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Wednesday, 2 May 2012

तुम्हारे ख़त पढ लेता हूँ


तुम्हारे  ख़त  पढ  लेता हूँ
आँखें   नम  कर  लेता हूँ 

तेरी यादों के फूल झरते  हैं
और चुपके से बिन लेता हूँ

माज़ी के गुलशन में जाकर 
ग़म के  पत्ते  चुन  लेता  हूँ

ज़ख्म  तो कब का भर गया
पै,निशाँ अक्शर देख लेता हूँ

जानता हूँ तुम नहीं आओगी
फिर भी दरवाज़े खोल देता हूँ

मुकेश इलाहाबादी -------------


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