आत्मा की लिपि
कोई काग़ज़ नहीं था,
न स्याही, न क़लम,
फिर भी कुछ लिखा जा रहा था
बहुत भीतर,
बहुत शांत।
वह आत्मा की लिपि थी।
उसमें अक्षर नहीं थे,
अनुभव थे।
वर्णमाला नहीं,
वेदनाएँ थीं,
जो जन्मों की धूप में तपकर
चिह्न बन गई थीं।
जब पहली बार
किसी ने प्रेम किया,
उस लिपि में
एक उजला वक्र उभरा।
जब किसी ने विश्वास तोड़ा,
एक गहरी रेखा खिंच गई,
मिटाई नहीं जा सकी।
आत्मा की लिपि
भाषाओं से परे है।
उसे न संस्कृत चाहिए,
न फ़ारसी, न हिंदी,
वह तो धड़कनों की बोली में
अपना व्याकरण रचती है।
कभी ध्यान की निस्तब्धता में
उसके अक्षर चमक उठते हैं,
जैसे अंधेरे जल में
अचानक कोई मछली
चाँदी बनकर लहराए।
तुम उसे पढ़ नहीं सकते
जब तक स्वयं
एक शब्द न बन जाओ।
क्योंकि यह लिपि
देखी नहीं जाती,
जिया जाती है।
हर जन्म
उसमें एक नया अध्याय जोड़ता है,
हर मृत्यु
सिर्फ़ पन्ना पलटती है।
और अंत में
जब सब आवाज़ें थम जाती हैं,
आत्मा अपनी ही लिपि में
एक आख़िरी चिह्न अंकित करती है
न पूर्ण विराम,
न प्रश्न
बस एक शांत वृत्त,
जो संकेत है
कि लेखन अभी जारी है।
मुकेश्,,,
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