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Tuesday, 14 April 2015

दिल मे बेकली सी है

दिल मे बेकली सी है
कहीं बिजली गिरी है

शब भर रोये हो क्या
इन ऑखों मे नमी है

दर्दो ग़म की गठरी से
पीठ व कमर झुकी है

दिल के बहुत नरम हो
यही  तो तेेरी कमी है

मुकेश झुलस जाओगे,
ईश्क आग की नदी है

मुकेश इलाहाबादी --

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