जब लड़कियाँ उस प्रेम से बाहर निकलती हैं जिसमें वो अकेली थीं…"
जब लड़कियाँ उस प्रेम से बाहर निकलती हैं जिसमें वो अकेली थीं…" तो वे टूटती नहीं, बल्कि एक नया चेहरा ओढ़ती हैं थोड़ा थका हुआ, पर सच के करीब। वो प्रेम जो सिर्फ़ उनका था, जिसमें जवाब नहीं, सिर्फ़ प्रतीक्षा थी उससे बाहर आना किसी युद्ध से कम नहीं होता। वो अपने ही लिखे खतों को जलाती हैं, जिनमें ‘हम’ सिर्फ़ कल्पना था। वो उन रास्तों से लौटती हैं जहाँ कोई नहीं आता था उन्हें लेने। और उस पल, जब वे उस प्रेम को पीछे छोड़ देती हैं, जिसमें वो अकेली थीं — तो दरअसल, वे खुद को फिर से पा लेती हैं। धीरे-धीरे… वो मुस्कुराना सीखती हैं बिना वजह के, बिना किसी के लिए। मुकेश ,,,,