होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Monday, 15 July 2013

रह रह के धूप छांह आती रही


 


रह रह के धूप छांह आती रही
चिलमन से वह झांक जाती रही

दरिया के साहिल पे बैठा हूं चुप
लहरें आती रहीं और जाती रही

जब जब वक्त ने स्याही फैलायी
हंसी उसकी चॉदनी फैलाती रही

मुकेष इलाहाबादी ............

No comments:

Post a Comment