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Thursday, 25 July 2013

दिन दोपहरी या रात नही देखती


दिन दोपहरी या रात नही देखती
अब ऑखें मेरी ख्वाब नही देखती

देह थक के चूर होती है तो नींद
जमीन या टूटी खाट नही देखती

मौत आती है तो आ ही जाती है
मौत धूप या बरसात नही देखती

प्रक्रित जब इंषा से खफा होती है
महल हो या टूटा छप्पर नही देखती

इंषान मेहनत करने पर आये तो
किस्मत हाथ की लकीर नही देखती

मुकेष इलाहाबादी ..............

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