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महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ११ : स्त्री, परिवार और सामाजिक व्यवस्था

 महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ११ : स्त्री, परिवार और सामाजिक व्यवस्था युद्ध समाप्त हो चुका था, पर उसके बाद का सबसे बड़ा प्रश्न था— समाज को फिर से कैसे जिया जाए? कुरुक्षेत्र में असंख्य पुरुष मारे गए थे। उनके पीछे रह गई थीं माताएँ, पत्नियाँ, बहनें, पुत्रियाँ और बच्चे। इसलिए युद्ध के बाद धर्म की चर्चा केवल राजा, योद्धा और शासन तक सीमित नहीं रह सकती थी। जिस समाज ने युद्ध का मूल्य चुकाया था, उसकी आधी से अधिक पीड़ा उन लोगों के जीवन में थी जो युद्धभूमि में उपस्थित भी नहीं थे। इसी संदर्भ में भीष्म के उपदेशों में स्त्री और परिवार का प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है। स्त्री को केवल परिवार की एक भूमिका में सीमित करके देखना इस विमर्श को छोटा कर देता है। महाभारत के सामाजिक संसार में स्त्री पत्नी है, माता है, पुत्री है, गृह की धारक है, पर अनेक प्रसंगों में वह स्वयं निर्णय लेने वाली, प्रश्न करने वाली और पुरुषों की स्थापित धारणाओं को चुनौती देने वाली स्वतंत्र चेतना भी दिखाई देती है। कुंती, द्रौपदी, गांधारी, सत्यवती और सुभद्रा—इनके जीवन एक जैसे नहीं हैं। इन सबके माध्यम से महाभारत यह दिखाता है कि स्त्...

महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग १२ : दानधर्म — संपत्ति का सामाजिक उत्तरदायित्व

 महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग १२ : दानधर्म — संपत्ति का सामाजिक उत्तरदायित्व भीष्म के उपदेश अब मनुष्य के व्यक्तिगत आचरण से आगे बढ़कर उस वस्तु तक पहुँचते हैं, जिसके कारण समाज में शक्ति, प्रतिष्ठा और असमानता तीनों उत्पन्न होती हैं— संपत्ति । युद्ध ने हस्तिनापुर को यह अनुभव करा दिया था कि केवल शस्त्रों का विनाश ही विनाश नहीं होता। जब धन कुछ हाथों में केंद्रित हो, जब आवश्यकता और उपलब्धता में बहुत अंतर हो और जब संपत्ति का उपयोग केवल स्वार्थ के लिए होने लगे, तब समाज के भीतर भी संघर्ष जन्म ले सकता है। इसीलिए अनुशासनपर्व में दान केवल धार्मिक पुण्य प्राप्त करने की क्रिया नहीं है। उसके पीछे संपत्ति के प्रति मनुष्य की दृष्टि का प्रश्न है। दान का पहला अर्थ दान का सामान्य अर्थ है—अपने पास की किसी वस्तु को दूसरे को देना। लेकिन भीष्म के चिंतन में महत्वपूर्ण बात केवल क्या दिया गया नहीं है; महत्वपूर्ण है किस भाव से दिया गया । यदि दान के पीछे अहंकार है, तो देने वाला वस्तु देकर भी अपने भीतर स्वामित्व बनाए रखता है। यदि दान के पीछे प्रसिद्धि की इच्छा है, तो वह परोपकार से अधिक प्रतिष्ठा का साधन बन जा...

महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ९ : क्षमा — स्मृति को विष बनने से रोकना

महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ९ : क्षमा — स्मृति को विष बनने से रोकना भीष्म के उपदेशों में क्षमा केवल किसी अपराधी को दण्ड न देने का नाम नहीं है। यह मनुष्य की उस क्षमता का नाम है जिसमें वह चोट को पहचानते हुए भी उसे अपने सम्पूर्ण जीवन का संचालक नहीं बनने देता। कुरुक्षेत्र के बाद यह शिक्षा विशेष अर्थ रखती थी। लगभग प्रत्येक जीवित व्यक्ति के पास किसी न किसी के प्रति शिकायत थी। किसी ने पुत्र खोया था, किसी ने पिता, किसी ने भाई, किसी ने गुरु। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने दुःख को प्रतिशोध में बदलता, तो युद्ध समाप्त होने के बाद भी हिंसा चलती रहती। इसलिए युद्ध के बाद समाज को केवल न्याय नहीं चाहिए था; उसे क्षमा की क्षमता भी चाहिए थी। क्षमा अन्याय को स्वीकार करना नहीं क्षमा का अर्थ यह नहीं कि अपराध को अपराध न माना जाए। न्याय अपना स्थान रखता है। जिसने अपराध किया, उसके कर्म का परिणाम हो सकता है। समाज की सुरक्षा के लिए दण्ड भी आवश्यक हो सकता है। लेकिन दण्ड देने वाले के भीतर यदि प्रतिशोध ही मुख्य प्रेरणा बन जाए, तो न्याय व्यक्तिगत क्रोध का रूप ले सकता है। क्षमा उस अंतर को बनाए रखती है। न्याय कर्म को दे...

महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ७ : कामना — इच्छा से कर्तव्य तक

 महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ७ : कामना — इच्छा से कर्तव्य तक अनुशासनपर्व की चर्चा अब मनुष्य की उन प्रवृत्तियों से आगे बढ़ती है जिन्हें केवल रोकने से समाधान नहीं होता। कामना उनमें सबसे मूलभूत है। इच्छा के बिना जीवन की गति भी संभव नहीं। भोजन की इच्छा शरीर को जीवित रखती है, ज्ञान की इच्छा अध्ययन कराती है, सृजन की इच्छा कला और विज्ञान को जन्म देती है। समस्या इच्छा के अस्तित्व में नहीं, तब उत्पन्न होती है जब इच्छा विवेक पर अधिकार कर लेती है। भीष्म के उपदेशों में इसलिए संयम का अर्थ इच्छा-विहीन हो जाना नहीं है। गृहस्थ, राजा और सामान्य मनुष्य के लिए इच्छाएँ जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं। प्रश्न यह है कि इच्छा का स्वामी कौन है— मनुष्य या उसकी इच्छा? कामना और कर्तव्य मनुष्य के जीवन में दो आवाजें अक्सर साथ चलती हैं। एक कहती है—  “मुझे क्या चाहिए?” दूसरी पूछती है—  “इस समय मुझे क्या करना चाहिए?” पहली इच्छा की आवाज है। दूसरी कर्तव्य की। परिपक्व जीवन वह है जिसमें इच्छा और कर्तव्य के बीच कोई विवेकपूर्ण संबंध स्थापित हो। हर इच्छा पूरी करना स्वतंत्रता नहीं है। कभी-कभी अपनी इच्छा को उच...

महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ६ : क्रोध — भीतर उठता हुआ दूसरा युद्ध

 महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ६ : क्रोध — भीतर उठता हुआ दूसरा युद्ध लोभ मनुष्य को वस्तु से बाँधता है, लेकिन जब उसकी इच्छा के मार्ग में कोई बाधा आती है, तब वही आसक्ति क्रोध का रूप ले सकती है। महाभारत के युद्ध को केवल बाहरी घटनाओं की श्रृंखला मानना उसके गहरे मनोवैज्ञानिक पक्ष को छोटा कर देना होगा। कुरुक्षेत्र से बहुत पहले मनुष्यों के भीतर छोटे-छोटे संघर्ष जन्म ले चुके थे। अपमान का स्मरण, अधिकार की भावना, प्रतिद्वंद्विता, अस्वीकार और प्रतिशोध—ये सब धीरे-धीरे एक ऐसी मानसिक ऊर्जा बनाते हैं जो अंततः विनाशकारी निर्णयों को जन्म दे सकती है। भीष्म के अनुशासन में इसलिए क्रोध पर नियंत्रण केवल व्यक्तिगत सद्गुण नहीं, सामाजिक शांति की शर्त बन जाता है। क्रोध कहाँ से जन्म लेता है? क्रोध अचानक आकाश से नहीं गिरता। उसके पीछे प्रायः कोई अपेक्षा होती है। “मेरी बात मानी जानी चाहिए।” “मुझे सम्मान मिलना चाहिए।” “मेरे साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था।” “दूसरे को मेरी इच्छा के अनुसार व्यवहार करना चाहिए।” जब वास्तविकता इन अपेक्षाओं से अलग होती है, तो भीतर प्रतिरोध पैदा होता है। यदि यह प्रतिरोध तीव्र हो जाए तो व...

महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ५ : लोभ — आवश्यकता से अधिक पाने की भूख

 महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ५ : लोभ — आवश्यकता से अधिक पाने की भूख सत्य के बाद भीष्म जिस मनोभूमि की ओर संकेत करते हैं, वह है लोभ । महाभारत के पूरे आख्यान को पीछे मुड़कर देखें तो कुरुवंश के विनाश में अनेक कारण दिखाई देते हैं, लेकिन उनमें एक वृत्ति लगातार सक्रिय रहती है— जो प्राप्त है, उससे संतुष्ट न होना। दुर्योधन के पास राज्य था, सामर्थ्य था, प्रतिष्ठा थी और विशाल सेना थी। फिर भी पाण्डवों के अधिकार को स्वीकार करना उसके लिए कठिन था। यह केवल संपत्ति का प्रश्न नहीं था। यह उस मानसिक स्थिति का प्रश्न था जिसमें दूसरे के पास जो है, वह अपने लिए असह्य लगने लगता है। यहीं से लोभ जन्म लेता है। लोभ और आवश्यकता में अंतर मनुष्य की आवश्यकताएँ सीमित हो सकती हैं, लेकिन उसकी इच्छाएँ सीमित नहीं होतीं। भोजन चाहिए—यह आवश्यकता है। स्वाद के लिए लगातार अधिक चाहना—यह इच्छा है। जीवन के लिए धन चाहिए—यह आवश्यकता है। धन को ही सुरक्षा, प्रतिष्ठा और सत्ता का अंतिम साधन मान लेना—यह लोभ की दिशा है। इसलिए लोभ का संबंध वस्तु की मात्रा से कम और मन की तृप्तिहीनता से अधिक है। जिसे दस चाहिए और दस मिलने पर संतोष हो ज...

महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ४ : सत्य — धर्म की पहली कसौटी

 महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ४ : सत्य — धर्म की पहली कसौटी अहिंसा के बाद भीष्म का चिंतन उस आधार की ओर जाता है जिसके बिना कोई भी नैतिक व्यवस्था टिक नहीं सकती— सत्य । युधिष्ठिर के जीवन में सत्य पहले से ही एक केंद्रीय मूल्य रहा था। किंतु महाभारत ने यह भी दिखाया था कि केवल सत्यवादी होना पर्याप्त नहीं; कभी-कभी परिस्थितियाँ ऐसी बन जाती हैं जहाँ सत्य, कर्तव्य और परिणाम एक-दूसरे से टकराने लगते हैं। कुरुक्षेत्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण था।  इसलिए अब भीष्म के लिए सत्य केवल “झूठ न बोलना” नहीं है। सत्य केवल शब्द नहीं मनुष्य के लिए असत्य का सबसे सरल रूप झूठ है।  लेकिन असत्य के और भी रूप हैं— जो जानते हुए भी गलत को सही कहना, अपने स्वार्थ के कारण तथ्य छिपाना, वचन देकर उसे निभाने का प्रयास न करना, और अपने भीतर कुछ तथा बाहर कुछ और होना। इस अर्थ में सत्य पहले वाणी का गुण है, लेकिन अंततः वह सम्पूर्ण व्यक्तित्व की संगति बन जाता है। मन, वचन और कर्म में जितना कम अंतर होता है, व्यक्ति उतना ही सत्य के निकट होता है। सत्य और प्रिय वचन भारतीय नैतिक परंपरा में सत्य के साथ प्रियता का विचार भी जुड़...

महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ३ : अहिंसा — क्या धर्म का अर्थ केवल न मारना है?

 महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ३ : अहिंसा — क्या धर्म का अर्थ केवल न मारना है? अनुशासनपर्व में भीष्म के उपदेश अब धर्म के एक ऐसे सिद्धांत की ओर बढ़ते हैं, जिसने भारतीय चिंतन को बहुत गहराई से प्रभावित किया— अहिंसा । युद्ध अभी समाप्त हुआ था। चारों ओर मृत्यु की स्मृति थी। ऐसे समय में भीष्म का अहिंसा पर बोलना अपने आप में एक गहरा विरोधाभास है। जिस कुरुक्षेत्र में धर्म की स्थापना के लिए युद्ध हुआ, उसी युद्ध के बाद धर्म के स्वरूप पर चर्चा करते हुए अहिंसा को इतना महत्व क्यों दिया गया? यहीं महाभारत की जटिलता सामने आती है। अहिंसा को केवल यह कह देना कि “किसी जीव को मत मारो” उसके व्यापक अर्थ को सीमित कर देता है। मनुष्य केवल शस्त्र से हिंसा नहीं करता। वह वाणी से भी चोट पहुँचा सकता है। विचार से किसी को अपमानित कर सकता है। सत्ता का दुरुपयोग कर सकता है। किसी निर्बल के अधिकार को दबा सकता है। और कभी-कभी अपनी उदासीनता से भी दूसरे के दुःख को बढ़ा सकता है। इसलिए हिंसा का पहला क्षेत्र शरीर नहीं, मानवीय संबंध हैं। अहिंसा और वाणी महाभारत बार-बार वाणी की शक्ति को पहचानता है। एक कठोर शब्द दिखाई नहीं देता,...

महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग २ : दान से आगे — धर्म का आंतरिक अनुशासन

 महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग २ : दान से आगे — धर्म का आंतरिक अनुशासन भीष्म के सामने युधिष्ठिर का प्रश्न केवल यह नहीं था कि राजा को क्या करना चाहिए। युद्ध के बाद प्रश्न और गहरा हो चुका था— मनुष्य अपने कर्मों को धर्ममय कैसे बनाए? भीष्म ने धर्म को केवल यज्ञ, व्रत या दान तक सीमित नहीं किया। उनके उपदेशों में बार-बार आचरण की शुद्धता और मन की अवस्था का महत्व सामने आता है। मनुष्य बाहर से दान दे सकता है, पर भीतर अहंकार रख सकता है। वह सत्य बोल सकता है, पर किसी को अपमानित करने के लिए सत्य का प्रयोग कर सकता है। वह नियमों का पालन कर सकता है, पर उसके भीतर करुणा का अभाव हो सकता है। इसलिए धर्म का मूल्य केवल कर्म के बाहरी रूप से निर्धारित नहीं होता। कर्म के पीछे की वृत्ति भी महत्वपूर्ण है। यही अनुशासनपर्व की एक केंद्रीय दिशा है। दान क्यों? भीष्म दान के महत्व को विस्तार से बताते हैं। भारतीय परंपरा में दान केवल संपत्ति का हस्तांतरण नहीं था। उसके पीछे यह विचार था कि मनुष्य अपने संसाधनों का पूर्ण स्वामी नहीं, बल्कि उनका उत्तरदायी धारक है। धन जब केवल संग्रह बन जाता है तो वह व्यक्ति को अपने साथ बाँध...

महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग १ : शरशय्या पर अंतिम उपदेश की ओर

 महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग १ : शरशय्या पर अंतिम उपदेश की ओर स्त्रीपर्व के पश्चात् महाभारत की कथा युद्धभूमि से धीरे-धीरे जीवन के अनुशासन और धर्म के प्रश्नों की ओर मुड़ती है। कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो चुका था। अठारह अक्षौहिणियों की विशाल सेना में से गिने-चुने योद्धा ही जीवित बचे थे। हस्तिनापुर में विजय का उत्सव नहीं था; वहाँ विजय से अधिक विनाश का बोध था। युधिष्ठिर के सामने अब एक विचित्र स्थिति थी। जिस राज्य के लिए युद्ध हुआ था, वह राज्य मिल चुका था। परंतु राज्य प्राप्त करने वाला मनुष्य भीतर से स्वयं को विजेता नहीं मान पा रहा था। युद्ध ने उसके सामने एक कठिन प्रश्न खड़ा कर दिया था—  क्या केवल युद्ध जीत लेना धर्म की विजय है? यही प्रश्न आगे अनुशासनपर्व के मूल स्वर को जन्म देता है। भीष्म अभी जीवित थे। शरशय्या पर पड़े हुए भीष्म केवल एक वृद्ध योद्धा नहीं रह गए थे। वे उस पूरी पीढ़ी के जीवित साक्षी थे जिसने कुरुवंश को बनते, टूटते और अंततः विनष्ट होते देखा था। उनके शरीर को बाणों ने रोक दिया था, लेकिन उनका अनुभव अभी प्रवाहित था। युधिष्ठिर उनके पास पहुँचे। यह वही युधिष्ठिर थे जि...