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Saturday, 28 February 2026

आँगन जितना अनंत

 आँगन जितना अनंत

हमारे घर का आँगन

माप से बाहर है

नापने बैठो तो

दिशाएँ थक जाती हैं।


वहाँ तुलसी के पास

सुबह की पहली किरण

धीरे से पाँव धोती है,

और शाम

दीये की लौ में

अपना चेहरा देखती है।


उस आँगन में

बच्चों की हँसी

चिड़ियों-सी उड़ती है,

और बुज़ुर्गों की चुप्पी

बरगद की जड़-सी

गहरी उतरती जाती है।


हमने वहीं

रखा है अपना दुःख भी—

कि खुले में रहे,

साँस ले सके,

सूख सके धूप में।


सपने

वहीं रस्सी पर सूखते हैं,

बारिश के बाद

और चमकीले होकर।


कोई दीवार

उस आँगन को बाँध नहीं पाती

क्योंकि वह

मिट्टी से नहीं,

मन से बना है।


कभी-कभी

रात गहरी होती है

तो आकाश

धीरे से उतर आता है

और उसी आँगन में

तारे बिखेर देता है

जैसे किसी ने

अनंत को

मुट्ठी में भरकर

ज़मीन पर रख दिया हो।


हम वहीं बैठकर

समय से बातें करते हैं,

और वह

बिना जल्दी किए

हमारी गोद में

कुछ पल छोड़ जाता है।


आँगन जितना अनंत

और अनंत जितना अपना

यही हमारा विस्तार है,

यही हमारी परिधि,

यही वह जगह

जहाँ सीमाएँ

चुपचाप

घुल जाती हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,

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