Posts

जब लड़कियाँ उस प्रेम से बाहर निकलती हैं जिसमें वो अकेली थीं…"

 जब लड़कियाँ उस प्रेम से बाहर निकलती हैं जिसमें वो अकेली थीं…" तो वे टूटती नहीं, बल्कि एक नया चेहरा ओढ़ती हैं  थोड़ा थका हुआ, पर सच के करीब। वो प्रेम जो सिर्फ़ उनका था, जिसमें जवाब नहीं, सिर्फ़ प्रतीक्षा थी  उससे बाहर आना किसी युद्ध से कम नहीं होता। वो अपने ही लिखे खतों को जलाती हैं, जिनमें ‘हम’ सिर्फ़ कल्पना था। वो उन रास्तों से लौटती हैं जहाँ कोई नहीं आता था उन्हें लेने। और उस पल, जब वे उस प्रेम को पीछे छोड़ देती हैं, जिसमें वो अकेली थीं — तो दरअसल, वे खुद को फिर से पा लेती हैं। धीरे-धीरे… वो मुस्कुराना सीखती हैं  बिना वजह के, बिना किसी के लिए। मुकेश ,,,,

लड़कियाँ मोहब्बत में कहाँ-कहाँ खुद को छोड़ देती हैं…

 लड़कियाँ मोहब्बत में कहाँ-कहाँ खुद को छोड़ देती हैं… लड़कियाँ मोहब्बत में अपने तकिए के नीचे से वो डायरी हटा देती हैं जिसमें उन्होंने एक बार तुमसे जुड़ी सारी उम्मीदें लिखी थीं। वो अपने पसंद के इत्र का इस्तेमाल कम कर देती हैं — क्योंकि तुम्हें "ज़्यादा महक" से एलर्जी है। लड़कियाँ मोहब्बत में अपना मनपसंद रंग पहनना छोड़ देती हैं, जो कभी तुमने हँसते हुए कहा था — "ये रंग तुम पर कम फबता है।" वो अपने दोस्तों से मिलने के वक़्त को तुम्हारी कॉल के हिसाब से ढाल लेती हैं, और कभी-कभी तुम्हारी झुंझलाहट के लिए अपनी हँसी को गिरवी रख देती हैं। लड़कियाँ मोहब्बत में हर उस बात को माफ़ कर देती हैं जो उनके अंदर एक गांठ बना देती है  बस इसलिए कि तुम्हारा हाथ छूट न जाए। वो तुम्हारी हर चुप्पी को एक नई भाषा समझने लगती हैं, और तुम्हारी हर दूरी को "थोड़ी देर की बात" मान लेती हैं। लड़कियाँ मोहब्बत में खुद से कम, तुमसे ज़्यादा बात करती हैं  अपनी पसंद को तुम्हारी आदत बना लेती हैं, और तुम्हारी आदत को अपना धर्म। वो जब थक जाती हैं तो भी नहीं कहतीं  क्योंकि उन्हें लगता है मोहब्बत में सह लेना...

वो लड़की जो जवाब नहीं माँगती…

 वो लड़की जो जवाब नहीं माँगती… वो लड़की, जो हर बार मुस्करा देती है जब तुम कह दो — "थोड़ा बिज़ी हूँ", वो तुम्हारे जवाबों को जैसे किसी पुराने ख़त की तरह संभाल कर रखती है  चाहे उनमें तारीख़ न हो, या नाम अधूरा। वो लड़की तुमसे कभी नहीं पूछती  "क्या मैं तुम्हारे लिए कुछ मायने रखती हूँ?" क्योंकि वो जानती है, हर बार जब वो ये सोचेगी, उसका दिल थोड़ा और टूटेगा। वो लड़की कभी नहीं बताती कि उसने तुम्हारी आख़िरी "seen" की गई मैसेज पर कितनी बार स्क्रीन देखा था। वो जानती है कि मोहब्बत हमेशा loud नहीं होती, कभी-कभी वो एक धीमा-सा इंतज़ार होती है  जो घड़ी देखे बिना भी चलता है। वो लड़की तुम्हें याद करती है बग़ैर तुम्हें याद दिलाए, तुम्हारी पसंद की चीज़ें रखती है बग़ैर बताए, और तुम्हारी हर वापसी के लिए एक चुप सा स्वागत हमेशा अपने भीतर बनाए रखती है। वो लड़की जवाब नहीं माँगती  क्योंकि वो डरती नहीं है, बल्कि वो चाहती है कि अगर कभी जवाब आए भी  तो खुद से आए, बिना दबाव, बिना तर्क। उसकी मोहब्बत किसी मौसम की तरह नहीं, बल्कि ज़मीन की तरह होती है  जो हर बार तुम्हारे क़दमों के नीचे रह...

लड़कियाँ जब पहली बार "ना" कहती हैं...

 लड़कियाँ जब पहली बार "ना" कहती हैं... लड़कियाँ जब पहली बार "ना" कहती हैं, तो दुनिया थोड़ी चुप हो जाती है  जैसे किसी मंदिर की घंटी के बाद एक लंबी मौन सी लहर फैल जाती है। ये "ना" सिर्फ़ इनकार नहीं होता, ये एक दरवाज़ा बंद करने का नहीं, ख़ुद को पहली बार भीतर से खोलने का ऐलान होता है। जब वे कहती हैं "ना", तो वो डर, जो बरसों से उनकी पलकों पर टिका था  धीरे-धीरे उतरने लगता है। ये "ना" उन अनगिनत "हाँ" का उत्तर होता है, जो उन्होंने कभी माँ-बाप की उम्मीदों के लिए, कभी समाज की तर्जनी के डर से कहा था। पहली बार जब वे अपनी हिचकियों को काटकर बोलती हैं  "नहीं, ये मेरा रास्ता नहीं है," तो समझो उन्होंने अपनी ज़मीन पहचान ली है। अब कोई उंगली नहीं उठती, तो भी उठती हैं वे  अपने लिए, अपने शब्दों में, अपने वजूद के पक्ष में। लड़कियाँ जब पहली बार "ना" कहती हैं, तो वो सिर्फ़ विरोध नहीं करतीं  वे अपने भीतर एक छोटा-सा सूरज जला लेती हैं। और उस उजाले में वे खुद को पहली बार पूरा देख पाती हैं  सच में, जैसी हैं, वैसी। मुकेश ,,,,,,,,,

जब लड़कियाँ पहली बार आईने में खुद को देखती हैं — बिना डर के…

 जब लड़कियाँ पहली बार आईने में खुद को देखती हैं — बिना डर के… जब लड़कियाँ पहली बार आईने में खुद को देखती हैं  बिना डर के, बिना जजमेंट के, बिना उस सवाल के कि "क्या मैं ठीक लग रही हूँ?"  तो आईना भी थोड़ी देर साँस रोक लेता है। वो खुद को सिर्फ़ एक चेहरा नहीं, एक मुकम्मल कहानी की तरह देखती हैं  जिसमें आँखों के नीचे की थकान किसी हार की नहीं, बल्कि लड़ाइयों की जीत होती है। उनकी नाक, होंठ, त्वचा, जो अक्सर किसी फ़िल्टर या ताने की ज़द में रहे, अब बस… "अपनी" लगती है। जब लड़कियाँ आईने में खुद को पहली बार "कम नहीं" समझतीं  तो वो उस पल किसी परी कथा की राजकुमारी नहीं, बल्कि अपनी ही दुनिया की रानी बन जाती हैं। वे मुस्कराती हैं  जैसे किसी गहरे पानी में अपनी परछाईं को पहली बार गले लगा रही हों। अब कोई और उन्हें "सुधारने" की सलाह नहीं दे सकता  क्योंकि उन्होंने खुद से कह दिया है  "मैं जैसी हूँ, मैं पूरी हूँ।" जब लड़कियाँ आईने में खुद को देखती हैं बिना डर के, तो वो आईना अब सिर्फ़ काँच नहीं रहता  वो एक दरपन बन जाता है  जिसमें उन्हें उनका आत्मा-रूप दिखता है। म...

रातें अब सपनों से नहीं, हिसाबों से भरी होती हैं

 रातें अब सपनों से नहीं, हिसाबों से भरी होती हैं रातें अब सपनों से नहीं, हिसाबों से भरी होती हैं। हर पल का हिसाब रखा जाता है— कितनी हँसी छोड़ी, कितना ग़ुस्सा जमा किया, कितने शब्द अधूरे रह गए। चाँद बस निगरानी करता है, तारों की चमक अब केवल गवाह है, और हम गिनते हैं पुरानी गलतियाँ, पुरानी यादें, जैसे कोई बहीखाता पढ़ रहा हो। नींद अब चोरी की तरह आती है, हर ख्वाब के पीछे एक अंक, एक संकेत, एक सवाल छिपा है। रातें अब सपनों के लिए नहीं, सिर्फ़ हिसाब के लिए हैं— हम अपने ही भीतर के लेखा-जोखा में उलझे हुए  मुकेश ,,,,,,,

मोहब्बत के बाद जो खालीपन बचता है

 मोहब्बत के बाद जो खालीपन बचता है मोहब्बत के बाद जो खालीपन बचता है, वो किसी कमरे की तरह है जिसमें सभी लाइटें जल चुकी हैं, मगर खिड़कियाँ बंद हैं। उसमें न कोई गंध है, न कोई आवाज़, सिर्फ़ एक गूंज है— जो तुम्हारी यादों के साये में धीरे-धीरे बढ़ती है। वह खालीपन कभी चीखता नहीं, कभी रोता नहीं, बस रहता है, साँसों में, ख्यालों में, और उन छोटे-छोटे लम्हों में जहाँ तुम और मैं कभी साथ थे। और हम सीखते हैं, कि मोहब्बत खोने के बाद भी खालीपन अपना घर बना लेता है, और हम उसे हमेशा अपने अंदर ले चलते हैं। मुकेश ,,,,,,,,

जब लड़कियाँ लौटती हैं अपनी माँ की गोद में...

 "जब लड़कियाँ लौटती हैं अपनी माँ की गोद में..." जब लड़कियाँ लौटती हैं अपनी माँ की गोद में  तो वे औरतें नहीं होतीं, फिर से वही बच्चियाँ बन जाती हैं जो टूटी चूड़ियों के लिए रोया करती थीं या स्कूल से लौटकर सीधा उसी आँचल में अपना दिन रख दिया करती थीं। वे सारी थकानें जो उम्र ने जमा की थीं, माँ की हथेलियों की बस एक गर्म थपकी से पिघलने लगती हैं। जब लड़कियाँ लौटती हैं अपनी माँ की गोद में, तो वे अपनी सभी अधूरी दुआओं को एक बार फिर माँ की पलकों पर रख आती हैं — कि शायद अब कबूल हो जाएँ। वे उस गोद में कभी अपने पहले प्यार की चोटें रोती हैं, तो कभी दुनिया की बिना वजह की नाराज़गियाँ। उस एक गोद में वे अपने सारे किरदार उतार देती हैं  पत्नी, बहू, माँ, प्रेमिका  और फिर से सिर्फ़ “बिटिया” बन जाती हैं। जब लड़कियाँ लौटती हैं अपनी माँ की गोद में, तो दरअसल वे अपने सबसे पुराने घर लौटती हैं  एक ऐसे घर, जहाँ सिर्फ़ प्यार किराया होता है और आँसू हमेशा माफ़ कर दिए जाते हैं। मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

जब लड़कियाँ रिश्तों में माँ जैसी होने लगती हैं…

 जब लड़कियाँ रिश्तों में माँ जैसी होने लगती हैं… तो वे शिकायतें कम और समझ ज़्यादा करने लगती हैं। हर बार खुद को पीछे रख दूसरों की थकान का हिसाब रखने लगती हैं — किसे चाय चाहिए, कौन चुप है, किसकी आँखों में आज कुछ कहना छुपा है। जब लड़कियाँ रिश्तों में माँ जैसी होने लगती हैं, तो वे उम्र से बड़ी हो जाती हैं। चाहे खुद बच्ची ही क्यों न हों, पर अपनों की परवाह उन्हें माँ की तरह सोने नहीं देती। वे नज़रों से दिल का हाल जानने लगती हैं, और आवाज़ से मन की थकन। उनकी गोद तकिया बन जाती है, और हथेली — बिना कहे सहला देने वाली दवा। वे खाना परोसते वक़्त पूछती नहीं, बस थाली में वो रखती हैं जो तुम्हारे मन ने भी ठीक से नहीं चाहा था। उनकी आँखों में डाँट नहीं होती, पर जो कहा नहीं गया, वो भी समझा जाता है। जब लड़कियाँ रिश्तों में माँ जैसी होने लगती हैं, तो उन्हें भी किसी की गोद चाहिए होती है, पर वे माँ बनते-बनते कभी बेटी रह ही नहीं पातीं। और फिर एक दिन, जब सब कह देते हैं — "तेरे बिना तो घर अधूरा है…" तो वे मुस्कुराती हैं, पर कोई नहीं देखता कि वो कब से ख़ुद के लिए ‘घर’ ढूँढ रही हैं। मुकेश ,,,,,,,,

अकेलापन

 अकेलापन जब अकेलापन सिर्फ़ ख़ाली बिस्तर नहीं होता, बल्कि ख़ाली आत्मा की सिसकी बन जाता है तो जिस्म किसी जिस्म को नहीं, दिल किसी दिल को तरसता है। रात बाहों की तलबगार नहीं होती, वो तो किसी की आवाज़ माँगती है जो कहे मैं हूँ। तकिए गवाह हैं उन ख़ामोश बातों के, जो होंठों तक आते-आते रूह में ही दम तोड़ देती हैं। यह प्यास लम्स की नहीं, एहसास की है कोई पेशानी पर हाथ रख दे और पूछ ले, आज बहुत थक गए हो? दिल चाहता है कोई पास बैठे बिना छुए, और फिर भी इतना क़रीब हो कि तन्हाई शर्मिंदा हो जाए। यह कमी बदन की नहीं, हमनफ़स की है— जिसके साथ ख़ामोशी भी सुकून बन जाए। अजीब बात है भीड़ में भी आदमी तन्हा रह जाता है, अगर कोई उसकी रूह तक न पहुँचे। और तब समझ आता है कि मोहब्बत बिस्तर में नहीं, नज़र में होती है। छुअन में नहीं, ठहराव में होती है। जब कोई दिल से कहे— तुम्हें देखा है, समझा है, और अब छोड़ूँगा नहीं। मुकेश ,,,,,,,,