर्ती अद्वैत में स्थिर हुआ। शंकर के भाष्यों में यही भाव कार्य और कारण के सम्बन्ध के रूप में आता है। छान्दोग्य (6.1.4) के वाक्य "वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्" का आशय है कि घड़ा केवल नाम और रूप है, सत्य तो मिट्टी ही है। ब्रह्मसूत्र (2.1.14) के "तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः" में कार्य को कारण से अलग न मानने की बात आती है। रज्जु-सर्प का उदाहरण भी परवर्ती परम्परा में अधिक प्रसिद्ध है। इन सबका विस्तार जगत् की सत्ता वाले भाग में होगा।

क्या ब्रह्म जगत् से बाहर है?

यदि ब्रह्म जगत् का कारण है, तो क्या वह जगत् से बाहर बैठा कोई निर्माता है? अद्वैत की दृष्टि में ऐसा समझना पर्याप्त नहीं। यदि ब्रह्म के बाहर कोई स्वतन्त्र सत्ता है, तो ब्रह्म अद्वितीय कैसे रहेगा?

इसलिए ब्रह्म को केवल जगत् का "बाहरी निर्माता" मानना शाङ्कर दृष्टि को सीमित कर देता है। ब्रह्म ही परम आधार है, और जगत् की सत्ता ब्रह्म से स्वतन्त्र नहीं है। पर इसका यह अर्थ भी नहीं कि जगत् को ब्रह्म जितना ही परम सत्य मान लिया जाए। यहीं से सत्ता के स्तरों का प्रश्न सामने आता है, जिसे आगे विस्तार से समझना होगा।

शोध-टिप्पणी: ब्रह्मसूत्र (1.4.23 से 27) के भाष्य में शंकर ब्रह्म को जगत् का निमित्त कारण भी मानते हैं और उपादान कारण भी। सरल उदाहरण: बाहर बैठे कुम्हार को निमित्त कारण और मिट्टी को उपादान कारण कहा जाता है। यहाँ ब्रह्म को ऐसा कारण माना गया है जो कुम्हार भी है और मिट्टी भी, इसलिए ब्रह्म के बाहर कोई दूसरी स्वतन्त्र सत्ता नहीं बचती।

11. ब्रह्म को जानना और ब्रह्म बन जाना

अद्वैत में एक सामान्य भ्रम है: क्या आत्मज्ञान का अर्थ है कि कोई व्यक्ति ज्ञान पाकर ब्रह्म बन जाता है? शाङ्कर दृष्टि में ऐसा नहीं है। यदि आत्मा मूलतः ब्रह्म-स्वरूप है, तो नया ब्रह्म बनना सम्भव ही नहीं।

ज्ञान किसी नई सत्ता का निर्माण नहीं करता। ज्ञान केवल गलत पहचान को हटाता है। जैसे अँधेरे में रस्सी पर साँप का भ्रम हुआ। प्रकाश आने पर रस्सी "बनाई" नहीं गई, केवल साँप का भ्रम मिटा। इसी तरह ब्रह्मज्ञान का कार्य है, जो वास्तव में है, उसे वैसा ही जानना।

शोध-टिप्पणी: मुण्डक उपनिषद् (3.2.9) में "ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति" जैसा वचन आता है, जिसका शाब्दिक अर्थ "ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है" है। शंकर इसे किसी नई वस्तु के बनने की तरह नहीं, अज्ञान के हटने पर अपने सिद्ध स्वरूप के बोध की तरह समझाते हैं। इसी कारण वे मोक्ष को कर्म से उत्पन्न होने वाली नई वस्तु नहीं मानते। यह बात आगे मोक्ष वाले भाग में विस्तार से देखी जाएगी।

12. ब्रह्म और "सत्"

शंकर की दृष्टि में ब्रह्म को "सत्" कहने का अर्थ केवल यह नहीं कि वह बहुत लम्बे समय तक रहता है। जो कभी था और फिर नष्ट हो गया, वह परम सत्य नहीं हो सकता। जो अभी है पर भविष्य में नहीं रहेगा, वह भी परम सत्य नहीं। परम सत्य वह है जिसकी सत्ता किसी दूसरे आधार पर निर्भर नहीं।

इसीलिए अद्वैत में "सत्य" शब्द को केवल "सच" और "झूठ" के साधारण अर्थ में नहीं समझा जा सकता।

शोध-टिप्पणी: शंकर के गीताभाष्य (2.16) और तैत्तिरीय-भाष्य में "सत्" की कसौटी स्पष्ट मिलती है: जिसका बोध कभी बदलता नहीं, वह सत् है; जिसका बोध बदल जाता है, वह असत्। ब्रह्मसूत्रभाष्य (1.1.4) में वे ब्रह्म को कूटस्थ नित्य कहते हैं। कूटस्थ का अर्थ है निहाई की तरह अटल, जिसमें सब कुछ बदलता है पर वह स्वयं नहीं बदलता। यह उस नित्य से भिन्न है जो निरन्तर बदलता रहता है (परिणामी नित्य)।

13. ब्रह्म और अनुभव

एक और प्रश्न है: यदि ब्रह्म इतना सूक्ष्म है, तो उसका मनुष्य के अनुभव से क्या सम्बन्ध है?

उत्तर यह है कि ब्रह्म कोई दूर की वस्तु नहीं है। यदि चैतन्य ही ब्रह्म का स्वरूप है, तो अनुभव की हर प्रक्रिया उसी चैतन्य में प्रकाशित होती है। हम वस्तुओं को देखते हैं, विचारों को जानते हैं, स्मृतियों को पहचानते हैं और सुख-दुःख अनुभव करते हैं। पर इन सब अनुभवों के पीछे जो चेतन प्रकाश है, उसकी ओर सामान्यतः हमारा ध्यान नहीं जाता।

अद्वैत का प्रश्न यहीं से भीतर लौटता है: क्या वह चैतन्य स्वयं किसी वस्तु की तरह अनुभव किया जा सकता है, या वही हर अनुभव की मूल शर्त है? इस प्रश्न का उत्तर हमें आत्मा की मीमांसा की ओर ले जाएगा।

शोध-टिप्पणी: बृहदारण्यक (4.3) के जनक-याज्ञवल्क्य संवाद में आत्मा को "स्वयंज्योति" कहा गया है। जब सूर्य, चन्द्र और अग्नि जैसे प्रकाश अस्त हो जाएँ, तब भी पुरुष आत्मा की ज्योति से ही बैठता, चलता और कर्म करता है। आगे के आत्मा-भाग में यह प्रसंग काम आएगा।

14. अब तक का सार

ब्रह्म के सम्बन्ध में अब तक ये बातें स्पष्ट होती हैं:

  • ब्रह्म कोई सीमित वस्तु नहीं है।
  • ब्रह्म परम सत्ता है और चैतन्य-स्वरूप है।
  • ब्रह्म किसी दूसरी स्वतन्त्र सत्ता पर निर्भर नहीं।
  • निर्गुण का अर्थ शून्य या अभाव नहीं।
  • ईश्वर और ब्रह्म का सम्बन्ध उपाधि के प्रश्न से जुड़ता है।
  • जगत् की स्थिति समझे बिना ब्रह्म-विचार पूरा नहीं होता।
  • ब्रह्मज्ञान किसी नई वस्तु की प्राप्ति नहीं है।

पर सबसे बड़े प्रश्न अभी अनुत्तरित हैं। यदि ब्रह्म एक है, तो हमें अनेकता क्यों दिखती है? मैं स्वयं को सीमित व्यक्ति क्यों मानता हूँ? ब्रह्म यदि चैतन्य है, तो अज्ञान कहाँ से आया? और यदि ब्रह्म ही परम सत्य है, तो यह अनुभव होने वाला जगत् किस अर्थ में सत्य है? यहीं से शाङ्कर दर्शन का सबसे कठिन अध्याय खुलता है।

निष्कर्ष

शंकराचार्य के लिए ब्रह्म किसी दूर बैठे परम देवता की केवल धार्मिक कल्पना नहीं है। ब्रह्म अस्तित्व का परम आधार है। वह जानी जाने वाली वस्तुओं में से एक वस्तु नहीं, बल्कि ज्ञान और अस्तित्व की अन्तिम भूमि है।

इसीलिए अद्वैत का ब्रह्म-विचार केवल ईश्वर-विचार नहीं है। वह उससे भी गहरा प्रश्न है: वास्तविकता की अन्तिम प्रकृति क्या है? और जब यह प्रश्न उठता है, तो उसके सामने हमारा अनुभव खड़ा हो जाता है:

  • एक ब्रह्म, पर अनेक जीव।
  • एक सत्य, पर अनेक वस्तुएँ।
  • चैतन्य, पर अज्ञान।
  • अपरिवर्तनशील ब्रह्म, पर परिवर्तनशील जगत्।

इस विरोधाभास को समझे बिना शाङ्कर दर्शन अधूरा रहेगा। अगले भाग में हम इसी प्रश्न को मनुष्य के अपने अनुभव से जोड़ेंगे:

भाग 4 — आत्मा कौन है? : आत्मा और ब्रह्म का सम्बन्ध

वहाँ प्रश्न होगा: जिस ब्रह्म को हम बाहर खोज रहे हैं, क्या वही हमारे भीतर आत्मा के रूप में उपस्थित है?

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)


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