महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 10 - ज्ञान और कर्म — यदि ज्ञान श्रेष्ठ है तो कर्म क्यों?
महाभारत — भीष्मपर्व — भाग 10 - ज्ञान और कर्म — यदि ज्ञान श्रेष्ठ है तो कर्म क्यों? महाभारत के भीष्मपर्व में भगवद्गीता का आरम्भ अर्जुन के विषाद से होता है, लेकिन उसका वास्तविक दार्शनिक संघर्ष केवल युद्ध करने या न करने का प्रश्न नहीं है। अर्जुन के सामने उससे भी गहरा प्रश्न है— यदि आत्मा नित्य है, शरीर नश्वर है और ज्ञानी व्यक्ति मृत्यु को अंतिम सत्य नहीं मानता, तो फिर कर्म का क्या प्रयोजन है? द्वितीय अध्याय में कृष्ण अर्जुन को आत्मा की नित्यता समझाते हैं। वे शरीर की नश्वरता और आत्मा की अविनाशिता का विवेचन करते हैं। इसके बाद वे स्थितप्रज्ञ की अवस्था बताते हैं—वह व्यक्ति जिसकी बुद्धि स्थिर है, जो कामनाओं से ऊपर उठ चुका है और सुख-दुःख में सम रहता है। यहीं से अगला प्रश्न स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होता है— यदि स्थितप्रज्ञता और आत्मज्ञान ही सर्वोच्च अवस्था है, तो अर्जुन को युद्ध जैसे अत्यन्त सक्रिय कर्म में क्यों लगाया जाए? यही प्रश्न तृतीय अध्याय की भूमिका बनता है। मूल प्रश्न - अर्जुन स्वयं इस द्वन्द्व को स्पष्ट रूप से सामने रखता है— ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत्किं ...