तीन मुख्य आधार: प्रस्थानत्रयी
पिछले भाग में हमने देखा कि शाङ्कर दर्शन शून्य से पैदा हुआ मत नहीं है। उसकी जड़ें उपनिषदों की उस धारा में हैं, जहाँ मनुष्य से पूछा जाता है: जिसे तुम "मैं" कहते हो, उसका वास्तविक स्वरूप क्या है?
अब प्रश्न थोड़ा व्यावहारिक है: शंकराचार्य को पढ़ें कहाँ से?
यह प्रश्न इसलिए ज़रूरी है कि आज शंकराचार्य के नाम से अनेक ग्रंथ मिलते हैं, पर सबकी प्रामाणिकता एक जैसी नहीं है। यदि हम स्वयं शंकर के विचारों, बाद की अद्वैत-परम्परा और लोकप्रिय ग्रंथों को बिना भेद किए मिला देंगे, तो "शाङ्कर दर्शन" की जगह केवल "अद्वैत परम्परा का सामान्य परिचय" बनकर रह जाएगा।
इसलिए इस भाग का उद्देश्य ग्रंथों की सूची देना नहीं, बल्कि शंकराचार्य के दर्शन तक पहुँचने का सही द्वार दिखाना है।
तीन मुख्य आधार: प्रस्थानत्रयी
वेदान्त में तीन ग्रंथ-समूह सबसे महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं: उपनिषद्, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र। इन्हें मिलाकर प्रस्थानत्रयी कहते हैं। तीनों का स्वभाव अलग है:
- उपनिषद् ब्रह्म और आत्मा के प्रश्न को श्रुति के रूप में सामने रखते हैं।
- भगवद्गीता उसी वैदिक दृष्टि को जीवन, कर्म, धर्म, योग और भक्ति के क्षेत्र में उतारती है।
- ब्रह्मसूत्र उपनिषदों में बिखरे विचारों को सूत्र-रूप में एक दार्शनिक व्यवस्था देता है। इसके चार अध्याय हैं: समन्वय, अविरोध, साधना और फल। शांकर पाठ में सूत्रों की संख्या लगभग 555 मानी जाती है।
शंकराचार्य ने तीनों पर भाष्य लिखे। इसलिए केवल किसी एक प्रसिद्ध ग्रंथ को पढ़ लेना शाङ्कर दर्शन समझने के लिए काफ़ी नहीं है।
उपनिषदों पर शंकरभाष्य
शंकर की दार्शनिक दृष्टि का सबसे मूल स्रोत उपनिषदों पर उनके भाष्य हैं। इनमें विशेष रूप से ये उपनिषद् आते हैं: ईशावास्य, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक।
यहाँ एक बारीक बात समझनी चाहिए। शंकराचार्य उपनिषदों को केवल धार्मिक ग्रंथ की तरह नहीं पढ़ते। वे वाक्यों के बीच के दार्शनिक सम्बन्ध खोजते हैं।
उदाहरण के लिए "तत्त्वमसि" को केवल एक प्रेरक वाक्य मान लेना काफ़ी नहीं। शंकर पूछेंगे:
- "तत्" किसके लिए है?
- "त्वम्" किसके लिए है?
- दोनों के सामान्य और विशेष अर्थ क्या हैं?
- यदि दोनों में प्रत्यक्ष विरोध दिखता है, तो अभेद कैसे सिद्ध होगा?
इस तरह एक छोटा-सा उपनिषद्-वाक्य भी गम्भीर दार्शनिक विवेचन का विषय बन जाता है।
भगवद्गीताभाष्य: ज्ञान और जीवन का सेतु
यदि उपनिषद् ब्रह्मविद्या का दार्शनिक आकाश हैं, तो गीता उसी ज्ञान को संघर्ष-भरे मानव-जीवन में उतारती है।
शंकर के गीता-भाष्य से हमें कर्म, ज्ञान, योग, भक्ति और मोक्ष पर उनके विचार एक साथ देखने को मिलते हैं। गीता युद्धभूमि से शुरू होती है, पर शंकर के लिए मूल प्रश्न केवल "युद्ध करें या न करें" नहीं है। मूल प्रश्न यह है कि अज्ञान के कारण मनुष्य अपने कर्तव्य, शरीर, सम्बन्धों और वास्तविक स्वरूप को किस तरह देखता है।
शंकर के लिए कर्म का अपना महत्त्व है, पर आत्मज्ञान की जगह कर्म नहीं ले सकता। मोक्ष के लिए ज्ञान और कर्म को बराबर मिलाने की बात (ज्ञान-कर्म-समुच्चय) का वे अपने भाष्यों में खण्डन करते हैं। इस विषय पर आगे एक अलग भाग में विस्तार से चर्चा होगी।
ब्रह्मसूत्रभाष्य: शंकर की दार्शनिक प्रयोगशाला
यदि शाङ्कर दर्शन की बनावट समझने के लिए एक ही ग्रंथ चुनना हो, तो वह ब्रह्मसूत्रभाष्य है।
बादरायण के ब्रह्मसूत्र बहुत संक्षिप्त हैं। इतने कि उनका अर्थ खोलने के लिए विस्तृत व्याख्या आवश्यक हो जाती है। यहीं भाष्यकार की भूमिका शुरू होती है। शंकर:
- उपनिषदों के वचन सामने रखते हैं,
- अलग-अलग दार्शनिक मतों को प्रस्तुत करते हैं,
- उनकी आपत्तियों पर विचार करते हैं,
- तर्क देते हैं,
- और अन्त में अपना सिद्धान्त स्थापित करते हैं।
इसलिए ब्रह्मसूत्रभाष्य केवल अद्वैत का परिचय नहीं, भारतीय दर्शन के साथ किया गया एक विशाल शास्त्रार्थ भी है।
अध्यासभाष्य: मूल समस्या का प्रवेश-द्वार
ब्रह्मसूत्रभाष्य के आरम्भ में आने वाला अध्यासभाष्य शाङ्कर दर्शन समझने के लिए असाधारण रूप से महत्त्वपूर्ण है। उसकी परिभाषा है:
"स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः अध्यासः।"(पहले देखी हुई वस्तु की स्मृति-जैसा बोध, जो किसी दूसरी वस्तु पर प्रतीत होता है, वह अध्यास है।)
शंकर यहाँ एक ऐसी समस्या पकड़ते हैं जो साधारण दिखती है, पर बहुत गहरी है: हम एक वस्तु को दूसरी वस्तु के रूप में देख लेते हैं।
सबसे प्रसिद्ध उदाहरण रस्सी में साँप का दिखना है। अँधेरे में रस्सी पड़ी है और हमें साँप दिखता है। साँप का अनुभव हुआ, डर लगा, शरीर ने प्रतिक्रिया दी, पर वहाँ साँप था ही नहीं।
शोध-टिप्पणी: अध्यासभाष्य में स्वयं शंकर मुख्यतः "सीप में चाँदी" (शुक्ति-रजत) और "एक चन्द्रमा का दो दिखना" जैसे उदाहरण देते हैं। रज्जु-सर्प का उदाहरण परवर्ती अद्वैत-परम्परा में अधिक लोकप्रिय हुआ। लेख या शोध में उदाहरण लिखते समय यह भेद ध्यान में रखना अच्छा रहेगा।
अब शंकर इसी संरचना को आत्मज्ञान के बड़े प्रश्न तक ले जाते हैं: क्या मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप पर शरीर, मन, कर्तापन और भोक्तापन का आरोप कर रहा है?
यदि हाँ, तो अविद्या केवल जानकारी की कमी नहीं, बल्कि वास्तविकता के बारे में मूल भ्रम है। यहीं से शाङ्कर दर्शन की पूरी समस्या खुलने लगती है।
भाष्य की पद्धति: पूर्वपक्ष और सिद्धान्त
शंकर की शैली की पहचान है पूर्वपक्ष, यानी पहले विरोधी मत को उसके तर्कों सहित रखना। फिर उसकी परीक्षा होती है, और उसके बाद सिद्धान्त आता है।
यह पद्धति इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि शंकर केवल यह नहीं कहते कि "मेरा मत सही है।" वे दिखाते हैं कि विरोधी मत कहाँ तक ठीक है, उसकी सीमा कहाँ आती है, और वेदान्त का निष्कर्ष किस कारण अधिक संगत है। इसी वजह से उनके भाष्यों में सांख्य, न्याय, मीमांसा और बौद्ध परम्पराओं से गहरा संवाद दिखता है।
क्या शंकराचार्य तर्कवादी थे?
यदि शंकर तर्क का इतना प्रयोग करते हैं, तो क्या उनका दर्शन तर्क पर टिका है? उत्तर है: केवल तर्क पर नहीं।
उनके लिए ब्रह्म का अन्तिम ज्ञान केवल अनुमान से नहीं मिलता। वेदान्त में श्रुति का विशेष स्थान है। पर इसका अर्थ यह भी नहीं कि तर्क बेकार है। तर्क का काम है:
- श्रुति-वाक्य का अर्थ स्पष्ट करना,
- विरोधी व्याख्याओं की परीक्षा करना,
- भ्रम दूर करना,
- और सिद्धान्त को बुद्धि के अनुकूल बनाना।
शोध-संकेत: ब्रह्मसूत्र (2.1.11) का "तर्काप्रतिष्ठानात्" इस प्रश्न को समझने में उपयोगी है। उसका भाव है कि केवल सूखा तर्क स्थिर नहीं रहता, क्योंकि एक तर्क को दूसरा काट देता है।
इसलिए शाङ्कर पद्धति में श्रुति आधार देती है, और तर्क उसे स्पष्ट तथा समर्थ बनाता है। यह सम्बन्ध ज्ञानमीमांसा वाले भाग में और साफ़ होगा।
कौन-से ग्रंथ प्रामाणिक हैं?
शंकराचार्य के नाम से प्रचलित ग्रंथों को तीन वर्गों में देखना उपयोगी है।
1. अधिकांश विद्वानों द्वारा प्रामाणिक माने जाने वाले ग्रंथ
- ब्रह्मसूत्रभाष्य
- प्रमुख उपनिषदों के भाष्य (ऊपर दी गई सूची)
- भगवद्गीताभाष्य
- उपदेशसाहस्री (शंकर का स्वतन्त्र प्रकरण-ग्रंथ, जिसे आधुनिक शोध में प्रायः प्रामाणिक माना जाता है)
कुछ भाष्यों पर विद्वानों में थोड़ी चर्चा भी रही है, इसलिए शोध-लेखन में सबसे सुरक्षित आधार ब्रह्मसूत्रभाष्य और प्रमुख उपनिषद्-भाष्य ही हैं।
2. परम्परा में शंकर से जुड़े, पर विवादित ग्रंथ
विवेकचूडामणि, आत्मबोध, अपरोक्षानुभूति, तत्त्वबोध, दक्षिणामूर्तिस्तोत्र, पंचीकरण और ब्रह्मज्ञानावलीमाला। ये अद्वैत-परम्परा में बहुत लोकप्रिय हैं और अद्वैत की भावना से भरे हैं, पर आधुनिक पाठालोचन में इनकी लेखकीय प्रामाणिकता पर प्रश्न उठे हैं।
3. उत्तरवर्ती अद्वैत-साहित्य
शंकर के बाद के आचार्यों की रचनाएँ, जिन पर आगे चर्चा होगी।
इस श्रृंखला का नियम यह रहेगा: जो ग्रंथ विवादित है, उसे निर्विवाद रूप से शंकराचार्य की रचना नहीं कहा जाएगा। यह सावधानी छोटी दिखती है, पर शोध के लिए बहुत ज़रूरी है। किसी ग्रंथ का अद्वैतपरक होना और उसका स्वयं शंकर द्वारा लिखा जाना, दो अलग प्रश्न हैं।
शंकराचार्य और बाद की अद्वैत परम्परा
शंकर के बाद अद्वैत वेदान्त रुका नहीं। शिष्यों और उत्तरवर्ती आचार्यों ने उसे आगे बढ़ाया:
| आचार्य | प्रसिद्ध योगदान |
|---|---|
| पद्मपाद | पञ्चपादिका |
| सुरेश्वर | नैष्कर्म्यसिद्धि और वार्तिक-ग्रंथ |
| वाचस्पति मिश्र | भामती (ब्रह्मसूत्रभाष्य की टीका) |
| प्रकाशात्मन् | पञ्चपादिका-विवरण |
| मधुसूदन सरस्वती | अद्वैतसिद्धि |
| विद्यारण्य | अद्वैत-परम्परा के प्रमुख आचार्य |
यहाँ दो स्तर अलग रखने होंगे: शंकराचार्य का अद्वैत, और उत्तरवर्ती अद्वैत का विकास। दोनों एक ही परम्परा के अंग हैं, पर इन्हें बिल्कुल एक जैसा मान लेना ऐतिहासिक और दार्शनिक दृष्टि से ठीक नहीं होगा।
उदाहरण के लिए, भामती और विवरण की परम्पराएँ अद्वैत के भीतर ही कुछ सूक्ष्म प्रश्नों पर अलग दृष्टियाँ रखती हैं। इससे पता चलता है कि अद्वैत कोई जड़ सूत्र नहीं, बल्कि एक जीवित दार्शनिक परम्परा रहा है।
सर्वदर्शनसंग्रह और शाङ्कर दर्शन
मध्यकालीन भारतीय दर्शन में सर्वदर्शनसंग्रह एक उपयोगी ग्रंथ है। परम्परा इसे माधवाचार्य (विद्यारण्य) से जोड़ती है। इसमें अनेक भारतीय दर्शनों को क्रम से प्रस्तुत किया गया है, और शाङ्कर मत भी एक दार्शनिक स्थिति के रूप में उसमें आया है।
पर शोध की एक सीमा याद रखनी चाहिए: सर्वदर्शनसंग्रह शंकर का मूल स्रोत नहीं है। इसलिए वहाँ से ली गई किसी अवधारणा को जहाँ सम्भव हो, शंकराचार्य के अपने भाष्यों से मिलाकर देखा जाएगा। इस श्रृंखला में यह ग्रंथ सहायक स्रोत रहेगा, अन्तिम प्रमाण नहीं।
शंकराचार्य को पढ़ने का सही क्रम
पहली बार पढ़ने वाले के लिए सीधे कठिन ब्रह्मसूत्रभाष्य में उतरना कठिन हो सकता है। अधिक उपयोगी क्रम यह है:
उपनिषद् → भगवद्गीता → अध्यासभाष्य → ब्रह्मसूत्रभाष्य → उत्तरवर्ती अद्वैत
इस क्रम में पहले प्रश्न सामने आते हैं, फिर उनका आधार, फिर समस्या की बनावट, और अन्त में उसका व्यवस्थित समाधान। तब दिखता है कि अद्वैत कोई घोषणा नहीं, बल्कि एक प्रश्न से दूसरे प्रश्न की ओर बढ़ती दार्शनिक यात्रा है।
एक सावधानी: "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या"
अद्वैत की चर्चा में सबसे प्रसिद्ध वाक्य है: "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या।" इसे प्रायः शंकराचार्य का सूत्र मानकर रखा जाता है।
पर शोध में केवल लोकप्रिय परम्परा काफ़ी नहीं। यह वाक्य सामान्यतः ब्रह्मज्ञानावलीमाला जैसे ग्रंथों से उद्धृत किया जाता है, जिसकी लेखकीय प्रामाणिकता स्वयं विवादित है। और शंकर के प्रमुख भाष्यों में यही शब्द-समूह सूत्र की तरह इसी रूप में मिलता है, यह बात विद्वान संदिग्ध मानते हैं। इसलिए इसकी पाठ-स्थिति अलग से जाँचनी होगी।
उससे भी महत्त्वपूर्ण इसका दार्शनिक अर्थ है। यदि "मिथ्या" का अर्थ केवल "झूठ" कर दिया जाए, तो पूरा अद्वैत विकृत हो जाता है। शंकर के यहाँ जगत् की सत्ता का प्रश्न कहीं अधिक सूक्ष्म है। इसीलिए अगले कुछ भागों में हम धीरे-धीरे इस प्रश्न तक पहुँचेंगे: यदि ब्रह्म परम सत्य है, तो यह अनुभव होने वाला जगत् किस अर्थ में सत्य है?
अब तक का सार
अब तक हमने शाङ्कर दर्शन को किसी सिद्धान्त की तरह नहीं, बल्कि एक ग्रंथ-परम्परा की तरह देखा। उसके केन्द्र में हैं:
- उपनिषद्: ब्रह्मविद्या का मूल स्रोत
- गीता: ज्ञान और जीवन का संवाद
- ब्रह्मसूत्र: दार्शनिक व्यवस्था
- अध्यासभाष्य: अज्ञान की समस्या का प्रवेश-द्वार
- शंकरभाष्य: इन सबको जोड़ने वाली व्याख्या-पद्धति
और इनके चारों ओर विकसित हुई शाङ्कर परम्परा। अब हमारे पास आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त आधार है।
अगला प्रश्न और भी मूलभूत है: वह "ब्रह्म" आख़िर है क्या, जिसे शंकराचार्य परम सत्य कहते हैं? क्या वह कोई विराट सत्ता है? क्या वह ईश्वर है? क्या वह चेतना है? क्या उसे जाना जा सकता है? और यदि ब्रह्म को किसी वस्तु की तरह जानना सम्भव ही नहीं, तो "ब्रह्मज्ञान" का अर्थ क्या है?
अगले भाग में हम इसी प्रश्न में प्रवेश करेंगे।
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