होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Wednesday, 3 February 2016

तुम्हारे पास वक्त ही कहां है ?

तुम्हारे पास
वक्त ही कहां है ?

सुबह की आपा धापी के बाद
जब
बच्चे स्कूल
और पति आफिस जा चुके होते हैं
काम वाली
झाडू पोछा लगा के
बर्तन और कपडे साफ कर के    
जा चुकी होती है
तब भी तो बहुत से काम होते हैं
मॉ को फोन करके हाल चाल लेना है
पिताजी को वक्त से दवाई लेते रहने
की हिदायत देनी होती है
भाई के बारे मे जानना होता है
जाडा जाने वाला है
सारे कपडों को धूप दिखा के बक्से मे रखना है
बच्चों ने उस दिन अलमारी खोली थी
सब कुछ उलट पुलट कर दिया था
पडोसन की सास आयी है
मिलने जाना जरुरी है
फिर कुछ देर आराम और
मनोरंजन भी तो
इन्सान के लिये जरुरी है

सच तुम्हारे पास
एक अकेली जान के पास कितने तो काम रहते हैं
भला इतने कामो के बीच हमे कैसे याद कर सकती हो

तुम सही कहती हो मेरे पास तो सिवाय तुम्हे याद करने के
कोई काम ही नही है।

मुकेश इलाहबदी ----------





Tuesday, 2 February 2016

राख कुरेदता हूँ

आग
बुझ चुकी है
राख बाकी है
रह रह के
राख कुरेदता हूँ
भीतर राख से
लिपटे कुछ अंगारे शेष हैं
मुह अलाव के पास
ले जाकर फूंकता हूँ
अंगारे चमकने लगते हैं
सुर्ख सेव सा
तुम्हारे गाल याद आये
कुछ राख उड़ के
आँखों में आ गयी
गमछे से
राख और आँसू
पोंछूँगा
और अलाव की
सोंधी सोंधी गमक
में ऊँघता रहूंगा
और खाब में
देखूँगा तुम्हे
बहुत देर तक

मुकेश इलाहबदी --------







तुम्हे याद रखता हूँ

काम के
वक़्त भी
तुम्हे याद रखता हूँ
फिर
फुर्सत मिलते ही
तुम्हे,
पूरी तफ्सील से
याद करता हूँ

मुकेश इलाहाबादी --------- 

चुप्पी


चुप्पी में
कई चीखते हुए सवाल हैं
शायद
जिनके उत्तर
किसी भी पोथी
किसी भी दिग्ग्दर्शिका
किसी भी धर्मग्रन्थ
में नहीं हैं
अगर रहे भी हों तो
उन्हें मिटा दिया गया है
हमेसा हमेसा के लिए
ताकि
इन चुप्पियों से
कोई आवाज़ न उठे
चुप करने वालों के ख़िलाफ़

मुकेश इलाहबदी -------------

मसखरे भाई!

मसखरा,
रोता तो हम हँसते
मसखरा
बेवकूफियां करता
तो हम हँसते
मसखरा
ज़ोर ज़ोर से
ताली बजा के
पागलों सा हँसता तो
हम कहकहे लगाते
पर, उस दिन
मसखरा
बहुत उदास दिखा
हमने पूछा
'क्यूँ मसखरे भाई!
आज तक हमने तुम्हे
हँसते देखा है
या फिर रोते देखा है
उदास तो  कभी नहीं देखा
तुम्हारे चेहरे पे ये उदासी क्यूँ ?'
मसखरा, कुछ और उदास हो गया
कहने लगा
दरअसल बात ये है,
आज कल हमारा धंधा
ख़त्म हो गया है,
क्यूँ कि मसखरी
बेवकूफियां
और बेहूदगीयां
अब नेता, मौलवी और धर्म गुरू करने
लगे हैं, लिहाज़ा मेरे पास अब काम ही नहीं बचा
इसी लिए मै उदास हूँ,

यह सुन कर मै भी
उदास हो गया

अब मै और मसखरा दोनों ही उदास हो चुके थे

मुकेश इलाहाबादी ------------------------------


अलसाया सूरज भी जब रात

सुमी,
मुझे मालूम है
अलसाया
सूरज भी जब
रात के पहलू से
निकलने के लिए
सोच रहा होता है
उसके पहले ही
तुम छोड़ चुकी
होती होगी लिहाफ
झाड़ू पोछा
नहाना धोना
पूजा पाठ निपटा कर
नास्ते की तैयारी कर के
बच्चों को जगा रही होती हो
स्कूल जाने के लिए
बच्चों के बाद पति के ऑफिस जाने
की तैयारी
उसके बाद भी तो
तमाम काम होते होंगे
जिन्हे निपटना होता होगा
चकरघिन्नी सा
नाचते रहना होता होगा
चकले - बेलन के बीच
गोल - गोल घूमती रोटी सा
इन सब के
बीच भी
कुछ कुछ देर में
अपने ऍफ़ बी एकॉउंट स्टेटस
देख लेती होगी
और मेरे नोटिफिकेशन को
पढ़ती होगी
लाईक भी करती होगी
पर बिना कुछ कमेंट किये
आगे बढ़ जाती होगी
दुसरे नोटिफिकेशन्स पढ़ने के लिए
मेरे बारे में
मुस्कुरा कर सोचते हुए

मुकेश इलाहबदी ---------

Monday, 1 February 2016

ये मत कहना मै झुट्ठा हूँ

तुम्हारे,
सपने में
आते हैं
कंगना, पायल
बिछिया, झुमका
लहंगा
चाँद, तारे,फूल
खुशबू
सावन
झूला
और
मेरे सपने में
सिर्फ 'तुम'

(अब, ये मत कहना मै झुट्ठा हूँ )

मुकेश इलाहाबादी --