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Monday, 13 April 2026

न तुम्हें खो सकता हूँ, न पा सकता हूँ

 न तुम्हें खो सकता हूँ,

न पा सकता हूँ

तुम एक बीच का प्रदेश हो।


न कोई सीमा स्पष्ट

न कोई नक़्शा तय

तुम्हारी ओर बढ़ता हूँ

तो लगता है

जैसे कदम किसी ऐसी ज़मीन पर पड़ रहे हों

जो पूरी मेरी भी नहीं,

पूरी परायी भी नहीं।


तुम्हारे पास आता हूँ

तो न दूरी रहती है

न निकटता पूरी होती है


बस एक हल्की-सी रेखा

हमारे बीच खिंची रहती है

जिसे हम दोनों

देखते भी हैं

और अनदेखा भी करते हैं।


मैं तुम्हें पुकार सकता हूँ

पर नाम से आगे नहीं बढ़ पाता

तुम मुझे सुन सकती हो

पर उत्तर में

एक ठहराव रखती हो।


हमारे बीच

कोई वादा नहीं

कोई अधिकार नहीं

फिर भी

एक अजीब-सा संबंध है

जो न स्वीकार किया गया है

न अस्वीकार।


कभी लगता है

बस एक कदम और

और तुम मेरी हो जाओगी


फिर तुरंत

एक और एहसास

कि यह “मेरी” होने की संभावना

यहीं तक सीमित है।


तुम्हारे साथ बैठता हूँ

तो समय ठहरता नहीं

बस धीमा हो जाता है


जैसे वह भी समझता हो

कि यहाँ कोई जल्दबाज़ी नहीं है

क्योंकि यहाँ

कहीं पहुँचना नहीं है।


तुम मुस्कुराती हो

मैं मुस्कुरा देता हूँ

हम दोनों जानते हैं

यह मुस्कान

पूरी नहीं है


पर अधूरी भी

अजीब तरह से संतोष देती है।


मैंने कई बार सोचा

तुम्हें छोड़ दूँ

इस “बीच” से बाहर निकल जाऊँ


पर हर बार

वहीं लौट आता हूँ


क्योंकि यह अधूरापन

किसी पूरी चीज़ से

ज़्यादा सच्चा लगता है।


तुम्हें पाना

शायद आसान होता

तुम्हें खोना

शायद संभव होता


पर यह जो “बीच” है

यही सबसे कठिन है

और सबसे गहरा भी।


यहाँ

न कोई अंत है

न कोई आरंभ


बस एक लंबा-सा विस्तार है

जहाँ हम दोनों

चलते रहते हैं

साथ-साथ

पर बिना छुए।


मैं तुम्हें देखता हूँ

और सोचता हूँ


तुम मेरी होती

तो शायद

इतनी रहस्यमयी न होती


तुम चली जाती

तो शायद

इतनी गहरी न रह जाती।


तुम्हारा होना

और न होना

दोनों साथ हैं


और मैं

इन्हीं दोनों के बीच

तुम्हारे साथ हूँ।


न तुम्हें खो सकता हूँ

न पा सकता हूँ


क्योंकि तुम कोई व्यक्ति नहीं,

एक अवस्था हो

एक प्रदेश हो

जहाँ पहुँचकर

लौटना भी संभव नहीं

और ठहरना भी पूरा नहीं।


कुछ रिश्ते मंज़िल नहीं होते,

वे रास्ते होते हैं

जिन्हें छोड़ा भी नहीं जा सकता

और पूरा चला भी नहीं जा सकता।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

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