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Tuesday, 31 March 2026

अधूरी प्रेम कहानियों का बूढ़ा संग्रहालय

 अधूरी प्रेम कहानियों का बूढ़ा संग्रहालय 


जब तक

किसी पुराने शहर की

किसी तंग गली में

एक बूढ़ा संग्रहालय

अधूरी प्रेम कहानियों का

चुपचाप खुला है

तब तक

मोहब्बत कभी पूरी तरह खत्म नहीं होती दोस्तों!


वह संग्रहालय

जिसकी दीवारों पर

कोई पेंटिंग नहीं टंगी,

पर हर ईंट में

किसी का “कह न सका”

धीरे-धीरे साँस लेता है।


दरवाज़ा

हल्का-सा चरमराता है

जैसे पूछ रहा हो

“पक्का आना चाहते हो अंदर?”


और जो भी

हिम्मत करके दाखिल होता है,

वह

थोड़ा-सा अपना अतीत

बाहर ही छोड़ देता है।


अंदर

शीशे के बक्सों में रखी हैं


कुछ अधूरी चिट्ठियाँ,

जिनमें “प्रिय” के बाद

शब्द काँपते रह गए,


कुछ सूखे हुए फूल,

जो कभी किताबों में दबे थे,


कुछ टिकट के टुकड़े,

जिन पर साथ बैठने का सपना

अकेले उतर गया।


एक कोने में

एक पुराना रेडियो रखा है

जिसमें

अब भी वही गाना अटका है

जो

किसी ने किसी के लिए

कभी भेजा था।


यहाँ

हर कहानी पूरी नहीं होती

बस

रुक जाती है कहीं


किसी “अगर” पर,

किसी “क्यों” पर,

या

किसी “चलो छोड़ो” पर।


इस संग्रहालय का

कोई गाइड नहीं

हर आने वाला

खुद ही

अपनी कहानी पहचान लेता है।


कभी

कोई बूढ़ा आदमी आता है

धीरे-धीरे चलता हुआ,

किसी एक बक्से के सामने

लंबे समय तक खड़ा रहता है


और फिर

हल्का-सा मुस्कुरा कर

आँखें पोंछ लेता है।


कभी

कोई अधेड़ स्त्री आती है

एक चिट्ठी को

बस दूर से देखती है

छूती नहीं


जैसे

छू लिया तो

सालों से संभाली हुई

शांति टूट जाएगी।


यहाँ

रोना मना नहीं है,

हँसना भी नहीं


बस

ज़्यादा देर ठहरना

थोड़ा खतरनाक है।


मैंने एक दिन

उस बूढ़े संग्रहालय से पूछा

"तुम बंद क्यों नहीं हो जाते?"


वह बोला

"कहानियाँ पूरी हो जातीं

तो शायद बंद हो जाता…"


और इस जवाब में

इतनी सच्चाई थी

कि मेरे पास

कोई सवाल नहीं बचा।


मैं जानता हूँ

यह कविता

किसी न किसी को

इस दरवाज़े तक ले आएगी


वह अंदर जाएगा,

कुछ पहचानेगा,

कुछ छुपाएगा,

और

चुपचाप बाहर आ जाएगा।


जाने क्यों मन करता है

दुनिया के हर सफल प्रेम के सामने

इस संग्रहालय को खड़ा कर दूँ

और कहूँ


देखो!

जो पूरा नहीं हुआ,

वही सबसे ज़्यादा बचा रहा


जो मिल गया,

वह शायद

इतना याद नहीं रहा।


अरे ओ

अधूरी प्रेम कहानियों के

बूढ़े संग्रहालय!

तुम्हारी ये खामोशियाँ

कितनी बोलती हैं…


आओ,

आज

तुम्हारी किसी शेल्फ पर

अपनी भी

एक अधूरी कहानी रख दूँ


ताकि

थोड़ी-सी मोहब्बत

और बची रहे यार!


मुकेश ,,,,,,

मॉल में घूमता हुआ खाली जेब वाला आदमी

 मॉल में घूमता हुआ खाली जेब वाला आदमी


जब तक

किसी मॉल की चमकती हुई रोशनी में

एक आदमी

खाली जेब लेकर

धीरे-धीरे चलता हुआ

ज़िंदा है

तब तक

चमक पूरी सच्चाई नहीं है दोस्तों!


वह आदमी

जिसके कदम

एस्केलेटर पर भी

संकोच से चढ़ते हैं,

जिसकी आँखें

हर दुकान के शीशे में

थोड़ी देर ठहर जाती हैं


जैसे

देख रहा हो

एक ऐसी दुनिया

जो उसकी है भी

और नहीं भी।


ब्रांडेड कपड़ों के बीच

वह अपने पुराने शर्ट को

हल्का-सा ठीक करता है

जैसे

अपनी इज़्ज़त को

क्रीज़ दे रहा हो।


हर दुकान में

"SALE" लिखा है

पर

उसके लिए

हर चीज़ अब भी

"OUT OF REACH" है।


वह रुकता है

एक जूते की दुकान के सामने,

कीमत देखता है,

और

हल्का-सा मुस्कुरा देता है


जैसे

अपने ही ख़्वाब से

मज़ाक कर लिया हो।


फूड कोर्ट में

भीड़ है

हँसी है,

ट्रे हैं,

कॉफी है


वह

एक कोने में खड़ा होकर

मेन्यू बोर्ड पढ़ता है,

फिर

पानी पीकर

तसल्ली कर लेता है।


बच्चों को देखता है

आइसक्रीम खाते हुए,

खिलौनों पर झगड़ते हुए


उसकी आँखों में

एक पुराना रविवार

हल्का-सा जाग जाता है।


मोबाइल निकालता है

किसी को कॉल नहीं करता

बस

स्क्रीन देखता है,

जैसे

खुद से बच रहा हो।


सिक्योरिटी गार्ड

एक नज़र देखता है उसे

वह

थोड़ा सीधा हो जाता है

जैसे

अपनी गरीबी को

जेब में छुपा रहा हो।


कभी-कभी

वह

किसी महँगी दुकान में

अंदर चला भी जाता है


एसी की ठंडक में

थोड़ी देर खड़ा रहता है,

किसी शर्ट को छूता है,

और

फिर धीरे से

बाहर आ जाता है


जैसे

किसी और की दुनिया में

बस मेहमान बनकर आया हो।


वह आदमी

कुछ नहीं खरीदता

पर

बहुत कुछ लेकर जाता है


थोड़ी-सी चाह,

थोड़ी-सी शर्म,

थोड़ी-सी हँसी,

और

थोड़ी-सी चुप्पी।


मैंने एक दिन पूछा

"कुछ लिया नहीं?"


वह बोला

"घूमने आया था…"


और इस "घूमने" में

इतनी गहराई थी

कि मैं

अपनी भरी हुई थैली

थोड़ी हल्की महसूस करने लगा।


मैं जानता हूँ

यह कविता

उस तक पहुँचेगी

वह पढ़ेगा,

हल्का-सा हँसेगा,

और कहेगा


"अरे! इतना भी क्या…"


पर

अंदर ही अंदर

थोड़ा और भर जाएगा।


जाने क्यों मन करता है

हर उस आदमी के सामने

उसे खड़ा कर दूँ

जो मॉल में

सिर्फ़ खरीदने आता है


और कहूँ


देखो!

यह आदमी

कुछ खरीदे बिना भी

ज़िन्दगी को देख रहा है


और तुम

सब कुछ खरीदकर भी

शायद कुछ नहीं देख पा रहे।


अरे ओ खाली जेब वाले आदमी!

तुम्हारी यह चुप चाल

कितनी बड़ी कहानी है


आओ,

आज

मॉल की रोशनी से बाहर निकलो

और एक चाय की दुकान पर

बैठकर

थोड़ी-सी दुनिया

अपने हिसाब से जी लो यार!


मुकेश ,,,,,,

घर में रहकर भी घर से बाहर हो चुकी स्त्री

घर में रहकर भी घर से बाहर हो चुकी स्त्री

(जिसकी ज़रूरतें अब सिर्फ़ काम तक सीमित हैं) 


जब तक

किसी घर के बीचों-बीच

एक स्त्री

रहकर भी

घर से बाहर हो चुकी है

तब तक

दीवारें सिर्फ़ दीवारें हैं दोस्तों,

घर नहीं।


वह स्त्री

जिसके कदमों की आहट से

कभी सुबह होती थी,

जिसकी हँसी से

दोपहर हल्की हो जाती थी


अब

उसी के होने का मतलब

सिर्फ़ काम रह गया है।


वह उठती है

सबसे पहले,

सोती है

सबके बाद,


पर

उसके बीच का पूरा दिन

किसी और का होता है।


रसोई में

उसकी उँगलियाँ

रोटी बेलती हैं,

सब्ज़ी काटती हैं,

चाय बनाती हैं


पर

कोई नहीं पूछता

"तुमने खाया?"


वह बोलती है

तो बस काम के लिए

"दूध रख दिया है"

"कपड़े सुखा दिए हैं"


उसकी आवाज़

धीरे-धीरे

निर्देश बन गई है,

बात नहीं।


घर में

हर चीज़ अपनी जगह पर है

कपड़े, बर्तन, बच्चे, समय


बस

वह खुद

कहीं नहीं है।


कभी

आईने के सामने रुकती है

अपने चेहरे को देखती है,

जैसे

पहचानने की कोशिश कर रही हो


"मैं… कौन हूँ अब?"


उसकी पसंद

धीरे-धीरे

गायब हो गई है

कपड़े वही

जो घर को ठीक लगें,

खाना वही

जो सबको पसंद हो


उसकी अपनी भूख

कब की

चुप हो चुकी है।


हँसी भी आती है उसे

पर

हल्की-सी,

संभलकर


जैसे

ज़्यादा हँसना

अब उसके हिस्से में नहीं।


बीमार पड़ती है

तो भी

काम करती है

दवा खाकर

फिर खड़ी हो जाती है


क्योंकि

उसके रुकने से

घर रुक जाता है।


कभी

कोई मेहमान पूछ ले

"क्या करती हैं आप?"


तो वह मुस्कुरा देती है

और जवाब

गले में ही रह जाता है।


मैंने एक दिन पूछा

"थकती नहीं?"


वह बोली

"आदत है…"


और इस "आदत" में

इतनी गहरी थकान थी

कि नींद भी

शायद उसे आराम न दे पाए।


मैं जानता हूँ

यह कविता

उस तक पहुँचेगी

वह पढ़ेगी,

थोड़ा ठहरेगी,

और फिर

किसी को आवाज़ देगी


"चाय बना दी है…"


जाने क्यों मन करता है

हर उस घर के सामने

इस स्त्री को खड़ा कर दूँ

और कहूँ


देखो!

यह औरत

गायब नहीं हुई है

बस

तुम्हारी नज़रों से

ओझल हो गई है।


अरे ओ घर में रहकर भी

घर से बाहर हो चुकी स्त्री!

तुम्हारी यह खामोशी

कोई हार नहीं


बस

एक लंबा इंतज़ार है

उस दिन का

जब कोई

तुमसे पूछेगा


"तुम कैसी हो?"


आओ,

आज

रसोई की आंच थोड़ी धीमी करो

और एक कप चाय में

अपना नाम घोल दो…


शायद

तुम खुद को

फिर से पा लो।


मुकेश ,,,,

एक "माँ" बेटी की विदाई के बाद

 एक "माँ" बेटी  की विदाई के बाद 


जब तक

किसी रसोई की आँच पर

एक माँ

बेटी की विदाई के बाद भी

दो कप चाय रख देती है—

तब तक

ममता पूरी तरह विदा नहीं होती दोस्तों!


वह माँ

जिसके हाथों की महक

बेटी के बालों में बसती थी,

जिसकी डाँट में भी

मीठी-सी छाँव होती थी—


अब

उसी रसोई में

थोड़ा धीमे चलती है।


उसकी अलमारी में

एक कोना वैसा ही है—

जहाँ बेटी के कपड़े

अब भी तह करके रखे हैं,


कभी

उन्हें खोलकर देखती है,

सूँघती है हल्का-सा,

और फिर

चुपचाप

वापस रख देती है।


सुबह उठकर

पहले की तरह आवाज़ लगाती है—

"उठ जा… देर हो जाएगी!"


फिर

खुद ही ठहर जाती है—

और समझ जाती है

कि अब

कोई नहीं उठेगा उस आवाज़ से।


फोन पर बात होती है—

"खाना खाया?"

"ससुराल में सब ठीक?"


हर सवाल में

चिंता कम

और आदत ज़्यादा होती है—


और "हाँ माँ" सुनकर

वह

अपने आँचल से

दिल की धड़कन ढँक लेती है।


वह माँ

जो पहले

बेटी के साथ

हर छोटी बात बाँटती थी—


अब

अपनी ही बातों को

अंदर रख लेती है,

जैसे

खुद ही अपनी सहेली बन गई हो।


रसोई में

कभी वही पकवान बनाती है

जो बेटी को पसंद थे—


फिर

थाली में परोसते हुए

एक पल को रुक जाती है—

और

थोड़ा-सा

नमक बढ़ जाता है।


घर में

सब कुछ है—

दीवारें, सामान, लोग—


बस

एक आवाज़ की कमी है

जो

हर कोने को

घर बनाती थी।


कभी

बेटी की पुरानी चोटी

या रिबन हाथ लग जाए—

तो वह

थोड़ी देर के लिए

वक्त को उल्टा जी लेती है—


फिर

धीरे-धीरे

वर्तमान में लौट आती है।


मैंने एक दिन पूछा—

"कैसा लग रहा है?"


वह मुस्कुराई—

"अच्छा है…

बेटी अपने घर में खुश है…"


और इस "अच्छा है" में

इतना गहरा खालीपन था

कि शब्द भी

थोड़ा ठहर गए।


मैं जानता हूँ

यह कविता

उस तक पहुँचेगी—

वह पढ़ेगी,

आँखों पर पल्लू रखेगी,

और कहेगी—


"सब माँओं की यही कहानी है…"


जाने क्यों मन करता है—

हर उस इंसान के सामने

इस माँ को खड़ा कर दूँ—

और कहूँ—


देखो!

यह स्त्री

अपना एक हिस्सा

खुद से अलग करके भी

मुस्कुरा रही है—


यह त्याग नहीं,

यह

जीवन का सबसे गहरा प्रेम है।


अरे ओ बेटी की माँ!

तुम्हारी यह खामोशी भी

एक लोरी है—


आओ,

आज

रसोई की आँच थोड़ी धीमी करो—

और एक कप चाय में

अपनी यादें घोल दो…


शायद

तुम्हारी गोद

फिर से भर उठे

किसी अहसास से।


मुकेश ,,,,,

बेटी की शादी के बाद चुप हो गया पिता

 बेटी की शादी के बाद चुप हो गया पिता

जब तक

किसी घर के आँगन में

एक पिता

बेटी की विदाई के बाद

अपनी ही आवाज़ से

थोड़ा डरने लगता है

तब तक

घर पूरी तरह घर नहीं रहता दोस्तों!


वह पिता

जो पहले

ज़रा-ज़रा सी बात पर

आवाज़ लगा देता था

"अरे सुनती हो!"

"कहाँ हो?"


अब

दरवाज़े तक आकर

खुद ही लौट जाता है।


उसके कमरे में

अब भी

एक कोना वैसा ही है

जहाँ कभी

बेटी की हँसी

खिलखिलाती थी,


अब वहाँ

सिर्फ़

घड़ी की टिक-टिक है

और

कुछ पुरानी गूँजें।


वह पिता

जो बाज़ार से

उसकी पसंद का

छोटा-सा क्लिप,

या कोई दुपट्टा ले आता था


अब भी

कभी-कभी

यूँ ही रुक जाता है

उसी दुकान के सामने

फिर

बिना कुछ खरीदे

आगे बढ़ जाता है।


मोबाइल में

उसकी फोटो है

विदाई वाली भी,

बचपन वाली भी


कभी

ज़ूम करके देखता है चेहरा,

और

उँगली से

आँसू पोंछ देता है

जैसे स्क्रीन गीली हो गई हो।


फोन करता है

"खुश तो हो न?"


और

"हाँ पापा" सुनकर

थोड़ा हल्का होता है


पर

उस "हाँ" के बाद

जो खामोशी होती है

वहीं

वह फिर से

थोड़ा भारी हो जाता है।


घर में

सब कुछ है

पत्नी, बेटा, बहू,

टीवी, अख़बार, चाय


बस

एक आवाज़ कम है

जो

सबसे ज़्यादा हुआ करती थी।


वह पिता

अब कम बोलता है

ज्यादा सुनता है

जैसे

अपनी ही ज़िन्दगी को

दूर से देख रहा हो।


कभी

कोई पुराना खिलौना

हाथ में आ जाता है,

या

किसी कॉपी के पन्ने में

उसकी लिखावट


तो वह

थोड़ी देर के लिए

वापस

"पापा" बन जाता है

फिर

धीरे से

वर्तमान में लौट आता है।


मैंने एक दिन पूछा

"चुप क्यों रहते हो आजकल?"


वह मुस्कुराया

"आदत हो रही है…"


और इस "आदत" में

इतनी गहराई थी

कि मैं कुछ बोल नहीं पाया।


मैं जानता हूँ

यह कविता

उस तक पहुँचेगी

वह पढ़ेगा,

चश्मा उतारेगा,

आँखें पोंछेगा,

और कहेगा


"अरे… इतना भी क्या…"


पर

दिल में

थोड़ा और भर जाएगा।


जाने क्यों मन करता है

दुनिया के हर उस इंसान के सामने

इस पिता को खड़ा कर दूँ

और कहूँ


देखो!

यह आदमी

अपनी सबसे प्यारी आवाज़

खोकर भी

टूटा नहीं है


बस

थोड़ा-सा

खामोश हो गया है।


अरे ओ बेटी के पिता!

तुम्हारी यह चुप्पी भी

एक कविता है


आओ,

आज

पुरानी तस्वीरें निकालो

और एक कप चाय में

थोड़ी-सी यादें घोल दो…


शायद

तुम्हारी आवाज़

फिर से लौट आए

धीरे-धीरे।


मुकेश ,,,,

अधेड़ होती स्त्री

 जब तक

किसी घर की खिड़की के पास

एक अधेड़ होती स्त्री

अपने चश्मे को थोड़ा ऊपर सरकाकर

मोबाइल की स्क्रीन में

अपना चेहरा ढूँढती हुई

ज़िंदा है

तब तक

ज़िन्दगी पूरी तरह बुझी नहीं है दोस्तों!


वह स्त्री

जिसकी कमर में हल्का-सा दर्द है,

पैरों में थकान की पुरानी गाँठें हैं,

और आँखों पर चश्मा

पर दिल में

अब भी एक छोटी-सी लड़की

चुपचाप मुस्कुरा रही है।


सुबह

वह तुलसी में पानी डालती है,

अगरबत्ती जलाती है,

कुछ मंत्र बुदबुदाती है


और उसी हाथ से

थोड़ी देर बाद

मोबाइल खोलकर

अपनी नई सेल्फी देखती है।


कभी बाल ठीक करती है,

कभी दुपट्टा सँवारती है,

और फिर

एक तस्वीर डाल देती है


कुछ ही देर में

लाइक्स टपकने लगते हैं

और उसके चेहरे पर

एक हल्की-सी रोशनी फैल जाती है

जैसे किसी ने

उसकी थकान पर फूल रख दिया हो।


मैसेंजर पर

कई नाम चमकते हैं

कुछ अनजान,

कुछ आधे-पहचाने


ज़्यादातर को

वह अनदेखा कर देती है,

पर एक-दो से

धीरे-धीरे बात करती है


एक दूरी बनाए रखते हुए,

जैसे कोई

नदी किनारे-किनारे चले

पर पानी में उतरे नहीं।


कभी-कभी

फिर भी धोखा खा जाती है

किसी शब्द पर भरोसा करके,

किसी आवाज़ को सच मानकर


फिर

थोड़ा टूटती है,

थोड़ा संभलती है,

और

अगली सुबह

फिर वही दिन शुरू कर देती है।


रील्स बनाती है

कभी किसी पुराने गाने पर,

कभी किसी भजन पर


उसकी आवाज़ में

थोड़ी कच्ची मिठास होती है,

और आँखों में

एक अनकही कहानी


वह अपने हुनर दिखाती है

रेसिपी, सिलाई, सजावट

जैसे

ज़िन्दगी के बिखरे टुकड़ों को

फिर से जोड़ रही हो।


पुरानी सहेलियाँ

अचानक मिल जाती हैं

फोन पर,

चैट में,

या कभी सचमुच


और फिर

घंटों चलती है बात

बचपन, स्कूल, शरारतें,

शादी, बच्चे, दुख-सुख


हँसी के बीच

कभी-कभी

आँसू भी चुपचाप गिर जाते हैं।


बहू की बात करती है

कभी तारीफ,

कभी शिकायत

पर एक अजीब-सा संतुलन बनाए रखती है,

जैसे

अपने ही घर में

न्यायाधीश बन गई हो।


कभी

जवानी के किसी नाम पर

हल्का-सा मुस्कुरा देती है

"अरे, वो भी क्या दिन थे…"


पर असली बात

वहीं रोक देती है

दिल के किसी कोने में

ताला लगाकर।


ज़िन्दगी

वह काट रही है

थोड़े सुख के साथ,

थोड़े दुख के साथ


जैसे

मीठी चाय में

हल्की-सी कड़वाहट भी हो।


व्रत हैं,

त्योहार हैं,

पूजा है


इन सबके सहारे

वह

दिनों को बाँधती रहती है,

और रातों को

थोड़ा हल्का करती रहती है।


मैंने एक दिन पूछा

"खुश हो?"


वह बोली

"हाँ…

जब फोन में लोग याद कर लेते हैं…"


और इस छोटे-से "हाँ" में

इतनी बड़ी तन्हाई थी

कि मैं चुप हो गया।


मैं जानता हूँ

यह कविता

उस तक पहुँचेगी

वह पढ़ेगी,

हल्का-सा मुस्कुराएगी,

और शायद

एक नई सेल्फी डाल दे


और मैं कहूँगा

"तुम्हारी यह मुस्कान ही

सबसे सच्ची पोस्ट है…"


जाने क्यों मन करता है

दुनिया के हर बेपरवाह इंसान के सामने

उसे खड़ा कर दूँ

और कहूँ


देखो!

यह स्त्री

टूटी नहीं है

बस

धीरे-धीरे बदल रही है


इसकी आँखों में

अब भी एक सपना है

और दिल में

थोड़ी-सी जगह

अब भी खाली है।


अरे ओ अधेड़ होती स्त्री!

तुम्हारी यह

हल्की-सी थकी,

हल्की-सी चमकती ज़िन्दगी

कितनी खूबसूरत है…


आओ,

एक दिन

फोन साइड में रखो

और एक कप चाय में

अपनी कहानी घोल दो…


शायद

तुम्हें खुद ही

अपनी आवाज़

फिर से सुनाई दे जाए।


मुकेश ,,,,,

साठ बरस का आदमी - तीन

 जब तक

किसी कॉलोनी के गेट पर
सुबह-सुबह
एक साठ बरस का आदमी
हाथ में माला
और आँखों में आधी नींद लिए
ज़िंदा है—
तब तक
ज़िन्दगी पूरी तरह सीधी रेखा नहीं हुई दोस्तों!


वह आदमी
जो अलार्म से पहले ही उठ जाता है,
नल के पानी से मुँह धोकर
भगवान के सामने बैठ जाता है—

घंटी की आवाज़ में
थोड़ी-सी श्रद्धा,
थोड़ी-सी आदत,
और थोड़ी-सी
डर की झनकार होती है।


फिर निकल पड़ता है
टहलने—
ना किसी पहाड़ पर,
ना किसी जंगल में—
बस अपनी ही गली के गोल-गोल चक्कर में,

जहाँ
हर मोड़ पर
एक पहचान खड़ी मिलती है।


"अरे शर्मा जी!"
"कहो वर्मा जी!"

बात शुरू होती है
ब्लड प्रेशर से,
शुगर पर आती है,
और बहू-बेटों पर टिक जाती है—

कभी शिकायत,
कभी गर्व,
कभी तुलना,
कभी तंज—

जैसे
ज़िन्दगी एक अखबार हो
जिसे हर कोई
अपने हिसाब से पढ़ रहा हो।


हँसी भी होती है—
हल्की-सी,
थोड़ी फिसलती हुई—

कभी कोई पुराना मज़ाक,
कभी कोई ऐसा जुमला
जिसे सुनकर
सब हँसते भी हैं
और इधर-उधर भी देखने लगते हैं।


वह आदमी
चलते-चलते
कभी किसी गुज़रती हुई औरत को
ज़रा देर तक देख लेता है—
जैसे
समय को पलटकर देख रहा हो,
या
खुद को याद दिला रहा हो
कि वह अब भी
ज़िंदा है।


घर लौटता है—
टीवी चालू करता है,
न्यूज़ देखता है
और सरकार को
दिन का पहला आशीर्वाद देता है—

"सब बर्बाद कर दिया…"

और इसी वाक्य में
उसे एक अजीब-सी राहत मिलती है।


दवाइयाँ हैं—
समय पर,
नियम से—

और हर गोली के साथ
वह
अपनी बीमारी का एक नया अध्याय
दोहराता है—
इतने विस्तार से
कि डॉक्टर भी
शायद इतना न जानता हो।


मोबाइल पर
धीरे-धीरे स्क्रॉल करता है—
वीडियो, मैसेज, फोटो—

कभी हँसता है,
कभी सिर हिलाता है,
कभी कहता है—
"आजकल की पीढ़ी…"

और फिर
उसी स्क्रीन में
खो जाता है।


दरवाज़े की घंटी बजती है—
"Amazon!"

वह उठकर
दरवाज़ा खोलता है—
जैसे
अपने ही घर में
एक मेहमान बन गया हो—

पार्सल लेता है,
नाम पढ़ता है,
और सोचता है—
"क्या मंगाया होगा इन्होंने…"


कभी बाजार जाता है—
छोटी-छोटी चीज़ें खरीदता है,
जैसे
ज़िन्दगी के छोटे-छोटे हिस्सों को
अब भी अपने हाथ में रखना चाहता हो।


स्कूल बस के पास खड़ा रहता है—
छोटे बच्चों को चढ़ाता है,
उतारता है—

उनके बैग से भारी
अपनी उम्र को
हल्का करता हुआ।


दिन ऐसे ही
घूमता रहता है—
सुबह की माला से
रात की दवा तक—

एक ही ढर्रा,
एक ही लय—

जिसमें
वह आदमी
कभी खुश है,
कभी थका हुआ,
कभी बस
चुप।


मैंने एक दिन पूछा—
"खुश हो?"

वह बोला—
"हाँ भी…
और नहीं भी…"

और इस "हाँ-नहीं" में
पूरी ज़िन्दगी का सच था।


मैं जानता हूँ
यह कविता
उस तक पहुँचेगी—
वह पढ़ेगा,
हल्का-सा मुस्कुराएगा,
और कहेगा—

"अरे! ये तो मेरी ही दिनचर्या है…"

और मैं कहूँगा—
"हाँ…
और यही तुम्हारी सबसे बड़ी कविता भी।"


जाने क्यों मन करता है—
दुनिया के हर भागते हुए आदमी को
इसके सामने खड़ा कर दूँ—
और कहूँ—

देखो!
यह आदमी
कुछ खास नहीं करता—
बस
जीता है—

धीरे-धीरे,
दोहराते हुए,
थोड़ा-थोड़ा टूटते हुए—
और फिर भी
हर सुबह उठ जाता है।


अरे ओ साठ साल के आदमी!
तुम्हारी यह
सीधी-सादी, उलझी हुई ज़िन्दगी—
कितनी गहरी है…

आओ,
आज फिर
टीवी की आवाज़ थोड़ी कम करो—
और एक कप चाय में
थोड़ी-सी बात मिला दो…

शायद
ज़िन्दगी का स्वाद
थोड़ा बदल जाए यार!

साठ बरस का आदमी - दो

 जब तक

किसी मोहल्ले के कोने में

एक साठ बरस का आदमी

अपनी ऐनक के पीछे से

दुनिया को आधा सच, आधा सपना देखता हुआ

ज़िंदा है—

तब तक

इंसान पूरी तरह संत नहीं हुआ दोस्तों!


वह आदमी

जो सुबह उठकर

राम-नाम जपता है,

और शाम को

फेसबुक पर किसी अनजान मुस्कान को

थोड़ी देर ज़्यादा देख लेता है


जिसके भीतर

धूप भी है,

और एक कोना

अब भी हल्की-सी धुंध में भीगा हुआ है।


वह कहता है—

"अब उम्र क्या रही इन सब बातों की…"

लेकिन

किसी "नमस्ते अंकल" में

उसे एक छोटा-सा वसंत सुनाई दे जाता है।


कभी-कभी

पुराने दोस्तों के व्हाट्सऐप ग्रुप में

हँसी थोड़ी फिसल जाती है

हल्की-सी शरारत,

थोड़ी-सी पुरानी आदतें


और फिर

वही आदमी

रात को सोने से पहले

गीता का एक श्लोक भी पढ़ लेता है।


उसकी उँगलियाँ

मोबाइल की स्क्रीन पर

धीरे-धीरे चलती हैं—

जैसे कोई

पुरानी यादों को टटोल रहा हो।


कभी

कुछ ऐसी तस्वीरों पर भी ठहर जाती हैं

जिन्हें वह

दुनिया से छुपाकर देखता है


फिर

अचानक स्क्रीन बंद कर देता है,

जैसे अपने ही मन से

नज़र चुरा ली हो।


शुगर है,

ब्लड प्रेशर है,

घुटनों में दर्द है

लेकिन

ज़िन्दगी से हार मानना

उसे आता नहीं।


दवा की शीशी के साथ

वह

अब भी

उम्मीद की एक छोटी गोली

हर रोज़ निगल लेता है।


उसके भीतर

एक साथ कई आदमी रहते हैं

एक जो प्रेम ढूँढता है,

एक जो थककर सो जाना चाहता है,

एक जो थोड़ा-सा स्वार्थी है,

थोड़ा-सा आलसी,

और

एक जो अब भी

अपने को बहुत समझदार समझता है।


कभी-कभी

वह खुद पर हँस भी लेता है

"क्या कर रहा हूँ मैं इस उम्र में?"


और फिर

चुपचाप

चाय में बिस्कुट डुबोते हुए

ज़िन्दगी को

थोड़ा और मुलायम बना लेता है।


पड़ोस की आवाज़ें,

गली के लोग,

किसी की हँसी,

किसी की नज़र


इन सबमें

वह ढूँढता है

एक छोटा-सा

सुरक्षित कोना

जहाँ

वह थोड़ी देर के लिए

सिर्फ "आदमी" रह सके,

"उम्र" नहीं।


मैंने एक दिन पूछा

"थकते नहीं हो?"


वह मुस्कुराया

"थोड़ा-थोड़ा…

पर जीना भी तो है…"


और उस "जीना" में

इतनी जिद थी

कि मुझे

ज़िन्दगी पर फिर से भरोसा हो गया।


मैं जानता हूँ

यह कविता

उस तक पहुँचेगी

वह हँसेगा,

थोड़ा झेंपेगा,

और कहेगा


"अरे यार!

मुझे ही पकड़ लिया तुमने?"


और मैं कहूँगा

"तुम जैसे लोग ही

हम सबका सच हो…"


जाने क्यों मन करता है

दुनिया के हर नकली संत के सामने

इस आदमी को खड़ा कर दूँ

और कहूँ


देखो!

यह आदमी

इच्छाओं से बना है,

कमज़ोरियों से बना है,

और फिर भी

हर सुबह

थोड़ा बेहतर बनने की कोशिश करता है


इसके सिर पर हाथ रखकर कसम खाओ—

कि इंसान को

पूरी तरह काटकर

सिर्फ आदर्श नहीं बनाओगे!


अरे ओ साठ साल के आदमी!

तुम्हारी यह उलझी हुई कहानी भी

कितनी सच्ची है


आओ,

एक कप चाय हो जाए—

थोड़ी-सी शक्कर कम,

थोड़ी-सी बात ज़्यादा…


और

थोड़ी-सी ज़िन्दगी

फिर से हँस दी जाए यार!


मुकेश ,,,,,,,,

साठ बरस का आदमी - एक

 जब तक हर गली में

कोई साठ बरस का आदमी

धीरे-धीरे चलते हुए

अपनी चप्पलों की थकी हुई आवाज़ के साथ

ज़िंदा है

तब तक

इस दुनिया को पूरी तरह सूखा नहीं कहा जा सकता दोस्तों!


वह आदमी

जिसकी कमीज़ के बटन

ऊपर से एक कम और नीचे से एक ज़्यादा लगे होते हैं,

जिसकी जेब में हमेशा

पुरानी दवाइयों की पर्चियाँ मुड़ी-तुड़ी पड़ी रहती हैं,

और आँखों के नीचे

रातों की नींद के काले धब्बे


जब वह हल्का-सा मुस्कुरा देता है,

तो लगता है

जैसे टूटी हुई चारपाई पर

अचानक कोई सपना बैठ गया हो।


वह कहता है

"भाई साहब! आज फिर

उनकी तबीयत ठीक नहीं है…"

या फिर

"अब तो आदत हो गई अकेले खाने की…"


और मैं

उसकी पीठ पर हाथ रखता हूँ

जैसे कोई पेड़

दूसरे पेड़ को सहारा देता हो आँधी में।


उसकी पत्नी

कभी बिस्तर पर पड़ी रहती है महीनों,

या फिर

अचानक चली गई

बिना अलविदा कहे,

जैसे रसोई में उबलती चाय

एकदम से ठंडी हो जाए।


या फिर

घर में है तो सही,

पर शब्दों में काँटे उग आए हैं,

हर बात में झगड़ा, हर साँस में चिड़चिड़ापन

और वह आदमी

चुपचाप

अपनी चाय में चीनी कम करता रहता है।


छुट्टियाँ भी लेता है वह

कभी दवा लेने के लिए,

कभी अस्पताल की लाइन में लगने के लिए,

कभी बस यूँ ही

खाली दीवारों को देखने के लिए।


लेकिन

नीयत उसकी अब भी साफ़ है

दूध में पानी नहीं मिलाता,

बातों में ज़हर नहीं मिलाता,

और किसी के हिस्से की रोटी

कभी नहीं छीनता।


गलतियाँ करता है

चश्मा कहीं रखकर भूल जाता है,

नाम याद नहीं रहते लोगों के,

कभी नमक ज़्यादा डाल देता है दाल में,

कभी चाय उबालकर कड़वी कर देता है


लेकिन

एक बात नहीं भूलता

किसी के दुख में

कंधा देना।


नींद अब कम आती है उसे

आधी रात को उठकर

खाली बिस्तर की सिलवटें ठीक करता है,

या खाँसती हुई आवाज़ सुनकर

दवा की शीशी ढूँढता है अँधेरे में


उसके भीतर

एक औरत है अब भी

जो साज-सिंगार नहीं करती,

बस चुपचाप

देखभाल में घुल जाती है।


कभी-कभी

पुरानी तस्वीरें निकालता है

जिसमें उसकी पत्नी

हँस रही होती है खुलकर,

और वह

तब भी उतना ही संकोची था


तस्वीर को देखता है

और कहता है

"अच्छा था वो समय…"


फिर

चुपचाप

तस्वीर वापस रख देता है।


मैंने एक दिन कहा

"बहुत अकेले हो गए हो यार…"


तो वह हँसकर बोला

"अकेला कहाँ?

यादें तो हैं साथ…"


और उस हँसी में

इतनी नमी थी

कि मेरी आँखें भीग गईं।


मैं जानता हूँ

मेरी यह कविता

उस तक पहुँच जाएगी

वह मुस्कुराएगा हल्का-सा

और कहेगा


"मुझे ही मिला क्या लिखने के लिए?"


और मैं

उसे गले लगाकर कहूँगा

"तुम्हारे जैसे लोग ही

कविता को ज़िंदा रखते हैं…"


जाने क्यों मेरा जी करता है

कि दुनिया के हर कठोर आदमी के सामने

इस साठ साल के आदमी को खड़ा कर दूँ

और कहूँ


देखो!

यह आदमी

टूटी हुई नींदों से बना है,

यह आदमी

अधूरी मोहब्बतों से बना है,

यह आदमी

गीता, बाइबिल, क़ुरान से नहीं

सीधे जीवन से उतरा है


इसके सर पर हाथ रखकर कसम खाओ

कि किसी के दिल को

यूँ अकेला नहीं छोड़ोगे!


अरे ओ साठ साल के आदमी!

तुम्हारी कहानी भी

ख़त्म नहीं हो रही


आओ,

आज फिर

एक कप हल्की-सी मीठी चाय पिलाओ…

और थोड़ी-सी ज़िन्दगी

मुझमें भी घोल दो यार!


मुकेश ,,,,,

भीड़ में गुम होती हुई आत्मा

 भीड़ में गुम होती हुई आत्मा


भीड़ बहुत है यहाँ

चेहरों की

आवाज़ों की

ख़्वाहिशों की


हर तरफ़

चलते हुए जिस्म हैं

भागते हुए साए हैं


मगर

किसी की रूह

कहीं दिखाई नहीं देती


हर कोई

किसी न किसी के साथ है


और अजीब बात है

हर कोई

अकेला है


बाज़ारों में

रोशनी बहुत है


इतनी कि

आँखें चौंधिया जाएँ


मगर

दिल के अंदर

एक कोना है

जो अब भी

अँधेरे में बैठा है


लोग

नाम पुकारते हैं

चेहरे पहचानते हैं


मगर

कोई किसी की

ख़ामोशी नहीं पढ़ता


मैंने देखा है


हँसते हुए चेहरों के पीछे

एक थका हुआ आदमी


जो

बस थोड़ी देर

किसी सच्चे कंधे की तलाश में है


ये कैसी भीड़ है


जहाँ

टकराहटें बहुत हैं

मुलाक़ातें नहीं


हर कोई

अपनी कहानी सुनाना चाहता है


मगर

सुनने वाला

कोई नहीं


एक बच्चे ने

भीड़ में खोकर

रोना शुरू किया


लोग आए

उसकी तस्वीर ली

और आगे बढ़ गए


किसी ने

उसका हाथ नहीं पकड़ा


मेरे भीतर

कोई पुराना दरवेश

धीरे से कहता है


“तू भीड़ में नहीं खोया

तू खुद से बिछड़ गया है”


मैं रुकता हूँ

थोड़ा पीछे हटता हूँ


आँखें बंद करता हूँ


और

पहली बार

भीड़ का शोर

कम होने लगता है


अंदर कहीं

एक हल्की-सी आवाज़ आती है


“मैं यहाँ हूँ…”


शायद

आत्मा

कभी गुम नहीं होती


हम ही

उसे

भीड़ के हवाले कर देते हैं


अब

मैं कम भागता हूँ


कम बोलता हूँ


कम ढूँढता हूँ


और अजीब बात है

भीड़ अब भी उतनी ही है


मगर

उसके बीच

मैं थोड़ा-सा

खुद को सुन लेता हूँ


कविता :

“इसे कविता मत कहिए

ये शायद

भीड़ से लौटती हुई एक रूह की सरगोशी है…”


मुकेश ,,,,,,,,,

आध्यात्मिक बाज़ार

 आध्यात्मिक बाज़ार 


आज

रूह का भी

एक बाज़ार लगा है


चौराहों पर

इबादत बिक रही है

गलियों में

मुक्ति के पोस्टर लगे हैं


कोई कहता है

“आओ, तुम्हें खुदा से मिला दूँ”


और

उसके पीछे

एक रेट-लिस्ट टंगी होती है


ज़िक्र की महफ़िलें सजती हैं

नूर की बातें होती हैं


मगर

आँखों में

तिजारत चमकती है


मस्जिद से

मंदिर तक

आश्रम से

स्टूडियो तक


हर जगह

रास्ते बताए जा रहे हैं


मगर

मंज़िल कहीं गुम है


एक दरवेश

कोने में बैठा हँस रहा है


कहता है


“जिसे तुम बेच रहे हो

वो बिकता ही नहीं”


लोग

माला गिनते हैं

साँसें गिनते हैं

मिनट गिनते हैं


और समझते हैं

इबादत पूरी हो गई


किसी ने

खामोशी को भी

कोर्स बना दिया


किसी ने

ध्यान को

वीडियो बना दिया


और रूह


वो अब भी

किसी सूने जंगल में

तन्हा बैठी है


किसी सच्चे पुकारने वाले का

इंतज़ार करती हुई


मैंने देखा है


जो सबसे ज़्यादा बोलते हैं

खुदा के बारे में


वो अक्सर

खुद से सबसे दूर होते हैं


और

जो चुप रहते हैं


उनके अंदर

कोई नूर उतरता है


ये कैसा बाज़ार है


जहाँ

खरीदने वाला भी भटका हुआ है

बेचने वाला भी


मेरे भीतर

कोई फकीर

धीरे-धीरे जागता है


और कहता है


“छोड़ दे ये सब दुकाने

चल

खुद को ढूँढ”


अब

मैं कम जानना चाहता हूँ


कम पाना चाहता हूँ


बस

एक सच्ची खामोशी


एक सच्ची पुकार


और

एक सच्चा राब्ता


क्योंकि

जो असली है


वो

न किताब में मिलता है

न बाज़ार में


वो

सिर्फ़

दिल के सूने कमरे में


खामोशी की तहों में

छुपा बैठा है


कविता :

“इसे कविता मत कहिए

ये शायद

एक खोई हुई तलाश की आह है…”


मुकेश ,,,,,,,,,

सब कुछ ‘कनेक्टेड’ है अब — एक सूफ़ियाना बयान

 सब कुछ ‘कनेक्टेड’ है अब — एक सूफ़ियाना बयान”


सब कुछ “कनेक्टेड” है अब

हर रग में जैसे कोई तार बिछा है

हर साँस में

एक अदृश्य जाल लिपटा है


मगर अजीब बात है

दिल अब भी

बेख़बर बैठा है


लोग कहते हैं—

हम जुड़ गए हैं


मैं देखता हूँ—

हर कोई

अपने ही घेरे में क़ैद है


एक वक़्त था

जब दरवाज़े खटखटाए जाते थे

नाम पुकारे जाते थे

और आवाज़ में

रूह की गर्मी होती थी


अब

उँगलियाँ चलती हैं

स्क्रीन जगमगाती है

और बात

दिल तक पहुँचने से पहले

ही कहीं खो जाती है


ज़िक्र अब भी होता है

मगर

लबों से नहीं


स्टेटस में


दुआएँ अब भी उठती हैं

मगर

हाथों से नहीं


इमोजी से


❤️

🤲

🌙


तीन निशानों में

पूरी इबादत समेट दी गई है


एक सूफ़ी ने कहा था

“जिसे तुम ढूँढते हो

वो तुम्हारे दिल में है”


और हम

उसे

वाई-फाई में तलाश रहे हैं


रात को

जब सब सो जाते हैं

नेटवर्क धीमा पड़ता है


तब

दिल धीरे से पूछता है


“कोई है…?”


और

कोई जवाब नहीं आता


सिर्फ़

एक हल्की-सी

खामोशी


जो

सब कुछ कह जाती है


मैंने देखा है

हज़ारों चेहरों से जुड़े लोग

एक ही पल में

टूट जाते हैं


और

एक फकीर

जो किसी से नहीं जुड़ा

रब से इतना जुड़ा होता है

कि उसे

किसी और की ज़रूरत नहीं पड़ती


ये कैसा वक़्त है


जहाँ

मुलाक़ातें कम

और

मौजूदगी ज़्यादा है


जहाँ

लोग पास हैं

मगर

पास नहीं हैं


मेरे भीतर

कोई दरवेश

धीरे-धीरे जागता है


और कहता है


“तोड़ दे ये सारे कनेक्शन

जो तुझे तुझसे दूर करते हैं

और जुड़ जा

उस एक से

जो कभी ऑफलाइन नहीं होता”


अब

मैं कम बोलता हूँ


कम दिखता हूँ


कम जुड़ता हूँ


और अजीब बात है

पहली बार

थोड़ा-सा

जुड़ा हुआ महसूस करता हूँ


सब कुछ “कनेक्टेड” है अब


मगर

जो असली रिश्ता है—


वो

अब भी

खामोशी में

इंतज़ार कर रहा है


कविता :

“इसे कविता मत कहिए

ये शायद

एक अधूरी दुआ है…”


मुकेश ,,,,,,,,

सब कुछ “कनेक्टेड” है अब

सब कुछ “कनेक्टेड” है अब

चारों तरफ़ इसी की धूम

यही एक विचार हवा में

यही एक चीज़ बाज़ार में


यही मोबाइल में

यही लैपटॉप में

यही ऑफिस में

यही बेडरूम में

यही मेट्रो में

यही मंदिर में

यही श्मशान में


ऐसा लगता है

जैसे इंसान ने

पहली बार

एक-दूसरे से जुड़ना सीखा है


जबकि

सदियों से लोग

बिना नेटवर्क के

दिलों में बसते आए हैं


सुबह उठते ही

चेहरा नहीं देखते हम


नोटिफिकेशन देखते हैं


कोई “गुड मॉर्निंग” नहीं कहता

सब

“स्टेटस” डालते हैं


जो भी पूछो

जिससे भी पूछो

जिस बारे में भी पूछो


“ऑनलाइन हो?”


माँ पास बैठी है

बेटा

दूर बैठा है


दोनों

एक ही घर में

“टाइपिंग…” कर रहे हैं


दोस्त

दोस्त नहीं रहे


“फॉलोअर्स” बन गए हैं


रिश्ते

रिश्ते नहीं रहे


“चैट्स” बन गए हैं


मुलाकातें

मुलाकातें नहीं रहीं


“वीडियो कॉल” बन गई हैं


इंस्टाग्राम खोलो

हर कोई

खुश है


व्हाट्सएप खोलो

हर कोई

बिज़ी है


फेसबुक खोलो

हर कोई

यादों में ज़िंदा है


और

अपने भीतर झाँको

तो

कोई भी

साथ नहीं है


एक आदमी

हज़ार लोगों से

जुड़ा हुआ है


और

एक भी इंसान से

नहीं जुड़ा


“लास्ट सीन”

हमारी मौजूदगी का सबूत है


“ब्लू टिक”

हमारी अहमियत का पैमाना


किसी के कंधे पर सिर रखकर

रोने की जगह

अब

इमोजी भेजे जाते हैं


😂

😭

❤️


तीन चिन्हों में

पूरा दिल समेट दिया गया है


एक दस साल का बच्चा

पूछता है


“पापा, ऑफलाइन क्या होता है?”


पापा सोचते हैं

बहुत देर तक


किसी के कमरे में

अब सन्नाटा नहीं होता


हर वक्त

कोई-न-कोई आवाज़ चलती रहती है


लेकिन

अंदर


एक गहरा

भयानक

अकेलापन बैठा है


ऐसा लगता है

जैसे इंसान

धीरे-धीरे

“डेटा” बनता जा रहा है


और मैं


इस डिजिटल भीड़ में

एक सादा-सा सवाल लिए भटक रहा हूँ


“क्या किसी को

वाक़ई मेरी ज़रूरत है

या सिर्फ़ मेरे ‘ऑनलाइन’ होने की?”


मेरे भीतर

कोई पुराना इंसान

धीरे-धीरे बुझ रहा है


जो

दरवाज़ा खटखटाकर

मिलने जाता था


अब

दरवाज़े नहीं खुलते


लिंक खुलते हैं


हम सब

जुड़े हुए हैं दोस्तों


और

शायद

इसीलिए

सबसे ज़्यादा टूटे हुए हैं


कविता :

“इसे कविता मत कहिए

यह भी शायद

एक नोटिफिकेशन है दोस्तों।”


मुकेश ,,,,,,,,,,

सब कुछ ‘सफलतामय’ है अब

सब कुछ “सफलतामय” है अब

चारों तरफ़ इसी की धूम

यही एक विचार हवा में

यही एक चीज़ बाज़ार में


यही स्कूल में

यही कोचिंग में

यही ऑफिस में

यही कॉलोनी में

यही गाँव में

यही शहर में

यही महानगर में


ऐसा लगता है

जैसे इंसान नहीं

सिर्फ़ “सीवी” पैदा हो रहे हैं


माँ कहती है

बेटा कुछ बन जाओ


बाप कहता है

नाम रोशन करो


टीचर कहता है

टॉपर बनो


कोचिंग कहती है

रैंक लाओ


कॉरपोरेट कहता है

खुद को बेचो

और मुस्कुराते रहो


जो भी पूछो

जिससे भी पूछो

जिस बारे में भी पूछो


“कितना कमाते हो?”


बचपन

ट्यूशन की मेज़ पर मर गया


जवानी

लैपटॉप के स्क्रीन में फँस गई


बुढ़ापा

पेंशन और प्रॉपर्टी के बीच

झूल रहा है


इंस्टाग्राम खोलो

तो हर कोई

सफल है


फेसबुक खोलो

तो हर कोई

खुश है


लिंक्डइन खोलो

तो हर कोई

प्रेरणादायक है


और

ज़िंदगी खोलो

तो हर कोई

थका हुआ है


मोटिवेशनल स्पीकर चिल्लाता है


“जागो!”

“भागो!”

“जीत लो दुनिया!”


और

भीतर बैठा आदमी पूछता है


“थोड़ा सो भी लूँ?”


दोस्त

दोस्त नहीं रहे


नेटवर्क बन गए हैं


रिश्ते

रिश्ते नहीं रहे


“कॉन्टैक्ट्स” बन गए हैं


मुलाकातें

मुलाकातें नहीं रहीं


“मीटिंग्स” बन गई हैं


किसी के कंधे पर सिर रखकर

रोने की जगह

अब

“स्टेटस अपडेट” है


एक दस साल का बच्चा

पूछता है


“पापा, पैशन क्या होता है?”


पापा कहते हैं—

“जिससे पैसे आएं”


किसी के चेहरे पर

अब मेहनत का पसीना नहीं है


सबके माथे पर

“परफॉर्मेंस” का पॉलिश है


ऐसा लगता है

जैसे इंसान

धीरे-धीरे

“प्रोजेक्ट” बनता जा रहा है


डेडलाइन के साथ


और मैं


इस भीड़ में

एक बेकार-सा सवाल लिए घूम रहा हूँ


“क्या बिना जीते भी

जिया जा सकता है?”


मेरे भीतर

कोई पुराना आदमी

धीरे-धीरे मर रहा है


जो कहता था


चलो

आज कुछ न करें


अब

कुछ न करना

सबसे बड़ा अपराध है


हम सब

भाग रहे हैं दोस्तों


कहाँ

ये किसी को नहीं पता


हम सब जीत रहे हैं दोस्तों


और

शायद

इसीलिए

सबसे बुरी तरह हार रहे हैं


मुकेश ,,,,,,,,,,,

आकाश की गवाही

आकाश की गवाही

मैं,

आकाश,


आज

गवाही देने आया हूँ।


न किसी पक्ष में,

न विपक्ष में


बस

सच के पक्ष में।


मैंने

सब कुछ देखा है


पहली आग,

पहला घर,

पहला सपना…


और

पहला विश्वासघात भी।


जब

तुमने

धरती को

माँ कहा था,


तब भी

मैं ऊपर था


और जब

उसे

टुकड़ों में बाँट दिया,


तब भी

मैं यहीं था।


मैंने देखा


कैसे

पेड़ों को काटते वक़्त

तुम्हारी कुल्हाड़ी

कभी नहीं काँपी,


और

कैसे

नदियों को ज़हर देते हुए

तुम्हारी आँख

कभी नहीं भीगी।


तुम

ऊपर देखते थे


और कहते थे,

“ईश्वर वहीं रहता है…”


पर

तुमने

कभी यह नहीं देखा


कि

मैं

तुम्हारी हर हरकत का

खामोश साक्षी हूँ।


तुमने

मेरे सीने में

धुआँ भर दिया,


मेरे नीले रंग को

धुंधला कर दिया,


और

मेरे सितारों को

छिपा दिया


अपनी ही रोशनी में।


तुमने सोचा


कि

तुम बहुत आगे बढ़ गए हो,


कि

तुमने मुझे

छू लिया है


पर

तुमने

सिर्फ़

मशीनें भेजी हैं

मेरी ओर,


खुद को नहीं।


आज

जब अदालत लगी है


और

तुम

कटघरे में खड़े हो,


तो

मुझसे पूछा गया


“क्या मनुष्य दोषी है?”

मैं

कुछ पल चुप रहा


क्योंकि

मेरी गवाही में

सिर्फ़ अपराध नहीं,


कुछ यादें भी थीं


एक बच्चा

जो मुझे देखकर

हँसता था,


एक प्रेमी

जो सितारों में

अपना नाम ढूँढता था,


एक बूढ़ा

जो हर शाम

मुझे धन्यवाद कहता था।


मैंने

धीरे से कहा


“मनुष्य…

दोषी है


पर

पूरी तरह नहीं।”


अदालत में

सन्नाटा छा गया।


मैंने आगे कहा


“उसने

बहुत कुछ तोड़ा है,


पर

उसमें

अब भी

कुछ बचा है


जो

फिर से बना सकता है।”


जज ने पूछा


“तो सज़ा क्या हो?”


मैंने

अपनी विशालता में

थोड़ा-सा झुककर कहा


“उसे

एक और मौका दिया जाए

पर इस बार

कोई चेतावनी नहीं होगी,

कोई दूसरा अवसर नहीं।”


और फिर

मैं

चुप हो गया

जैसे

गवाही पूरी हो चुकी हो।

अब

निर्णय

तुम्हारे हाथ में है


तुम

मेरे नीचे

कैसे जीना चाहते हो?


क्योंकि

मैं तो

फिर भी रहूँगा


नीला,

अनंत,

और

खामोश

पर

तुम्हारा होना

तुम्हारे ही निर्णय पर टिका है।


मुकेश ,,,,,

हवा की अंतिम चिट्ठी”

हवा की अंतिम चिट्ठी”


प्रिय मनुष्य,

यह मेरी

आख़िरी चिट्ठी है


क्योंकि

अब मुझमें

इतनी ताक़त नहीं बची

कि मैं

तुम तक बार-बार पहुँच सकूँ।


तुमने

मुझे कभी देखा नहीं,

पर

हर पल

मेरे सहारे जिए


फिर भी

तुमने

मुझे

सबसे हल्का समझा।


मैं

तुम्हारी पहली साँस थी,

और

तुम्हारी आख़िरी भी हो सकती थी


पर तुमने

मुझे

धुएँ में बदल दिया।


मैं

पहाड़ों से उतरती थी

गीत बनकर,


पेड़ों से गुजरती थी

खुशबू बनकर,


नदियों को छूती थी

ठंडक बनकर


पर अब

मैं

फैक्ट्रियों में फँस गई हूँ,

चिमनियों में अटक गई हूँ,


और

तुम्हारे शहरों में

खाँसती हुई भटकती हूँ।


तुमने

मेरे रास्ते बंद कर दिए


ऊँची-ऊँची इमारतों से,

बंद खिड़कियों से,

और

अपने ही डर से।


अब

मैं बहना चाहती हूँ


पर

हर जगह

मुझे रोका जाता है,


जैसे

मैं कोई खतरा हूँ।


तुम्हें पता है


जब तुम

थककर बैठते हो,

और

एक गहरी साँस लेते हो


तो

मैं

अब भी

तुम्हें बचाने की कोशिश करती हूँ।


पर

हर साँस के साथ

मैं

थोड़ी-थोड़ी मरती जा रही हूँ।


एक दिन

ऐसा आएगा


जब तुम

बहुत ज़ोर से

साँस लेना चाहोगे,


पर

मैं

वहाँ नहीं होऊँगी।


और तब

तुम समझोगे


कि

मैं

सिर्फ़ हवा नहीं थी,


मैं

तुम्हारी ज़िंदगी थी।


मैंने

कभी तुमसे

कुछ नहीं माँगा


बस

थोड़ी-सी जगह,

थोड़ी-सी हरियाली,


और

थोड़ा-सा सम्मान।


पर

तुमने

मुझे

एक आँकड़ा बना दिया


AQI,

पार्टिकल,

रिपोर्ट…


और

मैं

एक एहसास से

एक समस्या बन गई।


अब

मैं जा रही हूँ


धीरे-धीरे,

खामोशी से


जैसे

मैं कभी थी ही नहीं।


अगर

कभी

तुम्हें

मेरी याद आए


तो

किसी पेड़ के नीचे बैठना,


आँखें बंद करना,


और

एक गहरी साँस लेना


अगर

मैं वहाँ मिल जाऊँ


तो समझ लेना

कि

मैंने तुम्हें

अब भी माफ़ किया हुआ है।


वरना


यह चिट्ठी

सिर्फ़ एक स्मृति बन जाएगी।


तुम्हारी ही

जो कभी

तुम्हारे भीतर रहती थी,


हवा।


मुकेश ,,,

ईश्वर का लॉग-आउट

 “ईश्वर का लॉग-आउट”

एक दिन

अचानक


कोई चमत्कार नहीं हुआ,

कोई आवाज़ नहीं आई,


बस

बहुत चुपचाप

ईश्वर

लॉग-आउट हो गया।


न आसमान टूटा,

न धरती फटी


सब कुछ

वैसा ही रहा,


बस

प्रार्थनाएँ

कहीं पहुँचनी बंद हो गईं।


मंदिरों में

घंटियाँ बजती रहीं,


मस्जिदों में

अज़ान होती रही,


पर

उनके बीच

जो खाली जगह थी


वह

पहले से ज़्यादा

खाली हो गई।


लोगों ने कहा


“शायद

सर्वर डाउन है…”


उन्होंने

और ज़ोर से

प्रार्थना की,


और बड़े-बड़े

अनुष्ठान किए,


पर

कोई “रिस्पॉन्स” नहीं आया।


धीरे-धीरे

खबर फैल गई


कि

ईश्वर

अब “ऑनलाइन” नहीं है।


कुछ लोग डर गए,

कुछ

और भी निर्दयी हो गए


क्योंकि

अब उन्हें लगा

कोई देख नहीं रहा।


पर

एक अजीब-सी बात हुई


सन्नाटे में

कुछ और

धीरे-धीरे सुनाई देने लगा।


वह

मनुष्य की अपनी आवाज़ थी


जिसे

वह

सालों से

ईश्वर समझता आया था।


एक बूढ़ा

आसमान की ओर देखता है


और कहता है


“अगर तू चला गया है…

तो अब

हम क्या करें?”


आसमान

चुप रहता है


पर

हवा के एक हल्के झोंके में

जैसे

कोई जवाब छुपा हो


“अब

तुम खुद

ईश्वर बनो…”


लोग

पहले हँसे


फिर

धीरे-धीरे

डरने लगे


क्योंकि

ईश्वर होना

आसान नहीं था।


इसका मतलब था


कि अब

हर अन्याय

उनकी ज़िम्मेदारी है,


हर पीड़ा

उनका बोझ है,


और

हर प्रेम

उनका चुनाव।


कोई

मंदिर से बाहर आया,


और पहली बार

किसी भूखे को

रोटी दी


बिना किसी डर के,

बिना किसी फल की इच्छा के।


वहीं

किसी ने

एक पेड़ लगाया


जैसे

वह प्रार्थना कर रहा हो।


और

किसी ने

किसी को

गले लगा लिया


जैसे

वह पूजा कर रहा हो।


शायद

ईश्वर

गया नहीं था


उसने

बस

अपना अकाउंट

मनुष्यों में ट्रांसफर कर दिया था।


और

अब

हर दिल में

एक छोटा-सा नोटिफिकेशन था

“You are now the admin.”

मुकेश ,,,,,,,

अंतिम मनुष्य की डायरी

 अंतिम मनुष्य की डायरी

दिन – 1

आज

सभी नेटवर्क

हमेशा के लिए बंद हो गए।


पहले लगा

यह भी कोई अस्थायी समस्या है

रीस्टार्ट कर लेंगे,

सब ठीक हो जाएगा।


पर

कोई “रीस्टार्ट” नहीं हुआ।


दिन – 3


शहर

अचानक बहुत बड़ा लगने लगा है


इतना बड़ा

कि

उसमें मैं

खुद को नहीं ढूँढ पा रहा।


कोई आवाज़ नहीं,

कोई नोटिफिकेशन नहीं


सिर्फ़

मेरी अपनी साँसों की

अनजानी ध्वनि।


दिन – 7


आज

मैंने पहली बार

आसमान को देखा


बिना किसी फ़िल्टर के।


अजीब लगा


इतना साफ़,

इतना खाली…


जैसे

वह मुझसे कुछ पूछ रहा हो।


दिन – 10


मुझे

एक सूखा हुआ पेड़ मिला


मैंने

उसकी छाल को छुआ,


और अचानक

कुछ याद आया


शायद

इसे

“स्पर्श” कहते थे।


दिन – 14


मैंने

अपने ही दिल की धड़कन सुनी


बहुत सालों बाद।


पहले

यह शोर में दब जाती थी,

अब

यह ही एकमात्र आवाज़ है।


दिन – 18


प्यास लगी थी


पर

कोई ऐप नहीं था,

कोई बोतल नहीं थी।


मैंने

धरती को खोदा


बहुत देर तक…


फिर

थोड़ा-सा गीला मिट्टी मिला


मैं रो पड़ा।


दिन – 21


आज

मैंने खुद से बात की


बिना किसी स्क्रीन के,

बिना किसी शब्द के।


और पहली बार

मुझे लगा


कि मैं

अब तक

किसी और के साथ नहीं,

खुद से दूर था।


दिन – 25


रात को

एक सपना आया


एक नदी,

कुछ पेड़,

और

कुछ लोग…


वे

हँस रहे थे।


मैं

जागना नहीं चाहता था।


दिन – 28


आज

मेरा “लाइफ़ पैक”

खत्म होने वाला है


पर

इस बार

मैंने रिचार्ज नहीं किया।


क्योंकि

अब

मुझे समझ आ गया है


कि

ज़िंदगी

कभी खत्म नहीं होती,


बस

हम उसे

गलत तरीक़े से जीते हैं।


मैं

अपनी आख़िरी साँस के साथ

यह लिख रहा हूँ


“अगर कोई

इस डायरी को पढ़े

तो

एक पेड़ ज़रूर लगाना…

और

किसी को

बिना वजह

छू लेना।”


शायद

वहीं से

फिर शुरू होगी

दुनिया।


मुकेश ,,,,,

धरती का आख़िरी नोटिफिकेशन”

 धरती का आख़िरी नोटिफिकेशन”


एक सुबह

सभी स्क्रीन पर

एक साथ

एक नोटिफिकेशन आया


“Warning:

Earth is shutting down…”


लोग

हँसे


“यह कोई बग होगा…”


पर

इस बार

कोई अपडेट

नहीं आया।


नदियाँ

लॉग-आउट हो गईं,

पेड़

डिलीट हो गए,


और

आसमान

ब्लैंक स्क्रीन बन गया।


आख़िरी संदेश था


“You had unlimited life…

but you used it like a limited plan.”


और

सिस्टम

हमेशा के लिए

बंद हो गया।


मुकेश ,,,

आत्मा का ऑफ़लाइन होना”

 आत्मा का ऑफ़लाइन होना”


एक रात

अचानक


सारे नेटवर्क

चले गए।


न इंटरनेट,

न डेटा,

न कोई कनेक्शन।


लोग

घबराने लगे


जैसे

उनकी साँस

रुक गई हो।


पर उसी सन्नाटे में


कुछ और

धीरे-धीरे जागा।


वह

आत्मा थी


जो

सालों से

ऑफ़लाइन पड़ी थी।


उसने

धीरे से पूछा


“क्या अब

तुम मुझे सुन सकते हो?”


कोई जवाब नहीं आया


क्योंकि

लोग

अब भी

नेटवर्क ढूँढ रहे थे।


मुकेश ,,,,,,,,,,

प्रेम का ट्रायल वर्ज़न

 प्रेम का ट्रायल वर्ज़न


अब

प्रेम

फ्री में नहीं मिलता


उसका

“7 दिन का ट्रायल” है।


दो लोग

एक-दूसरे को

डाउनलोड करते हैं


थोड़ी-सी नज़दीकी,

थोड़ी-सी गर्माहट,


और

फिर


“Your trial has expired.”


मुकेश ,,,,,,,,,

यादों का क्लाउड

 यादों का क्लाउड


अब

किसी को

कुछ याद नहीं रहता


क्योंकि

यादें

क्लाउड में सेव हो जाती हैं।


माँ की गोद,

पहली मोहब्बत,

बारिश की खुशबू


सब कुछ

एक फ़ोल्डर में है


नाम:

“Old Emotions”


लोग

कभी-कभी

उसे खोलते हैं


पर

महसूस नहीं करते,


बस

स्क्रॉल करते हैं।


एक दिन

सर्वर क्रैश हो गया


और

सारी यादें

गायब हो गईं।


तब

लोग पहली बार

रोना चाहते थे


पर

उन्हें याद ही नहीं था

कि

रोते कैसे हैं।


मुकेश ,,,

ऑक्सीजन का सब्सक्रिप्शन

 ऑक्सीजन का सब्सक्रिप्शन


एक समय था

जब हवा

बिना पूछे

फेफड़ों में उतर जाती थी


अब

उसके लिए

लॉग-इन करना पड़ता है।


शहर के बीचों-बीच

एक बड़ा-सा बोर्ड लगा है


“ऑक्सीजन प्रीमियम प्लान 

शुद्ध साँसें, अब EMI पर!”


लोग

मास्क नहीं,

मशीन पहनते हैं


जो

हर साँस का हिसाब रखती है।


एक बूढ़ा

लाइन में खड़ा है


उसके पास

बस इतनी ही साँसें बची हैं

जितनी

एक छोटे पैक में मिलती हैं।


वह पूछता है


“क्या

थोड़ी-सी हवा

उधार मिल सकती है?”


काउंटर वाला हँसता है


“यहाँ

साँसें नहीं,

सिर्फ़ प्लान मिलते हैं।”


आसमान

ऊपर से देखता है


पर अब

उसकी नीली आँखों में

कोई गहराई नहीं बची।


और

धरती के सीने पर

लिखा है


“Out of Stock”


मुकेश ,,,,,,,,

लाइफ़ पैक – 28 दिन की ज़िंदगी

“लाइफ़ पैक – 28 दिन की ज़िंदगी”


एक दिन जब

धरती के साए पेड़ कट जाएँगे,

नदियाँ

अपनी ही प्यास में

सूख जाएँगी,


और विज्ञान

इतना आगे बढ़ चुका होगा

कि

ईश्वर भी

एक “थ्योरी” भर रह जाएगा—


तब

इंसान

दुकानों पर नहीं,

स्क्रीन पर जाएगा


और खरीदेगा

“लाइफ़ पैक”


ऑफ़र चल रहा होगा


“एक महीने की ज़िंदगी

अब सिर्फ़ 28 दिन में!”


लोग

खुश होंगे


जैसे

उन्हें कोई सौदा

बहुत सस्ता मिल गया हो।


कोई लेगा

“प्रिमियम लाइफ़”


जिसमें

थोड़ी-सी हँसी,

दो-चार रिश्ते,

और

एक सीमित-सी मोहब्बत

फ्री मिलेगी।


कोई

“बेसिक प्लान” में

सिर्फ़ साँसें खरीदेगा


बिना सपनों के,

बिना एहसास के।


और

गरीब आदमी


वह

किसी कोने में बैठकर

पुराने दिनों को याद करेगा


जब

ज़िंदगी

खरीदी नहीं जाती थी,


जी जाती थी।


एक बच्चा

अपने पिता से पूछेगा


“पापा,

ये पेड़ क्या होता है?”


पिता

थोड़ा सोचेगा,

फिर गूगल खोलेगा


और कहेगा


“बेटा,

ये एक पुरानी चीज़ है

जो ऑक्सीजन देती थी…”


बच्चा हँसेगा


“ऑक्सीजन भी

अब ऐप से मिलती है ना!”


नदियों की जगह

स्क्रीनसेवर होंगे,


जहाँ पानी

बस बहता हुआ दिखेगा


पर

प्यास नहीं बुझाएगा।


और प्रेम


वह भी

सब्सक्रिप्शन पर होगा


“7 दिन का ट्रायल

बिना किसी कमिटमेंट के!”


रिश्ते

ऑटो-रिन्यू पर चलेंगे,


और

जैसे ही बैलेंस खत्म होगा


लोग

एक-दूसरे से

कट जाएँगे।


किसी रात

जब नेटवर्क चला जाएगा


और

सारे सर्वर

अचानक बंद हो जाएँगे


तब

इंसान

पहली बार

सच में अकेला होगा।


वह ढूँढेगा


कोई पेड़,

कोई नदी,

कोई असली स्पर्श…


पर

सब कुछ

इतिहास बन चुका होगा।


और उस सन्नाटे में

एक आवाज़ गूँजेगी


धीरे-धीरे,

भीतर से


“तुमने

ज़िंदगी को

डेटा समझ लिया था…”


और तब

कोई रिचार्ज

काम नहीं आएगा


क्योंकि

ज़िंदगी

नेटवर्क नहीं थी,


एक एहसास थी

जिसे तुमने

समय रहते

अनलिमिटेड नहीं किया।


मुकेश ,,,,,,,,

Monday, 30 March 2026

पेड़ों की आत्महत्या का मौसम

 “पेड़ों की आत्महत्या का मौसम”

इस साल

मौसम थोड़ा अलग है


कैलेंडर में लिखा है


“पेड़ों की आत्महत्या का मौसम”


सुबह उठते ही

लोगों ने देखा


पेड़

खड़े तो हैं,

पर जैसे

जीना छोड़ चुके हैं।


उनकी शाखाएँ

अब आसमान को नहीं छूतीं,


वे झुकी हुई हैं

जैसे

किसी अदृश्य बोझ से

टूट गई हों।


पत्ते

धीरे-धीरे गिरते नहीं,


वे

एक साथ

छूट जाते हैं


जैसे

किसी ने

जीवन से इस्तीफ़ा दे दिया हो।


किसी ने कहा


“यह सूखा है…”


किसी ने कहा


“यह जलवायु परिवर्तन है…”


पर एक बूढ़े ने

धीरे से फुसफुसाया


“नहीं,

यह निराशा है…”


पेड़ों ने

बहुत देखा है


अपनी जड़ों के पास

खून बहते हुए,


अपनी छाँव में

सौदे होते हुए,


और अपने ही शरीर से

कुर्सियाँ बनते हुए।


वे थक गए हैं


हर बार

फल देने से,


जबकि

उन्हें बदले में

कुल्हाड़ी मिलती है।


इस बार

उन्होंने तय किया


वे काटे जाने का

इंतज़ार नहीं करेंगे,


वे खुद

सूख जाएँगे


धीरे-धीरे,

खामोशी से,

बिना किसी आवाज़ के।


शहरों में

अब भी

लकड़ी बिक रही है,


पर उसमें

कोई खुशबू नहीं


जैसे

वह भी

मर चुकी हो पहले ही।


एक बच्चा

एक सूखे पेड़ के पास खड़ा है


वह पूछता है


“माँ,

ये पेड़ मर क्यों गया?”


माँ

मोबाइल से नज़र उठाकर

बस इतना कहती है


“पानी नहीं मिला होगा…”


पर पेड़

कुछ और कहना चाहता है


वह कहना चाहता है


“मुझे पानी नहीं,

तुम्हारी ज़रूरत थी…”


रात को

जब हवा चलती है


सूखी शाखाएँ

आपस में टकराती हैं,


और एक अजीब-सी आवाज़ आती है


जैसे

कोई आख़िरी बार

जीने की कोशिश कर रहा हो।


धरती

धीरे-धीरे काँपती है


और पूछती है


“अब कौन

मेरी साँस बनेगा?”


पर जवाब में

बस सन्नाटा है


एक लंबा,

गहरा,

डरावना सन्नाटा।


और इस तरह

हर साल

थोड़ा-थोड़ा बढ़ रहा है


पेड़ों की आत्महत्या का मौसम।


मुकेश ,,,,,

प्रेम की आख़िरी प्रदर्शनी

 प्रेम की आख़िरी प्रदर्शनी

शहर के बीचों-बीच

एक विशाल हॉल में

आज खुली है


“प्रेम की आख़िरी प्रदर्शनी”


दरवाज़े पर लिखा है


“अंदर आने से पहले

अपने सारे तर्क,

अपना अहं,

और अपने हिसाब-किताब

बाहर जमा कर दें।”


पर लोग

फिर भी

सब कुछ भीतर ले आते हैं


जेब में रखे हुए

शक,

दिमाग में भरे हुए

सवाल,

और दिल में

कई अधूरे सौदे।


पहली दीवार पर

टंगा है


एक पुराना आलिंगन,


जिसमें

दो लोग

दुनिया से बेख़बर

एक-दूसरे में

घर बना रहे हैं।


दूसरे फ्रेम में

एक प्रतीक्षा है


जिसने

घड़ी की सुइयों को

थाम रखा है,


और समय

उसके सामने

हार मान चुका है।


एक काँच के केस में

रखा है


एक “ना कहा गया इज़हार”,


इतना जीवित

कि

आज भी

धड़कता है।


लोग पढ़ते हैं


“यह वही प्रेम है

जो कह दिया जाता

तो शायद

हमेशा के लिए खो जाता…”


एक कोने में

एक टूटा हुआ दिल रखा है


पर अजीब बात यह है

कि

वह अब भी

धड़क रहा है।


एक बच्ची

अपनी उँगली से

उस काँच को छूती है

और पूछती है


“माँ,

क्या दर्द में भी

प्रेम होता है?”


माँ

कुछ कहना चाहती है,

पर शब्द

गले में अटक जाते हैं।


अगले कक्ष में

एक आईना है


जिस पर लिखा है


“यहाँ

वह चेहरा देखिए

जिसने कभी

सच्चा प्रेम किया था…”


लोग

खुद को देखते हैं,

और जल्दी से

नज़रें फेर लेते हैं


जैसे

उन्हें डर हो

कि कहीं

कुछ सच न दिख जाए।


भीड़ में

एक बूढ़ा आदमी

धीरे-धीरे चलता है


हर फ्रेम को

थोड़ा ज़्यादा देर तक देखता हुआ,


जैसे

वह किसी को

पहचानने की कोशिश कर रहा हो।


अचानक

वह एक तस्वीर के सामने रुकता है


जहाँ

एक लड़की मुस्कुरा रही है,


और उसकी आँखों में

पूरा आकाश बसा है।


बूढ़ा

थोड़ा काँपता है,

और फुसफुसाता है


“यह…

यह तो मेरा अधूरा प्रेम है…”


रात को

जब प्रदर्शनी बंद होती है


सारे फ्रेम

धीरे-धीरे

साँस लेने लगते हैं।


और प्रेम

किसी कोने से

धीरे से कहता है


“मैं मरा नहीं हूँ…

बस

तुमने मुझे

दिखाने की चीज़ बना दिया है…”


और बाहर

एक नया बोर्ड लग चुका है


“अगली प्रदर्शनी:

‘सच्चाई’ — देखने का साहस हो तो आइए”


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

स्पर्श का अंतिम दस्तावेज़

 स्पर्श का अंतिम दस्तावेज़


कहा गया

कि

अब इस दुनिया में

स्पर्श सुरक्षित नहीं है,


इसलिए

उसे दर्ज कर लिया गया है

एक “अंतिम दस्तावेज़” में।


किसी पुरानी अलमारी में

रखी है वह फाइल


जिसके पन्नों पर

स्याही नहीं,

त्वचा की यादें चिपकी हैं।


पहले पन्ने पर

लिखा है


“जब माँ ने

पहली बार

बच्चे को छुआ था,

तो उसने

रोना छोड़ दिया था।”


दूसरे पन्ने पर


एक अधूरी-सी गर्माहट है,


जहाँ

दो हाथ

मिलते-मिलते

रुक गए


समय के डर से,

समाज के डर से,

या

खुद अपने डर से।


एक कोने में

सूखा हुआ है


वह स्पर्श

जो विदा के वक़्त

किसी ने

थामे रखा था देर तक,


जैसे

छोड़ देने से

रिश्ता टूट जाएगा।


लोग

इस दस्तावेज़ को पढ़ने आते हैं


दस्ताने पहनकर,

सावधानी से,


ताकि

कोई असली एहसास

उन तक न पहुँच जाए।


एक पन्ने पर

लिखा है


“यह वह स्पर्श है

जो बिना छुए

महसूस हुआ था

आँखों से,

खामोशी से,

और दूरी से।”


किसी ने

धीरे से पूछा


“क्या

अब भी

कोई छूता है

किसी को…

बिना मतलब के?”


कोई जवाब नहीं आया


बस

हवा ने

हल्का-सा

पन्ना पलट दिया।


आख़िरी पन्ना

अब तक खाली है


शायद

किसी के इंतज़ार में,


जो

फिर से

स्पर्श को


शब्दों से नहीं,

दिल से लिख सके।


रात को

जब सब चले जाते हैं


वह दस्तावेज़

धीरे से काँपता है,


और फुसफुसाता है


“मैं इतिहास नहीं बनना चाहता…

मैं फिर से

वर्तमान होना चाहता हूँ।”


पर

अब लोग

छूते नहीं


वे

स्क्रीन को स्वाइप करते हैं,

और समझते हैं

कि उन्होंने

किसी को महसूस कर लिया।


और इस तरह

स्पर्श

एक फाइल में कैद होकर

इंतज़ार करता है


उस आख़िरी इंसान का,


जो

किसी का हाथ थामकर

यह कह सके


“यह दस्तावेज़

अब ज़रूरी नहीं…”


मुकेश ,,,,,,,

प्यास के ख़िलाफ़ साज़िश

 प्यास के ख़िलाफ़ साज़िश


यह साज़िश

बहुत धीरे-धीरे रची गई

इतनी ख़ामोशी से

कि किसी को

प्यास लगना भी

अपराध लगने लगा।

पहले

उन्होंने पानी को

नाम दिया

“रिसोर्स”

फिर

उसे बाँट दिया

बोतलों में,

ब्रांडों में,

और कीमतों में।

अब

प्यास

कोई एहसास नहीं रही,

एक “डिमांड” बन गई है

जिसे

मार्केट पूरा करता है।

नदियों से कहा गया

“बहना बंद करो,

तुम्हें पाइपलाइनों में

चलना होगा।”

बारिश से कहा गया

“जहाँ ज़रूरत हो

वहीं बरसो,

बाक़ी जगह

तुम्हारी कोई ज़रूरत नहीं।”

बादलों को

ठेके पर दे दिया गया

और आकाश

किसी कंपनी का

ऑफ़िस बन गया।

धरती की कोख से

खींच लिया गया पानी

इतना कि

उसकी नसें

सूखने लगीं।

और मनुष्य

वह

अपनी ही बनाई हुई

इस प्यास को

प्लास्टिक की बोतल में

भरकर

पीता रहा

बिना समझे

कि वह

पानी नहीं,

अपना भविष्य पी रहा है।

किसी गाँव में

एक बूढ़ा

कुएँ के पास बैठा था

सूखी रस्सी को

बार-बार खींचता,

और हर बार

खाली लौट आता।

उसने आसमान से पूछा

“क्या अब

प्यास भी

खरीदनी पड़ेगी?”

आसमान चुप रहा

शायद

उसकी आवाज़ भी

किसी ने

किराए पर ले ली थी।

शहरों में

फव्वारे नाच रहे थे,

लॉन हरे थे,

और लोग

“वाटर क्राइसिस” पर

सेमिनार कर रहे थे।

पर कहीं दूर

एक बच्चा

अपनी सूखी जीभ से

होंठ चाटते हुए

सो गया

बिना यह जाने

कि उसकी नींद में

कोई सपना भी नहीं आएगा,

क्योंकि सपनों को भी

थोड़ा पानी चाहिए।

यह साज़िश

इतनी गहरी है

कि अब

प्यास को ही

गलत ठहराया जा रहा है।

कहा जा रहा है

“कम पियो,

कम माँगो,

कम जियो…”

पर

एक दिन

जब धरती

आख़िरी बार

करवट लेगी,

तो वह पूछेगी—

“तुमने मेरे पानी से

क्यों डरना शुरू कर दिया?”

और उस दिन

अगर जवाब नहीं मिला

तो

प्यास

सिर्फ़ एहसास नहीं रहेगी,

एक विद्रोह बन जाएगी

जो

हर बाँध तोड़ देगी,

हर बोतल फोड़ देगी,

और

हर साज़िश को

बहा ले जाएगी।

तब

पानी नहीं बहेगा

न्याय बहेगा।

मुकेश्,,, 

जब शांति म्यूज़ियम में रख दी गई”

 “जब शांति म्यूज़ियम में रख दी गई”

एक दिन

घोषणा हुई

कि

“शांति” अब

इस दुनिया में नहीं मिलती,

इसलिए

उसे सुरक्षित रखने के लिए

म्यूज़ियम में रख दिया गया है।

लोग

लाइन लगाकर

देखने आने लगे

बच्चे पूछते—

“पापा,

ये शांति क्या होती है?”

पिता

थोड़ा झेंपते,

थोड़ा हँसते,

और कहते

“बेटा,

ये बहुत पुरानी चीज़ है…

अब इस्तेमाल में नहीं आती।”

काँच के एक बड़े-से बॉक्स में

रखी थी शांति

धूल जमी हुई,

थोड़ी पीली,

थोड़ी थकी हुई।

उसके पास

एक बोर्ड लगा था

“कृपया इसे छुएँ नहीं,

यह बहुत नाज़ुक है।”

पास ही

एक और सेक्शन था

“युद्ध के आधुनिक मॉडल”

जहाँ

बटन दबाते ही

मिसाइलें उड़ती थीं,

शहर जलते थे,

और स्क्रीन पर

तालियाँ बजती थीं।

लोग

वहाँ ज़्यादा देर रुकते

सेल्फ़ी लेते,

वीडियो बनाते,

और लिखते

“#Power #Nation #Victory”

शांति के सामने

बस कुछ बूढ़े खड़े होते

उनकी आँखों में

कुछ धुँधला-सा तैरता,

जैसे

उन्हें याद आ रहा हो

कोई पुराना गीत,

कोई भूला हुआ आलिंगन।

एक कोने में

एक बच्चा

चुपचाप खड़ा था

उसने धीरे से

काँच पर हाथ रखा,

और पूछा

“क्या यह

साँस लेती है?”

कोई जवाब नहीं आया

सिर्फ़

एक हल्की-सी दरार पड़ी

काँच पर।

अचानक

अलार्म बज उठा

“सावधान!

शांति को ख़तरा है!”

सुरक्षा गार्ड दौड़े,

बच्चे को हटाया गया,

और

काँच को फिर से

मज़बूत कर दिया गया

ताकि

शांति सुरक्षित रहे

इस खतरनाक दुनिया से।

बाहर

तोपें गरज रही थीं,

नेताओं के भाषणों में

आग बरस रही थी,

और

हर देश

खुद को

सबसे शांतिप्रिय साबित कर रहा था।

रात को

जब म्यूज़ियम बंद हुआ

शांति ने

धीरे से आँखें खोलीं,

और फुसफुसाई

“मैं यहाँ सुरक्षित नहीं हूँ…

मैं तो

दिलों में बसती थी कभी…”

पर

अब दिल

खाली थे,

या

भरे हुए थे

बारूद से।

और अगली सुबह

म्यूज़ियम के बाहर

एक नया बोर्ड लगा था

“नई प्रदर्शनी:

‘मानवता’ — लुप्तप्राय प्रजाति”

मुकेश्,,,, 

अंतर्यामि का आलोक — एक वैदिक दृष्टि

 अंतर्यामि का आलोक — एक वैदिक दृष्टि


कभी यूँ प्रतीत होता है

यह जो भीतर सूर्योदय है,

वह कोई आकाशीय घटना नहीं,

अपितु आत्मा का

अपने ही प्रकाश में

जागना है।


प्राणों की गति में

एक अग्नि छिपी है—

यज्ञ की लौ-सी,

जो हर श्वास के साथ

अहं की आहुतियाँ माँगती है।


मैं जब “मैं” कहता हूँ,

तो कोई सूक्ष्म स्वर पूछता है

कौन?

देह? मन? बुद्धि?

या वह साक्षी

जो इन सबको आते-जाते देखता है?


वेद कहते हैं

“नेति, नेति”

यह नहीं, यह भी नहीं;

और उसी निषेध में

एक अनकहा स्वीकार उगता है

कि जो शेष है,

वही सत्य है।


रात्रि के नीरव तल में

चंद्र नहीं,

चिदाकाश चमकता है

जहाँ विचार लहर हैं,

और साक्षी

अचल सागर।


कर्म की डोरियाँ

मुझे जगत से बाँधती हैं,

पर हर कर्म के केंद्र में

एक अकर्म का बिंदु है

जहाँ कर्ता विलीन हो जाता है,

और केवल होना शेष रहता है।


मैं देखता हूँ—

राग उठता है, द्वेष ढलता है,

सुख आता है, दुःख जाता है;

पर जो देख रहा है—

वह न आया, न गया।


क्या वही आत्मा है?

या ब्रह्म का प्रतिबिंब?

या दोनों का अभेद

“अहं ब्रह्मास्मि” की

निःशब्द अनुभूति?


जब यह पहचान

क्षण भर को भी जागती है,

तो भीतर का सूर्य-चंद्र

एक ही आलोक में गल जाते हैं

और जगत

न तो त्याज्य लगता है,

न ग्राह्य;

बस देखा हुआ

एक पूर्ण, शांत विस्तार।


तब समझ में आता है

मुक्ति कोई दूर का लोक नहीं,

वह तो दृष्टि का परिवर्तन है;

जहाँ “मैं”

सीमाओं से उतरकर

साक्षी में ठहर जाता है।


और उसी ठहराव में

सब गति थमकर भी

पूर्ण हो जाती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

अंतरिक्ष भीतर का — सूर्य, चंद्र और नक्षत्र

 अंतरिक्ष भीतर का — सूर्य, चंद्र और नक्षत्र


कभी-कभी

लगता है

मेरे भीतर कोई कुंडली खुलती है,

जिसमें लग्न हर सुबह

सूर्य के साथ उगता है।


एक तेज़, प्रखर सूर्य

मेरे नाभि-आकाश में धधकता है

अहं नहीं,

बल्कि चेतना का अग्नि-बिंदु,

जो कर्मों को पकाता है,

और मुझे

मेरे ही केंद्र की ओर धकेलता है।


दिन भर

वो सूर्य

दृष्टियाँ डालता है

कभी दशम भाव में महत्वाकांक्षा,

कभी चतुर्थ में बेचैनी,

कभी सप्तम में

तुम्हारी परछाईं जगा देता है।


फिर सांझ

जब प्रकाश ढलता है,

तो लगता है

जैसे सूर्य

मेरे ही बारहवें भाव में डूब गया हो,

त्याग बनकर,

विरक्ति बनकर।


और रात…

मेरे हृदय में एक चंद्र उगता है

शीतल,

पर उधार की रौशनी लिए,

जैसे स्मृतियों का दर्पण हो।


वो चंद्र

मेरी भावनाओं के ज्वार उठाता है,

कभी पूर्णिमा

तो सब कुछ उजला,

कभी अमावस—

तो भीतर का सारा आकाश

एक गहरी चुप में डूबा।


मेरे मन के नक्षत्र

रोहिणी की कोमलता,

मृगशिरा की तलाश,

अनुराधा का प्रेम,

और शतभिषा की रहस्यमयी दूरी

सब मेरे भीतर

अपनी-अपनी चाल चलते हैं।


कभी राहु-सा भ्रम

मुझे मेरे ही साए में उलझा देता है,

तो केतु-सा वैराग्य

सब बंधनों को काटकर

मुझे शून्य की ओर खींचता है।


और इन सब के बीच—

मैं…

ना केवल ग्रह,

ना केवल भाव,

ना केवल दशा

बल्कि एक साक्षी,

जो इस पूरी जन्मपत्री को

भीतर ही भीतर पढ़ रहा है।


कभी सोचता हूँ

क्या ये आकाश बाहर है?

या मैं ही

किसी ब्रह्मांड का

चलता-फिरता ज्योतिष हूँ?


जहाँ हर दिन

एक नया गोचर होता है,

हर रात

एक नई व्याख्या,

और हर जन्म

सिर्फ़ एक कोशिश

खुद को समझने की।


और शायद—

जब ये समझ पूरी हो जाएगी,

तब ना सूर्य बचेगा,

ना चंद्र,

ना नक्षत्र…

बस एक प्रकाश होगा

जो कभी उदय नहीं होता,

और कभी अस्त भी नहीं।


मुकेश ,,,,,,,

मैं—जो हर जगह होकर भी कहीं नहीं

 मैं—जो हर जगह होकर भी कहीं नहीं


कई बार यूँ लगता है

मेरे भीतर सिर्फ़ सूरज-चाँद ही नहीं,

एक पूरा आसमान सांस लेता है

फैलता हुआ, सिमटता हुआ,

बिना किसी किनारे के।


सुबह

मेरे सीने से एक रौशनी उठती है,

जो रास्ते नहीं खोजती,

बस खुद ही रास्ता बनती चली जाती है

और मैं उसके पीछे

एक साया-सा चलता रहता हूँ।


दिन भर

वो उजाला मुझमें

कुछ जलाता है, कुछ गढ़ता है,

कुछ तोड़ता है, कुछ जोड़ता है

जैसे हर धड़कन

एक नई सृष्टि रच रही हो।


और जब शाम

थककर मेरी रगों में उतरती है,

तो लगता है

मैं खुद ही

अपने भीतर के किसी समंदर में

डूब गया हूँ

खारा, गहरा, बेआवाज़।


रात होते ही

एक चाँद नहीं,

कई चाँद उगते हैं

कुछ यादों के,

कुछ ख्वाबों के,

कुछ उन सवालों के

जो कभी पूछे ही नहीं गए।


सितारे भी

बाहर के नहीं लगते,

जैसे मेरी ही सोच के टुकड़े हों,

जो अँधेरे में चमकना सीख गए हों।


और इन सब के बीच

मैं…

कभी एक कण बन जाता हूँ,

कभी पूरा ब्रह्मांड,

कभी एक सवाल,

जिसका कोई जवाब नहीं।


अजीब है ये होना

सब में होकर भी

कहीं न होना,

जैसे वजूद

खुद को ही ढूँढता रह गया हो।


शायद

मैं कोई एक “मैं” नहीं,

बल्कि अनगिनत “मैं” का संगम हूँ

जो हर रोज़

उगते हैं,

जलते हैं,

और फिर

खुद में ही

लौट जाते हैं।


मुकेश ,,,,,


एक लम्हा जो कभी गुज़रा ही नहीं

 एक लम्हा जो कभी गुज़रा ही नहीं


एक लम्हा

जो कभी गुज़रा ही नहीं,

बस ठहर गया है

वक़्त की किसी अनदेखी तह में,

जहाँ घड़ियाँ चलती तो हैं,

मगर कुछ बदलता नहीं।


वो लम्हा

शायद तुम्हारी नज़र का था,

या मेरी ख़ामोशी का,

जहाँ हमने कुछ कहा नहीं,

और सब कुछ

हमेशा के लिए कह दिया।


अजीब है

वक़्त आगे बढ़ता रहा,

दिन रात में, रात सुबह में ढलती रही,

मगर वो एक पल

आज भी वहीं खड़ा है,

जैसे उसे जाने की इजाज़त ही न मिली हो।


मैं जब भी

ख़ुद में उतरता हूँ,

वो लम्हा मुझे मिल जाता है

बिना दस्तक,

बिना आहट,

बस एक सच्चाई की तरह।


क्या वो मोहब्बत थी?

या वजूद का कोई गहरा राज़,

जहाँ “पहले” और “बाद”

अपनी अहमियत खो देते हैं,

और सिर्फ़ “होना”

बाक़ी रह जाता है।


तुम अब पास नहीं,

फिर भी वो लम्हा

मुझसे जुदा नहीं

जैसे तुम चले गए हो,

मगर तुम्हारा होना

कहीं गया ही नहीं।


और शायद

कुछ लम्हे गुज़रते नहीं,

क्योंकि वो वक़्त के नहीं होते,

वो रूह के होते हैं…

और रूह

कभी पुरानी नहीं होती।


मुकेश ,,,,,

मुस्कुराहट के पीछे ठहरा हुआ दर्द

 मुस्कुराहट के पीछे ठहरा हुआ दर्द


मुस्कुराहट के पीछे

ठहरा हुआ दर्द

जैसे किसी ने

आँखों की दहलीज़ पर

आँसू रखकर

उन्हें गिरने से मना कर दिया हो।


होंठ हँसते हैं,

पर भीतर कहीं

एक सन्नाटा है

जो हर लफ़्ज़ के बाद

थोड़ा और गहरा हो जाता है।


लोग कहते हैं

“तुम ठीक लगते हो”,

और मैं सोचता हूँ

क्या ठीक होना

सिर्फ़ दिखने की चीज़ है?


तुम्हारे जाने के बाद

मैंने सीखा है

कैसे दर्द को

आदत की तरह पहनना है,

कैसे मुस्कुराहट को

एक परदा बनाना है।


ये जो ठहराव है

ये कोई सुकून नहीं,

ये वो जगह है

जहाँ दर्द

चलना छोड़ देता है,

और बस

रहना सीख जाता है।


कभी-कभी

आईने में खुद को देखकर

यूँ लगता है

जैसे मैं नहीं,

मेरी मुस्कुराहट जी रही है

और मैं

उसके पीछे कहीं

खो गया हूँ।


फिर भी…

ये मुस्कुराहट

झूठ नहीं है पूरी,

क्योंकि उसमें

तुम्हारी याद की

हल्की-सी गर्मी भी है


जो दर्द को

ज़िंदा रखती है,

और मुझे भी।


मुकेश ,,,,,,,

तल्ख़ियाँ

 तल्ख़ियाँ


तल्ख़ियाँ

वो जो ज़ुबाँ पर नहीं,

रूह के किनारों पर

धीरे-धीरे जम जाती हैं।


कभी तेरी चुप में,

कभी मेरी बातों में,

कभी उन लम्हों में

जहाँ हम थे

मगर सच में

कभी मिले ही नहीं।


ये तल्ख़ियाँ

शोर नहीं करतीं,

बस मुस्कुराहटों के पीछे

एक खामोश साया बनकर

चलती रहती हैं।


मोहब्बत भी अजीब है

जितनी गहरी होती है,

उतनी ही बारीक

तल्ख़ियाँ छोड़ जाती है,

जैसे मीठे में

हल्की-सी कसैलापन।


मैंने चाहा था

तुम्हें पूरा महसूस करना,

मगर शायद

हर एहसास के साथ

थोड़ी-सी दूरी

लिखी होती है।


अब जो बचा है

ना वो ग़म है,

ना पूरी ख़ुशी,

बस कुछ तल्ख़ियाँ हैं

जो यादों में घुलकर

एक अजीब-सा सुकून दे जाती हैं।


और अजीब बात ये है

इन तल्ख़ियों के बिना

शायद मोहब्बत

इतनी सच्ची भी न लगती।


मुकेश ,

लम्हों के दरमियान सुलगता हुआ सुकून

 लम्हों के दरमियान सुलगता हुआ सुकून


लम्हों के दरमियान

सुलगता हुआ सुकून

जैसे वक़्त की उँगलियों में

कोई धीमी आग

बिना धुएँ के जल रही हो।


ना कोई शोर,

ना कोई हलचल,

फिर भी भीतर

कुछ लगातार घटता है

एक नरम-सी तपिश,

जो ख़ामोशी को भी

महसूस होने लगती है।


तुम्हारे पास बैठकर

अक्सर यूँ लगता है

कि बातों की ज़रूरत ही नहीं

हमारे दरमियान

जो कुछ है,

वो लफ़्ज़ों से पहले का है,

और शायद

लफ़्ज़ों के बाद का भी।


ये सुकून

ठंडा नहीं है,

इसमें एक हल्की-सी आग है—

जो जलाती नहीं,

बस याद दिलाती है

कि हम ज़िंदा हैं,

और किसी के होने से

और भी ज़्यादा।


कभी सोचता हूँ

क्या ये ठहराव ही असली हरकत है?

जहाँ सब कुछ रुका हुआ लगता है,

वहीं सबसे गहरा

बहाव छुपा होता है।


तुम्हारी मौजूदगी में

ये सुलगता हुआ सुकून

मुझे बदलता नहीं,

बस मुझे

मुझसे मिलवा देता है।


और फिर—

ना वक़्त का एहसास रहता है,

ना लम्हों का फ़ासला,

बस एक ठहराव होता है

जो धीरे-धीरे

अनंत में बदलता चला जाता है।


मुकेश ,,,,,,,,

जिस्म से रूह तक जाती हुई एक गर्म लहर

 जिस्म से रूह तक जाती हुई एक गर्म लहर


जिस्म से रूह तक

जाती हुई एक गर्म लहर

जैसे किसी ने

बिना छुए ही

मुझे पूरा छू लिया हो।


ये एहसास

सिर्फ़ त्वचा पर नहीं ठहरता,

ये भीतर उतरता है

जहाँ ख़ामोशी

अपनी ही आवाज़ सुनती है।


तुम्हारी क़ुर्बत में

कुछ ऐसा है

जो लफ़्ज़ों से परे है,

एक हरारत

जो सवाल नहीं करती,

बस महसूस होती है।


ये लहर

धीरे-धीरे उठती है,

ना तूफ़ान बनती है,

ना सुकून में खोती

बस एक पुल-सी बन जाती है

जिस पर चलकर

मैं “मैं” से “तुम” तक पहुँचता हूँ।


क्या ये मोहब्बत है?

या वो रास्ता

जहाँ जिस्म

सिर्फ़ दरवाज़ा रह जाता है

और रूह

अपनी मंज़िल पहचान लेती है?


तुम्हारे होने की ये गर्मी

मुझे जलाती नहीं,

मुझे गढ़ती है—

जैसे कोई अनदेखा हाथ

मेरे वजूद को

नई शक्ल दे रहा हो।


और फिर—

ना दूरी रह जाती है,

ना क़रीबी का एहसास,

बस एक लहर होती है

जो चलती नहीं,

ठहरकर भी

मुझे बहाए लिए जाती है।


मुकेश ,,,,,,,

गर्म साँसों में ठहरी हुई बारिश

 गर्म साँसों में ठहरी हुई बारिश


गर्म साँसों में

ठहरी हुई बारिश

जैसे कोई एहसास

होंठों तक आकर

रुक गया हो।


हवा में नमी है,

पर बादल कहीं नहीं,

बस तेरी क़ुर्बत का असर है

जो फ़िज़ाओं को

भीगा-भीगा सा रखता है।


धूप भी आज

कुछ धीमी-सी लगती है,

जैसे उसे भी

इस ठहराव का एहतराम हो

वो जलती नहीं,

बस हल्के से छूती है।


मेरे और तेरे दरमियान

एक ख़ामोश लम्हा है,

जिसमें ना बारिश गिरती है,

ना साँसें थमती हैं

बस दोनों

एक-दूसरे में

धीरे-धीरे घुलते रहते हैं।


तेरी गर्म साँसों की लय पर

ये ठहरी हुई बारिश

कोई गीत नहीं गाती,

फिर भी लगता है

हर बूँद में

एक अनकहा इकरार है।


कभी लगता है


ये बारिश अगर बरस पड़ी

तो सब कुछ बहा ले जाएगी,

इसलिए वो ठहरी है,

सिर्फ़ तेरी साँसों में

महफ़ूज़ रहकर।


और मैं

इस अधूरी-सी बारिश में

पूरा भीगता रहता हूँ,

बिना किसी बूँद के,

सिर्फ़ तेरी गर्माहट से।


मुकेश ,,,,,,,

धूप का रक़्स और छाँव की सरगोशी

 धूप का रक़्स और छाँव की सरगोशी


धूप आज

सिर्फ़ उतरती नहीं

वो फैलती है

जैसे कोई राज़

धीरे-धीरे खुल रहा हो।


आसमान की पेशानी से

पिघलती हुई रौशनी

धरती के कंधों पर आकर

ठहर-सी जाती है

मानो थककर

किसी अपने से लिपट गई हो।


और धरती...

वो सिर्फ़ नाचती नहीं,

वो सुनती भी है

हर किरण की आहट,

हर ताप की सरगोशी,

हर जलन में छुपी

एक अजीब-सी राहत।


पत्तों के होंठों पर

धूप का स्वाद है,

और हवाएँ—

वो अब भी चलती हैं,

मगर जैसे किसी ख़्वाब में,

धीमी, मदहोश, बेख़बर।


दूर कहीं

एक साया खड़ा है,

जो इस रक़्स को देखता है

ना धूप में शामिल,

ना छाँव में पूरा,

बस एक गवाह

इस अनकही मोहब्बत का।


कभी लगता है

ये गर्मी, ये तपिश, ये चमक

कोई सज़ा नहीं,

बल्कि वो लम्हा है

जहाँ वजूद

अपने ही उजाले में

खुद को पहचानने लगता है।


और तब—

धूप भी मुस्कुरा देती है,

धरती भी ठहर जाती है,

जैसे दोनों ने

एक ही ख़ामोशी में

अपना इकरार कह दिया हो।


मुकेश ,,

Sunday, 29 March 2026

तुम मिलती नहीं…

 तुम मिलती नहीं…

तुम मिलती नहीं
तुम भीतर जागती हो,
जैसे कोई पुरानी प्रार्थना
अचानक स्वर पा लेती है।

तुम बाहर से नहीं आती,
न किसी रास्ते से,
न किसी संयोग से
तुम तो पहले से ही
कहीं गहराई में सोई रहती हो,
और एक क्षण
बस आँख खोल देती हो।

मैं तुम्हें खोजता रहा
दुनिया की भीड़ में,
चेहरों में,
आवाज़ों में
पर तुम वहाँ नहीं थी,
क्योंकि तुम कभी खोई ही नहीं थी।

तुम तो मेरे ही भीतर
एक शांत प्रतीक्षा थी,
जो सही समय पर
स्वयं को प्रकट करती है।

तुम्हारा मिलना
कोई घटना नहीं,
एक स्मरण है
जैसे मैं अचानक याद कर लूँ
कि मैं कौन हूँ।

तुम्हें देखकर
ऐसा नहीं लगता
कि कोई नया रिश्ता बना है,
बल्कि ऐसा लगता है
कि कोई बहुत पुराना बंधन
फिर से साँस लेने लगा है।

तुम मिलती नहीं
क्योंकि मिलना
दो अलग अस्तित्वों का खेल है,
और तुम तो वो एकत्व हो,
जहाँ अलगाव का भ्रम
धीरे-धीरे पिघल जाता है।

तुम भीतर जागती हो
और मैं बाहर से
भीतर की ओर लौटने लगता हूँ,
जैसे कोई नदी
आख़िरकार
अपने स्रोत को पहचान ले।

तुम्हारे जागने से
मैं भी जागता हूँ,
और तब समझ आता है
कि प्रेम
किसी को पाने की प्रक्रिया नहीं,
स्वयं को पहचानने की यात्रा है।

तुम मिलती नहीं
तुम भीतर जागती हो…
और उसी क्षण
मैं भी
अपने भीतर
जन्म लेता हूँ।

— मुकेश

तुम वो ठहराव हो…

 “तुम वो ठहराव हो…”

तुम वो ठहराव हो,
जहाँ हर बेचैनी
विश्राम मांगती है

जैसे लंबी यात्रा के बाद
थका हुआ पथिक
अचानक किसी वृक्ष की छाँव पा ले,
और बिना कुछ सोचे
बस बैठ जाए…

तुम्हारे पास आकर
मन सवाल नहीं करता,
वो धीरे-धीरे
उत्तर बनने लगता है।

जो हलचल भीतर चलती रहती थी,
जो अनकही दौड़
हर क्षण मुझे खींचती थी
तुम्हारी एक झलक से
वो सब थमने लगता है।

तुम कोई मंज़िल नहीं,
न ही कोई रास्ता
तुम वो विराम हो,
जहाँ चलना भी
एक शांति बन जाता है।

तुम्हारी आँखों में
कोई आग्रह नहीं,
कोई पुकार नहीं
फिर भी एक खिंचाव है,
जो हर भटकी हुई धड़कन को
अपने पास बुला लेता है।

मैं तुम्हें पाना नहीं चाहता,
क्योंकि तुम्हारे पास
कुछ पाने की चाह ही
धीरे-धीरे विलीन हो जाती है।

बस यूँ लगता है
कि जो भी अधूरा था,
जो भी टूटा हुआ था,
वो तुम्हारी खामोशी में
खुद ही जुड़ रहा है।

तुम्हारे पास
मैं कुछ करता नहीं,
कुछ बनता नहीं
मैं बस
होने लगता हूँ।

और शायद यही
सबसे गहरा विश्राम है
जहाँ कोई प्रयास नहीं,
कोई पहचान नहीं,
बस एक मौन स्वीकार है…

तुम वो ठहराव हो,
जहाँ हर बेचैनी
आख़िरकार
खुद को छोड़ देती है।

— मुकेश