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Wednesday, 15 April 2026

वो खुश हो जाती है

वो खुश हो जाती है

बस गोलगप्पे खिला देने से,

जैसे स्वाद नहीं,

किसी ने उसे याद किया हो।


McDonald’s का एक छोटा-सा बर्गर,

उसके लिए दावत नहीं

तुम्हारा साथ होता है।


Pizza Hut की एक स्लाइस में भी,

वो ढूंढ लेती है

रिश्ते की गर्माहट।


एक पसंदीदा कपड़ा

बस इतना ही काफी है,

उसे यह यकीन दिलाने के लिए

कि तुमने उसे देखा है।


जब तुम कहते हो

“खाना बहुत अच्छा बना है”,

वो मुस्कुराती नहीं,

भीतर कहीं खिल उठती है।


उसकी नाराज़गी भी अजीब है

बात छोटी होती है,

पर उसमें छुपा होता है

अनदेखा रह जाने का डर।


वो रूठती है

क्योंकि उसे हक़ लगता है,

और मनाने की उम्मीद

प्यार की भाषा होती है।


कभी एक मैसेज ना आए

तो दिल में सवाल उठते हैं,

“याद हूँ भी या नहीं?”


उसकी खुशी बड़ी नहीं होती

बस सच्ची होती है,

इसलिए छोटी-छोटी चीज़ों में

पूरा दिल लगा देती है।


वो गुस्सा भी करती है

और उसी में छुपा होता है,

कि उसे परवाह है

तुम्हारे हर छोटे व्यवहार की।


मुकेश ,,,,,,,,,,

वर्तमान समय में विश्व की बौद्धिक चेतना

  वर्तमान समय में विश्व की बौद्धिक चेतना

(पिछले पच्चीस वर्षों के प्रमुख चिंतकों के आलोक में एक गंभीर विवेचन)

इक्कीसवीं सदी का प्रथम चतुर्थांश मानव इतिहास में एक असाधारण संक्रमणकाल के रूप में दर्ज होगा। तकनीक की तीव्र गति, लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा, जलवायु संकट, पहचान-राजनीति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, महामारी और वैश्विक पूँजी की पुनर्रचना—इन सबने मिलकर विश्व की बौद्धिक चेतना को एक नई दिशा दी है।


पिछले लगभग 25 वर्षों में विश्व-प्रसिद्ध चिंतकों ने जिस प्रकार मानव सभ्यता के भविष्य पर विचार किया है, वह न केवल चेतावनी देता है, बल्कि नए प्रतिमानों की खोज का आग्रह भी करता है। यह निबंध इन्हीं बौद्धिक प्रवृत्तियों का सम्यक् विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

1. वैश्वीकरण से “उत्तर-वैश्वीकरण” तक

बीसवीं सदी के अंतिम दशक में वैश्वीकरण को मानव विकास का स्वाभाविक पथ माना गया। परंतु 21वीं सदी के दूसरे दशक तक आते-आते इसकी सीमाएँ स्पष्ट होने लगीं।

Yuval Noah Harari ने अपनी कृतियों में यह संकेत दिया कि मनुष्य अब जैविक प्राणी से “डेटा-प्राणी” में रूपांतरित हो रहा है। उनके अनुसार भविष्य का संघर्ष विचारधाराओं का नहीं, बल्कि डेटा के नियंत्रण का होगा।

Thomas Piketty ने वैश्विक पूँजीवाद की असमानताओं को उजागर करते हुए दिखाया कि संपत्ति का संकेन्द्रण लोकतंत्र के लिए खतरा है।

इस प्रकार विश्व बौद्धिक चेतना में यह भाव उभरा कि आर्थिक प्रगति पर्याप्त नहीं; न्यायपूर्ण संरचना भी अनिवार्य है।

2. लोकतंत्र, पहचान और असुरक्षा

21वीं सदी में लोकतंत्र की परिभाषा पुनः प्रश्नांकित हुई।

Francis Fukuyama ने “इतिहास के अंत” की अपनी पूर्व धारणा के बाद स्वयं स्वीकार किया कि पहचान-राजनीति (Identity Politics) आधुनिक लोकतंत्रों को चुनौती दे रही है।

Martha Nussbaum ने करुणा और नैतिक शिक्षा को लोकतंत्र की रक्षा का साधन माना।

विश्व चेतना में यह द्वंद्व स्पष्ट है—व्यक्ति की स्वतंत्रता और सामूहिक पहचान के बीच संतुलन कैसे बने?

3. तकनीकी चेतना और कृत्रिम बुद्धिमत्ता

पिछले 25 वर्षों की सबसे निर्णायक शक्ति—प्रौद्योगिकी।

Elon Musk और Nick Bostrom जैसे विचारकों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संभावित अस्तित्वगत जोखिमों पर चेताया।

वहीं दूसरी ओर Ray Kurzweil ने “सिंगुलैरिटी” की संभावना को मानव उत्कर्ष का चरण माना।

यहाँ बौद्धिक चेतना द्विभाजित दिखती है

एक ओर तकनीक मुक्ति का साधन है,

दूसरी ओर वही मानव नियंत्रण से बाहर जा सकती है।

यह बहस आज की वैश्विक विमर्शधारा का केंद्रीय बिंदु है।

4. जलवायु संकट और नैतिक उत्तरदायित्व

21वीं सदी का बौद्धिक विमर्श जलवायु संकट के बिना अधूरा है।

Greta Thunberg ने युवाओं की चेतना को वैश्विक मंच दिया।

Naomi Klein ने पूँजीवाद और जलवायु विनाश के अंतर्संबंध को रेखांकित किया।

यहाँ विश्व चेतना में एक नैतिक आग्रह उभरा—

“प्रगति” यदि पृथ्वी के विनाश पर आधारित है, तो वह प्रगति नहीं, आत्मघात है।

5. उत्तर-मानववाद और अस्तित्व का प्रश्न

वर्तमान बौद्धिक चेतना में “मनुष्य” स्वयं एक प्रश्न बन गया है।

जैव-प्रौद्योगिकी, जीन-संपादन, साइबोर्ग अवधारणाएँ—ये सब संकेत देती हैं कि मानव की परिभाषा स्थिर नहीं है।

Slavoj Žižek ने महामारी और वैश्विक संकटों को पूँजीवादी संरचना के अंतर्विरोध के रूप में देखा।

महामारी (COVID-19) के बाद बौद्धिक जगत में यह प्रश्न गहरा हुआ—

क्या सभ्यता का वर्तमान मॉडल टिकाऊ है?

6. आध्यात्मिकता की पुनरावृत्ति

पिछले दो दशकों में पश्चिम में भी ध्यान, माइंडफुलनेस, योग और पूर्वीय दर्शन की ओर रुझान बढ़ा।

यह प्रवृत्ति केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और अस्तित्वगत संतुलन की खोज है।

आधुनिक चिंतक विज्ञान और अध्यात्म के संवाद की आवश्यकता पर बल दे रहे हैं—जहाँ चेतना, मस्तिष्क और अनुभव का समेकित अध्ययन हो।

7. सूचना-युग और सत्य का संकट

सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने सूचना को लोकतांत्रिक बनाया, परंतु “सत्य” को जटिल भी।

फेक न्यूज़, एल्गोरिदमिक पक्षपात, वैचारिक ध्रुवीकरण—ये सब आधुनिक बौद्धिक चेतना की चिंता हैं।

अब प्रश्न यह है कि

ज्ञान और सूचना में भेद कैसे किया जाए?

बुद्धि और एल्गोरिद्म में संतुलन कैसे बने?

समेकित विश्लेषण

यदि हम पिछले 25 वर्षों की वैश्विक बौद्धिक चेतना को संक्षेप में समझें, तो उसमें निम्न प्रवृत्तियाँ स्पष्ट हैं:

प्रौद्योगिकी-केंद्रित भविष्यदृष्टि

आर्थिक असमानता की तीव्र आलोचना

लोकतंत्र और पहचान का द्वंद्व

जलवायु नैतिकता का उदय

मानव-परिभाषा का पुनर्विचार

अध्यात्म और विज्ञान का संवाद

यह चेतना केवल आलोचनात्मक नहीं, बल्कि संक्रमणशील है—पुराने प्रतिमानों का विघटन और नए प्रतिमानों की खोज।

वर्तमान विश्व की बौद्धिक चेतना एक “संक्रमणकालीन चेतना” है। यह न तो पूर्णतः आधुनिक है, न उत्तर-आधुनिक; न पूर्णतः वैज्ञानिक, न आध्यात्मिक; न केवल वैश्विक, न पूर्णतः स्थानीय।

यह चेतना प्रश्न करती है

मनुष्य क्या है?

प्रगति का अर्थ क्या है?

क्या तकनीक मानव का विस्तार है या प्रतिस्थापन?

क्या पृथ्वी के बिना मानव सभ्यता संभव है?

पिछले पच्चीस वर्षों के चिंतन से यह स्पष्ट है कि विश्व बौद्धिकता अब एक समन्वित दृष्टि की ओर बढ़ रही है—जहाँ विज्ञान, नैतिकता, पर्यावरण और चेतना एक ही विमर्श में समाहित हों।

आज की वैश्विक बौद्धिक चेतना का मूल स्वर यही है:

सत्ता से अधिक उत्तरदायित्व, प्रगति से अधिक संतुलन, और ज्ञान से अधिक प्रज्ञा।

मुकेश श्रीवास्तव। 

आत्मन्तुलन आध्यत्मिक ऊर्जा केंद्र 

बालाजी ग्रीन विला 

विला नंबर 12 

ग्रेटर नॉएडा 


Tuesday, 14 April 2026

ईशावास्योपनिषद्—शंकरभाष्य, जयमंगलवार्तिक सहित” पर महामंडलेश्वर काशिकानन्द गिरि जी महाराज की कृति : एक शोधपूर्ण विवेचन

 ईशावास्योपनिषद्—शंकरभाष्य, जयमंगलवार्तिक सहित” पर महामंडलेश्वर काशिकानन्द गिरि जी महाराज की कृति : एक शोधपूर्ण विवेचन

भारतीय दार्शनिक परम्परा में उपनिषद् ज्ञान के सर्वोच्च शिखर माने जाते हैं। उनमें भी ईशावास्योपनिषद् अत्यन्त संक्षिप्त होते हुए भी गहनतम आध्यात्मिक रहस्यों को उद्घाटित करने वाला ग्रन्थ है। इस उपनिषद् पर आदि शंकराचार्य का भाष्य अद्वैत वेदान्त की आधारशिला है, और उस पर आधारित “जयमंगलवार्तिक” सहित काशिकानन्द गिरि (महामंडलेश्वर) की कृति आधुनिक युग में एक महत्त्वपूर्ण व्याख्यात्मक प्रयास के रूप में सामने आती है। प्रस्तुत निबंध में इस ग्रन्थ की शास्त्रीय, दार्शनिक और व्याख्यात्मक महत्ता का विश्लेषण किया गया है।

1. ईशावास्योपनिषद् का स्वरूप और महत्त्व

ईशावास्योपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद का अंश है और केवल 18 मन्त्रों में सम्पूर्ण वेदान्त का सार प्रस्तुत करता है। इसका प्रारम्भिक मन्त्र—

“ईशावास्यमिदं सर्वं…”

समस्त जगत् को ईश्वरमय मानने का अद्वैत सिद्धान्त प्रतिपादित करता है।

इस उपनिषद् के प्रमुख विषय हैं—

ईश्वर की सर्वव्यापकता

त्याग और भोग का समन्वय

कर्म और ज्ञान का सम्बन्ध

आत्मा और ब्रह्म की अभिन्नता

2. शंकरभाष्य की दार्शनिक भूमिका

आदि शंकराचार्य का भाष्य इस उपनिषद् की अद्वैतपरक व्याख्या करता है। उनके अनुसार—

“ईशावास्यम्” = समस्त जगत् ब्रह्म से आवृत है

त्याग = आसक्ति का परित्याग

भोग = कर्तव्य कर्म का निर्वाह

शंकराचार्य ने स्पष्ट किया कि—

- ज्ञान ही मोक्ष का एकमात्र साधन है

- कर्म केवल चित्तशुद्धि के लिए है

उनका भाष्य उपनिषद् के प्रत्येक मन्त्र को अद्वैत वेदान्त के सिद्धान्तों से जोड़ता है।

3. जयमंगलवार्तिक : परम्परा और उद्देश्य

“जयमंगलवार्तिक” शंकरभाष्य की व्याख्या पर आधारित एक विस्तृत टीका-परम्परा का प्रतिनिधित्व करता है। “वार्तिक” का उद्देश्य केवल भाष्य की पुनरुक्ति नहीं, बल्कि—

शंका-समाधान

तर्क-वितर्क

गूढ़ार्थ का विस्तार

इस वार्तिक में अनेक दार्शनिक आपत्तियों का समाधान करते हुए अद्वैत सिद्धान्त को और अधिक दृढ़ किया गया है।

4. काशिकानन्द गिरि जी की कृति की विशेषताएँ

काशिकानन्द गिरि द्वारा प्रस्तुत यह ग्रन्थ शास्त्रीय परम्परा और आधुनिक दृष्टि का अद्भुत समन्वय है।

(क) त्रिस्तरीय व्याख्या-पद्धति

उनकी कृति में तीन स्तरों पर व्याख्या मिलती है—

मूल मन्त्र

शंकरभाष्य

जयमंगलवार्तिक सहित सरल व्याख्या

यह पद्धति पाठक को क्रमशः गहराई में ले जाती है।

(ख) सरलता और गाम्भीर्य का संगम

उन्होंने कठिन अद्वैत सिद्धान्तों को सहज भाषा में प्रस्तुत किया है, जिससे यह ग्रन्थ—

शोधार्थियों के लिए उपयोगी

सामान्य साधकों के लिए सुबोध

दोनों बन जाता है।

(ग) दार्शनिक समन्वय

काशिकानन्द गिरि जी ने केवल अद्वैत को ही नहीं, बल्कि—

कर्मयोग

भक्ति

ध्यान

इन सबको भी समाहित करते हुए समग्र आध्यात्मिक दृष्टि प्रस्तुत की है।

5. प्रमुख दार्शनिक विषयों का विश्लेषण

(i) ईश्वर और जगत् का सम्बन्ध

ग्रन्थ में यह स्पष्ट किया गया है कि—

- जगत् मिथ्या नहीं, बल्कि व्यवहारिक सत्य है

- परम सत्य केवल ब्रह्म है

यह शंकराचार्य के अद्वैत का ही विस्तार है।

(ii) त्याग और भोग का समन्वय

पहले मन्त्र की व्याख्या में बताया गया है—

त्याग = मानसिक अनासक्ति

भोग = कर्तव्य पालन

अतः संसार का परित्याग नहीं, बल्कि दृष्टिकोण का परिवर्तन आवश्यक है।

(iii) कर्म और ज्ञान का सम्बन्ध

ग्रन्थ में यह प्रश्न उठता है—

- क्या कर्म और ज्ञान साथ-साथ चल सकते हैं?

उत्तर में यह प्रतिपादित किया गया है—

प्रारम्भ में कर्म आवश्यक है

अन्ततः ज्ञान ही मोक्ष देता है

(iv) अविद्या और विद्या

उपनिषद् के प्रसिद्ध मन्त्र—

“विद्यां चाविद्यां च…”

की व्याख्या में कहा गया है—

अविद्या = कर्म, विज्ञान, जगत् का ज्ञान

विद्या = आत्मज्ञान

दोनों का समन्वय जीवन को संतुलित बनाता है।

6. मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक आयाम

काशिकानन्द गिरि जी की व्याख्या में आधुनिक मनोविज्ञान की झलक भी मिलती है—

अहंकार = मानसिक बन्धन

अनासक्ति = मानसिक स्वतंत्रता

आत्मज्ञान = ultimate awareness

इस प्रकार उपनिषद् को केवल दार्शनिक न मानकर, जीवन-प्रबंधन (life management) का ग्रन्थ भी बनाया गया है।

7. समालोचनात्मक मूल्यांकन

(सकारात्मक पक्ष)

शास्त्रीयता और आधुनिकता का संतुलन

जटिल सिद्धान्तों की सरल प्रस्तुति

साधना और दर्शन का समन्वय

(सीमाएँ)

अत्यधिक सरलता कभी-कभी गूढ़ता को कम कर देती है

वार्तिक के कुछ दार्शनिक तर्कों का संक्षेपण हो गया है

फिर भी, यह कृति अपने उद्देश्य में अत्यन्त सफल है।

“ईशावास्योपनिषद्—शंकरभाष्य, जयमंगलवार्तिक सहित” पर काशिकानन्द गिरि की यह कृति भारतीय दर्शन के अध्ययन में एक महत्त्वपूर्ण योगदान है। यह न केवल अद्वैत वेदान्त की गहराई को उद्घाटित करती है, बल्कि उसे आधुनिक जीवन के सन्दर्भ में भी प्रासंगिक बनाती है।

अन्ततः यह ग्रन्थ हमें यह बोध कराता है कि

संसार में रहते हुए भी उससे ऊपर उठा जा सकता है

ज्ञान और कर्म विरोधी नहीं, पूरक हैं

और आत्मा ही परम सत्य है

इस प्रकार यह कृति उपनिषद् की शाश्वत शिक्षाओं को जीवंत और व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करने वाला एक सेतु सिद्ध होती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

“श्रीशक्तिमन्त्र तन्त्रम” पर राधेश्याम चतुर्वेदी की टीका : एक शोधपूर्ण विवेचन

श्रीशक्तिमन्त्र तन्त्रम” पर राधेश्याम चतुर्वेदी की टीका : एक शोधपूर्ण विवेचन

भारतीय तांत्रिक परम्परा में “शक्ति” की उपासना केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं, बल्कि एक गहन दार्शनिक और आध्यात्मिक साधना-पथ है। इस परम्परा के महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों में श्रीशक्तिमन्त्र तन्त्रम विशेष स्थान रखता है, जिस पर विद्वान आचार्य राधेश्याम चतुर्वेदी द्वारा की गई टीका इसे और अधिक सुलभ, तात्त्विक तथा शोधयोग्य बनाती है। प्रस्तुत निबंध में इस ग्रन्थ एवं उसकी टीका का तांत्रिक, दार्शनिक और साधनात्मक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण किया गया है।

1. ग्रन्थ का स्वरूप एवं परम्परा

“श्रीशक्तिमन्त्र तन्त्रम” मूलतः शक्ति-साधना से सम्बद्ध एक तांत्रिक ग्रन्थ है, जिसमें देवी के विविध रूपों, मन्त्रों, यंत्रों तथा साधना-विधियों का विस्तारपूर्वक निरूपण किया गया है। यह ग्रन्थ शाक्त तंत्र परम्परा का प्रतिनिधि है, जिसमें शक्ति को परम सत्ता (Ultimate Reality) के रूप में स्वीकार किया गया है।

तांत्रिक ग्रन्थों की भाँति इसमें भी

मन्त्र (ध्वनि-ऊर्जा)

यंत्र (रूप-ऊर्जा)

तत्त्व (दार्शनिक आधार)

तीनों का समन्वय मिलता है।

2. राधेश्याम चतुर्वेदी की टीका की विशेषता

राधेश्याम चतुर्वेदी की टीका इस ग्रन्थ को केवल अनुष्ठानिक ग्रन्थ न रहने देकर उसे दार्शनिक-व्याख्यात्मक ग्रन्थ का रूप प्रदान करती है। उनकी टीका की प्रमुख विशेषताएँ हैं—

(क) भाषिक सरलता और शास्त्रीयता का संतुलन

उन्होंने कठिन तांत्रिक शब्दावली को सरल भाषा में स्पष्ट किया है, किन्तु शास्त्रीयता से कोई समझौता नहीं किया।

(ख) मन्त्रार्थ का गूढ़ विश्लेषण

प्रत्येक मन्त्र के

बीजाक्षर (seed syllables)

स्वर-विन्यास

ध्वन्यात्मक शक्ति

का सूक्ष्म विवेचन प्रस्तुत किया गया है।

(ग) तांत्रिक साधना का मनोवैज्ञानिक पक्ष

टीका में साधना को केवल बाह्य क्रिया न मानकर, चेतना के रूपांतरण (transformation of consciousness) के रूप में देखा गया है।

3. तांत्रिक दर्शन की अभिव्यक्ति

इस ग्रन्थ में शक्ति को केवल देवी-स्वरूप में नहीं, बल्कि सर्वव्यापक ऊर्जा (cosmic energy) के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

(i) शक्ति = ब्रह्म का गतिशील पक्ष

जहाँ वेदांत ब्रह्म को निर्गुण मानता है, वहीं तंत्र उसे शक्ति के रूप में गतिशील स्वीकार करता है।

(ii) कुण्डलिनी सिद्धान्त

ग्रन्थ में मानव शरीर को एक सूक्ष्म ब्रह्माण्ड माना गया है, जिसमें

मूलाधार से सहस्रार तक

ऊर्जा का आरोहण साधना का लक्ष्य है।

(iii) अद्वैत का तांत्रिक रूप

यहाँ अद्वैत केवल बौद्धिक सिद्धान्त नहीं, बल्कि अनुभवजन्य साधना है—

साधक = साध्य (देवी)

4. मन्त्र और साधना-विधि

“श्रीशक्तिमन्त्र तन्त्रम” में मन्त्रों को केवल जप का साधन नहीं, बल्कि चेतना को परिवर्तित करने वाली शक्ति माना गया है।

मन्त्र की तीन अवस्थाएँ:

वाचिक (उच्चारण)

उपांशु (धीमा)

मानस (मन में)

टीका में बताया गया है कि वास्तविक साधना मानसिक स्तर पर होती है, जहाँ ध्वनि ऊर्जा बन जाती है।

5. यंत्र और प्रतीकवाद

ग्रन्थ में वर्णित यंत्र केवल चित्र नहीं, बल्कि ऊर्जा के ज्यामितीय रूप (geometric energy patterns) हैं।

त्रिकोण = शक्ति

वृत्त = अनन्तता

बिन्दु = परम तत्त्व

चतुर्वेदी जी ने इन प्रतीकों की गहन व्याख्या करते हुए उन्हें ध्यान (meditation) के उपकरण के रूप में प्रस्तुत किया है।

6. साधना का आन्तरिक रूप

टीका का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह बाह्य अनुष्ठानों से आगे बढ़कर साधना के आन्तरिकीकरण (internalization) पर बल देती है—

यज्ञ = आन्तरिक शुद्धि

पूजा = चेतना का केन्द्रित होना

देवी = स्वयं की चेतना का उच्चतम रूप

इस प्रकार तंत्र को रहस्यवाद से निकालकर आत्मानुभूति की प्रक्रिया के रूप में स्थापित किया गया है।

7. आधुनिक सन्दर्भ में प्रासंगिकता

आज के मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विमर्श में इस ग्रन्थ की प्रासंगिकता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है—

(i) मानसिक ऊर्जा का विज्ञान

मन्त्र और ध्यान को आज neuroscience और psychology भी स्वीकार करने लगे हैं।

(ii) स्त्री-शक्ति का दार्शनिक पुनर्पाठ

शक्ति को सर्वोच्च सत्ता मानना आधुनिक स्त्री-विमर्श (feminist philosophy) के लिए भी प्रेरक है।

(iii) आन्तरिक उपचार (Inner Healing)

तांत्रिक साधना को आज “energy healing” के रूप में भी देखा जा रहा है।

8. समालोचनात्मक दृष्टि

यद्यपि यह ग्रन्थ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, किन्तु कुछ आलोचनात्मक बिंदु भी हैं—

तांत्रिक ग्रन्थों की गूढ़ता साधारण पाठक के लिए कठिन है

कुछ अनुष्ठान आधुनिक सामाजिक सन्दर्भ में अप्रासंगिक प्रतीत हो सकते हैं

गुरु-परम्परा के बिना साधना का दुरुपयोग सम्भव है

किन्तु चतुर्वेदी जी की टीका इन सीमाओं को काफी हद तक संतुलित करती है।

"श्रीशक्तिमन्त्र तन्त्रम” पर राधेश्याम चतुर्वेदी की टीका तांत्रिक साहित्य में एक महत्वपूर्ण योगदान है। यह केवल एक व्याख्या नहीं, बल्कि तंत्र को दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि से पुनर्स्थापित करने का प्रयास है।

यह ग्रन्थ हमें बताता है कि

शक्ति बाहर नहीं, भीतर है

मन्त्र शब्द नहीं, चेतना है

साधना क्रिया नहीं, अनुभव है

अतः यह कृति तंत्र को अंधविश्वास से निकालकर ज्ञान, अनुभव और आत्मबोध की दिशा में ले जाने वाली एक सेतु के रूप में स्थापित होती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

सुनो कमला…

 सुनो  कमला…


तुम्हें हमने

कभी नाम से नहीं पुकारा

हमारे लिए तुम हमेशा

“अकेली औरत” ही रहीं।


गली के उस मकान में

जहाँ दरवाज़ा कम

और नज़रें ज़्यादा खुलती हैं

तुम रहती हो।


सुबह

तुलसी में पानी डालती हुई,

शाम

चुपचाप दीया जलाती हुई


जैसे तुम्हारा जीवन

बस इन दो समयों के बीच

अटका हुआ हो।


कहते हैं

तुम्हारी शादी नहीं हुई।


कुछ कहते हैं

हुई थी…

पर निभी नहीं।


कुछ कहते हैं

वह चला गया

या तुम छोड़ दी गईं।


सच क्या है

यह किसी ने जानना नहीं चाहा।


क्योंकि

हमारे लिए

कहानी से ज़्यादा

उसका निष्कर्ष ज़रूरी था


“अकेली है…”


हाँ! कमला…


हमने तुम्हें

हमेशा शक की नज़र से देखा


तुम हँस दो तो

“इशारा”

तुम चुप रहो तो

“घमंड”


तुम किसी से बात कर लो तो

“चरित्र”

और न करो तो

“रहस्य”


तुम्हारे जीवन का हर रंग

हमने

अपनी सुविधा से तय किया।


तुम बाज़ार जाती हो

तो आँखें पीछा करती हैं।


तुम छत पर कपड़े सुखाती हो

तो फुसफुसाहटें उठती हैं।


तुम रात को

थोड़ा देर तक जाग जाओ

तो कहानियाँ बन जाती हैं।


और इन सबके बीच

तुम बस जीती हो

धीरे-धीरे,

बिना शोर के।


कितनी बार

तुमने चाहा होगा

कि कोई तुम्हें

नाम से पुकारे


कोई पूछे

“कमला, तुम कैसी हो?”


पर हमने

तुम्हारी पहचान को

एक शब्द में समेट दिया

“अकेली”


हाँ! कमला…


तुम अधूरी नहीं थीं—

हमारी सोच अधूरी थी।


तुम छूटी नहीं थीं

हमने तुम्हें छोड़ दिया था।


तुम अकेली नहीं थीं

हम सब मिलकर

तुम्हें अकेला करते रहे।


और आज भी

जब तुम दरवाज़े पर बैठी

चुपचाप दुनिया देखती हो—


तो लगता है

तुम हमसे नहीं,

हमारी नज़रों से थक गई हो।


हाँ…


अगर अकेलापन

एक दोष है

तो दोषी तुम नहीं,

हम हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

सुहानी…

 सुहानी…

रात के ढाई बजे

जब शहर सो चुका होता है,

तुम जाग रही होती हो


हेडसेट कानों पर,

आवाज़ में मुस्कान लगाकर—

“हेलो सर…”


और उस “सर” के पीछे

कितनी बार

तुम्हें अपने ही स्वर से

घृणा हुई होगी—

हम कभी नहीं जान पाए।


दिन में

जब धूप दीवारों पर चढ़ती है,

तुम सोती हो


नींद में नहीं,

थकान में डूबी हुई—


और हम कहते हैं—

“देखो, दिन में सोती है…”


जैसे यह भी

कोई अपराध हो।


हाँ,

हमने तुम्हें देखा है—


कैब से उतरते हुए,

रात के सन्नाटे में

धीरे-धीरे चलते हुए


और हमारी आँखों में

सवाल नहीं,

संदेह था।


हमने तुम्हारा नाम नहीं जाना

बस तुम्हारा समय जान लिया

“रात में आती-जाती है…”


और बस

इतना ही काफ़ी था

तुम्हारा चरित्र तय करने के लिए।


तुम्हारी आवाज़

दूसरों की समस्याएँ हल करती रही—


“सर, मैं आपकी मदद कर सकती हूँ…”


पर तुम्हारे हिस्से की

कोई मदद

कभी किसी ने ऑफर नहीं की।


तुम्हारे लिए

रात नौकरी थी

हमारे लिए

रात एक कल्पना।


और हमने

अपनी कल्पनाओं से

तुम्हें बना दिया—

“वैसी लड़की…”


कितनी बार

तुमने हँसकर टाल दिया होगा

किसी ग्राहक की

फूहड़ बात


कितनी बार

अपनी चुप्पी में

अपमान निगला होगा


क्योंकि

कॉल कट करना

नौकरी खोना था।


घर में

माँ पूछती है

“इतनी रात तक काम ठीक है न?”


और तुम कहती हो

“हाँ…”


उस “हाँ” में

कितनी “ना” छिपी थीं

हम कभी नहीं समझ पाए।


हाँ! सुहानी…


तुम्हारी दुनिया

एयर-कंडीशन्ड दफ्तरों में थी,

पर तुम्हारी लड़ाई

गली-मोहल्ले की नजरों से थी।


हमने तुम्हें

आधुनिक कहा

फिर उसी आधुनिकता से

डर गए।


हमने तुम्हें

स्वतंत्र कहा

फिर उसी स्वतंत्रता को

संदेह बना दिया।


और अंत में

बहुत आसानी से कह दिया

“चरित्रहीन…”


जैसे यह शब्द

हमारे सारे अपराध

धो देता हो।


हाँ! सुहानी…


तुम गलत नहीं थीं

गलत हमारे पैमाने थे।


तुम बिखरी नहीं थीं

हमारी सोच बिखरी हुई थी।


तुम रात में काम करती थीं

हम अंधेरे में जी रहे थे।


और आज भी

जब कोई लड़की

रात में काम करती दिखती है


हम बदलते नहीं,

बस नाम बदल देते हैं।


हाँ…

अगर “चरित्र” इतना सस्ता है

तो चरित्रहीन तुम नहीं,

हम हैं।


मुकेश ,,,,,,,

पप्पू नेता…


 पप्पू नेता…

(एक छुटभैया राजनीतिक पार्टी का मामूली कार्य करता )

पप्पू नेता…

चौराहे की उस दीवार पर

आज भी चिपका है तुम्हारा पसीना

पोस्टर के गोंद में मिला हुआ,

सूखकर भी

छूटता नहीं।


तुम्हें पहली बार देखा था

हाथ में ब्रश,

कंधे पर बाल्टी,

और आँखों में

एक अजीब-सी चमक।

तुम नेता नहीं थे

पर “नेता” कहलाना

तुम्हें अच्छा लगता था।


रात-रात भर

तुम दीवारों पर

चेहरे चिपकाते थे

किसी और के।

सुबह होते-होते

पूरा शहर

किसी और का हो जाता था

और तुम

फिर भी अपने ही मोहल्ले में

अजनबी बने रहते थे।


नारे तुम्हारे थे

आवाज़ तुम्हारी थी

पर शब्द

किसी और के।

“ज़िंदाबाद!”

तुम चिल्लाते थे

और जिंदाबाद

किसी और का हो जाता था।


रैलियों में

सबसे आगे दौड़ते हुए

तुम्हें देखा है

लाठी भी पहले

तुम पर ही पड़ी थी,

और फोटो में

नेता जी मुस्कुरा रहे थे।


तुम्हारे घर की दीवार पर

अब भी

एक कैलेंडर टंगा है

जिसमें नेता जी के साथ

तुम्हारी एक धुंधली-सी फोटो है।

तुम हर आने वाले को दिखाते हो

“ये देखो, मैं भी साथ था…”

जैसे वह फोटो

तुम्हारी जिंदगी की

सबसे बड़ी उपलब्धि हो।


हाँ,

हम भी हँसे थे तुम पर

“अरे पप्पू, तुझे क्या मिलेगा?”

और तुम हँसकर कहते थे

“देख लेना, एक दिन…”


वह “एक दिन”

कभी नहीं आया।


चुनाव आए

तुमने पोस्टर लगाए,

झंडे बाँधे,

भीड़ जुटाई

और जीत के बाद

तुम्हारा फोन

कभी नहीं उठा।


तुम दरवाज़े पर खड़े रहे

अंदर कुर्सियाँ भर गई थीं।

तुम्हारे लिए

कोई जगह नहीं बची थी।


पप्पू नेता…

तुम्हें इस्तेमाल किया गया

और तुम

खुश थे इस्तेमाल होकर।

क्योंकि तुम्हें लगता था

यही रास्ता है

“ऊपर” जाने का।


पर असल में

तुम सीढ़ी थे

जिस पर चढ़कर

कोई और ऊपर गया।

और सीढ़ियाँ

कभी ऊपर नहीं जातीं।


आज भी

तुम किसी पोस्टर के पीछे

खड़े हो

चेहरा ढका हुआ,

नाम गायब

पर आवाज़ वही

“ज़िंदाबाद!”


हाँ…

अगर राजनीति

सेवा है

तो सेवक तुम थे।

अगर राजनीति

सत्ता है

तो सत्ता

कभी तुम्हारी नहीं थी।


और सच कहूँ

नेता तुम नहीं थे,

पप्पू…

नेता तो

हम सब हैं

जो तुम्हें देखकर भी

कुछ नहीं बदलते।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

सुहानी के लिए …

 सुहानी के लिए …


सुहानी…

रात के ढाई बजे

जब शहर सो चुका होता है,

तुम जाग रही होती हो

हेडसेट कानों पर,

आवाज़ में मुस्कान लगाकर

“हेलो सर…”

और उस “सर” के पीछे

कितनी बार

तुम्हें अपने ही स्वर से

घृणा हुई होगी

हम कभी नहीं जान पाए।


दिन में

जब धूप दीवारों पर चढ़ती है,

तुम सोती हो

नींद में नहीं,

थकान में डूबी हुई

और हम कहते हैं

“देखो, दिन में सोती है…”

जैसे यह भी

कोई अपराध हो।


हाँ,

हमने तुम्हें देखा है

कैब से उतरते हुए,

रात के सन्नाटे में

धीरे-धीरे चलते हुए

और हमारी आँखों में

सवाल नहीं,

संदेह था।


हमने तुम्हारा नाम नहीं जाना

बस तुम्हारा समय जान लिया

“रात में आती-जाती है…”

और बस

इतना ही काफ़ी था

तुम्हारा चरित्र तय करने के लिए।


तुम्हारी आवाज़

दूसरों की समस्याएँ हल करती रही

“सर, मैं आपकी मदद कर सकती हूँ…”

पर तुम्हारे हिस्से की

कोई मदद

कभी किसी ने ऑफर नहीं की।


तुम्हारे लिए

रात नौकरी थी

हमारे लिए

रात एक कल्पना।

और हमने

अपनी कल्पनाओं से

तुम्हें बना दिया

“वैसी लड़की…”


कितनी बार

तुमने हँसकर टाल दिया होगा

किसी ग्राहक की

फूहड़ बात

कितनी बार

अपनी चुप्पी में

अपमान निगला होगा

क्योंकि

कॉल कट करना

नौकरी खोना था।


घर में

माँ पूछती है

“इतनी रात तक काम ठीक है न?”

और तुम कहती हो

“हाँ…”

उस “हाँ” में

कितनी “ना” छिपी थीं

हम कभी नहीं समझ पाए।


हाँ! सुहानी…

तुम्हारी दुनिया

एयर-कंडीशन्ड दफ्तरों में थी,

पर तुम्हारी लड़ाई

गली-मोहल्ले की नजरों से थी।


हमने तुम्हें

आधुनिक कहा

फिर उसी आधुनिकता से

डर गए।

हमने तुम्हें

स्वतंत्र कहा

फिर उसी स्वतंत्रता को

संदेह बना दिया।


और अंत में

बहुत आसानी से कह दिया

“चरित्रहीन…”

जैसे यह शब्द

हमारे सारे अपराध

धो देता हो।


हाँ! सुहानी…

तुम गलत नहीं थीं

गलत हमारे पैमाने थे।

तुम बिखरी नहीं थीं

हमारी सोच बिखरी हुई थी।

तुम रात में काम करती थीं

हम अंधेरे में जी रहे थे।


और आज भी

जब कोई लड़की

रात में काम करती दिखती है

हम बदलते नहीं,

बस नाम बदल देते हैं।


हाँ…

अगर “चरित्र” इतना सस्ता है

तो चरित्रहीन तुम नहीं,

हम हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

हाँ! शान्ति...

हाँ! शान्ति...

चौराहे पर देखी है उसे

बाल बिखेरे,

हाथ में डंडा,

हँसती हुई

या शायद रोती हुई हँसी में।

पहचान नहीं पाया पहले

बहुत बदल गई थी वह,

या शायद

हमने कभी उसे ठीक से देखा ही नहीं था।


याद है मुझे—

वही शान्ति

जो गली के आख़िरी मोड़ पर

चूने से पुते, टूटते घर में रहती थी।

काली थी,

बदसूरत कही जाती थी,

और गरीब तो जैसे

उसकी त्वचा में ही लिख दिया गया था।

हम उसे नाम से नहीं,

विशेषणों से बुलाते थे

“अरे वही…”

और वह

बस मुस्कुरा देती थी

या शायद

वह मुस्कान नहीं,

आदत थी।


मुहल्ले के हर लौंडे की नजर

उस पर टिकती थी

हँसी में,

सीटी में,

या गंदी फुसफुसाहट में।

कुछ अधपगले थे,

कुछ रसूख वाले,

कुछ सिर्फ बीमार

और कुछ हम जैसे

जो चुप रहते थे।

हाँ,

हम सब शामिल थे।


शान्ति कोई देह नहीं थी

पर हमने उसे

देह बना दिया।

वह कोई इच्छा नहीं थी

पर हमने उसे

भोग की वस्तु बना दिया।

और फिर

धीरे-धीरे

उसके भीतर का मन

घिसता गया…


एक दिन सुना

शादी हो गई उसकी।

एक शराबी,

एक थरकी के साथ

जिसकी नजर

उसके घर पर थी,

उस पर नहीं।

कुछ दिन बाद

घर उसका नहीं रहा

और शान्ति भी

कहीं की नहीं रही।


फिर वह दिखी—

किसी और के साथ।

रखैल…

यह शब्द हमने सीखा

उसी से।

वह मारी गई,

पीटी गई,

घिसी गई

जैसे कोई पुराना बर्तन

जिसे कोई फेंकने से पहले

पूरा इस्तेमाल कर लेना चाहता हो।


फिर एक दिन

वह पागल हो गई।

या शायद

वह पहली बार

सच में होश में आई थी।


अब वह चौराहे पर है

डंडा लेकर,

गालियाँ बकती हुई,

हँसती हुई

उस भयानक हँसी में

पूरा मुहल्ला काँप जाता है।

रात के सन्नाटे में

जब उसकी आवाज गूँजती है

तो लगता है

जैसे हमारी आत्मा पर

कोई खरोंच पड़ रही हो।


पुलिस आती है

उसे पीटती है,

भगा देती है

और फिर

मुहल्ले में

फिर से “शान्ति”

कायम हो जाती है।


हम चैन से सो जाते हैं।


हाँ! शान्ति…

तुम पागल नहीं थीं—

पागल तो हम थे।

तुम गंदी नहीं थीं—

गंदगी हमारी नजरों में थी।

तुम टूटी नहीं थीं—

हमने तुम्हें तोड़ा था।


और आज

जब तुम चौराहे पर खड़ी

हँसती हो—

तो लगता है

तुम हम पर नहीं,

हमारे समाज पर हँस रही हो।


हाँ…

अगर शान्ति “अशान्ति” है

तो शान्ति हम थे।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

वो मेरे बारे में सब कुछ याद रखती है

 वो मेरे बारे में सब कुछ याद रखती है

और मैं उसे ही भूल जाता हूँ।


उसे रहता है 

किस फ़ंक्शन में

मैंने किस रंग की शर्ट पहनी थी,

किस पल

मैंने भीड़ में

किस लड़की को ज़रा ज़्यादा देखा था,

और कब

मैंने यूँ ही

बिना सोचे

उससे क्या कह दिया था।


उसे याद है

मेरे लफ़्ज़,

मेरी आदतें,

मेरी लापरवाहियाँ भी।


और मुझे

मुझे तो यह भी याद नहीं

कि पिछली मुलाक़ात में

वो किस रंग में थी…


वो जानती है

मुझे ठंडी कॉफ़ी पसंद है…”


मुझे याद नहीं आता

कि मैंने कब बताया था,

या बताया भी था

या नहीं।


उसे याद है

मेरी हर छोटी-सी बात,

जैसे मैं

उसकी ज़ेहन की डायरी में

बारीकी से दर्ज हूँ।


और मैं

उसकी किताब का

वही पन्ना हूँ

जिसे पढ़ा तो है,

पर याद नहीं रखा।


कभी-कभी लगता है

वो मुझे

मुझसे ज़्यादा जानती है,

और मैं

उसे जानने की कोशिश में

बस सवालों में उलझा रहता हूँ।


वो मेरी तरफ़ देखती है

एक हल्की मुस्कान के साथ

जैसे उसे पता हो

कि मैं भूल जाऊँगा,

और वो

याद रखेगी।


शायद

औरतें यूँ ही नहीं याद रखतीं

वो उन लम्हों को

महफ़ूज़ करती हैं

जिनमें

कोई और बस यूँ ही

गुज़र जाता है।


और मैं सोचता हूँ

वो मुझे याद रखती है,

जैसे कोई मोहब्बत याद रखी जाती है…

और मैं उसे भूलता हूँ,

जैसे कोई सच

जिसे मानने से डर लगता हो।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

वो बिना पूछे जान लेती है

 वो बिना पूछे जान लेती है

और मैं पूछकर भी नहीं जान पाता।


मैं सवाल करता हूँ

सही शब्दों में,

सही समय पर,

पूरी नीयत के साथ

पर जवाब

मेरे हाथ नहीं आते।


वो कुछ नहीं पूछती

बस देखती है,

ठहरती है,

और समझ लेती है।


मैं अर्थ ढूँढ़ता हूँ

हर बात में,

हर लफ़्ज़ में

वो

लफ़्ज़ों के बिना ही

मायने पा लेती है।


मैं कहता हूँ

“बताओ न…”

वो मुस्कुरा देती है

और उसी में

सब कुछ कह देती है।


कभी-कभी लगता है

मैं सुनता ज़्यादा हूँ,

समझता कम हूँ

और वो

समझती ज़्यादा है,

कहती कम है।


हम दोनों

एक ही जगह खड़े हैं

पर रास्ते अलग हैं।


वो बिना पूछे जान लेती है,

और मैं

पूछकर भी

नहीं जान पाता।


शायद समझ

सवालों से नहीं,

सन्नाटों से आती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

साठ वर्ष की स्त्री का प्रेम

साठ वर्ष की स्त्री का प्रेम


साठ वर्ष की स्त्री का प्रेम

कोई आकस्मिक ज्वाला नहीं होता

वह एक दीर्घ साधना का प्रसाद होता है।


उसके भीतर अब

उत्साह का उफान कम,

और समझ का गहरापन अधिक होता है।

वह प्रेम में “पाना” नहीं खोजती,

बल्कि “होना” जानती है।


उसका प्रेम

अब किसी की आँखों की चमक पर नहीं ठहरता,

वह मन की थकान पहचान लेता है,

बिना कहे हुए शब्दों को सुन लेता है,

और बिना छुए ही सहला देता है।


साठ वर्ष की स्त्री

प्रेम को प्रमाणों में नहीं बाँधती—

न उसे रोज़ के इज़हार की ज़रूरत होती है,

न ही आश्वासनों की।

वह जानती है कि

साथ होना ही सबसे बड़ा कथन है।


उसका प्रेम

धीमी आँच पर पका हुआ वह स्वाद है

जो जल्दी में समझ नहीं आता।

वह प्रतीक्षा कर सकता है,

त्याग कर सकता है,

और सबसे बढ़कर—

स्वीकार कर सकता है।


अब उसमें अधिकार कम,

आश्रय अधिक होता है।

वह प्रेम को बाँधती नहीं,

बस उसके लिए एक खुला आकाश बन जाती है।


साठ वर्ष की स्त्री का प्रेम

शब्दों से कम,

और मौन से अधिक व्यक्त होता है—

जहाँ एक चुप्पी में भी

पूरा जीवन बोलता है।


और शायद यही कारण है कि

उसका प्रेम

युवावस्था की चंचलता से नहीं,

बल्कि एक गहरी शांति से चमकता है

जैसे सांझ का आकाश,

जिसमें दिन की सारी थकान घुलकर

एक सुंदर विराम बन जाती है।


मुकेश ,,,,,,,,,

दिन भर जो नहीं कहा गया

दिन भर

जो नहीं कहा गया

रात उसे लिख देती है।


होंठों तक आकर

लौट गए थे जो लफ़्ज़,

वे काग़ज़ पर

चुपचाप उतर आते हैं।


मौन की तह में

जो दबा रह गया था,

वही स्याही बनकर

बहने लगता है।


कोई शोर नहीं

बस भीतर

एक हल्का-सा विस्फोट,

और एक पंक्ति

जन्म लेती है।


सुबह

सब कुछ सामान्य लगता है,

पर रात

अपना काम कर चुकी होती है।


मुकेश ,,,,,,,,,, 

हर रात शब्दों की सूखी लकड़ियों में

 हर रात

शब्दों की सूखी लकड़ियों में

सुलगता है एक कवि।


दिन भर

वह चुप रहता है

लोगों की बातों में

अपने हिस्से की जगह

खाली छोड़ देता है।


पर रात होते ही

जब सब आवाज़ें

धीरे-धीरे सो जाती हैं

तब वह

अपने भीतर की झाड़ियों से

सूखे शब्द बटोरता है।


वे शब्द

जो दिन में काम नहीं आते,

जो बातचीत में

बेमेल लगते हैं,

जो किसी की समझ में

पूरे नहीं उतरते—

उन्हीं को वह

लकड़ियों की तरह

जमा करता है।


फिर

एक छोटी-सी चिंगारी—

किसी याद की,

किसी अधूरे स्पर्श की,

किसी अनकहे दर्द की—

और आग लग जाती है।


धीरे-धीरे

वे शब्द जलते हैं

और उनके साथ

वह भी—

कोई शोर नहीं होता

कोई लपट नहीं उठती

बस

अंदर ही अंदर

एक लंबी तपिश।


कभी कोई पंक्ति बनती है

तो लगता है—

जैसे राख में

अब भी थोड़ी गर्मी बची है।


कभी कुछ भी नहीं बनता

तो वह

उसी धुएँ में

अपना चेहरा छुपा लेता है।


सुबह होती है

तो लोग कहते हैं—

“कितना शांत है यह आदमी…”

उन्हें क्या मालूम—

रात भर

वह जलता रहा है

अपने ही शब्दों में।


हर रात

शब्दों की सूखी लकड़ियों में

सुलगता है एक कवि—

और हर सुबह

राख से उठकर

फिर सामान्य हो जाता है

जैसे कुछ हुआ ही न हो।


कवि आग नहीं दिखाता,

वह बस

राख में छुपी गर्मी

लोगों तक पहुँचा देता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,

उसे मेरे ख़ामोशियों का मतलब मालूम है

 उसे मेरे ख़ामोशियों का मतलब मालूम है

और मैं उसके शब्दों में उलझा हूँ।


वो जब मेरे सामने बैठती है

तो ज़्यादा बोलती नहीं

बस देखती है,

ठहर-ठहर कर,

जैसे हर लफ़्ज़ से पहले

मेरी चुप्पी को पढ़ लेना चाहती हो।


मैं कुछ कहता हूँ

आधे-अधूरे वाक्य,

बेमेल-सी बातें,

कभी बेवजह हँसी


वो मुस्कुरा देती है,

जैसे कह रही हो

“समझ गई…”


और मैं हैरान होता हूँ

कि मैंने तो कहा ही क्या था?


मेरी ख़ामोशी

उसके लिए

ख़त की तरह है


वो उसे खोलती है,

पढ़ती है,

और बिना जवाब लिखे ही

मुझे जवाब दे देती है।


पर जब वो बोलती है

तो उसके शब्द

सीधे नहीं होते,


उनमें तह होती है,

इशारे होते हैं,

रुकावटें होती हैं


और मैं…

बस उन्हीं में उलझा रह जाता हूँ।


वो कहती है

“कुछ बातें समझी जाती हैं…”


मैं पूछता हूँ

“पर कैसे?”


वो फिर मुस्कुरा देती है

और यही उसका जवाब होता है।


हमारे बीच

एक अजीब-सा रिश्ता है


वो मुझे

मेरे कहे बिना समझ लेती है,

और मैं

उसके कहे हुए में

मतलब ढूँढ़ता रह जाता हूँ।


कभी-कभी

मैं सोचता हूँ

क्या मैं सच में

उसे नहीं समझता?


या

मैं समझना

शब्दों में चाहता हूँ

और वो

महसूस करने में?


वो मेरे पास बैठती है

और कुछ नहीं कहती


पर उस “कुछ नहीं” में

इतनी बातें होती हैं

कि मैं

उनका हिसाब भी नहीं रख पाता।


मैं उससे कहता हूँ

“तुम साफ़-साफ़ क्यों नहीं कहती?”


वो कहती है

“तुम सुनते कहाँ हो…”


और उस एक वाक्य में

जैसे

पूरी दूरी समा जाती है


सुनने और समझने के बीच की दूरी,

शब्द और एहसास के बीच की दूरी।


वो मेरी ख़ामोशियों का

मतलब जानती है


और मैं

उसके शब्दों में

मतलब ढूँढ़ता हूँ।


शायद यही फ़र्क है


वो महसूस करती है,

मैं समझना चाहता हूँ।


और इस बीच

एक ख़ूबसूरत-सी दूरी बनती है

जहाँ हम दोनों

एक-दूसरे के पास भी हैं,

और थोड़े-से दूर भी।


कुछ रिश्ते बोले नहीं जाते,

समझे जाते हैं

और कुछ लोग

समझे नहीं जाते,

बस महसूस किए जाते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

Monday, 13 April 2026

वो—जिसके बारे में मुझे कुछ भी मालूम नहीं

 वो—जिसके बारे में मुझे कुछ भी मालूम नहीं


इतने अरसे बाद भी

मुझे नहीं मालूम

वो किस company का इत्र लगाती है,

किस रंग की lipstick उसे रास आती है,

उसे साड़ियों में क्या पसंद है—

कांजीवरम की शान,

या बनारसी की रवानी,

या शिफॉन की नर्मी,

या लखनवी चिकन की सादगी…

या फिर कोई और

जिसका मुझे इल्म ही नहीं।


मुझे ये भी नहीं मालूम

उसे खाने में क्या भाता है,

कब वो बीमार होती है,

कब उदास,

कब थकी हुई सी

किस बात पर

उसकी आँखें चमक उठती हैं,

और किस लम्हे

वो ख़ामोश होकर

अपने ही भीतर सिमट जाती है।


मुझे ये भी नहीं पता

वो रात को जल्दी सो जाती है

या देर तक जागती है,

दरअसल

मुझे उसके बारे में

कुछ भी नहीं मालूम,

सिवाय इसके कि

वो एक

निहायत प्यारी सी दोस्त है,

और…

मुझे अच्छी लगती है।


पर अजीब बात ये है

उसे मेरे बारे में

बिना पूछे, बिना जाने

सब कुछ मालूम है।


उसे पता है

मैं deo नहीं लगाता,

मुझे थोड़ा बेतरतीब रहना पसंद है,

चमक-दमक वाले कपड़े

मुझ पर जंचते नहीं।


उसे ये भी मालूम है

मुझे रोज़-रोज़ shave करने में

उलझन होती है,

मैं रात देर तक पढ़ता हूँ,

और पढ़ते-पढ़ते

एक-आध cigarette भी सुलगा लेता हूँ।


उसे ये भी पता है

मुझे hot coffee पसंद है,

हालाँकि

मुझे बहुत बाद में मालूम हुआ

कि उसे cold coffee भाती है।


हाँ, ये भी

किसी यूँ ही गुज़रती बात में

पता चला

उसे chocolate से

कुछ ख़ास मोहब्बत है।


उसे मालूम है

मुझे सादी

या चेक वाली शर्ट्स पसंद हैं,

मैं अक्सर

तन्हा टहलने निकल जाता हूँ,

और…

मैं एक हद तक

लापरवाह इंसान हूँ।


मैं हैरान होता हूँ

कैसे उसे

मेरी हर आदत का इल्म है,

और मुझे

उसकी दुनिया का

किनारा भी नसीब नहीं।


शायद…

औरतें ख़याल रखने की

फ़ितरत लेकर पैदा होती हैं

वो पूछती नहीं,

समझ लेती हैं…

वो बताती नहीं,

महसूस कर लेती हैं…


और हम

बस यूँ ही

उनके इस ख़ामोश एहसास में

अपनी पूरी कहानी

छुपाए फिरते हैं।


वो—जिसके बारे में मुझे कुछ भी मालूम नहीं,

शायद वही

मुझे सबसे ज़्यादा समझती है।


मुकेश ,,,,,,,

वो जो मेरी प्रेमिका नहीं (3)

 वो जो मेरी प्रेमिका नहीं

फिर भी

मेरी सबसे लंबी ख़ामोशी में

सबसे साफ़ सुनाई देती है।


वो किसी वादे में नहीं बँधी

न किसी रिश्ते के नाम में

पर मेरे दिनों के बीच

एक पतली-सी नदी की तरह बहती रहती है।


मैं उसे बुलाता नहीं

वो आती नहीं

फिर भी

हम अक्सर मिल लेते हैं

जैसे दो रास्ते

बिना तय किए

एक ही मोड़ पर आ मिलें।


वो मुस्कुराती है

जैसे उसे सब पता हो

पर कुछ भी कहना

ज़रूरी न हो।


मैं उसके साथ होता हूँ

तो कोई बड़ी बात नहीं होती

न इज़हार

न शिकायत

न भविष्य की कोई रेखा


बस एक साथ बैठना होता है

और उस बैठने में

कितनी बातें हो जाती हैं।


वो मेरी प्रेमिका नहीं है

इसलिए

मैं उसके सामने

और भी सच्चा हो जाता हूँ।


न मुझे अच्छा दिखना है

न सही साबित होना है

मैं बस होता हूँ

और वो

मुझे होने देती है।


कभी-कभी

हम दोनों चुप रहते हैं

लंबे समय तक


और वह चुप्पी

अजीब तरह से

हम दोनों को जोड़ती रहती है।


मैंने कई बार सोचा

उसे एक नाम दे दूँ

इस रिश्ते को

एक दिशा दे दूँ


पर हर बार लगा

नाम देने से

यह छोटा हो जाएगा।


वो मेरी ज़िंदगी का

कोई अध्याय नहीं है

जिसे मैं शुरू या ख़त्म कर सकूँ


वो एक बीच की जगह है

जहाँ मैं

कभी-कभी ठहर जाता हूँ।


जब मैं थक जाता हूँ

दुनिया के शोर से

तो याद आता है


कि कहीं एक जगह है

जहाँ मुझे

कुछ कहने की ज़रूरत नहीं।


वो जो मेरी प्रेमिका नहीं

फिर भी

मेरे भीतर

एक शांत-सी उपस्थिति है।


और शायद

यही उसका होना है


न मेरे पास

न मुझसे दूर


बस

मेरे साथ।


कुछ रिश्ते प्रेम नहीं कहलाते,

पर प्रेम से कम भी नहीं होते

वे बस

शब्दों के बाहर

जीते रहते हैं।


मुकेश ,,,,,,,

साठ वर्ष की स्त्री में भावनात्मक जड़ता:

 साठ वर्ष की स्त्री में भावनात्मक जड़ता: कारण, स्वरूप और उससे बाहर निकलने के उपाय”

साठ वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते स्त्री का जीवन कई भूमिकाओं—माँ, पत्नी, गृहिणी, कर्मशील व्यक्तित्व—के निर्वहन से निर्मित होता है। इन भूमिकाओं के धीरे-धीरे कम होने या समाप्त होने पर एक विशेष प्रकार की भावनात्मक जड़ता (emotional stagnation) विकसित हो सकती है। यह जड़ता बाहरी शांति के रूप में दिखती है, पर भीतर एक सूक्ष्म खालीपन और अर्थहीनता का अनुभव उपस्थित रहता है।

१. जड़ता का मनोवैज्ञानिक स्वरूप

दिनचर्या का यांत्रिक होना: जीवन अत्यधिक नियमित और पूर्वानुमेय हो जाता है, जिसमें नवीनता का अभाव रहता है।

भावनात्मक प्रतिक्रिया का क्षीण होना: न अत्यधिक प्रसन्नता, न गहरा दुःख—एक प्रकार की भावनात्मक सपाटता।

अर्थहीनता का अनुभव (loss of meaning): “अब क्या?” जैसा प्रश्न बार-बार उभरता है।

आंतरिक शून्यता (inner void): बाहरी व्यवस्था के बावजूद भीतर रिक्तता का अनुभव।


२. जड़ता के प्रमुख कारण

(i) भूमिकाओं का समाप्त होना (Role Exit)

बच्चों का स्वतंत्र हो जाना, पारिवारिक दायित्वों का कम होना

सामाजिक उपयोगिता की भावना में कमी


(ii) दीर्घकालिक भावनात्मक दमन (Chronic Suppression)

वर्षों तक अपनी इच्छाओं, पीड़ा और असंतोष को दबाना

परिणामस्वरूप भावनाओं की अभिव्यक्ति की क्षमता का क्षीण होना

(iii) पहचान का संकट (Identity Crisis)

“मैं कौन हूँ?”—यह प्रश्न तीव्र हो जाता है

स्वयं की पहचान केवल भूमिकाओं से जुड़ी होने के कारण शून्यता

(iv) सामाजिक अलगाव (Social Withdrawal)

सक्रिय सामाजिक जीवन का सीमित हो जाना

संवाद और संबंधों में कमी


३. जड़ता के मनोवैज्ञानिक प्रभाव

Emotional Numbness (भावनात्मक सुन्नता): अनुभव करने की क्षमता का कम हो जाना

Low Motivation (प्रेरणा का अभाव): किसी नए कार्य के प्रति उत्साह की कमी

Mild Existential Anxiety (अस्तित्वगत चिंता): जीवन के अर्थ को लेकर अस्पष्ट चिंता

Cognitive Rigidity (मानसिक जड़ता): नई परिस्थितियों को स्वीकारने में कठिनाई


४. जड़ता से बाहर निकलने के मनोवैज्ञानिक उपाय

(i) इच्छा का पुनर्जागरण (Reactivation of Desire)


प्रतिदिन स्वयं से पूछना—“मैं क्या चाहती हूँ?”

छोटे-छोटे व्यक्तिगत निर्णय लेना

suppressed इच्छाओं को पहचानना


(ii) भावनात्मक अभिव्यक्ति (Emotional Expression)

डायरी लेखन (journaling)

विश्वसनीय व्यक्ति से संवाद

रोने, हँसने जैसी स्वाभाविक अभिव्यक्तियों को स्वीकारना


(iii) नई भूमिका का निर्माण (New Role Formation)

सामाजिक, शैक्षिक या रचनात्मक कार्यों में संलग्न होना

नई पहचान विकसित करना—जैसे मार्गदर्शक, शिक्षिका, सृजनकर्ता


(iv) Behavioral Activation (व्यवहारिक सक्रियता)

नियमित रूप से नई गतिविधियाँ अपनाना

छोटे बदलाव—नई जगह जाना, नया कौशल सीखना


५. आध्यात्मिक उपाय

(i) स्वीकार (Acceptance)

अतीत को बिना पछतावे के स्वीकार करना

जीवन की घटनाओं को समग्र दृष्टि से देखना


(ii) साक्षी भाव (Witness Consciousness)

विचारों और भावनाओं को “देखना”, उनसे जुड़ना नहीं

ध्यान (meditation) के माध्यम से आत्म-दृष्टि विकसित करना


(iii) “होने” का अभ्यास (Being Mode)

केवल वर्तमान में रहना, बिना किसी लक्ष्य या परिणाम के

प्रकृति, संगीत, मौन का अनुभव


६. संबंधों का पुनर्संरचना (Relational Re-engagement)

पुराने संबंधों को पुनर्जीवित करना

नए सामाजिक जुड़ाव बनाना

अनुभवों और भावनाओं को साझा करना


७. जड़ता से रूपांतरण तक

जड़ता को केवल एक समस्या के रूप में नहीं, बल्कि एक संक्रमण अवस्था (transition phase) के रूप में समझना आवश्यक है। यह वह चरण है जहाँ पुरानी पहचान समाप्त होती है और नई पहचान का निर्माण संभव होता है।

यदि इस अवस्था को जागरूकता, स्वीकार और सक्रिय प्रयासों के साथ जिया जाए, तो यही जड़ता एक गहरे आंतरिक रूपांतरण (inner transformation) का माध्यम बन सकती है।


साठ वर्ष की स्त्री के जीवन में भावनात्मक जड़ता एक सामान्य, किंतु गहन मनोवैज्ञानिक अवस्था है। इसका समाधान बाहरी परिवर्तन से अधिक, भीतरी पुनर्संरचना में निहित है।

इच्छाओं का पुनर्जागरण, भावनात्मक प्रवाह की पुनर्स्थापना, नई पहचान का निर्माण और आध्यात्मिक जागरूकता—ये सभी मिलकर उस स्त्री को केवल जड़ता से बाहर नहीं लाते, बल्कि उसे एक अधिक परिपक्व, स्वतंत्र और सचेत अस्तित्व की ओर ले जाते हैं।


मुकेश ,,,,,,,

साठ वर्ष की स्त्री

 “उसकी दिनचर्या में अब कोई शोर नहीं—बस एक धीमा-सा खालीपन है”

(वृद्धावस्था, दिनचर्या और भावनात्मक जड़ता का मनोविज्ञान)

साठ वर्ष की स्त्री

जीवन के उस पड़ाव पर खड़ी होती है जहाँ बाहरी संघर्ष लगभग समाप्त हो चुके होते हैं,

पर भीतर एक नया, सूक्ष्म संघर्ष जन्म लेता है

अर्थ (meaning) का संघर्ष।


उसकी दिनचर्या अब परिपक्व है

वर्षों की साधना से निर्मित एक सटीक संरचना

सुबह की चाय, अख़बार, रसोई, थोड़ी-बहुत बातचीत, और फिर एक लंबा, शांत दिन।

यह दिनचर्या देखने में संतुलित लगती है,

पर मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह अक्सर escape mechanism (पलायन का साधन) बन जाती है।


1. Routine as Escape (दिनचर्या एक शरणस्थली)


जब जीवन में सक्रिय भूमिकाएँ कम हो जाती हैं

माँ की भूमिका, पत्नी की केंद्रीयता, सामाजिक उपयोगिता

तब व्यक्ति एक void (रिक्तता) का अनुभव करता है।


इस रिक्तता से बचने के लिए मन

एक predictable structure (पूर्वानुमेय ढाँचा) बना लेता है

जिसे हम दिनचर्या कहते हैं।


यह दिनचर्या उसे यह अहसास देती है कि

“मैं अब भी नियंत्रण में हूँ”

जबकि भीतर एक अनकहा सत्य होता है

“मेरे पास अब करने को कुछ नया नहीं बचा।”


2. Silence that is not Peace (मौन जो शांति नहीं है)


उसका मौन अक्सर बाहर से देखने पर “शांत” लगता है

पर यह शांति नहीं, बल्कि emotional exhaustion (भावनात्मक थकान) का परिणाम है।


सालों तक

भावनाओं को दबाना,

समझौते करना,

अपनी इच्छाओं को टालना

इन सबका संचय अंततः एक ऐसी अवस्था लाता है

जहाँ मन प्रतिक्रिया देना बंद कर देता है।


यह वही अवस्था है जहाँ—

आँसू सूख जाते हैं, पर दर्द समाप्त नहीं होता।


3. Emotional Numbness (भावनात्मक सुन्नता)


साठ वर्ष की स्त्री अक्सर एक ऐसे बिंदु पर पहुँचती है

जहाँ वह न बहुत खुश होती है, न बहुत दुखी

बल्कि एक flat emotional line (सपाट भावनात्मक रेखा) पर जीती है।


यह सुन्नता (numbness)

किसी शांति का संकेत नहीं,

बल्कि एक प्रकार की defense mechanism है—

जिसमें मन खुद को और चोट से बचाने के लिए

अनुभव करना ही कम कर देता है।


4. Identity Crisis in Late Life (अंतिम जीवन में पहचान का संकट)


जब बच्चों की ज़िम्मेदारियाँ समाप्त हो जाती हैं

और जीवनसाथी के साथ संबंध एक habitual companionship में बदल जाता है,

तब एक गहरा प्रश्न उभरता है—


“मैं कौन हूँ—इन भूमिकाओं के बिना?”


यदि इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता,

तो व्यक्ति धीरे-धीरे एक functional existence (केवल क्रियात्मक जीवन) जीने लगता है—

जहाँ वह काम तो करता है,

पर उसमें स्वयं का अनुभव नहीं करता।


5. The Beauty of Stillness vs. The Trap of Stagnation


(ठहराव का सौंदर्य बनाम जड़ता का जाल)


वृद्धावस्था में ठहराव स्वाभाविक है—

और उसमें एक सौंदर्य भी है—

धीमी गति, कम अपेक्षाएँ, गहरी दृष्टि।


पर यही ठहराव जब

growth (विकास) और emotional flow (भावनात्मक प्रवाह) को रोक देता है,

तो वह stagnation (जड़ता) बन जाता है।


उसकी दिनचर्या तब

एक सुंदर अनुशासन नहीं,

बल्कि एक invisible cage (अदृश्य पिंजरा) बन जाती है।


उसकी दिनचर्या का यह शोरहीन संसार

दरअसल एक गहरी मनोवैज्ञानिक कहानी कहता है


यह कहानी है—

कर्तव्यों से भरे जीवन के बाद,

अर्थ की खोज में भटकते मन की।


यह खालीपन कोई शून्यता नहीं,

बल्कि एक unexpressed जीवन (अभिव्यक्त न हो पाया जीवन) है

जो अब भी भीतर कहीं

धीमे-धीमे साँस ले रहा है।


मुकेश ,,,,,,,,,

उसकी दिनचर्या में अब कोई शोर नहीं

 उसकी दिनचर्या में अब कोई शोर नहीं—बस एक धीमा-सा खालीपन है”


सुबह वह उठती है—जैसे नींद ने नहीं, आदत ने जगाया हो।

चाय का पानी चढ़ता है, अख़बार दरवाज़े पर गिरता है, और घड़ी की टिक-टिक पूरे घर में फैल जाती है।

सब कुछ वैसा ही है—सालों से—बस अब उन ध्वनियों के बीच कोई पुकार नहीं बची।


साठ साल की उम्र में उसकी दिनचर्या एक सुव्यवस्थित वृत्त बन चुकी है—

जहाँ हर काम अपने समय पर होता है,

पर किसी भी काम का इंतज़ार नहीं होता।


वह रसोई में जाती है,

जैसे कोई कर्म निभा रही हो

न कि किसी के लिए कुछ बना रही हो।

पहले चूल्हे की आंच में रिश्तों की गर्मी होती थी,

अब गैस की लौ बस खाना पका देती है—दिल नहीं।


घर सजा हुआ है

साफ़, शांत, व्यवस्थित

पर इस व्यवस्था में एक अजीब-सी जड़ता है।

जैसे हर चीज़ अपनी जगह पर है,

और जीवन कहीं नहीं।


कभी-कभी वह खिड़की के पास बैठती है

बाहर की दुनिया को देखती हुई

पर भीतर कोई लहर नहीं उठती।

न उत्सुकता, न बेचैनी

बस एक गहरा, स्थिर खालीपन।


उसका मौन अब शांति नहीं है—

यह वह सन्नाटा है

जो बहुत कुछ सह लेने के बाद आता है।


दिन बीतते हैं

बिना किसी घटना के, बिना किसी हलचल के

और वह जीती रहती है,

जैसे जीवन अब अनुभव नहीं,

केवल एक नियमित प्रक्रिया हो।


उसकी दिनचर्या सच में शोरहीन है

पर यह शांति नहीं,

बल्कि एक ऐसा ठहराव है

जहाँ भावनाएँ धीरे-धीरे जमकर

पत्थर बन गई हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

न तुम्हें खो सकता हूँ, न पा सकता हूँ

 न तुम्हें खो सकता हूँ,

न पा सकता हूँ

तुम एक बीच का प्रदेश हो।


न कोई सीमा स्पष्ट

न कोई नक़्शा तय

तुम्हारी ओर बढ़ता हूँ

तो लगता है

जैसे कदम किसी ऐसी ज़मीन पर पड़ रहे हों

जो पूरी मेरी भी नहीं,

पूरी परायी भी नहीं।


तुम्हारे पास आता हूँ

तो न दूरी रहती है

न निकटता पूरी होती है


बस एक हल्की-सी रेखा

हमारे बीच खिंची रहती है

जिसे हम दोनों

देखते भी हैं

और अनदेखा भी करते हैं।


मैं तुम्हें पुकार सकता हूँ

पर नाम से आगे नहीं बढ़ पाता

तुम मुझे सुन सकती हो

पर उत्तर में

एक ठहराव रखती हो।


हमारे बीच

कोई वादा नहीं

कोई अधिकार नहीं

फिर भी

एक अजीब-सा संबंध है

जो न स्वीकार किया गया है

न अस्वीकार।


कभी लगता है

बस एक कदम और

और तुम मेरी हो जाओगी


फिर तुरंत

एक और एहसास

कि यह “मेरी” होने की संभावना

यहीं तक सीमित है।


तुम्हारे साथ बैठता हूँ

तो समय ठहरता नहीं

बस धीमा हो जाता है


जैसे वह भी समझता हो

कि यहाँ कोई जल्दबाज़ी नहीं है

क्योंकि यहाँ

कहीं पहुँचना नहीं है।


तुम मुस्कुराती हो

मैं मुस्कुरा देता हूँ

हम दोनों जानते हैं

यह मुस्कान

पूरी नहीं है


पर अधूरी भी

अजीब तरह से संतोष देती है।


मैंने कई बार सोचा

तुम्हें छोड़ दूँ

इस “बीच” से बाहर निकल जाऊँ


पर हर बार

वहीं लौट आता हूँ


क्योंकि यह अधूरापन

किसी पूरी चीज़ से

ज़्यादा सच्चा लगता है।


तुम्हें पाना

शायद आसान होता

तुम्हें खोना

शायद संभव होता


पर यह जो “बीच” है

यही सबसे कठिन है

और सबसे गहरा भी।


यहाँ

न कोई अंत है

न कोई आरंभ


बस एक लंबा-सा विस्तार है

जहाँ हम दोनों

चलते रहते हैं

साथ-साथ

पर बिना छुए।


मैं तुम्हें देखता हूँ

और सोचता हूँ


तुम मेरी होती

तो शायद

इतनी रहस्यमयी न होती


तुम चली जाती

तो शायद

इतनी गहरी न रह जाती।


तुम्हारा होना

और न होना

दोनों साथ हैं


और मैं

इन्हीं दोनों के बीच

तुम्हारे साथ हूँ।


न तुम्हें खो सकता हूँ

न पा सकता हूँ


क्योंकि तुम कोई व्यक्ति नहीं,

एक अवस्था हो

एक प्रदेश हो

जहाँ पहुँचकर

लौटना भी संभव नहीं

और ठहरना भी पूरा नहीं।


कुछ रिश्ते मंज़िल नहीं होते,

वे रास्ते होते हैं

जिन्हें छोड़ा भी नहीं जा सकता

और पूरा चला भी नहीं जा सकता।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

वो मुस्कुराती है जैसे कोई दर्द

 वो मुस्कुराती है

जैसे कोई दर्द

शालीनता से रहना सीख गया हो।


पहली बार जब देखा था उसे

तो लगा

यह मुस्कान सहज है, सरल है


पर धीरे-धीरे समझ आया

यह सहज नहीं,

साधी हुई है।


उसकी हँसी

तेज़ नहीं होती

फूटती नहीं

बस हल्के से

होठों पर टिक जाती है


जैसे भीतर कुछ है

जो बहना चाहता था

पर उसने उसे

ठहरना सिखा दिया।


वो बात करती है

पूरी सजगता के साथ

शब्द नाप-तौल कर चुनती है


कभी कुछ कहकर

रुक जाती है

जैसे खुद ही

अपने वाक्य को

थाम लेती हो।


उसकी आँखों में

कोई शोर नहीं है

कोई उतावलापन नहीं


पर एक गहराई है

जैसे बहुत कुछ

देख लिया हो उसने

और अब

कुछ भी चकित नहीं करता।


वो सुनती है

ध्यान से

धैर्य से


जैसे हर व्यक्ति की बात में

वो केवल शब्द नहीं

उनके पीछे छिपे

भाव भी सुन लेती हो।


मैंने एक दिन पूछा

“तुम इतना शांत कैसे रहती हो?”


वो मुस्कुराई

वही मुस्कान

और बोली

“आदत हो गई है…”


उस “आदत” में

इतने वर्ष छिपे थे

इतनी कहानियाँ

इतनी बार

खुद को समझाना


कि अब

कुछ भी अचानक नहीं होता उसके भीतर।


वो रोती नहीं

कम-से-कम

दिखती नहीं रोती हुई


शायद रो चुकी है

इतना कि

अब आँसू भी

संयम सीख गए हैं।


उसके जीवन में

कोई नाटक नहीं है

कोई उथल-पुथल नहीं


सब कुछ

संतुलित

व्यवस्थित

और थोड़ा-सा…

चुप।


मैं उसे देखता हूँ


वो जो अपनी भावनाओं को

दबा नहीं रही

बल्कि उन्हें

धीरे-धीरे

परिष्कृत कर चुकी है।


उसका दुख

अब दर्द नहीं रहा

वो एक स्वभाव बन गया है


जैसे कोई पुराना घाव

जो अब चुभता नहीं

पर मौजूद रहता है।


वो मुस्कुराती है

हर बार

उसी शालीनता के साथ


और हर बार

मुझे लगता है


यह मुस्कान

खुशी की नहीं

समझ की है।


समझ

कि जीवन वैसा नहीं होगा

जैसा सोचा था

और फिर भी

उसे वैसे ही जीना है।


मैं उसके सामने बैठता हूँ

और सोचता हूँ


कितनी अजीब बात है

कि एक व्यक्ति

इतना संतुलित हो सकता है

और फिर भी

इतना अकेला।


वो मेरी ओर देखती है

हल्का-सा मुस्कुराती है


और उस एक मुस्कान में

पूरा जीवन समा जाता है


बिना शिकायत

बिना प्रश्न

बिना शोर।


वो मुस्कुराती है

जैसे कोई दर्द

अब उसके भीतर

घर कर चुका हो

और दोनों ने

एक-दूसरे के साथ

रहना सीख लिया हो।


कुछ दर्द चीखते नहीं,

वे धीरे-धीरे

व्यवहार बन जाते हैं

और फिर

मुस्कान की तरह

चेहरे पर टिक जाते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

जैसे दो चुप्पियाँ

 हम मिलते हैं

जैसे दो चुप्पियाँ

एक-दूसरे को सुनने आई हों।


न कोई तय समय

न कोई औपचारिक कारण

फिर भी

किसी अदृश्य लय में

हम मिल ही जाते हैं।


तुम सामने बैठी होती हो

मैं तुम्हारे सामने

बीच में

एक मेज़

और उससे भी अधिक

एक गहरा मौन।


“कुछ लोग चुप क्यों रहते हैं?”

तुम कभी-कभी पूछती हो


मैं मुस्कुरा देता हूँ

“शायद इसलिए कि

वे बहुत कुछ कहना चाहते हैं…”


तुम भी मुस्कुरा देती हो

और फिर

हम दोनों चुप।


यह चुप्पी

कभी भारी नहीं होती

न ही असहज


यह वैसी चुप्पी है

जिसमें शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती

क्योंकि जो कहना है

वह पहले से ही समझा जा चुका होता है।


तुम अपनी उँगलियों से

कप के किनारे को छूती रहती हो

मैं तुम्हें देखता रहता हूँ


कोई जल्दी नहीं होती

कोई लक्ष्य नहीं होता


बस एक साथ होना होता है

बिना किसी शर्त के।


तुम कुछ कहती हो

बीच में रुक जाती हो


मैं पूछता नहीं

क्योंकि जानता हूँ

हर बात पूरी होना ज़रूरी नहीं होती।


हमारे बीच

न वादे हैं

न अधिकार

न भविष्य की कोई रूपरेखा


फिर भी

एक अजीब-सी निकटता है

जो बिना नाम के

धीरे-धीरे गहराती रहती है।


कभी-कभी

मैं सोचता हूँ

क्या यह भी प्रेम है?


पर फिर

इस प्रश्न को छोड़ देता हूँ


क्योंकि

हर चीज़ को नाम देना

उसे सीमित कर देता है।


हम उठते हैं

चलने के लिए


तुम कहती हो

“चलो…”


मैं कहता हूँ

“हाँ…”


और इस “हाँ” में

थोड़ा-सा रुकना होता है

जो दोनों महसूस करते हैं

पर कहते नहीं।


तुम अपनी दिशा में

मैं अपनी दिशा में


पर वह मौन

जो हमारे बीच था

वह वहीं नहीं रहता

वह साथ चला आता है

हमारे भीतर।


हम मिलते हैं

कम ही सही

पर हर बार ऐसा लगता है


जैसे दो चुप्पियाँ

फिर से

एक-दूसरे को सुनने आई हों।


कुछ रिश्ते बोले नहीं जाते,

वे बस सुने जाते हैं

मौन में,

धीरे-धीरे,

गहराई से।


मुकेश ,,,,,,,,

वो जो मेरी प्रेमिका नहीं है (दो )

 वो जो मेरी प्रेमिका नहीं है

आज फिर याद आई

बिना किसी कारण के।


सुबह की चाय के साथ

अख़बार खोला था मैंने

पर अक्षरों के बीच

उसका चेहरा उतर आया


जैसे किसी ख़बर से नहीं

किसी ख़ाली जगह से निकली हो।


वो मेरी दिनचर्या का हिस्सा नहीं है

फिर भी

हर दिन में कहीं-न-कहीं

उसका एक कोना बना रहता है।


वो संदेश नहीं भेजती

न ही प्रतीक्षा करती है

पर जब भी

फ़ोन हाथ में लेता हूँ मैं

एक क्षण के लिए

उसका नाम याद आता है।


वो मेरी प्रेमिका नहीं है

इसलिए

हमारे बीच कोई वादा नहीं

कोई हिसाब नहीं

कोई शिकायत नहीं।


पर अजीब है

इन्हीं सब के न होने में

एक अजीब-सी उपस्थिति है

जो हर चीज़ के बीच

धीरे-धीरे बनी रहती है।


मैं जब थक जाता हूँ

दिन भर की भागदौड़ से

तो सोचता हूँ

अगर अभी उसके पास होता

तो कुछ नहीं करता

बस बैठा रहता।


वो भी शायद

कुछ नहीं कहती

बस अपनी उसी

गंभीर मुस्कान के साथ

पास बैठी रहती।


हम दोनों के बीच

कोई बड़ी बात नहीं होती

कोई गहरा संवाद नहीं


पर एक सन्नाटा होता

जो हमें

एक-दूसरे से जोड़ देता।


कभी-कभी सोचता हूँ

अगर वो मेरी प्रेमिका होती

तो क्या यह सब

इतना सहज रहता?


शायद नहीं।


शायद तब

हम भी बाकी लोगों की तरह

शब्दों में उलझ जाते

उम्मीदों में बँध जाते।


अभी

हमारे बीच कुछ भी तय नहीं है

और शायद यही

सबसे सच्चा है।


वो मेरे जीवन की

कोई कहानी नहीं है

जिसे मैं पूरा लिख सकूँ


वो एक एहसास है

जो आता है

और बिना शोर किए

ठहर जाता है।


शाम को

जब सूरज ढलता है

और रोशनी हल्की हो जाती है

तब उसका ख्याल

और साफ़ दिखता है


जैसे धूप कम होते ही

कुछ चीज़ें

और स्पष्ट हो जाती हैं।


वो जो मेरी प्रेमिका नहीं है

उसे खोने का डर नहीं

उसे पाने की चाह नहीं


फिर भी

वो कहीं गहराई में

बसी हुई है।


और मैं सोचता हूँ


कुछ रिश्ते

नाम नहीं माँगते,

बस एक जगह माँगते हैं

जहाँ वे चुपचाप

जीते रह सकें।


मुकेश ,,,,,,,

वो जो मेरी प्रेमिका नहीं है

वो जो मेरी प्रेमिका नहीं है
आज उसी के घर गया था मैं।
शाम उतर रही थी धीरे-धीरे
और उसके घर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए
मुझे लगा
जैसे किसी जीवन में नहीं,
किसी ठहरे हुए समय में प्रवेश कर रहा हूँ।
घंटी बजाई—
दरवाज़ा खुला
और वह सामने थी
वही शालीनता
वही सधी हुई सादगी
और वही मुस्कान—
जो हँसी कम,
एक स्थायी भाव अधिक लगती है।
“आओ…”
उसने कहा—
जैसे कहने की ज़रूरत न हो
फिर भी कहा जाना चाहिए।
घर में कदम रखा तो
सब कुछ व्यवस्थित था
किताबें सीधी पंक्तियों में
कुर्सियाँ संतुलित
परदे आधे खुले
जैसे रोशनी भी
पूरी तरह भीतर आने से हिचकती हो।
यह घर बिखरा नहीं था
पर जिया हुआ भी नहीं था पूरी तरह।
हर चीज़ अपनी जगह पर थी
पर “अपनापन”
जैसे कहीं और रह गया हो।
वो चाय बनाने चली गई
और मैं बैठा रहा
उस सन्नाटे के बीच—
जो शोर नहीं करता
पर सुनाई देता है।
उसकी मेज़ पर रखी थीं कुछ किताबें
एक अधखुली डायरी
और एक पेन
जैसे शब्द यहाँ आते तो हैं
पर ठहरते नहीं।
वो लौटी
चाय के साथ
और अपनी उसी गंभीर मुस्कान के साथ
उसकी उम्र
उसके कपड़ों में नहीं
उसकी आँखों में थी
जहाँ अनुभव ने
भावनाओं को
धीरे-धीरे स्थिर कर दिया था।
“कैसे हो?”
उसने पूछा
“ठीक…”
मैंने कहा
और हम दोनों जानते थे
यह “ठीक”
एक उत्तर नहीं,
एक आदत है।
हमने बातें कीं
धीरे-धीरे
संयमित शब्दों में
कभी-कभी
वह चुप हो जाती
और मैं भी
जैसे दो लोग
बात नहीं,
एक ही मौन साझा कर रहे हों।
मैं उसे देखता रहा
वो जो मेरी प्रेमिका नहीं है
पर उसके सामने
मैं वैसा ही हो जाता हूँ
जैसा प्रेम में हुआ जाता है।
उसकी मुस्कान में
कोई आग्रह नहीं
कोई शिकायत नहीं
बस एक स्वीकृति है
जैसे उसने जीवन को
जैसा है
वैसा ही मान लिया हो।
मैं पूछना चाहता था
“तुम अकेली क्यों हो?”
पर पूछा नहीं
क्योंकि उसके घर की दीवारों ने
पहले ही कह दिया था
कि अकेलापन यहाँ समस्या नहीं,
एक व्यवस्था है।
शाम रात में बदल गई
लाइट जली
और उसके चेहरे पर
वही स्थिर उजाला आ गया
पर भीतर का जो अंधेरा था
वह वैसा ही रहा।
मैं उठने लगा
तो उसने बस इतना कहा—
“फिर आना…”
जैसे यह आग्रह नहीं,
एक औपचारिक सच्चाई हो।
मैं बाहर आ गया
पर वो घर
मेरे भीतर रह गया
उसकी सलीकेदार चुप्पी
उसकी सजी हुई उदासी
और वो स्त्री—
वो जो मेरी प्रेमिका नहीं है
पर उससे कम भी नहीं है—
जिसके घर में सब कुछ है
सिवाय उस अव्यवस्था के
जो जीवन को “जीवित” बनाती है।
और मैं सोचता हूँ—
कुछ रिश्तों को नाम नहीं दिया जाता,
क्योंकि नाम देने से
उनकी गहराई कम हो जाती है।
वो मेरी प्रेमिका नहीं है
पर शायद
मेरी सबसे सच्ची अनुभूति है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,