शंकर दर्शन - भाग -8 प्रमाण क्या है?

 शाङ्कर दर्शन में अब तक की हमारी यात्रा एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु तक पहुँच चुकी है। हमने ब्रह्म, आत्मा, जगत्, माया और मोक्ष पर विचार किया। पिछले भाग में यह भी देखा कि मोक्ष का प्रत्यक्ष साधन आत्मज्ञान है।

पर यहाँ एक कठोर दार्शनिक प्रश्न उठता है: ज्ञान प्राप्त कैसे होगा?

किसी वस्तु को जानने के लिए हमारे पास कोई प्रमाण होना चाहिए। आँख से रूप दिखता है। धुआँ देखकर अग्नि का अनुमान होता है। शब्द से उस वस्तु का ज्ञान हो सकता है जिसे हमने स्वयं नहीं देखा। तो ब्रह्म के ज्ञान का प्रमाण क्या है? यही शाङ्कर दर्शन की प्रमाण-मीमांसा का प्रश्न है।

प्रमाण क्या है?

प्रमा का अर्थ है यथार्थ ज्ञान, और जिस साधन से यथार्थ ज्ञान उत्पन्न होता है, वह प्रमाण है। भारतीय दर्शन की अलग-अलग परम्पराओं ने प्रमाणों की संख्या और स्वरूप को अलग-अलग माना है।

दर्शनसामान्यतः माने जाने वाले प्रमाण
चार्वाककेवल प्रत्यक्ष
बौद्ध, वैशेषिकप्रत्यक्ष, अनुमान
सांख्यप्रत्यक्ष, अनुमान, आप्त-वचन (शब्द)
न्यायप्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द
प्रभाकर मीमांसाउपर्युक्त चार और अर्थापत्ति
भाट्ट मीमांसा और अद्वैत वेदान्तउपर्युक्त पाँच और अनुपलब्धि (कुल छह)

अद्वैत वेदान्त भी अनेक प्रमाणों को व्यवहार के क्षेत्र में स्वीकार करता है, पर ब्रह्मज्ञान के प्रश्न पर उसकी स्थिति विशेष है।

शोध-टिप्पणी: छह प्रमाणों की यह व्यवस्थित सूची अद्वैत में उत्तरवर्ती ग्रन्थों (जैसे वेदान्त-परिभाषा) में स्पष्ट रूप से मिलती है। शंकर के भाष्यों में प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम (शब्द) की चर्चा प्रमुख है, और ऊपर की संख्याएँ दर्शनों की प्रचलित मान्यता के सार-रूप में हैं।

प्रत्यक्ष की सीमा

प्रत्यक्ष ज्ञान बहुत शक्तिशाली है: हम आँख से देखते हैं, कान से सुनते हैं, स्पर्श से अनुभव करते हैं। पर प्रत्यक्ष की एक स्पष्ट सीमा है: इन्द्रियाँ विषयों को जानती हैं। ब्रह्म कोई इन्द्रियगोचर वस्तु नहीं। इसलिए आँख से ब्रह्म को देखने की अपेक्षा करना वैसा ही है जैसे ध्वनि को रंग के माध्यम से पकड़ना।

यहाँ प्रत्यक्ष का निषेध नहीं हो रहा। प्रत्यक्ष अपने क्षेत्र में प्रमाण है। पर ब्रह्म का ज्ञान उसका विषय नहीं।

शोध-टिप्पणी: कठ उपनिषद् (2.1.1) में कहा गया है कि स्वयम्भू ने इन्द्रियों को बाहर की ओर खोला है, इसीलिए मनुष्य बाहर देखता है, भीतर के आत्मा को नहीं। केन (1.3) में भी कहा है कि वहाँ चक्षु नहीं पहुँचता।

अनुमान की सीमा

अनुमान भी ज्ञान का शक्तिशाली साधन है। धुआँ देखकर अग्नि का अनुमान होता है। पर अनुमान के लिए सामान्यतः किसी ज्ञात व्याप्ति की ज़रूरत होती है: जहाँ धुआँ है, वहाँ अग्नि है। ब्रह्म के विषय में ऐसी कोई इन्द्रियगोचर व्याप्ति स्थापित नहीं की जा सकती। इसलिए केवल तार्किक अनुमान से ब्रह्म का यथार्थ स्वरूप स्थापित नहीं हो सकता।

तर्क आवश्यक है, पर उसकी भूमिका मुख्यतः शंका-निवारण और विरोधाभास दूर करने की है। वह स्वयं ब्रह्मज्ञान का स्वतन्त्र मूल प्रमाण नहीं बन जाता।

शोध-टिप्पणी: ब्रह्मसूत्र (2.1.11) का "तर्काप्रतिष्ठानात्" यही कहता है कि केवल सूखा तर्क स्थिर नहीं रहता, क्योंकि एक तर्क को दूसरा काट देता है। ब्रह्मसूत्रभाष्य (2.1.6) में शंकर कहते हैं कि यहाँ तर्क श्रुति से अनुगृहीत होकर, अनुभव के अंग के रूप में लिया जाता है, स्वतन्त्र रूप में नहीं।

तो फिर ब्रह्म का प्रमाण क्या है?

यहीं शाङ्कर वेदान्त श्रुति की ओर आता है। उपनिषद् ऐसे सत्य का प्रतिपादन करते हैं जो साधारण इन्द्रिय और अनुमान के क्षेत्र से परे है। इसलिए ब्रह्म के विषय में उपनिषद्-वाक्य प्रमाण हैं।

ब्रह्मसूत्र का आरम्भ ही है: "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा।" और उसके बाद: "जन्माद्यस्य यतः।" यानी उस ब्रह्म की जिज्ञासा, जिससे जगत् के जन्म आदि होते हैं। शंकराचार्य के लिए ब्रह्मसूत्र कोई नया ब्रह्म नहीं गढ़ता; वह उपनिषद्-वाक्यों का दार्शनिक समन्वय करता है।

शोध-टिप्पणी: ब्रह्मसूत्रभाष्य (1.1.2) में शंकर स्पष्ट करते हैं कि सूत्र वेदान्त-वाक्यरूपी फूलों को माला में पिरोने के लिए हैं। ब्रह्म का बोध वाक्यों के अर्थ-विचार से होता है, अनुमान आदि दूसरे प्रमाणों से नहीं। और यह भी कि सूत्र (1.1.3) "शास्त्रयोनित्वात्" के दो अर्थ लिए जाते हैं: शास्त्र का योनि (मूल स्रोत) ब्रह्म है, और शास्त्र ही ब्रह्म का प्रमाण है।

शब्द-प्रमाण का विशेष स्थान

शब्द को दो तरह से समझा जा सकता है: एक साधारण मनुष्य का कथन, दूसरा विश्वसनीय वचन। पर वेदान्त में अपौरुषेय श्रुति का विशेष स्थान है। क्यों?

क्योंकि ब्रह्म कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे किसी मनुष्य ने देखकर दूसरों को बता दिया हो। वह इन्द्रियगोचर नहीं है। इसलिए जिस सत्य का ज्ञान प्रत्यक्ष या अनुमान से सम्भव नहीं, उसके लिए उपनिषद्-वाक्य का प्रमाणत्व स्वीकार किया जाता है। यही कारण है कि शाङ्कर वेदान्त में श्रुति अन्तिम निर्णायक प्रमाण के रूप में प्रतिष्ठित होती है।

शोध-टिप्पणी: बृहदारण्यक (2.4.10) में वेदों को उस महान भूत का "निःश्वास" कहा गया है, जिससे श्रुति की अपौरुषेयता का भाव बनता है। एक और बात ध्यान देने योग्य है: पूर्व-मीमांसा के अनुसार वेद-वाक्य मुख्यतः कर्म (विधि) में प्रमाण हैं, जबकि अद्वैत उपनिषदों को पहले से सिद्ध वस्तु, यानी ब्रह्म का बोधक मानता है (ब्रह्मसूत्र 1.1.4, "तत्तु समन्वयात्")। इसका विस्तार अगले भाग में होगा।

श्रुति की भी सीमा है: गीताभाष्य (18.66) में शंकर का आशय है कि सैकड़ों श्रुतियाँ भी यह कहें कि "अग्नि ठण्डी है", तो वे प्रमाण नहीं होंगी। यानी श्रुति अपने विषय, यानी आत्म-तत्त्व, में प्रमाण है, प्रत्यक्ष के क्षेत्र को काटने के लिए नहीं।

क्या तर्क की कोई ज़रूरत नहीं?

यदि श्रुति ही प्रमाण है, तो फिर दर्शन, तर्क और विचार की ज़रूरत क्यों? शंकराचार्य तर्क को अस्वीकार नहीं करते, पर उसे उसकी सीमा में रखते हैं। तर्क श्रुति का स्थान नहीं ले सकता, पर श्रुति को समझने में तर्क आवश्यक है। यदि किसी व्याख्या में विरोधाभास हो, वाक्य का अर्थ अस्पष्ट हो, या दो कथनों में प्रत्यक्ष विरोध दिखे, तो तर्क से उसका समाधान करना पड़ता है। इसलिए शाङ्कर पद्धति अन्धश्रद्धा नहीं, श्रुति-आधारित विवेकपूर्ण तर्क है।

उपनिषद्-वाक्य ज्ञान कैसे देते हैं?

यह सबसे सूक्ष्म प्रश्न है। "तत्त्वमसि" जैसे वाक्य में ऐसा क्या है जो आत्मज्ञान उत्पन्न करता है? वाक्य कोई जादुई मन्त्र नहीं है। वह साधक को ऐसी पहचान की ओर ले जाता है जिसमें "त्वम्" और "तत्" के वास्तविक तात्पर्य का विवेक किया जाता है।

वाक्य के सीधे शब्दार्थों में विरोध दिख सकता है, इसलिए उनका अभिप्रेत तात्त्विक अर्थ पकड़ने के लिए लक्षणा और उपाधि-विवेक जैसे साधन चाहिए। इस तरह महावाक्य का उद्देश्य किसी बाहरी वस्तु की सूचना देना नहीं, बल्कि स्वरूप-बोध कराना है।

शोध-टिप्पणी: यहाँ एक प्रसिद्ध उदाहरण बाद की परम्परा में चलता है, जिसे "दसवें व्यक्ति" की कथा कहते हैं (पञ्चदशी जैसे ग्रन्थों में)। दस लोग नदी पार करते हैं और गिनती करते समय हर कोई स्वयं को छोड़कर नौ गिनता है। राह चलता कोई कह देता है, "दसवाँ तुम ही हो।" वाक्य सुनते ही गिनती का भ्रम टूट जाता है, कुछ नया पाया नहीं गया। इसी से समझाया जाता है कि शब्द से तत्काल बोध हो सकता है।

शब्द से उत्पन्न ज्ञान परोक्ष होता है या अपरोक्ष, इस पर उत्तरवर्ती अद्वैत में दो मत बने। भामती परम्परा में शब्द से परोक्ष ज्ञान होता है और निदिध्यासन से परिष्कृत मन उसे अपरोक्ष बनाता है। विवरण परम्परा में विषय (आत्मा) स्वतः अपरोक्ष होने से महावाक्य से ही अपरोक्ष ज्ञान हो जाता है। इस सूक्ष्म बहस को हम यहीं शोध-टिप्पणी के स्तर पर छोड़ते हैं।

ज्ञान और अनुभव में अन्तर

आज "आध्यात्मिक अनुभव" को बहुत महत्त्व दिया जाता है। किसी को प्रकाश दिखा, किसी को ध्यान में आनन्द मिला, किसी को असाधारण अनुभूति हुई। क्या यही ब्रह्मज्ञान है? अद्वैत की दृष्टि से यहाँ सावधानी ज़रूरी है।

जो अनुभव आता है और चला जाता है, वह परिवर्तनशील है। ब्रह्म यदि नित्य है, तो किसी क्षण विशेष में आने वाला अनुभव ब्रह्म का पूर्ण पर्याय नहीं हो सकता। इसलिए आत्मज्ञान को किसी असाधारण मानसिक घटना तक सीमित नहीं किया जा सकता। ज्ञान का विषय आत्म-स्वरूप है, कोई क्षणिक दृश्य या अनुभूति नहीं।

शोध-टिप्पणी: यह मत अनुभव का निषेध नहीं है। ब्रह्मसूत्रभाष्य (1.1.2) में शंकर कहते हैं कि ब्रह्मज्ञान में श्रुति आदि के साथ अनुभव आदि भी यथासम्भव प्रमाण हैं, क्योंकि ब्रह्मज्ञान अनुभव में परिणत होता है और पहले से विद्यमान वस्तु को विषय बनाता है। यानी शंकर के यहाँ अनुभव का अर्थ "अज्ञान हटने पर वस्तु का यथार्थ बोध" है, कोई विशेष चमत्कारी अनुभूति नहीं। (पिछले भाग के अन्त में मैंने इस स्थल को 2.1.11 के भाष्य में बताया था; वह संकेत गलत था। सही स्थल 1.1.2 के आसपास है।)

ज्ञान उत्पन्न होता है या प्रकट होता है?

यहाँ अद्वैत का सूक्ष्म सिद्धान्त सामने आता है। ज्ञान किसी नई आत्मा का निर्माण नहीं करता। जैसे प्रकाश अँधेरे में रखी वस्तु को "बनाता" नहीं, केवल उसे प्रकाशित करता है, वैसे ही महावाक्य से उत्पन्न ज्ञान आत्मा को नया नहीं बनाता। वह उस भ्रान्ति को हटाता है जिसके कारण आत्मा को सीमित देह-मन के रूप में जाना जा रहा था। इसलिए आत्मज्ञान का स्वरूप उत्पादन नहीं, अज्ञान-निवृत्ति और यथार्थ-बोध है।

प्रमाण और प्रमाण-फल

एक और सूक्ष्म प्रश्न है: यदि ज्ञान केवल अज्ञान हटाता है, तो उसका फल क्या है? उत्तर है: मोक्ष। पर यह भी ध्यान देने योग्य है कि ज्ञान का फल कोई बाहरी वस्तु पाना नहीं है। यदि आत्मा पहले से मुक्त-स्वरूप है, तो ज्ञान उस मुक्ति को पैदा नहीं करता। वह केवल बन्धन के मिथ्या आधार को समाप्त करता है। इसीलिए शाङ्कर दर्शन में ज्ञान और मोक्ष का सम्बन्ध अत्यन्त निकट है।

शास्त्र का कार्य कहाँ समाप्त होता है?

यदि श्रुति ब्रह्मज्ञान का प्रमाण है, तो क्या व्यक्ति जीवन भर केवल शास्त्र पढ़ता रहे? नहीं। शास्त्र का उद्देश्य स्वरूप की ओर संकेत करना है। वह साधक से कहता है: जिसे तुम बाहर खोज रहे हो, उसे अपने वास्तविक स्वरूप के रूप में पहचानो। ज्ञान होने पर शास्त्र का प्रयोजन वैसे ही पूरा होता है, जैसे किसी स्थान तक पहुँचने के लिए दिया गया संकेत अपना काम पूरा कर लेता है। इसका अर्थ शास्त्र का अवमूल्यन नहीं, बल्कि उसके वास्तविक प्रयोजन की पहचान है।

शोध-टिप्पणी: बृहदारण्यक (4.3.22) में कहा गया है कि उस अवस्था में वेद भी अवेद हो जाते हैं। गीता (2.46) में उपमा है कि जब चारों ओर जल ही जल फैल गया हो, तब छोटे जलाशय का जितना प्रयोजन रहता है, उतना ही ज्ञानी का वेदों से रह जाता है। इन दोनों का आशय शास्त्र की निन्दा नहीं, उसके प्रयोजन की पूर्ति है।

शंकराचार्य की ज्ञानमीमांसा की विशेषता

शाङ्कर दर्शन की विशिष्टता यहाँ साफ़ दिखती है। वह न केवल इन्द्रियवाद है, न केवल तर्कवाद, और न केवल धार्मिक आस्था। वह कहता है:

  • जहाँ इन्द्रियाँ सक्षम हैं, वहाँ प्रत्यक्ष का सम्मान करो।
  • जहाँ तर्क आवश्यक है, वहाँ तर्क करो।
  • जहाँ अनुमान सम्भव है, वहाँ अनुमान करो।
  • पर जहाँ प्रश्न स्वयं परम आत्म-तत्त्व का है, वहाँ उपनिषद्-वाक्य को प्रमाण के रूप में ग्रहण करो और तर्क से उसका अर्थ स्पष्ट करो।

यही शाङ्कर ज्ञानमीमांसा का सन्तुलित स्वरूप है।

प्रमाण / साधनकहाँ काम करता हैब्रह्म के प्रश्न पर उसकी भूमिका
प्रत्यक्षइन्द्रिय-विषयों मेंब्रह्म इन्द्रियगोचर नहीं; यहाँ प्रमाण नहीं
अनुमानज्ञात व्याप्ति वाले विषयों मेंस्वतन्त्र रूप से ब्रह्म सिद्ध नहीं करता
तर्कशंका-निवारण, विरोध-परिहारश्रुति का अर्थ स्पष्ट करने में सहायक
श्रुति (शब्द)आत्म-तत्त्व के विषय मेंमूल प्रमाण
अनुभवअज्ञान के हटने परश्रुति-जन्य बोध की परिणति

निष्कर्ष

शाङ्कर दर्शन में प्रश्न केवल यह नहीं कि "सत्य क्या है?" उससे पहले एक और प्रश्न ज़रूरी है: "सत्य को जानने का प्रमाण क्या है?"

इन्द्रियाँ संसार को जान सकती हैं। अनुमान अनेक अदृश्य तथ्यों तक पहुँचा सकता है। तर्क विरोधाभास दूर कर सकता है। पर ब्रह्म, जो स्वयं ज्ञान का अन्तिम आधार है, उसका बोध उपनिषद्-वाक्य और उसके यथार्थ विवेचन से होता है। इसलिए अद्वैत में शास्त्र अन्धविश्वास का साधन नहीं, आत्म-विद्या का प्रमाण है।

तीन वाक्यों में सार:

  • प्रत्यक्ष और अनुमान अपने क्षेत्र में प्रमाण हैं, पर ब्रह्म उनका विषय नहीं।
  • ब्रह्म के विषय में उपनिषद्-वाक्य प्रमाण हैं, और तर्क उनका अर्थ स्पष्ट करने में सहायक।
  • ज्ञान कुछ नया उत्पन्न नहीं करता, वह अज्ञान को हटाकर यथार्थ-बोध कराता है।

एक प्रश्न अपने से: आप दिन भर में जो कुछ जानते हैं, उसमें कितना आँख से देखकर, कितना तर्क से और कितना किसी विश्वसनीय व्यक्ति या ग्रन्थ के कहने से मानते हैं? कौन-सी बात आप केवल इसलिए मानते हैं कि किसी विश्वसनीय स्रोत ने कही है, और उस पर भरोसे की कसौटी क्या है?

अब एक और प्रश्न सामने आता है: यदि उपनिषद् ही ब्रह्मज्ञान के प्रमाण हैं, तो उनमें अनेक प्रकार के कथन क्यों हैं? कहीं ब्रह्म निर्गुण है, कहीं सगुण। कहीं ईश्वर सृष्टिकर्ता है, कहीं कहा गया "नेति नेति"। तो इन सभी वाक्यों का आपस में समन्वय कैसे किया जाए? यही कार्य शंकराचार्य ने अपने ब्रह्मसूत्रभाष्य में किया।

अगला भाग — भाग 9 : ब्रह्मसूत्र और शंकरभाष्य — उपनिषदों का दार्शनिक समन्वय

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)



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