अधूरी इच्छाओं का अनंत गलियारा
यह एक गलियारा है
सीधा भी नहीं,
मुड़ा हुआ भी नहीं,
बस फैलता हुआ…
जैसे समय ने
अपनी ही लंबाई से थककर
खुद को फैला दिया हो।
दीवारें हैं
पर वे ठोस नहीं,
वे बनी हैं
उन इच्छाओं से
जो कभी पूरी नहीं हुईं।
हर ईंट में
एक अधूरा सपना धड़कता है,
हर दरार में
एक ‘काश’
धीरे-धीरे रिसता है।
मैं चलता हूँ
या शायद
चलाया जा रहा हूँ,
क्योंकि इस गलियारे में
रास्ते नहीं होते,
केवल
दोहराव होता है।
हर मोड़ पर
एक दरवाज़ा है
बंद,
या शायद
खुला हुआ इतना
कि भीतर झाँकने से डर लगे।
मैं एक दरवाज़ा खोलता हूँ
अंदर
एक पुरानी इच्छा बैठी है,
मुझसे आँखें मिलाकर पूछती है
“क्यों छोड़ा था मुझे?”
मैं चुप रहता हूँ,
क्योंकि
उस समय मैं कुछ और चाहता था
और अब
कुछ और चाहता हूँ।
गलियारा
मुस्कुराता नहीं,
पर उसका सन्नाटा
मुझ पर हँसता है।
यहाँ
हर कदम
किसी अधूरी कहानी की
गूँज बन जाता है।
कभी-कभी
मुझे लगता है
यह गलियारा बाहर नहीं,
मेरे भीतर है,
जहाँ हर इच्छा
पूरा होने से पहले ही
दूसरी इच्छा के नीचे दब जाती है।
एक दरवाज़े के पीछे
मैंने देखा
मैं वही हूँ
जो होना चाहता था,
पर उसकी आँखों में
भी वही खालीपन था
जो अभी मेरी आँखों में है।
मैं आगे बढ़ता हूँ
अब गलियारा
और लंबा हो गया है,
या शायद
मेरी इच्छाएँ
और गहरी हो गई हैं।
यहाँ समय
रुकता नहीं,
बस घूमता है
एक ही वृत्त में,
जहाँ हर अंत
एक नए ‘चाह’ की शुरुआत है।
मैं थक जाता हूँ
और बैठ जाता हूँ
उस फर्श पर
जो बना है
मेरे ही अधूरे निर्णयों से।
तभी
एक बहुत हल्की आवाज़ आती है
“क्या सच में
तुम्हें कुछ चाहिए?”
मैं चौंकता हूँ
यह प्रश्न
इस गलियारे का नहीं लगता,
यह कहीं और से आया है
किसी गहराई से,
जहाँ इच्छाएँ
अभी जन्म ही नहीं लेतीं।
मैं पहली बार
रुकता हूँ
चलना बंद करता हूँ,
सोचना भी…
और अचानक
गलियारा
सिकुड़ने लगता है।
दीवारें
धीरे-धीरे
धुंध में बदल जाती हैं,
दरवाज़े
अपना अर्थ खो देते हैं।
और मैं
जो अभी तक
हर इच्छा के पीछे भाग रहा था,
अब देखता हूँ
कि यह अनंत गलियारा
मेरी ही दौड़ से बना था।
जैसे ही मैं
रुकता हूँ,
यह भी
रुक जाता है।
और तब समझ आता है
अधूरी इच्छाएँ
गलियारे नहीं बनातीं,
हमारी पकड़
उन्हें अनंत बना देती है।
शायद मुक्ति
किसी दरवाज़े के पार नहीं,
बल्कि
उस क्षण में है
जब हम
किसी भी दरवाज़े को
खोलना बंद कर देते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,
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