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Tuesday, 17 February 2026

लखनऊ की एक दोस्त के नाम

मैंने तुमसे प्रेम नहीं किया,

पर जो है हमारे बीच

वह किसी इकरार से कम भी नहीं।


तुम लखनऊ की तरह हो ,

नफ़ासत से भरी,

धीमी आवाज़ में बोलती,

पर भीतर कहीं

अडिग और साफ़।


हमारी मुलाक़ातें

गोमती के किनारे की हवा जैसी हैं ,

न बहुत तेज़,

न बहुत ठहरी हुई,

बस उतनी

कि दिन की थकान उतर जाए।


तुम्हारे साथ चलते हुए

हज़रतगंज की रौशनी

कुछ और सलीकेदार लगती है,

और बड़ा इमामबाड़ा की सीढ़ियाँ

इतनी रहस्यमयी नहीं —

क्योंकि दोस्ती

भूल-भुलैया नहीं होती।


हमने कभी

एक-दूसरे की आँखों में

वायदे नहीं ढूँढे,

न ही भविष्य की तस्वीरें बनाईं।

बस बातों के दरमियान

एक भरोसा रखा —

जैसे टुंडे कबाबी की खुशबू

पुरानी गलियों में स्थिर रहती है।


तुम्हारी हँसी में

चिकनकारी-सी महीन सादगी है,

और तुम्हारी चुप्पी में

रूमी दरवाज़ा-सी ठहरी हुई शान।


मैं जानता हूँ ,

हमारे बीच

कोई अधूरा विरह नहीं,

न कोई अधूरी चाह।

सिर्फ़ एक साफ़-सा संबंध है

जिसमें अधिकार कम,

सम्मान ज़्यादा है।


लखनऊ ने हमें

तहज़ीब सिखाई है —

कि हर निकटता

प्रेम नहीं होती,

और हर गहराई

स्पर्श नहीं मांगती।


तुम्हारे साथ

दोस्ती का यह रिश्ता

इत्र की हल्की खुशबू-सा है —

दिखता नहीं,

पर देर तक साथ रहता है।


अगर कभी

यह शहर बदले,

गलियाँ नई हो जाएँ,

तब भी

यह सच्ची मित्रता

उसी तरह रहेगी ,

आवाज़ में नरमी,

दिल में जगह,

और दूरी में भी

एक आत्मीय निकटता।


मुकेश ,,,,,,,,,

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