शंकर दर्शन - भाग 7 — मोक्ष क्या है?

 पिछले भाग में हमने देखा कि शाङ्कर दर्शन के अनुसार बन्धन की जड़ अविद्या है। अब स्वाभाविक प्रश्न है: यदि अज्ञान ही बन्धन का कारण है, तो मुक्ति का साधन क्या है?

  • क्या यज्ञ, दान और तप से मोक्ष मिलेगा?
  • क्या ईश्वर की उपासना पर्याप्त है?
  • या केवल आत्मज्ञान ही मुक्ति का मार्ग है?

शंकराचार्य का उत्तर इस विषय में बहुत स्पष्ट भी है और सूक्ष्म भी।

मोक्ष क्या है?

मोक्ष का अर्थ किसी नए लोक में पहुँच जाना भर नहीं है। यदि बन्धन का मूल कारण आत्म-स्वरूप का अज्ञान है, तो मोक्ष का मूल अर्थ है उस अज्ञान का निवारण।

इसलिए मोक्ष कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे कर्म से पैदा किया जाए। कर्म से परिणाम उत्पन्न होता है, पर आत्मा कोई उत्पाद नहीं है। वह पहले से ही अपने स्वरूप में है। इसलिए शाङ्कर दृष्टि में ज्ञान मोक्ष को उत्पन्न नहीं करता; ज्ञान उस अज्ञान को दूर करता है जो मोक्ष-स्वरूप आत्मा के बोध में बाधक है।

शोध-टिप्पणी: ब्रह्मसूत्रभाष्य (1.1.4) में शंकर इसी बात को एक कसौटी से समझाते हैं। कर्म का फल चार ही तरह का हो सकता है: कुछ नया उत्पन्न होना, कुछ पाया जाना, किसी में बदलाव आना, या किसी का संस्कार (शुद्धि) होना। मोक्ष इनमें से कुछ नहीं हो सकता। नया उत्पन्न हुआ तो अनित्य होगा, पाने की वस्तु मानें तो आत्मा तो पहले से प्राप्त है, बदलाव मानें तो आत्मा निर्विकार है, और संस्कार मानें तो आत्मा शुद्ध ही है। इसीलिए वे मोक्ष को नित्य-सिद्ध स्वरूप मानते हैं।

कर्म की सीमा

वेदों में यज्ञ, दान, तप और अनेक कर्मों का विस्तृत विधान है। तो शंकराचार्य कर्म को मोक्ष का साधन क्यों नहीं मानते?

क्योंकि कर्म का आधार है कर्ता। जब तक कोई व्यक्ति स्वयं को कर्ता मानता है, तभी तक कर्म का विधान अर्थपूर्ण है। कर्म का फल भी उत्पन्न होता है, और जो उत्पन्न हुआ है, वह नित्य नहीं हो सकता। पर मोक्ष यदि नित्य आत्म-स्वरूप है, तो उसे कर्मफल की तरह उत्पन्न नहीं किया जा सकता। इसलिए: कर्म चित्त को तैयार कर सकता है; आत्मज्ञान को उत्पन्न नहीं करता।

शोध-टिप्पणी: मुण्डक उपनिषद् (1.2.12) का वाक्य यही कहता है: कर्मों से प्राप्त लोकों की परीक्षा करके ब्राह्मण वैराग्य को प्राप्त हो, क्योंकि "नास्त्यकृतः कृतेन", यानी जो अकृत (नित्य) है, वह कृत (किए गए) कर्म से नहीं मिलता।

फिर कर्म का महत्त्व क्या है?

यहाँ शंकराचार्य कर्म को पूरी तरह अस्वीकार नहीं करते। यह एक सामान्य भ्रान्ति है कि अद्वैत का अर्थ है "कर्म व्यर्थ है।" ऐसा नहीं है। निष्काम कर्म मनुष्य के भीतर चित्त-शुद्धि, अहंकार की शिथिलता, कर्तव्य-बोध और फलासक्ति से दूरी उत्पन्न कर सकता है। भगवद्गीता की शाङ्कर व्याख्या में कर्मयोग को ज्ञान की तैयारी के रूप में समझने की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

पर तैयारी और अन्तिम साधन में अन्तर है। कर्म चित्त को योग्य बनाता है; आत्मज्ञान बन्धन का निवारण करता है।

शोध-टिप्पणी: बृहदारण्यक (4.4.22) में कहा गया है कि ब्राह्मण वेदाध्ययन, यज्ञ, दान और तप से उस आत्मा को जानने की इच्छा (विविदिषा) करते हैं। शंकर इसे इस तरह पढ़ते हैं कि कर्म ज्ञान की इच्छा और योग्यता जगाते हैं, स्वयं ज्ञान नहीं देते। ब्रह्मसूत्र (3.4.26) के भाष्य में "अश्ववत्" का उदाहरण आता है: घोड़ा यात्रा तक काम आता है, पर मंज़िल पर पहुँचकर उसकी ज़रूरत नहीं रहती। गीता (5.11) में योगी "आत्म-शुद्धि के लिए" आसक्ति छोड़कर कर्म करते हैं।

कर्म और ज्ञान साथ-साथ?

यहाँ अद्वैत का एक प्रसिद्ध मतभेद सामने आता है: क्या कर्म और ज्ञान मिलकर मोक्ष दे सकते हैं? इसे ज्ञान-कर्म-समुच्चय कहा जाता है।

शंकराचार्य का उत्तर है: नहीं, अन्तिम स्तर पर दोनों का कार्य अलग है। कर्म में कर्ता, कर्म और फल का त्रिपुट रहता है। ज्ञान का अन्तिम बोध इसी कर्तृत्व-अहंकार की परीक्षा करता है। जिस अज्ञान से "मैं कर्ता हूँ" की भावना पैदा होती है, उसी के रहते किए गए कर्म को ज्ञान के बराबर मुक्ति का प्रत्यक्ष साधन नहीं माना जा सकता। इसलिए कर्म और ज्ञान का सम्बन्ध समुच्चय का नहीं, मुख्यतः तैयारी और बोध का है।

शोध-टिप्पणी: शंकर अपने गीता-भाष्य की भूमिका में स्पष्ट कहते हैं कि मोक्ष केवल तत्त्वज्ञान से है, ज्ञान और कर्म के समुच्चय से नहीं। गीता (3.1 से 3.3) के भाष्य में भी वे ज्ञान-निष्ठा और कर्म-निष्ठा को एक ही व्यक्ति द्वारा एक साथ निभाने की सम्भावना का खण्डन करते हैं। यह मत सर्वमान्य नहीं रहा: कुछ वेदान्ताचार्य (जैसे भास्कर) ज्ञान-कर्म-समुच्चय के पक्ष में थे। इसी कारण यह मतभेद शाङ्कर दर्शन की पहचान बन जाता है।

साधन-चतुष्टय

शंकराचार्य की परम्परा में आत्मज्ञान के अधिकारी की चार योग्यताएँ प्रसिद्ध हैं:

साधनअर्थ
नित्यानित्य-वस्तु-विवेकक्या स्थायी है और क्या परिवर्तनशील, इसका स्पष्ट बोध
इहामुत्र-फल-भोग-विरागइस लोक और परलोक के फलभोग के प्रति वैराग्य
शमादि-षट्सम्पत्तिशम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान
मुमुक्षुत्वमुक्ति की तीव्र आकांक्षा

ये केवल धार्मिक अनुशासन नहीं हैं। इनका उद्देश्य उस मन को तैयार करना है जो सूक्ष्म आत्म-विचार को ग्रहण कर सके।

शोध-टिप्पणी: चारों साधन ब्रह्मसूत्रभाष्य (1.1.1) में "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" की व्याख्या में मिलते हैं। वहाँ "अथ" (इसके बाद) का अर्थ ही यह है कि ब्रह्म-जिज्ञासा इन साधनों के बाद आती है। वहाँ "शम-दम आदि" का संक्षिप्त उल्लेख है; छह की पूरी सूची के लिए बृहदारण्यक (4.4.23) देखिए: "शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वा... श्रद्धावित्तो", जहाँ ये छहों गुण साथ आते हैं। इन्हें "षट्सम्पत्ति" नाम से व्यवस्थित सूची बाद के प्रकरण-ग्रन्थों में मिलती है।

श्रवण, मनन और निदिध्यासन

आत्मज्ञान की साधना को अद्वैत परम्परा तीन चरणों में समझाती है:

  • श्रवण: गुरु से उपनिषद्-वाक्यों के माध्यम से ब्रह्मतत्त्व को सुनना और समझना।
  • मनन: उठने वाले तर्कों और शंकाओं का समाधान करना।
  • निदिध्यासन: प्राप्त तत्त्वबोध में मन को बार-बार स्थिर करना और विपरीत धारणाओं को क्षीण करना।

यहाँ एक बात महत्त्वपूर्ण है: निदिध्यासन कोई नया आत्मज्ञान पैदा नहीं करता। ज्ञान के बौद्धिक रूप से समझ लिए जाने के बाद भी पुरानी देहात्म-बुद्धि और संस्कार बाधक बने रह सकते हैं। आत्मदृष्टि को दृढ़ करने के लिए निदिध्यासन की भूमिका है।

शोध-टिप्पणी: इस तीन-चरण की व्यवस्था का आधार बृहदारण्यक (2.4.5) है, जिसकी चर्चा हमने पिछले भाग में की थी। शंकर के भाष्यों में मुख्य बल श्रवण, यानी महावाक्य के उपदेश पर है। मनन और निदिध्यासन के विस्तृत स्थान, तथा बाधक संस्कारों को हटाने की भूमिका, को उत्तरवर्ती आचार्यों ने अधिक व्यवस्थित किया, और उनमें भी इनके स्थान को लेकर अलग-अलग मत मिलते हैं। ब्रह्मसूत्र (4.1.1 और 4.1.2) में "आवृत्ति" (बार-बार अभ्यास) की चर्चा आती है, जहाँ उपासना और ज्ञान का भेद भी दिखाई देता है।

गुरु की भूमिका

यदि आत्मा स्वयं ही है, तो गुरु की ज़रूरत क्यों? क्योंकि समस्या आत्मा की अनुपस्थिति नहीं, उसके विषय में भ्रम है। उपनिषद्-परम्परा में ज्ञान गुरु-शिष्य संवाद से आगे बढ़ता है। गुरु कोई आत्मा प्रदान नहीं करता। वह ऐसी दृष्टि देता है जिससे शिष्य स्वयं अपने स्वरूप का विवेक कर सके। इसलिए अद्वैत में गुरु को किसी जादुई मध्यस्थ की तरह नहीं, ज्ञान-परम्परा के आचार्य की तरह समझना चाहिए।

शोध-टिप्पणी: मुण्डक (1.2.12) में कहा गया है कि उसे जानने के लिए शिष्य हाथ में समिधा लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाए। छान्दोग्य (6.14.2) का वाक्य है "आचार्यवान् पुरुषो वेद", यानी आचार्य वाला व्यक्ति ही जानता है। इसीलिए शंकर के यहाँ ज्ञान का स्रोत श्रुति है और उसे खोलने वाला आचार्य।

संन्यास का प्रश्न

शंकराचार्य का दर्शन संन्यास से गहराई से जुड़ा है। उनकी दृष्टि में वैराग्य और ज्ञान का सम्बन्ध बहुत महत्त्वपूर्ण है। पर संन्यास का अर्थ केवल वस्त्र बदलना नहीं है। यदि भीतर अहंकार, फलासक्ति और विषयासक्ति ज्यों की त्यों हैं, तो बाहरी परिवर्तन आत्मज्ञान की गारंटी नहीं है। वास्तविक संन्यास का केन्द्र है कर्तृत्व और भोगासक्ति से वैराग्य। यही मन को आत्म-विचार के योग्य बनाता है।

शोध-टिप्पणी: बृहदारण्यक (4.4.22) में "प्रव्राजिनः" (संन्यासियों) का उल्लेख आता है, जो उस लोक की इच्छा से प्रव्रज्या लेते हैं। बाद की परम्परा में संन्यास के दो रूप अलग किए गए: विविदिषा-संन्यास (ज्ञान की इच्छा से लिया गया) और विद्वत्-संन्यास (ज्ञान हो जाने पर स्वाभाविक रूप से आने वाला)। यह भेद शंकर के बाद विकसित व्यवस्था है।

भक्ति का स्थान

यह कहना भी गलत होगा कि शंकराचार्य के दर्शन में भक्ति का कोई स्थान नहीं। उनके भाष्यों में ईश्वर-उपासना को साधना की महत्त्वपूर्ण भूमि माना गया है। अद्वैत में भक्ति मन को ईश्वर की ओर मोड़ती है, अहंकार को शिथिल करती है और चित्त को एकाग्र बनाती है। पर अन्तिम ब्रह्म-बोध में उपासक और उपास्य का द्वैत भी प्रश्न के घेरे में आता है। इसलिए शाङ्कर मार्ग में भक्ति चित्त को निर्मल कर सकती है; ज्ञान परम तत्त्व का बोध कराता है।

शोध-टिप्पणी: परम्परा में शंकराचार्य के नाम से अनेक स्तोत्र प्रचलित हैं, पर उनमें से कई के लेखकत्व पर शोध-स्तर पर चर्चा है। इसलिए भक्ति की भूमिका को सिद्ध करने के लिए सबसे सुरक्षित आधार उनके भाष्य हैं। गीताभाष्य (18.55) में शंकर "परा भक्ति" को ज्ञान-निष्ठा के रूप में समझाते हैं। और सगुण उपासना के फल के रूप में ब्रह्मलोक की प्राप्ति और वहाँ से क्रम से मुक्ति की चर्चा ब्रह्मसूत्र (4.3.10) के भाष्य के आसपास मिलती है।

ज्ञान किस प्रकार का?

यहाँ "ज्ञान" को केवल बौद्धिक सूचना समझना भूल होगी। यदि कोई व्यक्ति दस बार कह दे "अहं ब्रह्मास्मि", तो इससे आत्मज्ञान अपने आप उत्पन्न नहीं हो जाता। ज्ञान का अर्थ है आत्मा के वास्तविक स्वरूप का यथार्थ बोध। जिस प्रकार रस्सी को रस्सी जान लेने के बाद साँप का भ्रम टिक नहीं सकता, उसी प्रकार आत्म-स्वरूप का दृढ़ ज्ञान देहात्म-बुद्धि की मूल भ्रान्ति को समाप्त कर देता है।

ज्ञान और कर्मफल

तो फिर पहले किए गए कर्मों का क्या होगा? अद्वैत परम्परा में ज्ञान के बाद कर्म पर सूक्ष्म विवेचन मिलता है, जिसे सरल रूप में तीन भागों में समझा जा सकता है:

  • संचित कर्म (पहले के जमा कर्म) ज्ञान से नष्ट होते हैं।
  • आगामी कर्म के विषय में ज्ञानी में कर्तृत्व-अभिमान नहीं रहता, इसलिए वे बाँधते नहीं।
  • प्रारब्ध (जो फल देना शुरू कर चुका है) के कारण शरीर का व्यवहार चलता रहता है।

इसी से समझाया जाता है कि ज्ञान प्राप्त होने पर भी ज्ञानी का शरीर तुरन्त समाप्त नहीं होता। वह भोजन करता है, चलता है, बोलता है, समाज में रहता है। अन्तर भीतर है: कर्ता होने का मिथ्या अभिमान समाप्त हो चुका है।

शोध-टिप्पणी: मुण्डक (2.2.8) में कहा गया है कि उस परावर को देख लेने पर उसके कर्म क्षीण हो जाते हैं, और गीता (4.37) में ज्ञान की अग्नि सब कर्मों को भस्म करने वाली कही गई है। ब्रह्मसूत्र (4.1.13 से 4.1.15) में शंकर इसी पर विचार करते हैं: ज्ञान से पूर्व और उत्तर पापों का सम्बन्ध और नाश, और उन कर्मों की बात जो अभी आरम्भ नहीं हुए, जबकि आरब्ध कर्म भोग से क्षीण होते हैं। "संचित, आगामी, प्रारब्ध" की यह तीन-भाग वाली शब्दावली बाद की परम्परा में स्थिर हुई।

जीवन्मुक्ति

यहीं अद्वैत की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण धारणा आती है: जीवन्मुक्ति। मुक्ति केवल मृत्यु के बाद प्राप्त होने वाली अवस्था नहीं है। यदि ज्ञान से अज्ञान का निवारण हो गया, तो व्यक्ति शरीर रहते हुए भी आत्म-स्वरूप में स्थित हो सकता है। वह संसार का व्यवहार करता हुआ भी भीतर से इस ज्ञान में स्थित रहता है कि उसका वास्तविक स्वरूप शरीर-मन तक सीमित नहीं। इसी को जीवन्मुक्ति की दिशा में समझा जाता है।

यह वही प्रश्न है जो भाग 5 में उठा था कि ज्ञानी का व्यवहार कैसा होता है। ज्ञानी को संसार दिखता रहता है, पर उसके सत्य के बारे में उसकी समझ बदल चुकी है।

शोध-टिप्पणी: बृहदारण्यक (4.4.6 और 4.4.7) में कहा गया है कि ज्ञानी के प्राण उत्क्रमण नहीं करते, वह "ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति" (ब्रह्म ही होकर ब्रह्म को पाता है), और "अत्र ब्रह्म समश्नुते" (यहीं ब्रह्म को प्राप्त होता है)। कठ (2.3.14) में भी यही वाक्य आता है। गीता का स्थितप्रज्ञ (2.55 से 2.72) और गुणातीत (14.22 से 14.25) का वर्णन भी इसी जीवन्मुक्त दशा की ओर संकेत करता है। "जीवन्मुक्ति" की विस्तृत शास्त्रीय व्यवस्था बाद के ग्रन्थों में, विशेषतः विद्यारण्य की परम्परा में, मिलती है।

निष्कर्ष: साधनामार्ग का क्रम

शाङ्कर साधनामार्ग को एक क्रम में रखें तो उसकी दिशा कुछ ऐसी दिखती है:

चरणउसका कार्य
कर्मचित्त-शुद्धि
वैराग्यअन्तर्मुखता
उपासनाचित्त की एकाग्रता
श्रवणतत्त्व का बोध
मननसंशय का निवारण
निदिध्यासनबोध की दृढ़ता
ज्ञानअविद्या का निवारण
मोक्षआत्म-स्वरूप में स्थित होना

ध्यान रखें: यह क्रम तैयारी का है, उत्पादन का नहीं। पहले के चरण ज्ञान को पैदा नहीं करते; वे उसके लिए योग्य मन बनाते हैं। ज्ञान स्वयं प्रमाण से, यानी श्रुति के उपदेश से होता है।

इसलिए शंकराचार्य का मार्ग कर्म-विरोधी नहीं है; वह कर्म की सीमा और भूमिका दोनों तय करता है। अन्ततः प्रश्न कर्म का नहीं, उस अज्ञान का है जिसके कारण मनुष्य स्वयं को कर्ता, भोक्ता और सीमित जीव मानता है।

तीन वाक्यों में सार:

  • मोक्ष कर्म से उत्पन्न होने वाली वस्तु नहीं, आत्म-स्वरूप का बोध है।
  • कर्म, उपासना और वैराग्य मन को तैयार करते हैं; अविद्या को ज्ञान ही हटाता है।
  • ज्ञान के बाद भी प्रारब्ध से शरीर चलता है, और यही जीवन्मुक्ति की दशा है।

एक प्रश्न अपने से: आपके दैनिक कर्मों में कौन-सा कर्म आपको "मैं कर्ता हूँ" का सबसे अधिक अहसास कराता है? यदि उसी कर्म को बिना फल की चिन्ता के, केवल कर्तव्य मानकर करें, तो भीतर क्या बदलेगा?

पर यहाँ एक नई समस्या उठती है: यदि ज्ञान इतना महत्त्वपूर्ण है, तो ज्ञान प्राप्त करने का प्रमाण क्या है?

  • क्या केवल अनुभव प्रमाण है?
  • क्या वेद ही प्रमाण है?
  • क्या प्रत्यक्ष, अनुमान और उपमान भी ब्रह्म को जान सकते हैं?
  • और शंकराचार्य श्रुति को ब्रह्मज्ञान का स्वतन्त्र प्रमाण क्यों मानते हैं?

अगला भाग — भाग 8 : प्रमाण और ज्ञानमीमांसा — ब्रह्म को जाना कैसे जाता है?

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)


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