शंकर दर्शन -भाग 9 — ब्रह्मसूत्र और शंकरभाष्य : उपनिषदों का दार्शनिक समन्वय

 शंकर दर्शन  -भाग 9 — ब्रह्मसूत्र और शंकरभाष्य : उपनिषदों का दार्शनिक समन्वय

भारतीय वेदान्त परम्परा में तीन ग्रन्थों को विशेष प्रतिष्ठा मिली: उपनिषद्, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र। बाद की परम्परा ने इन्हें प्रस्थानत्रयी कहा।

  • उपनिषद् ब्रह्म और आत्मा के रहस्य को खोलते हैं।
  • भगवद्गीता जीवन, कर्म, ज्ञान और योग के बीच का सम्बन्ध स्पष्ट करती है।
  • ब्रह्मसूत्र उपनिषदों में बिखरे ब्रह्म-विषयक विचारों को सूत्रबद्ध दार्शनिक ढाँचा देता है।

शंकराचार्य ने इन तीनों पर भाष्य लिखकर अद्वैत वेदान्त को एक सुसंगत दार्शनिक रूप दिया। इसीलिए शाङ्कर दर्शन को समझने के लिए केवल "अद्वैत" शब्द जान लेना काफ़ी नहीं है। शंकरभाष्य को पढ़ना आवश्यक है।

ब्रह्मसूत्र क्या है?

ब्रह्मसूत्र के रचयिता परम्परा में बादरायण माने जाते हैं, जिन्हें परम्परा वेदव्यास से भी जोड़ती है। ग्रन्थ का आरम्भ है: "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा।" यानी अब ब्रह्म की जिज्ञासा।

यह "अब" केवल समय का संकेत नहीं है। यह उस स्थिति का संकेत है जहाँ मनुष्य संसार के क्षणभंगुर अनुभवों से आगे बढ़कर परम तत्त्व को जानना चाहता है। इसके बाद प्रसिद्ध सूत्र आता है: "जन्माद्यस्य यतः", यानी वह ब्रह्म जिससे इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय होते हैं। इस प्रकार ब्रह्मसूत्र का विषय आरम्भ से ही स्पष्ट है: ब्रह्म की जिज्ञासा।

शोध-टिप्पणी: ब्रह्मसूत्र को वेदान्त-सूत्र, शारीरक-सूत्र और उत्तर-मीमांसा भी कहा जाता है, और शंकर के भाष्य को "शारीरक-भाष्य"। इसके काल पर विद्वान अलग-अलग मत रखते हैं, पर इसमें जैमिनि, आश्मरथ्य, औडुलोमि और काशकृत्स्न जैसे पूर्व-आचार्यों के नाम आते हैं, जो दिखाता है कि वेदान्त-चिन्तन की परम्परा इससे पहले की है।

"अथ" का अर्थ शंकर ब्रह्मसूत्रभाष्य (1.1.1) में "इसके बाद" लेते हैं, यानी साधन-चतुष्टय की योग्यता आने के बाद, जिसकी चर्चा हमने भाग 7 में की थी। "अतः" का भाव है "इसलिए": कर्म का फल सीमित है और ब्रह्मज्ञान का फल नित्य। रामानुज जैसे आचार्य "अथ" को कर्म-मीमांसा के बाद की जिज्ञासा से जोड़ते हैं, इसलिए यह शंकर की अपनी व्याख्या है, एकमात्र नहीं।

आरम्भ की चार सूत्र-कड़ियाँ: चतुःसूत्री

ब्रह्मसूत्र के पहले चार सूत्र पूरे ग्रन्थ की रूपरेखा हैं, जिन्हें चतुःसूत्री कहा जाता है:

सूत्रक्या करता है
1.1.1 "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा"जिज्ञासा: क्या जानना है? ब्रह्म
1.1.2 "जन्माद्यस्य यतः"ब्रह्म की पहचान: जगत् का मूल कारण
1.1.3 "शास्त्रयोनित्वात्"प्रमाण: ब्रह्म का ज्ञान शास्त्र से
1.1.4 "तत्तु समन्वयात्"समन्वय: सब उपनिषद्-वाक्यों का तात्पर्य उसी में

यानी पहले प्रश्न, फिर लक्षण, फिर प्रमाण, और फिर समन्वय। भाग 8 में हमने तीसरी कड़ी देखी थी। इस भाग का केन्द्र चौथी कड़ी है।

ब्रह्मसूत्र इतना कठिन क्यों है?

ब्रह्मसूत्र बहुत संक्षिप्त है। एक सूत्र में कभी-कभी पूरा दार्शनिक विवाद संकेत-रूप में बँधा होता है, जैसे "शास्त्रयोनित्वात्" या "तत्तु समन्वयात्"। इन छोटे सूत्रों को खोलने के लिए पूर्वपक्ष, सिद्धान्त, उपनिषद्-वाक्य और तर्क, सबकी ज़रूरत होती है। इसलिए ब्रह्मसूत्र को अकेले पढ़ना कठिन है, और भाष्य के बिना उसका पूरा दार्शनिक आशय खुलना आसान नहीं।

शोध-टिप्पणी: ब्रह्मसूत्र की रचना "अधिकरणों" में है। एक अधिकरण में परम्परा के अनुसार पाँच अंग होते हैं: विषय (कौन-सा वाक्य), संशय (उसमें क्या शंका), पूर्वपक्ष (शंका का एक उत्तर), सिद्धान्त (अन्तिम उत्तर), और सङ्गति (पिछले अधिकरण से जुड़ाव)। शांकर पाठ में सूत्रों की संख्या लगभग 555 और अधिकरण लगभग 191 माने जाते हैं।

शंकराचार्य का महान कार्य

शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र को केवल शब्दार्थ से नहीं समझाया। उन्होंने हर प्रमुख दार्शनिक समस्या को सामने रखा: पहले पूर्वपक्ष (विरोधी मत क्या कहता है), फिर सिद्धान्त (वेदान्त का समाधान क्या है)। इसी पद्धति ने शंकरभाष्य को केवल धार्मिक व्याख्या नहीं रहने दिया, बल्कि एक गम्भीर दार्शनिक ग्रन्थ बना दिया।

सांख्य, योग, वैशेषिक, न्याय, मीमांसा और बौद्ध मतों के साथ संवाद और विवाद इसी प्रक्रिया में सामने आता है। इसलिए ब्रह्मसूत्रभाष्य पढ़ते समय हमें केवल शंकराचार्य का मत नहीं मिलता, उस समय के दार्शनिक संसार की बहस भी दिखाई देती है।

शोध-टिप्पणी: शंकर से पहले भी ब्रह्मसूत्र पर वृत्तियाँ मानी जाती हैं (जैसे उपवर्ष, जिनका नाम शंकर स्वयं ब्रह्मसूत्रभाष्य में लेते हैं, और बोधायन-वृत्ति, जिसकी चर्चा रामानुज करते हैं)। पर वे आज मूल रूप में उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए शंकरभाष्य उपलब्ध पूर्ण भाष्यों में सबसे प्राचीन गिना जाता है। बाद में अन्य परम्पराओं ने भी इन्हीं सूत्रों पर अपने भाष्य लिखे: रामानुज (विशिष्टाद्वैत), मध्व (द्वैत), निम्बार्क (द्वैताद्वैत) और वल्लभ (शुद्धाद्वैत)। यानी एक ही सूत्र-ग्रन्थ से अलग-अलग दर्शन निकले। "समन्वय" का अद्वैतपरक अर्थ शंकर की व्याख्या है।

"तत्तु समन्वयात्"

ब्रह्मसूत्र का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सूत्र है: "तत्तु समन्वयात्।" यानी वह ब्रह्म ही है, क्योंकि सभी उपनिषद्-वाक्यों का समन्वय उसी में होता है।

यहाँ शंकर की व्याख्या का मूल बिन्दु सामने आता है। उपनिषदों में अनेक प्रकार के कथन हैं। कहीं सृष्टि की चर्चा है, कहीं ईश्वर की, कहीं आत्मा की, कहीं निर्गुण ब्रह्म की, और कहीं ध्यान और उपासना की। इन्हें अलग-अलग सिद्धान्त मानने के बजाय शंकर उनके तात्पर्य को खोजते हैं। उनके लिए उपनिषदों का अन्तिम प्रयोजन है ब्रह्मविद्या।

उपनिषदों में विविधता और अद्वैत

यदि कोई केवल शब्दों को देखे, तो उपनिषदों में अनेक मत दिख सकते हैं। कहीं "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (छान्दोग्य 3.14.1) है, तो कहीं "नेति नेति" (बृहदारण्यक 2.3.6)। कहीं ब्रह्म को जगत् का कारण कहा गया, कहीं आत्मा को ब्रह्म।

शंकर इन कथनों को परस्पर विरोधी नहीं मानते। वे देखते हैं कि उपनिषद् कभी उपासना की भाषा में, कभी व्यवहार की भाषा में, और कभी परमार्थ की भाषा में सत्य को कहता है। इसलिए किसी एक वाक्य को पकड़कर पूरा वेदान्त तय नहीं किया जा सकता।

शोध-टिप्पणी: निर्गुण और सगुण वाक्यों का यही समन्वय ब्रह्मसूत्र (3.2.11 से 3.2.21) के भाष्य में विस्तार से आता है। वहाँ शंकर का आशय है कि उपाधि के कारण ब्रह्म स्वरूप से दो प्रकार का नहीं हो जाता। सगुण वर्णन (जैसे छान्दोग्य 3.14.2 का "सर्वकामः सर्वगन्धः") उपासना और उपाधि की दृष्टि से हैं, और निर्गुण वर्णन (जैसे बृहदारण्यक 3.8.8 का "अस्थूलमनण्वह्रस्वम्") स्वरूप की दृष्टि से। परम्परा में इसे समझाने के लिए "अरुन्धती-न्याय" का उदाहरण दिया जाता है: बहुत धुँधले तारे अरुन्धती को दिखाने के लिए पहले उसके पास का कोई चमकीला तारा दिखाया जाता है, फिर असली तारा।

उपक्रम और उपसंहार

शास्त्र का तात्पर्य तय करने के लिए मीमांसा की पद्धति में कुछ लक्षण बताए जाते हैं, जिन्हें तात्पर्य के छह लिङ्ग कहा जाता है:

  • उपक्रम और उपसंहार: आरम्भ में क्या कहा गया, और अन्त में क्या निष्कर्ष आया।
  • अभ्यास: बार-बार दोहराव।
  • अपूर्वता: जो बात किसी दूसरे प्रमाण से जानी न जा सके।
  • फल: उसे जानने का फल।
  • अर्थवाद: प्रशंसा या उदाहरण।
  • उपपत्ति: युक्ति या तर्क।

शंकर इन कसौटियों का उपयोग यह दिखाने के लिए करते हैं कि उपनिषदों का अन्तिम लक्ष्य केवल कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि ब्रह्मविद्या है।

शोध-टिप्पणी: परम्परा में इन छहों को समझाने के लिए छान्दोग्य उपनिषद् का छठा अध्याय उदाहरण बनता है:

लिङ्गछान्दोग्य (अध्याय 6) में
उपक्रम और उपसंहारआरम्भ में "एकमेवाद्वितीयम्" (6.2.1), अन्त में "ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्..." (6.16.3)
अभ्यास"तत्त्वमसि" का नौ बार दोहराव
अपूर्वतावह आदेश जिससे अश्रुत भी श्रुत हो जाता है (6.1.3)
फल"आचार्यवान् पुरुषो वेद..." (6.14.2)
अर्थवादमिट्टी, सोने और लोहे के उदाहरण (6.1.4 से 6.1.6)
उपपत्ति"कथमसतः सज्जायेत" (6.2.2)

यह छह की व्यवस्थित सूची उत्तरवर्ती परम्परा में अधिक स्पष्ट है। शंकर के भाष्यों में यही कसौटियाँ काम करती दिखती हैं, पर उन्होंने इन्हें इस रूप में सूची की तरह नहीं गिनाया।

कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड

वेद में कर्म के विधान भी हैं और ज्ञान का प्रतिपादन भी। तो क्या दोनों का लक्ष्य एक ही है? शंकराचार्य इनके कार्यक्षेत्र में अन्तर करते हैं। कर्म का सम्बन्ध मुख्यतः उस व्यक्ति से है जो कर्ता है: वह यज्ञ करता है, पुण्य कमाता है और फल पाता है। पर आत्मज्ञान का उद्देश्य इसी कर्तृत्व-बुद्धि के अन्तिम आधार को पहचानना है। इसलिए कर्म और ज्ञान को एक ही फल देने वाले साधन मानना शाङ्कर व्याख्या में स्वीकार्य नहीं।

शोध-टिप्पणी: यहीं मीमांसा और वेदान्त का बड़ा अन्तर है। जैमिनि के मीमांसा-सूत्र (1.2.1) की परम्परा में सारा वेद क्रिया (कर्म) का प्रतिपादक है, इसलिए जो वाक्य क्रिया नहीं बताते, उन्हें सहायक या प्रशंसा-परक माना जाता है। ब्रह्मसूत्रभाष्य (1.1.4) में शंकर इसका उत्तर देते हैं कि उपनिषद्-वाक्य किसी करने योग्य क्रिया का नहीं, पहले से सिद्ध वस्तु, यानी ब्रह्म का बोध कराते हैं। इसीलिए "तत्तु समन्वयात्" में समन्वय का अर्थ है कि सभी उपनिषद्-वाक्य ब्रह्म की ओर ही तात्पर्य रखते हैं। (उपासना के विधि-वाक्य शंकर भी मानते हैं।)

"अध्यास" से ब्रह्मसूत्रभाष्य की शुरुआत

शंकराचार्य के ब्रह्मसूत्रभाष्य की भूमिका, यानी अध्यासभाष्य, अद्वैत दर्शन के सबसे महत्त्वपूर्ण प्रारम्भिक दस्तावेज़ों में है। वहाँ वे मूल समस्या रखते हैं कि मनुष्य आत्मा और अनात्मा के धर्मों को एक-दूसरे पर आरोपित करता है। यही अध्यास "मैं शरीर हूँ", "मैं कर्ता हूँ", "मैं भोक्ता हूँ" जैसी धारणाओं का आधार बनता है।

इसलिए ब्रह्मज्ञान की चर्चा से पहले ही शंकर यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि अज्ञान हमारे अनुभव को किस तरह ढालता है। (अध्यास पर पहले के भागों में विस्तार से चर्चा हो चुकी है।)

ब्रह्मसूत्र में विरोधी दर्शन

ब्रह्मसूत्रभाष्य की एक विशेषता यह है कि शंकर अनेक दार्शनिक मतों से गम्भीर संवाद करते हैं:

  • सांख्य प्रकृति को जगत् का मूल कारण मानता है।
  • वैशेषिक परमाणुओं की चर्चा करता है।
  • बौद्ध क्षणिकता और शून्यता को अलग-अलग ढंग से स्थापित करते हैं।
  • मीमांसा वेद-विहित कर्म और धर्म को महत्त्व देती है।

इन मतों के सामने शंकर प्रश्न रखते हैं: क्या इनसे उपनिषदों द्वारा प्रतिपादित ब्रह्म की व्याख्या पूरी हो सकती है? उनका उत्तर है, नहीं, क्योंकि परम कारण को ऐसी सत्ता होना चाहिए जो चेतन हो और समस्त जगत् के अन्तिम आधार की व्याख्या कर सके। यहीं ब्रह्म की स्थापना होती है।

शोध-टिप्पणी: ब्रह्मसूत्र के दूसरे अध्याय में इन मतों का खण्डन विस्तार से आता है। सूत्र-संख्या मोटे तौर पर यह है (सूत्र-संख्या छपाई से पहले मूल से मिला लें):

मतब्रह्मसूत्र में प्रसंग (लगभग)
सांख्य (प्रधान-कारणवाद)1.1.5 से 1.1.11 और 2.2.1 से 2.2.10
योग के सांख्य-आधारित अंश2.1.3
न्याय-वैशेषिक (परमाणु-कारणवाद)2.2.11 से 2.2.17
बौद्ध (क्षणिकवाद, विज्ञानवाद, शून्यवाद)2.2.18 से 2.2.32
जैन2.2.33 से 2.2.36
पाशुपत और पाञ्चरात्र2.2.37 से 2.2.45
मीमांसा (कर्मपरक वेद)1.1.4 और अन्य प्रसंग

सांख्य के विरुद्ध एक प्रसिद्ध सूत्र है "ईक्षतेर्नाशब्दम्" (1.1.5): उपनिषद् में सृष्टि से पहले "उसने ईक्षण (संकल्प) किया" कहा गया है (छान्दोग्य 6.2.3), जो अचेतन प्रधान में नहीं बैठता।

ब्रह्मसूत्र का चार-अध्यायी ढाँचा

ब्रह्मसूत्र परम्परागत रूप से चार अध्यायों में बँटा है, और हर अध्याय में चार पाद हैं:

अध्यायनाममुख्य प्रश्न
1समन्वयउपनिषदों का तात्पर्य ब्रह्म में कैसे समन्वित होता है?
2अविरोधअन्य दार्शनिक मतों से वेदान्त का विरोध कैसे दूर हो?
3साधनब्रह्मज्ञान की प्राप्ति का मार्ग क्या है?
4फलब्रह्मज्ञान का फल, यानी मोक्ष, क्या है?

इस तरह पूरा ग्रन्थ एक स्वाभाविक यात्रा बनाता है: ब्रह्म क्या है → विरोध कहाँ है → ज्ञान कैसे होगा → उसका फल क्या है।

शोध-टिप्पणी: ब्रह्मसूत्र का अन्तिम सूत्र "अनावृत्तिः शब्दात्" दो बार आता है, जो ग्रन्थ-समाप्ति का संकेत माना जाता है। इसका भाव है कि मुक्त जीव का पुनरावर्तन नहीं होता, ऐसा शब्द (श्रुति) से सिद्ध है। इसी तरह मोक्ष वाले इस भाग का सम्बन्ध हमने भाग 7 में देखा था।

शंकराचार्य का समन्वय केवल "सब एक हैं" नहीं

अद्वैत को अक्सर एक वाक्य में कह दिया जाता है: "सब ब्रह्म है।" पर शंकराचार्य का दर्शन इससे कहीं अधिक कठोर है। उन्हें यह दिखाना पड़ता है कि:

  • कौन-सा उपनिषद्-वाक्य किस अर्थ में है,
  • कौन-सा वाक्य मुख्य है,
  • कौन-सा उपासना के लिए है,
  • कर्म का क्षेत्र कहाँ समाप्त होता है और ज्ञान का क्षेत्र कहाँ शुरू होता है,
  • और जीव-ब्रह्म का अभेद किस प्रकार सिद्ध होता है।

यानी अद्वैत केवल आध्यात्मिक अनुभूति नहीं, एक सुव्यवस्थित भाष्य-परम्परा है।

शंकरभाष्य की शैली

शंकराचार्य की लेखन-पद्धति में एक विशेषता दिखती है:

  1. वे विरोधी मत को पहले उसके सबसे मज़बूत रूप में प्रस्तुत करते हैं।
  2. फिर उसके आधार की जाँच करते हैं।
  3. फिर श्रुति-वाक्य प्रस्तुत करते हैं।
  4. फिर तर्क से उसका समन्वय करते हैं।
  5. और अन्त में सिद्धान्त स्थापित करते हैं।

इसलिए शंकरभाष्य केवल निष्कर्षों की पुस्तक नहीं, वह दर्शन करने की पद्धति भी सिखाता है।

निष्कर्ष

ब्रह्मसूत्र और शंकरभाष्य के सम्बन्ध को समझना बहुत ज़रूरी है:

  • उपनिषद् सत्य का मूल श्रुति-स्रोत हैं।
  • ब्रह्मसूत्र उस सत्य के दार्शनिक सूत्रीकरण और समन्वय का माध्यम है।
  • शंकरभाष्य उन सूत्रों और उपनिषद्-वाक्यों की अद्वैतपरक दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत करता है।

इसलिए शाङ्कर दर्शन "ब्रह्म ही सत्य है" जैसी लोकप्रिय उक्ति का नाम भर नहीं है। यह एक विशाल भाष्य-परम्परा, तर्क-पद्धति और श्रुति-समन्वय पर आधारित दर्शन है।

तीन वाक्यों में सार:

  • ब्रह्मसूत्र उपनिषदों का सूत्रबद्ध समन्वय है, और उसे खोलने की कुंजी शंकरभाष्य है।
  • चतुःसूत्री (जिज्ञासा, लक्षण, प्रमाण, समन्वय) पूरे वेदान्त की रूपरेखा देती है।
  • उपनिषदों के अलग-अलग कथन तात्पर्य की कसौटियों से एक ही ब्रह्म-बोध की ओर जाते हैं।

एक प्रश्न अपने से: जब आप किसी ग्रन्थ या व्यक्ति के अलग-अलग कथनों में विरोध पाते हैं, तो आप क्या करते हैं: किसी एक वाक्य को पकड़ लेते हैं, या पूरे प्रसंग का तात्पर्य खोजते हैं? इस भाग के बाद आप अपनी पद्धति में क्या बदलना चाहेंगे?

अब हमारी दृष्टि ब्रह्मसूत्र से हटकर प्रस्थानत्रयी के दूसरे महान आधार की ओर जानी चाहिए: भगवद्गीता। क्योंकि यहाँ प्रश्न बदल जाता है। उपनिषद् हमें तत्त्व बताते हैं, पर जो मनुष्य संसार में कर्म करता है, संघर्ष करता है, मोह में पड़ता है और निर्णय के सामने खड़ा होता है, उसके लिए अद्वैत का मार्ग क्या है? शंकराचार्य ने गीता को किस प्रकार पढ़ा? क्या उनकी गीता केवल ज्ञानमार्ग की पुस्तक है, या उसमें कर्मयोग, भक्ति और ध्यान का भी स्वतन्त्र महत्त्व है?

अगला भाग — भाग 10 : भगवद्गीता और शंकराचार्य — कर्मभूमि में अद्वैत का प्रयोग

मुकेश श्रीवास्तव

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