महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ७ : कामना — इच्छा से कर्तव्य तक
महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ७ : कामना — इच्छा से कर्तव्य तक अनुशासनपर्व की चर्चा अब मनुष्य की उन प्रवृत्तियों से आगे बढ़ती है जिन्हें केवल रोकने से समाधान नहीं होता। कामना उनमें सबसे मूलभूत है। इच्छा के बिना जीवन की गति भी संभव नहीं। भोजन की इच्छा शरीर को जीवित रखती है, ज्ञान की इच्छा अध्ययन कराती है, सृजन की इच्छा कला और विज्ञान को जन्म देती है। समस्या इच्छा के अस्तित्व में नहीं, तब उत्पन्न होती है जब इच्छा विवेक पर अधिकार कर लेती है। भीष्म के उपदेशों में इसलिए संयम का अर्थ इच्छा-विहीन हो जाना नहीं है। गृहस्थ, राजा और सामान्य मनुष्य के लिए इच्छाएँ जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं। प्रश्न यह है कि इच्छा का स्वामी कौन है— मनुष्य या उसकी इच्छा? कामना और कर्तव्य मनुष्य के जीवन में दो आवाजें अक्सर साथ चलती हैं। एक कहती है— “मुझे क्या चाहिए?” दूसरी पूछती है— “इस समय मुझे क्या करना चाहिए?” पहली इच्छा की आवाज है। दूसरी कर्तव्य की। परिपक्व जीवन वह है जिसमें इच्छा और कर्तव्य के बीच कोई विवेकपूर्ण संबंध स्थापित हो। हर इच्छा पूरी करना स्वतंत्रता नहीं है। कभी-कभी अपनी इच्छा को उच...