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Tuesday, 17 February 2026

“उसकी ख़ामोशी में रखे हुए अल्फ़ाज़”

 “उसकी ख़ामोशी में रखे हुए अल्फ़ाज़”

उसने मेरी कविताएँ पढ़ीं,
और फिर
कुछ नहीं कहा।
जैसे
किसी दरवाज़े ने
आहिस्ता से बंद होकर
अंदर की रौशनी अपने पास रख ली हो।
मैंने सोचा,
शायद उसे पसंद आई होंगी पंक्तियाँ,
या शायद
उन्हें पढ़ते हुए
उसकी पलकों पर
कोई पुरानी याद उतर आई हो
धूल की महीन तह की तरह।
मगर
वो चुप रही।
उसकी चुप्पी
सिर्फ़ चुप्पी नहीं थी,
वो एक मुकम्मल जुमला था
जिसमें फ़ाइलों की तरह तह करके
रख दिए गए थे
एहसास,
एतराज़,
एहतियात
और
इकरार की आधी साँस।
मैंने अपने अल्फ़ाज़
स्याही में नहीं,
धड़कनों में डुबोकर लिखे थे।
हर शेर में
थोड़ा-सा दिल रखा था,
थोड़ा-सा ख़्वाब,
और थोड़ा-सा
उसका नाम,
जिसे मैंने खुलकर कभी लिखा नहीं।
वो पढ़ती रही।
जैसे कोई दरवेश
मस्जिद के कोने में
किताब नहीं,
अपना मुक़द्दर पढ़ता है।
उसकी आँखें
लफ़्ज़ों से गुज़रती रहीं,
मगर होंठ
ख़ामोश रहे,
जैसे किसी सूफ़ी की तस्बीह
अंदर ही अंदर चलती हो
बिना आवाज़ के।
मैंने इंतज़ार को
कुर्सी पर बैठा दिया,
और उम्मीद को
खिड़की पर टिका दिया।
दोनों
रात भर जागते रहे।
क्या उसकी ख़ामोशी में
“हाँ” का कोई महीन-सा नूर था?
या
“ना” की ठंडी परछाईं?
मैंने कई बार
उसके मौन को
उलट-पलट कर देखा,
जैसे कोई पुराना ख़त
जिसमें इबारत से ज़्यादा
ख़ाली जगहें बोलती हैं।
उसकी चुप्पी में
एक समंदर था,
जिसके ऊपर
सुकून की सतह थी,
और नीचे
तूफ़ानों की तहें।
मुकेश इलाहाबादी ,,,,,,,,

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