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Monday, 4 March 2013

परछाइयां दीवार से


परछाइयां  दीवार से
नीचे उतरने लगी हैं

पिघल  रही  थी  बर्फ
फिर से जमने लगी है

रुकी रुकी  हवाएँ  भी
फिर से चलने लगी हैं

तेरे  आने  की  खबर से
उम्मीद  बंधने  लगी  है

बुझते हुए चराग की लौ
फिर से मचलने लगी है

उदास था  घर  मेरा कि
दीवारें भी हंसने लगी हैं 

मुकेश इलाहाबादी -----

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