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Saturday, 5 December 2020

पत्थर भी अब आईना होना चाहता है

 पत्थर भी अब आईना होना चाहता है 

इक सूरत आँखों में बसाना चाहता है 


इक उम्र गुजर गयी आवारगी करते 

मुहब्बत का इक घर बनाना चाहता हूँ 


हजारहां ज़ख्म मेरे सीने में दफ़न हैं 

किसी अपने को दिखाना चाहता हूँ 


फुर्सत मिल जाए जो तुझे औरों से 

तुझे अपनी नज़्म सुनाना चाहता हूँ 


कोई दहकता हुआ आफ़ताब निकले 

दर्द के दरिया को सुखाना चाहता हूँ 


मुकेश इलाहाबादी -------------------




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