शाङ्कर दर्शन - शरीर से आत्मा तक

 पिछले भाग में हमने ब्रह्म को शाङ्कर दर्शन के परम तत्त्व के रूप में देखा। ब्रह्म कोई सीमित वस्तु नहीं है और न किसी दूसरी सत्ता पर निर्भर है। वह अस्तित्व और चैतन्य की मूल भूमि है।

अब दर्शन का सबसे निकट और व्यक्तिगत प्रश्न सामने आता है: यदि ब्रह्म ही परम सत्य है, तो मैं कौन हूँ?

यह केवल आध्यात्मिक जिज्ञासा नहीं है। शंकराचार्य के लिए यही वह बिन्दु है जहाँ ब्रह्मविद्या मनुष्य के अपने अनुभव से जुड़ती है। मनुष्य संसार को जानता है, ईश्वर की कल्पना करता है, सुख-दुःख भोगता है, कर्म करता है, और अपने बारे में कहता है: "मैं।" पर यह "मैं" वास्तव में कौन है? यहीं से शाङ्कर दर्शन की आत्म-मीमांसा आरम्भ होती है।

शरीर से आत्मा तक

साधारण अनुभव में मनुष्य अपने शरीर को ही "मैं" मान लेता है: मैं लम्बा हूँ, मैं बूढ़ा हो गया हूँ, मैं स्वस्थ हूँ, मैं बीमार हूँ। पर शरीर लगातार बदल रहा है। बचपन का शरीर आज नहीं है, युवावस्था का शरीर भी स्थायी नहीं रहा। फिर भी व्यक्ति पूरे जीवन के अनुभव को एक ही "मैं" से जोड़ता है। इससे एक दार्शनिक प्रश्न बनता है:

जो लगातार बदल रहा है, क्या वही उस परिवर्तन को जानने वाला अन्तिम ज्ञाता हो सकता है?

शरीर दिखाई देता है, उसकी अवस्था हमें पता चलती है। यानी शरीर ज्ञेय है। और जो ज्ञेय है, उसे ही आत्मा मान लेना कठिन हो जाता है।

शोध-टिप्पणी: तैत्तिरीय उपनिषद् (ब्रह्मानन्दवल्ली) में आत्मा को बाहर से भीतर की ओर पाँच परतों में खोजा गया है: अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय। शंकर अपने तैत्तिरीय-भाष्य में इस क्रम को समझाते हैं। "पञ्चकोश" नाम बाद की परम्परा में अधिक प्रचलित हुआ।

मन भी "मैं" नहीं

शरीर से आगे बढ़ें तो मन सामने आता है। मन कभी प्रसन्न है, कभी उदास। कभी स्थिर है, कभी चंचल। कभी प्रेम से भरा है, कभी क्रोध से। फिर भी हम कहते हैं: "मेरा मन परेशान है।"

इस छोटे वाक्य में गहरा संकेत है। यदि मन "मेरा" है, तो "मैं" और मन के बीच कोई भेद माना जा रहा है। मन की स्थिति बदलती है और हम उस बदलाव को जानते हैं। इसलिए शाङ्कर दृष्टि में मन आत्मा का स्वरूप नहीं हो सकता। मन अनुभव का माध्यम है; आत्मा उस अनुभव की चेतन आधारभूमि है।

बुद्धि और अहंकार

मन के साथ बुद्धि और अहंकार भी हैं। बुद्धि निर्णय करती है: यह उचित है, यह अनुचित है, यह सत्य है, यह असत्य है। अहंकार कहता है: मैंने जाना, मैंने किया, मैं सफल हुआ, मैं असफल हुआ।

पर बुद्धि के निर्णय भी बदलते हैं, और अहंकार की धारणाएँ भी। जिसे आज हम अपने व्यक्तित्व का सबसे ज़रूरी हिस्सा मानते हैं, कुछ वर्षों बाद वही महत्त्वहीन लग सकता है। तब प्रश्न उठता है: फिर वह कौन है जो इन सभी परिवर्तनों को जानता है? यहीं से शाङ्कर दर्शन साक्षी-चैतन्य की ओर संकेत करता है।

साक्षी का अर्थ

"साक्षी" शब्द सुनते ही भीतर बैठे किसी निरीक्षक की कल्पना करना आसान है, मानो शरीर मशीन है, मन स्क्रीन है और आत्मा भीतर बैठकर सब देख रही है। पर शंकर की दिशा इतनी सरल नहीं है। यदि आत्मा भी बैठा हुआ कोई निरीक्षक होती, तो उसे जानने के लिए भी कोई दूसरा चाहिए होता।

साक्षी का वास्तविक संकेत है: वह चैतन्य जिसके प्रकाश में ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय की पूरी अनुभूति सम्भव होती है। जैसे दीपक को प्रकाशित होने के लिए दूसरे दीपक की ज़रूरत नहीं पड़ती, वैसे ही चैतन्य किसी बाहरी प्रकाश से प्रकाशित नहीं होता। इसीलिए आत्मा को स्वप्रकाश कहा जाता है। (यह उपमा केवल दिशा देती है, क्योंकि दीपक एक वस्तु है और आत्मा वस्तु नहीं।)

शोध-टिप्पणी: उपनिषदों में साक्षी की झलक कई जगह मिलती है। मुण्डक (3.1.1) और श्वेताश्वतर (4.6) के "दो पक्षियों" के चित्र में एक पक्षी फल खाता है और दूसरा बिना खाए केवल देखता रहता है। श्वेताश्वतर (6.11) में "साक्षी" शब्द स्पष्ट आता है। बृहदारण्यक (4.3) के जनक-याज्ञवल्क्य संवाद में आत्मा को "स्वयंज्योति" कहा गया है। यह वही प्रसंग है जिसका संकेत हमने पिछले भाग में किया था।

आत्मा को वस्तु की तरह क्यों नहीं जाना जा सकता?

यह शाङ्कर दर्शन का बहुत सूक्ष्म प्रश्न है। जब हम किसी वस्तु को जानते हैं, तो वह हमारे ज्ञान का विषय बनती है: वृक्ष सामने है तो मैं वृक्ष को जानता हूँ, शरीर का अनुभव है तो मैं शरीर को जानता हूँ, विचार उठता है तो मैं विचार को जानता हूँ।

अब यदि मैं आत्मा को भी इसी तरह जानूँ, तो आत्मा मेरे ज्ञान का विषय बन जाएगी। तब प्रश्न होगा कि आत्मा को जानने वाला कौन है? यदि उसके लिए कोई दूसरा ज्ञाता मानें, तो उसे जानने के लिए तीसरे की ज़रूरत पड़ेगी, और इस तरह कभी न रुकने वाला क्रम बन जाएगा। इसलिए आत्मा को साधारण वस्तु की तरह "जानना" सम्भव नहीं। आत्मा वह है जिसके कारण जानना सम्भव है।

शोध-टिप्पणी: ब्रह्मसूत्रभाष्य में शंकर एक रोचक तर्क देते हैं: आत्मा का निषेध कोई कर ही नहीं सकता। जो वस्तु बाहर से आई हो, उसका निषेध हो सकता है, पर जो निषेध करने वाला है, वही स्वयं आत्मा है। यानी "आत्मा नहीं है" कहने वाला भी आत्मा के सहारे ही यह कह रहा है।

जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति में "मैं"

मनुष्य तीन अवस्थाओं से गुज़रता है: जाग्रत, स्वप्न और गहरी नींद (सुषुप्ति)। जाग्रत में शरीर और संसार का अनुभव है। स्वप्न में शरीर निष्क्रिय है, पर मन अपना संसार रच लेता है। सुषुप्ति में कोई विषय, कोई विचार और कोई "मैं-मेरा" का अनुभव नहीं रहता।

फिर भी जागकर हम कहते हैं: "मैं सुख से सोया, मुझे कुछ पता नहीं था।" यह स्मरण बताता है कि अनुपस्थिति का भी कोई साक्षी था। शंकर इसी आधार पर कहते हैं कि अवस्थाएँ बदलती हैं, पर उन्हें जानने वाला चैतन्य नहीं बदलता।

शोध-टिप्पणी: बृहदारण्यक (4.3.23) में कहा गया है कि सुषुप्ति में द्रष्टा देखता हुआ भी नहीं देखता, क्योंकि द्रष्टा की दृष्टि का कभी लोप नहीं होता। अवस्था-विश्लेषण का विस्तृत रूप माण्डूक्य उपनिषद् और उसके भाष्य में मिलता है।

जीव और आत्मा

अब एक महत्त्वपूर्ण भेद सामने आता है: जीव कौन है और आत्मा कौन है?

हम स्वयं को जीव के रूप में अनुभव करते हैं: मेरा जन्म हुआ, मेरा परिवार है, मैं कर्म करता हूँ, मुझे सुख-दुःख और सफलता-असफलता मिलती है। यह पूरा व्यक्तित्व जीव के स्तर पर है। पर अद्वैत पूछता है: इन सब अनुभवों का आधार क्या है? शरीर बदलता है, मन बदलता है, बुद्धि बदलती है, अहंकार बदलता है, फिर भी अनुभव का मूल "मैं" बना रहता है। शाङ्कर दृष्टि में वही आत्म-चैतन्य जीव-अनुभव का आधार है।

जीव सीमित क्यों दिखाई देता है?

यदि आत्मा चैतन्य है और उसका वास्तविक स्वरूप सीमित नहीं, तो मनुष्य स्वयं को सीमित क्यों अनुभव करता है? कोई कहता है "मैं छोटा हूँ", कोई "मैं ज्ञानी हूँ", कोई "मैं दुःखी हूँ", कोई "मैं कर्ता हूँ।"

चैतन्य स्वयं इन विशेषताओं से सीमित नहीं है। पर जब उसकी पहचान शरीर, मन और बुद्धि के साथ जुड़ जाती है, तब चेतना का अनुभव सीमित व्यक्ति के रूप में होने लगता है। यही स्थिति अद्वैत की भाषा में उपाधि-सम्बन्ध और अध्यास की ओर ले जाती है, जिसकी चर्चा हम पहले भाग में कर चुके हैं।

आत्मा और ब्रह्म का सम्बन्ध

अब श्रृंखला के दो केन्द्रीय शब्द आमने-सामने हैं: ब्रह्म और आत्मा।

  • यदि ब्रह्म परम चैतन्य है और आत्मा भी चैतन्य-स्वरूप है, तो क्या दोनों अलग-अलग चेतनाएँ हैं?
  • यदि अलग हैं, तो अद्वैत कैसे रहेगा?
  • और यदि एक हैं, तो जीव स्वयं को ब्रह्म से अलग क्यों अनुभव करता है?

उपनिषद् इसी प्रश्न को महावाक्यों के माध्यम से सामने रखते हैं। सबसे प्रसिद्ध है: "तत्त्वमसि", अर्थात् "तू वही है।" पर "तू" और "वह" को साधारण अर्थ में जोड़ देना काफ़ी नहीं है।

"तत्त्वमसि" का दार्शनिक रहस्य

"तत्" से ब्रह्म का बोध होता है और "त्वम्" से जीव का। साधारण दृष्टि में दोनों के गुण उलटे दिखते हैं। जीव सीमित है, ईश्वर सर्वज्ञ माना जाता है। जीव कर्म के अधीन दिखता है, ईश्वर कर्मफल का दाता है। जीव अज्ञान अनुभव करता है, ब्रह्म ज्ञान-स्वरूप है। तब प्रश्न उठता है: "तत्त्वमसि" कैसे सत्य हो सकता है?

शंकर की व्याख्या यहाँ शब्दों के ऊपरी अर्थ से आगे जाती है। जीव और ईश्वर की उपाधियों को अलग करने पर जो मूल चैतन्य बचता है, उसी स्तर पर अभेद बताया जाता है। यानी शरीर ब्रह्म नहीं, मन ब्रह्म नहीं, अहंकार ब्रह्म नहीं, और ईश्वर की उपाधिगत विशेषताओं को भी ब्रह्म का अन्तिम स्वरूप नहीं माना जा सकता। महावाक्य का संकेत उस चैतन्य-तत्त्व की ओर है जो दोनों का आधार है।

शोध-टिप्पणी: यह उपदेश छान्दोग्य उपनिषद् (6.8.7 आदि) में उद्दालक आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को नौ बार देते हैं। उत्तरवर्ती अद्वैत में इस प्रक्रिया को "भाग-त्याग-लक्षणा" (जहदजहल्लक्षणा) कहा गया है: दोनों पदों के आपस में विरोधी अंश छोड़ दो और साझा चैतन्य रखो। इसका प्रसिद्ध उदाहरण है "वही यह देवदत्त है": पहले किसी और जगह और समय में देखा था, अब यहाँ मिला है। स्थान और समय का भेद छोड़ दें, तो व्यक्ति वही है। यह शब्द-विश्लेषण बाद की परम्परा का है; शंकर के यहाँ भाव उपाधि-भेद हटाकर अभेद दिखाने का है।

"अहं ब्रह्मास्मि": अहंकार की घोषणा नहीं

बृहदारण्यक उपनिषद् (1.4.10) कहता है: "अहं ब्रह्मास्मि।"

यदि इसे साधारण अहंकार के स्तर पर लिया जाए, तो अद्वैत का पूरा अर्थ उलट जाएगा। यहाँ यह नहीं कहा जा रहा कि "मैं, यह व्यक्ति, सर्वशक्तिमान ब्रह्म हूँ।" यहाँ "अहं" से उस सीमित व्यक्तित्व का आशय नहीं जिसे हम नाम, शरीर, स्मृति और सामाजिक पहचान से जानते हैं।

अद्वैत का आशय यह है कि जिस चैतन्य के कारण "मैं" का अनुभव सम्भव है, उसका अन्तिम स्वरूप ब्रह्म से भिन्न नहीं। इसलिए "अहं ब्रह्मास्मि" अहंकार का विस्तार नहीं, बल्कि अहंकार की अन्तिम सीमा का अतिक्रमण है।

चार महावाक्य

अद्वैत वेदान्त की परम्परा में चार महावाक्य विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं:

महावाक्यउपनिषद्वेद-परम्पराभाव
प्रज्ञानं ब्रह्मऐतरेय (3.3)ऋग्वेदचैतन्य ही ब्रह्म है
अहं ब्रह्मास्मिबृहदारण्यक (1.4.10)यजुर्वेदमेरा अन्तिम स्वरूप ब्रह्म है
तत्त्वमसिछान्दोग्य (6.8.7)सामवेदतू वही है
अयमात्मा ब्रह्ममाण्डूक्य (2)अथर्ववेदयह आत्मा ही ब्रह्म है

इन चारों का केन्द्र एक ही प्रश्न है: चैतन्य और परम सत्य का सम्बन्ध क्या है? पर इन्हें चार सूत्रों की तरह रट लेना काफ़ी नहीं। हर वाक्य को उसके अपने उपनिषद् के प्रसंग में समझना होगा। विशेषतः "तत्त्वमसि" की शंकर द्वारा की गई व्याख्या आत्मा-ब्रह्म अभिन्नता समझने के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है।

शोध-टिप्पणी: चार महावाक्यों का यह व्यवस्थित वर्गीकरण (चारों वेदों से एक-एक) उत्तरवर्ती परम्परा में स्थिर हुआ। शंकर इन सभी वाक्यों का अपने भाष्यों में उपयोग करते हैं, पर "चार महावाक्य" की यह सूची उन्हीं के शब्दों में इसी रूप में हो, ऐसा निश्चित नहीं माना जा सकता।

क्या आत्माएँ अनेक हैं?

हम देखते हैं कि मेरी चेतना अलग है, आपकी चेतना अलग है, और हर जीव अपना सुख-दुःख अलग भोगता है। तो क्या आत्माएँ अनेक हैं?

अद्वैत यहाँ अनुभव के दो स्तर अलग करता है। व्यक्तिगत मन अलग-अलग हैं, शरीर अलग-अलग हैं, अन्तःकरण अलग-अलग हैं। इसलिए अनुभवों की विविधता स्वाभाविक है। पर चेतना को भी मनों की तरह टुकड़ों में बाँटने पर समस्या खड़ी होती है, क्योंकि चेतना स्वयं विभाजित नहीं होती।

अलग-अलग घड़ों में आकाश अलग-अलग दिख सकता है, पर घड़ों के कारण आकाश वास्तव में खण्डित नहीं होता। यह उपमा पूर्ण दार्शनिक प्रमाण नहीं है, पर अद्वैत की दिशा समझने में सहायक है।

शोध-टिप्पणी: "घटाकाश" की यह उपमा गौडपाद की माण्डूक्य-कारिका (तृतीय प्रकरण) में प्रमुख रूप से आती है। जीवों की संख्या को लेकर उत्तरवर्ती अद्वैत में भी अलग-अलग मत बने (अनेक-जीववाद और एक-जीववाद)। उन पर आगे, जगत् और माया के विवेचन के बाद, अलग से विचार करना ठीक रहेगा।

आत्मा कर्ता है या साक्षी?

मनुष्य कहता है: "मैंने कर्म किया।" फिर कहता है: "मुझे कर्म का फल मिला।" यहीं कर्म और आत्मा का सम्बन्ध सामने आता है। यदि आत्मा शुद्ध चैतन्य है और स्वयं परिवर्तन-रहित है, तो कर्म करने वाला कौन है?

शाङ्कर दृष्टि में कर्तृत्व का सम्बन्ध शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार से है। चैतन्य इन सबको प्रकाशित करता है। पर अध्यास के कारण मनुष्य कहता है: "मैं कर्ता हूँ।" यही कर्तृत्व आगे कर्म-बन्धन को जन्म देता है। इसलिए आत्मा को समझना केवल दार्शनिक जिज्ञासा नहीं, बल्कि सीधे बन्धन और मोक्ष के प्रश्न से जुड़ा है।

शोध-टिप्पणी: गीता (3.27) में कहा गया है कि अहंकार से मोहित मनुष्य "मैं कर्ता हूँ" ऐसा मानता है, जबकि कर्म प्रकृति के गुणों से हो रहे हैं। गीता (13.31) कहती है कि आत्मा शरीर में स्थित होकर भी न करता है, न लिप्त होता है। शंकर के गीता-भाष्य में ये स्थल कर्तृत्व को औपाधिक (उपाधि के कारण प्रतीत होने वाला) मानने के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

आत्मज्ञान: नई वस्तु की प्राप्ति नहीं

यदि आत्मा ब्रह्म-स्वरूप है, तो आत्मज्ञान का अर्थ क्या है? क्या कोई साधक साधना करके कोई नया आत्म-तत्त्व पाता है? अद्वैत का उत्तर है: नहीं। जो पहले से है, उसे पैदा नहीं किया जा सकता। ज्ञान का काम नई वस्तु बनाना नहीं, बल्कि अज्ञान को हटाना है।

अँधेरे में भी रस्सी रस्सी ही थी। साँप का भ्रम वास्तविकता को बदल नहीं रहा था। प्रकाश ने केवल भ्रम को समाप्त किया। इसी तरह आत्मज्ञान आत्मा को ब्रह्म नहीं बनाता। वह उस भ्रान्ति को मिटाता है जिसके कारण आत्मा स्वयं को शरीर-मन से सीमित मान बैठी थी।

आत्मा की खोज कहाँ समाप्त होती है?

यहाँ शाङ्कर दर्शन अपनी सबसे गहरी दिशा में पहुँचता है। मनुष्य आत्मा को खोजने निकलता है। पहले शरीर को अलग करता है, फिर इन्द्रियों को, फिर मन को, फिर बुद्धि को, फिर अहंकार को। पर अन्त में जिस चैतन्य को वह खोज रहा था, उसे किसी वस्तु की तरह सामने नहीं पाता। क्योंकि जो खोज रहा है, वही वह चैतन्य है जिसे खोजा जा रहा था। यही अद्वैत का वास्तविक रहस्य है।

शाङ्कर दर्शन में आत्मा शरीर के भीतर रहने वाली कोई सूक्ष्म वस्तु नहीं है। वह मन का कोई परिवर्तन नहीं, और अहंकार भी नहीं। आत्मा वह चैतन्य है जिसके प्रकाश में शरीर, मन, बुद्धि और संसार का अनुभव सम्भव होता है। और जब यही आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में जानी जाती है, तब उपनिषद् का वचन अर्थपूर्ण होता है: "अयमात्मा ब्रह्म", यह आत्मा ही ब्रह्म है।

अभी भी शेष प्रश्न

पर हमारी सबसे बड़ी समस्या अभी समाप्त नहीं हुई।

  • यदि आत्मा वास्तव में ब्रह्म है, तो मनुष्य स्वयं को सीमित जीव क्यों मानता है?
  • यदि ब्रह्म एक है, तो अनेकता कहाँ से आई?
  • यदि आत्मा शुद्ध चैतन्य है, तो अज्ञान का अनुभव किसे होता है?

और सबसे कठिन प्रश्न: जिस जगत् को हम प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे हैं, उसकी सत्ता क्या है? क्या वह ब्रह्म से उत्पन्न कोई वास्तविक परिवर्तन है? क्या वह भ्रम है? या "मिथ्या" का कोई ऐसा सूक्ष्म अर्थ है जो सत्य और असत्य, दोनों से अलग है?

यहीं से शाङ्कर दर्शन का सबसे अधिक चर्चित सिद्धान्त सामने आता है।

अगला भाग — भाग 5 : जगत् — वास्तविक, अवास्तविक या मिथ्या?

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग होल्डर की अनुमति के बिना कहीं भी उल्लेख करने की अनुमति नहीं है।)


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