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Tuesday, 14 April 2026

सुहानी…

 सुहानी…

रात के ढाई बजे

जब शहर सो चुका होता है,

तुम जाग रही होती हो


हेडसेट कानों पर,

आवाज़ में मुस्कान लगाकर—

“हेलो सर…”


और उस “सर” के पीछे

कितनी बार

तुम्हें अपने ही स्वर से

घृणा हुई होगी—

हम कभी नहीं जान पाए।


दिन में

जब धूप दीवारों पर चढ़ती है,

तुम सोती हो


नींद में नहीं,

थकान में डूबी हुई—


और हम कहते हैं—

“देखो, दिन में सोती है…”


जैसे यह भी

कोई अपराध हो।


हाँ,

हमने तुम्हें देखा है—


कैब से उतरते हुए,

रात के सन्नाटे में

धीरे-धीरे चलते हुए


और हमारी आँखों में

सवाल नहीं,

संदेह था।


हमने तुम्हारा नाम नहीं जाना

बस तुम्हारा समय जान लिया

“रात में आती-जाती है…”


और बस

इतना ही काफ़ी था

तुम्हारा चरित्र तय करने के लिए।


तुम्हारी आवाज़

दूसरों की समस्याएँ हल करती रही—


“सर, मैं आपकी मदद कर सकती हूँ…”


पर तुम्हारे हिस्से की

कोई मदद

कभी किसी ने ऑफर नहीं की।


तुम्हारे लिए

रात नौकरी थी

हमारे लिए

रात एक कल्पना।


और हमने

अपनी कल्पनाओं से

तुम्हें बना दिया—

“वैसी लड़की…”


कितनी बार

तुमने हँसकर टाल दिया होगा

किसी ग्राहक की

फूहड़ बात


कितनी बार

अपनी चुप्पी में

अपमान निगला होगा


क्योंकि

कॉल कट करना

नौकरी खोना था।


घर में

माँ पूछती है

“इतनी रात तक काम ठीक है न?”


और तुम कहती हो

“हाँ…”


उस “हाँ” में

कितनी “ना” छिपी थीं

हम कभी नहीं समझ पाए।


हाँ! सुहानी…


तुम्हारी दुनिया

एयर-कंडीशन्ड दफ्तरों में थी,

पर तुम्हारी लड़ाई

गली-मोहल्ले की नजरों से थी।


हमने तुम्हें

आधुनिक कहा

फिर उसी आधुनिकता से

डर गए।


हमने तुम्हें

स्वतंत्र कहा

फिर उसी स्वतंत्रता को

संदेह बना दिया।


और अंत में

बहुत आसानी से कह दिया

“चरित्रहीन…”


जैसे यह शब्द

हमारे सारे अपराध

धो देता हो।


हाँ! सुहानी…


तुम गलत नहीं थीं

गलत हमारे पैमाने थे।


तुम बिखरी नहीं थीं

हमारी सोच बिखरी हुई थी।


तुम रात में काम करती थीं

हम अंधेरे में जी रहे थे।


और आज भी

जब कोई लड़की

रात में काम करती दिखती है


हम बदलते नहीं,

बस नाम बदल देते हैं।


हाँ…

अगर “चरित्र” इतना सस्ता है

तो चरित्रहीन तुम नहीं,

हम हैं।


मुकेश ,,,,,,,

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