दामन-ए-दिल की आख़िरी सिलाई
हर सिलाई में
थोड़ी-सी रौशनी थी,
थोड़ा-सा धुआँ
मैंने ही तो सहेज कर रखा था
इस लिबास-ए-दिल को।
रफ़ू करते-करते
उँगलियाँ लहूलुहान भी हुईं,
मगर इश्क़ की नर्मी ने
दर्द को भी लज़्ज़त बना दिया।
ये आख़िरी सिलाई है शायद
सुई काँप रही है,
धागा भी कुछ कमज़ोर-सा है,
और साँसों में
तेरा नाम धीमे-धीमे घुल रहा है।
अगर ये टाँका भी खुल गया
तो दामन बिखर जाएगा,
मगर अजीब बात है —
मुझे इस बिखराव से भी
एक मीठी-सी उदासी मिलती है।
सोचता हूँ
कि छोड़ दूँ सब यूँ ही,
हवा के हवाले कर दूँ
इस थके हुए कपड़े को
पर फिर
तेरी याद की नर्म आह
मेरी उँगलियों को थाम लेती है,
और मैं
दामन-ए-दिल की आख़िरी सिलाई भी
मोहब्बत से भर देता हूँ।
मुकेश ,,,,,,,
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