शंकर दर्शन - भाग 5 — जगत् : वास्तविक, अवास्तविक या मिथ्या?
पिछले भाग में हमने देखा कि शंकराचार्य के लिए आत्मा कोई शरीर, मन या अहंकार नहीं, बल्कि वह चैतन्य है जिसके प्रकाश में इन सबका अनुभव होता है। और उपनिषद् का महावाक्य कहता है: "अयमात्मा ब्रह्म।"
पर यहीं से एक कठिन प्रश्न जन्म लेता है। यदि आत्मा ब्रह्म है और ब्रह्म ही एकमात्र परम सत्य है, तो फिर यह संसार क्या है? यह पृथ्वी, आकाश, शरीर, मन, सम्बन्ध, सुख, दुःख, जन्म और मृत्यु: क्या ये सब वास्तविक हैं? यदि वास्तविक हैं, तो अद्वैत कैसे? और यदि वास्तविक नहीं हैं, तो हम इन्हें रोज़ अनुभव क्यों करते हैं?
यही प्रश्न शाङ्कर दर्शन में जगत्-मीमांसा बन जाता है।
अद्वैत के सामने सबसे बड़ी आपत्ति
अद्वैत कहता है: "एकमेवाद्वितीयम्।" पर हमारा अनुभव कहता है: एक नहीं, अनेक। मैं अलग हूँ, आप अलग हैं। मनुष्य और पशु अलग हैं, पर्वत और नदी अलग हैं, सुख और दुःख अलग हैं। जीव और ईश्वर में भी भेद अनुभव होता है। तो अद्वैत किस आधार पर कहता है कि परम सत्य एक है?
यहाँ शुरू में ही एक बात साफ़ कर देनी चाहिए: अद्वैत अनुभव में दिखने वाले भेदों को नकारकर दर्शन नहीं बनाता; वह भेद की अन्तिम सत्ता पर प्रश्न करता है।
यानी प्रश्न यह नहीं है कि "क्या मुझे अनेकता दिखती है?" वह तो स्पष्ट है। प्रश्न यह है कि क्या यह अनेकता स्वतन्त्र और परम सत्ता रखती है? यहीं से जगत् के सत्य होने का प्रश्न शुरू होता है।
"मिथ्या" का अर्थ "झूठ" नहीं
अद्वैत की चर्चा में सबसे ज़्यादा गलत समझे जाने वाले शब्दों में से एक है: मिथ्या। सामान्य भाषा में "यह मिथ्या है" का अर्थ लिया जाता है, "यह झूठ है।" पर शाङ्कर दर्शन में जगत् को केवल "झूठ" कह देना उसके विचार को बहुत सरल बना देना है।
यदि जगत् पूरी तरह असत् होता, तो उसका अनुभव ही कैसे होता? आकाश-कुसुम का अनुभव किसी वास्तविक वस्तु की तरह नहीं होता। पर जगत् ऐसा नहीं है। वह अनुभव में आता है, उसके साथ व्यवहार होता है, उसके नियम हैं, कर्म के परिणाम हैं, और दुःख वास्तविक रूप से भोगा जाता है। इसलिए जगत् को पूरी तरह "असत्" कहना उचित नहीं।
दूसरी ओर, यदि जगत् ब्रह्म के समान ही परम और स्वतन्त्र सत्य है, तो अद्वैत का अभेद समाप्त हो जाएगा। इन दोनों के बीच की स्थिति समझाने के लिए "मिथ्या" की धारणा काम आती है।
शोध-टिप्पणी: ब्रह्मसूत्र (2.2.28) में शंकर बाहरी वस्तुओं को अनुभव के आधार पर "अभावरूप" मानने वाले मत का खण्डन करते हैं, यानी वे जगत् के अनुभव को हल्के में नहीं लेते। अपने भाष्यों में वे नाम-रूप को ब्रह्म से "तत्त्व" (वही) और "अन्य" (अलग), दोनों ही रूपों में न कह पाने योग्य बताते हैं। इसी भाव को बाद की परम्परा ने अनिर्वचनीय (न सत् कहा जा सके, न असत्) जैसा तकनीकी नाम दिया। "मिथ्या" शब्द शंकर के यहाँ "मिथ्याज्ञान" जैसे प्रयोगों में भी आता है, जहाँ उसका अर्थ "गलत पहचान" के निकट है, "पूर्ण शून्य" के नहीं।
सत्, असत् और मिथ्या
इसे सरल रूप में तीन स्तरों से समझा जा सकता है:
| श्रेणी | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| सत् | जो कभी निरस्त नहीं होता, जिसकी सत्ता किसी दूसरे पर निर्भर नहीं | ब्रह्म |
| असत् | जिसका कोई वास्तविक अस्तित्व ही नहीं | आकाश-कुसुम, वन्ध्या-पुत्र |
| मिथ्या | जो अनुभव और व्यवहार में आता है, पर जिसकी स्वतन्त्र परम सत्ता नहीं | जगत् (रस्सी में साँप, स्वप्न-जैसा) |
जगत् के बारे में अद्वैत की चर्चा इसी तीसरी श्रेणी को समझने की ओर जाती है। इसलिए:
मिथ्या शून्य नहीं है, और मिथ्या परम सत्य भी नहीं है। यही सूक्ष्म अन्तर अद्वैत समझने की कुंजी है।
रज्जु और सर्प
शाङ्कर परम्परा में सबसे प्रसिद्ध दृष्टान्त है रज्जु-सर्प। अँधेरे में पड़ी रस्सी दिखती है, पर व्यक्ति उसे साँप समझ लेता है। भय उत्पन्न होता है, शरीर पीछे हटता है, मन प्रतिक्रिया करता है। उस क्षण साँप के अनुभव को पूरी तरह "झूठा" कहकर टाला नहीं जा सकता, क्योंकि भय सचमुच अनुभव हुआ। पर प्रकाश पड़ने पर पता चलता है कि वहाँ साँप था ही नहीं, रस्सी थी।
इस उदाहरण से एक महत्त्वपूर्ण बात निकलती है: साँप का अनुभव हुआ, पर उसकी अपनी स्वतन्त्र सत्ता नहीं थी। रस्सी के बिना साँप का अनुभव सम्भव नहीं था। इसी तरह अद्वैत जगत् के अनुभव और उसकी परम सत्ता के सम्बन्ध पर विचार करता है।
शोध-टिप्पणी: भाग 2 में बताई गई बात यहाँ भी ध्यान रखें: अध्यासभाष्य में शंकर मुख्यतः "सीप में चाँदी" और "एक चन्द्रमा का दो दिखना" जैसे उदाहरण देते हैं। रज्जु-सर्प परवर्ती परम्परा में अधिक प्रसिद्ध हुआ। शंकर के भाष्यों में स्वप्न, मरुभूमि में जल (मृगतृष्णा) और इन्द्रजाल जैसे उदाहरण भी मिलते हैं।
क्या जगत् ब्रह्म का परिवर्तन है?
अब एक दार्शनिक समस्या आती है। यदि जगत् ब्रह्म से जुड़ा है, तो क्या ब्रह्म स्वयं बदलकर जगत् बन गया? यदि ऐसा है, तो ब्रह्म में वास्तविक परिवर्तन मानना पड़ेगा। पर यदि ब्रह्म नित्य और अपरिवर्तनशील है, तो उसमें वास्तविक परिवर्तन कैसे होगा?
यहीं परिणामवाद और विवर्तवाद की चर्चा आती है। परिणाम में कारण वास्तव में बदलकर कार्य बनता है, जैसे दूध से दही। पर ब्रह्म के सम्बन्ध में ऐसा वास्तविक रूपान्तरण मानना कठिन है। इसलिए जगत् को ब्रह्म का वास्तविक रूपान्तरण मानने के बजाय विवर्त की दिशा में समझाया जाता है।
शोध-टिप्पणी: ब्रह्मसूत्र (2.1.26) में यही आपत्ति उठाई गई है कि यदि ब्रह्म बदलकर जगत् बने, तो या तो पूरा ब्रह्म बदल जाएगा या उसे अंशों वाला मानना पड़ेगा। 2.1.27 के भाष्य में शंकर उत्तर देते हैं कि भेद अविद्या से कल्पित नाम-रूप का है, ब्रह्म के स्वरूप का नहीं। यानी उनका उत्तर "विवर्त" नाम के सिद्धान्त से नहीं, अविद्या-कल्पित नाम-रूप की भाषा से आता है।
विवर्त का संकेत
विवर्त को सरल भाषा में ऐसे समझा जा सकता है: आधार में वास्तविक परिवर्तन हुए बिना किसी दूसरे रूप का अनुभव होना। रस्सी साँप नहीं बनी, फिर भी साँप का अनुभव हुआ। इसी तरह ब्रह्म में वास्तविक परिवर्तन हुए बिना जगत् की विविधता का अनुभव कैसे सम्भव है, यह प्रश्न विवर्त की धारणा से जुड़ता है।
पर यहाँ एक सावधानी बहुत ज़रूरी है। "विवर्तवाद" को केवल एक लोकप्रिय सूत्र मानकर शंकराचार्य के हर कथन पर थोपना ठीक नहीं। बाद के अद्वैताचार्यों ने इस अवधारणा को अधिक व्यवस्थित दार्शनिक रूप दिया। इसलिए शंकर का मूल मत और उत्तरवर्ती विवर्तवाद की तकनीकी बनावट, दोनों को अलग रखकर पढ़ना चाहिए।
जगत् की सत्ता कहाँ से आती है?
यदि जगत् स्वतन्त्र परम सत्य नहीं है, तो उसका अनुभव क्यों होता है? अद्वैत यहाँ अविद्या और अध्यास की ओर लौटता है। हमने पहले देखा था कि मनुष्य आत्मा पर शरीर और मन के धर्मों का आरोप करता है। अब वही समस्या बड़े स्तर पर दिखती है:
- जो एक है, उसमें अनेकता दिखती है।
- जो निरपेक्ष है, वह उपाधियों से सीमित दिखता है।
- जो चैतन्य है, वह जीवों की अलग-अलग चेतनाओं के रूप में अनुभव होता है।
यानी समस्या केवल बाहर के संसार में नहीं, देखने वाले की दृष्टि में ही कोई मूल भूल है। इसीलिए जगत्-मीमांसा और आत्म-मीमांसा अलग-अलग विषय नहीं रह जाते।
तीन अवस्थाएँ और जगत् का अनुभव
अद्वैत परम्परा में मनुष्य के अनुभव को जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्थाओं से भी देखा जाता है। जाग्रत् में बाहरी संसार का अनुभव होता है। स्वप्न में मन स्वयं एक अनुभव-जगत् रच लेता है। सुषुप्ति में व्यक्तिगत अनुभव-विषय प्रकट रूप में नहीं रहते।
अब प्रश्न उठता है: यदि स्वप्न का संसार जागने पर निरस्त हो जाता है, तो क्या जाग्रत् संसार भी किसी उच्चतर ज्ञान में निरस्त हो सकता है? यहीं अद्वैत का बाध (निरस्त होने) का विचार आता है। स्वप्न जाग्रत् ज्ञान से बाधित होता है, और अद्वैत के अनुसार अन्तिम आत्मज्ञान में जगत् की स्वतन्त्र परम-सत्ता का अभिमान बाधित होता है।
पर इसका अर्थ यह नहीं कि ज्ञानी को पेड़ दिखना बन्द हो जाएगा या पत्थर और दीवार का भेद मिट जाएगा। व्यवहार बना रहता है; बदलती है उसके सत्य के बारे में समझ। (एक सहायक उदाहरण, वेदान्त-ग्रन्थों का नहीं: सूर्यास्त देखते हुए भी हम जानते हैं कि सूर्य डूबता नहीं, पृथ्वी घूमती है। दृश्य बना रहता है, पर उसके बारे में धारणा बदल जाती है।)
शोध-टिप्पणी: यहाँ एक चूक से बचना ज़रूरी है। ब्रह्मसूत्र (2.2.29) में शंकर विज्ञानवादी बौद्धों के इस दावे का खण्डन करते हैं कि जाग्रत् जगत् हर तरह से स्वप्न जैसा ही है। वे दोनों के भेद बताते हैं। इसलिए स्वप्न की उपमा "बाध" (बाद में निरस्त होना) समझाने के लिए है, यह कहने के लिए नहीं कि जाग्रत् और स्वप्न हर दृष्टि से समान हैं। गौडपाद की माण्डूक्य-कारिका (वैतथ्य-प्रकरण) में स्वप्न-उपमा अधिक प्रबल रूप में आती है। शंकर और गौडपाद के इस अन्तर पर शोध में ध्यान देना अच्छा रहेगा।
पारमार्थिक और व्यावहारिक दृष्टि
अद्वैत को समझने के लिए यह भेद बहुत उपयोगी है:
- पारमार्थिक दृष्टि: जहाँ केवल ब्रह्म की परम सत्ता है।
- व्यावहारिक दृष्टि: जहाँ जीव, जगत्, ईश्वर, कर्म और कारण-कार्य का व्यवहार चलता है।
व्यवहार के स्तर पर संसार को नकारा नहीं जा सकता। भूख लगे तो भोजन चाहिए, रोग हो तो उपचार चाहिए, कर्म का परिणाम होता है, और धर्म-अधर्म का भी व्यावहारिक महत्त्व है। पर अद्वैत कहता है कि यह पूरा व्यवहार परम, स्वतन्त्र सत्ता के स्तर का सत्य नहीं है। इसीलिए ज्ञानी संसार में रहते हुए भी उसके अन्तिम स्वरूप के बारे में अलग दृष्टि रखता है।
शोध-टिप्पणी: ब्रह्मसूत्रभाष्य (2.1.14) में शंकर कहते हैं कि ब्रह्म और आत्मा की एकता का ज्ञान होने से पहले सभी व्यवहार सत्य की तरह बने रहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे स्वप्न के व्यवहार जागने से पहले। "पारमार्थिक" और "व्यावहारिक" की यह भाषा शंकर के यहाँ मिलती है। पर तीसरा स्तर "प्रातिभासिक" (जैसे सीप में चाँदी की प्रतीति) नाम से बाद की परम्परा में अधिक स्पष्ट हुआ।
ज्ञान के बाद शरीर और व्यवहार का कुछ समय चलते रहना शंकर प्रारब्ध कर्म से समझाते हैं। छान्दोग्य (6.14.2) का वाक्य है कि "उसकी देर तभी तक है जब तक वह मुक्त न हो", और ब्रह्मसूत्र (4.1.15) के भाष्य में कुम्हार के चाक का उदाहरण आता है, जो हाथ हटने पर भी कुछ देर घूमता रहता है।
क्या अद्वैत संसार से पलायन सिखाता है?
यदि संसार मिथ्या है, तो क्या जीवन निरर्थक है? क्या कर्म छोड़ देना चाहिए? क्या परिवार, समाज, नैतिकता और करुणा का कोई अर्थ नहीं? यह निष्कर्ष शाङ्कर दर्शन पर थोपना उचित नहीं।
शंकराचार्य ने स्वयं भगवद्गीता पर भाष्य लिखा है और उसमें कर्म, धर्म, उपासना और चित्त-शुद्धि की भूमिका पर विचार किया है। व्यावहारिक संसार को स्वीकार किए बिना साधना की कोई भूमि ही नहीं बन सकती। इसलिए अद्वैत का उद्देश्य संसार को नष्ट करना नहीं, संसार के बारे में हमारी अन्तिम धारणा को शुद्ध करना है।
शोध-टिप्पणी: गीता (3.25) में कहा गया है कि अज्ञानी आसक्त होकर कर्म करते हैं, जबकि ज्ञानी लोक-संग्रह की इच्छा से अनासक्त होकर कर्म करे। शंकर इस स्थल को ध्यान में रखते हुए ज्ञानी के कर्म की सम्भावना पर विचार करते हैं। ब्रह्मसूत्रभाष्य (1.1.1) में मोक्ष-जिज्ञासा की पूर्व-तैयारी के रूप में चार साधन गिनाए गए हैं: नित्य-अनित्य का विवेक, इस लोक और परलोक के भोगों से विराग, शम-दम आदि की सम्पत्ति, और मोक्ष की इच्छा। यानी नैतिक और व्यावहारिक जीवन अद्वैत से अलग नहीं, उसकी तैयारी है।
जगत् ब्रह्म से अलग भी नहीं
यहाँ अद्वैत की एक बहुत सूक्ष्म स्थिति सामने आती है। यदि जगत् ब्रह्म से पूरी तरह अलग है, तो द्वैत स्वीकार करना पड़ेगा। यदि जगत् ब्रह्म ही है और उसी के समान परम सत्य है, तो जगत् में होने वाला परिवर्तन ब्रह्म में भी स्वीकार करना पड़ेगा।
इसलिए अद्वैत का कथन बीच की एक सूक्ष्मता रखता है: जगत् ब्रह्म से स्वतन्त्र नहीं है, पर ब्रह्म के समान परम सत्य भी नहीं।
जैसे सोने से बने अनेक आभूषण नाम और रूप में अलग दिखते हैं, पर उनकी आधारभूत सत्ता सोने पर निर्भर है। यह दृष्टान्त पूर्ण दार्शनिक समाधान नहीं है, पर यह समझाने में सहायक है कि नाम-रूप की विविधता और आधारभूत सत्ता का सम्बन्ध कैसे देखा जा सकता है।
शोध-टिप्पणी: यह उदाहरण छान्दोग्य (6.1.4 से 6.1.6) में आता है: मिट्टी के घड़े, सोने के आभूषण और लोहे के औज़ार, जिनके बारे में कहा गया है कि विकार केवल वाणी का आश्रय लेने वाला नाम है, सत्य तो मिट्टी, सोना या लोहा ही है। ब्रह्मसूत्र (2.1.14) का "तदनन्यत्वम्" सूत्र इसी का दार्शनिक रूप है।
नाम और रूप
उपनिषद् परम्परा में नाम-रूप का विचार बहुत महत्त्वपूर्ण है। हम संसार को वस्तुओं के नाम और रूप से पहचानते हैं: यह वृक्ष है, यह नदी है, यह मनुष्य है, यह पर्वत है। पर नाम और रूप बदलने पर भी उनके अस्तित्व का प्रश्न बना रहता है।
अद्वैत इसी अस्तित्व को उसके परम आधार तक ले जाना चाहता है। इसलिए जगत् को नकारने के बजाय वह पूछता है: जगत् की सत्ता किस पर आश्रित है? और उत्तर ब्रह्म की ओर लौटता है।
शोध-टिप्पणी: बृहदारण्यक (1.4.7) में कहा गया है कि यह जगत् पहले अव्याकृत था और नाम-रूप से व्यक्त हुआ। छान्दोग्य (6.3.2) में भी नाम-रूप के प्रकट होने की बात है। शंकर इसी आधार पर "अव्याकृत नाम-रूप" की भाषा में जगत् की प्रक्रिया समझाते हैं।
"मिथ्या" को सही समझना क्यों ज़रूरी है
यदि कोई कहे, "संसार झूठ है, इसलिए संसार में कुछ भी मायने नहीं रखता", तो यह अद्वैत का दार्शनिक निष्कर्ष नहीं है। और यदि कोई दूसरी ओर कहे, "जगत् जैसा दिखता है, वैसा ही परम और स्वतन्त्र सत्य है", तो यह भी अद्वैत की स्थिति नहीं।
शाङ्कर दर्शन का प्रश्न इससे गहरा है: जिस जगत् को हम अनुभव करते हैं, उसकी सत्ता का अन्तिम आधार क्या है? जगत् अनुभव-सिद्ध है, व्यवहार-सिद्ध है, पर उसकी सत्ता ब्रह्म से स्वतन्त्र नहीं। यही "मिथ्या" की सूक्ष्म दिशा समझने का आधार है।
जगत्-मीमांसा से माया तक
अब हमारी यात्रा एक निर्णायक मोड़ पर पहुँचती है। हमने देखा:
- ब्रह्म एक है।
- जगत् अनेक दिखता है।
- जगत् पूरी तरह असत् नहीं।
- पर वह ब्रह्म के समान परम स्वतन्त्र सत्य भी नहीं।
तो फिर यह अनेकता आती कहाँ से है? अद्वैत परम्परा यहाँ जिस अवधारणा का सहारा लेती है, वह है माया। पर "माया" का अर्थ केवल जादू, भ्रम या धोखा नहीं है। माया और अविद्या के सम्बन्ध को लेकर अद्वैत परम्परा के भीतर भी सूक्ष्म मतभेद विकसित हुए हैं। इसलिए अगले भाग में हम इस कठिन प्रश्न को मूल शाङ्कर स्रोतों और उत्तरवर्ती अद्वैत की सहायता से समझेंगे।
जगत् के सम्बन्ध में शाङ्कर दर्शन को तीन सरल वाक्यों में समेटना हो तो कहा जा सकता है:
जगत् अनुभव में है। जगत् का व्यवहार है। पर जगत् की स्वतन्त्र परम सत्ता नहीं है।
अद्वैत का "मिथ्या" इसी तीसरे बिन्दु को समझने का प्रयास है। इस दृष्टि से शाङ्कर दर्शन संसार को नष्ट नहीं करता; वह उसके प्रति हमारी परम-सत्य की धारणा की परीक्षा करता है। रज्जु के ज्ञान से साँप का अनुभव समाप्त होता है, पर रस्सी नष्ट नहीं होती। उसी तरह आत्मज्ञान से संसार का व्यवहार अनिवार्य रूप से समाप्त नहीं होता; समाप्त होता है उसके स्वतन्त्र और परम सत्य होने का अज्ञान।
और अब सबसे कठिन प्रश्न सामने है:
- यदि ब्रह्म एकमात्र सत्य है और जगत् की स्वतन्त्र सत्ता नहीं, तो अनेकता का अनुभव उत्पन्न कैसे होता है?
- कौन-सी शक्ति एक को अनेक के रूप में प्रकट करती है? क्या वही माया है?
- क्या माया ब्रह्म से अलग कोई सत्ता है? यदि अलग है, तो अद्वैत कैसे बचा? यदि अलग नहीं है, तो जगत् कैसे प्रकट हुआ?
अगला भाग — भाग 6 : माया और अविद्या — शाङ्कर दर्शन की सबसे कठिन अवधारणा
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