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Thursday, 23 April 2026

प्रेम ख़त्म नहीं होता, बस रूप बदल लेता है

 प्रेम ख़त्म नहीं होता, बस रूप बदल लेता है

प्रेम कहीं जाता नहीं,

वह बस

अपनी जगह बदल लेता है—

दिल से उतरकर

यादों में बस जाता है।

जो कभी

छू लेने की ज़िद करता था,

अब

दूरी में भी साथ रहता है।

पहले

वह नाम लेकर पुकारता था,

अब

ख़ामोशी में सुनाई देता है।

वह जो

हर दिन मिलने की चाह था,

आज

बिना मिले भी पूरा लगता है।

समय ने

उसे तोड़ा नहीं,

बस

थोड़ा-सा मोड़ दिया है—

जैसे नदी

रास्ता बदलकर भी

समंदर तक पहुँचती है।

अब प्रेम

वो नहीं रहा

जो आँखों में ठहरता था,

वह अब

एक आदत है—

धीरे-धीरे जी जाने की।

तुम सोचते हो

सब बीत गया

पर सच ये है

कि प्रेम अब

तुम्हारे भीतर

और गहरा हो गया है।

इसलिए

जब भी लगे

कि सब ख़त्म हो गया

एक बार ठहरकर देखना,

शायद वही प्रेम

किसी और रूप में

अब भी

तुम्हारे साथ चल रहा हो।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

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