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Thursday, 6 April 2017

जैसे ही चैत में

जैसे
ही चैत में
आम्रकुंजों में आता है बौर
बौरा जाता है मन
हुलस - हुलस जाता है दिल 
बस !
ऐसा ही होता है
जब तुम्हारे आने की आहट आती है
सच सुमी ! ऐसा ही लगता है,
चैत, आते ही.....
मुकेश इलाहाबादी -------------

Wednesday, 5 April 2017

स्याह रातों में उजाला हो जाता है

स्याह रातों में उजाला हो जाता है
तनहाई में जब कोई याद आता है

मैं चुप, बुलबुल चुप, हवा भी चुप
फिर कानो में कौन गुनगुनाता है

ये कौन? लहरों समंदर से बेखबर
रेत् पे नज़्म लिखता है मिटाता है

जाने किसको याद कर के रोता है
बच्चों सा सुबकते हुए सो जाता है

फक्त अल्फ़ाज़ों के मोती हैं, जिन्हें
मुकेश,अपनी ग़ज़लों में लुटाता है 

मुकेश इलाहाबादी ----------------

Monday, 3 April 2017

नेल पॉलिश लगा कर

 जैसे,
 अपनी
 नाज़ुक और खूबसूरत
 उँगलियों पे  नेल पॉलिश लगा कर
 बड़े गौर से और प्रेम से
 सम्मोहित सा देखती हो
 बस !  ऐसे ही किसी दिन
 मुझे भी अपनी पोरों से
 छू कर देखो न !!

 मुकेश इलाहाबादी ---

बहुत अधीर था मन

बहुत अधीर था मन
तुमसे मिल के शांत हुआ मन

मुकेश इलाहाबादी ----------



दिल में तिश्नगी सी थी,

दिल में तिश्नगी सी थी,
शायद तेरी ही कमी थी

वहां प्यास कैसे बुझती
वहां तो रेत् की नदी थी

रात अंधेरी घना जंगल
दूर मद्धम सी रोशनी थी

मैंने तो शिद्दत से चाहा
तुमने दिल्लगी की थी

न तो सिर पे अस्मा था
न ही पैरों तले ज़मी थी

मुकेश इलाहाबादी -----

सुबह की शुर्मयी धूप

जैसे
कोई मुट्ठी में
रख लेना चाहे है
सुबह की शुर्मयी धूप

बस ऐसे ही
तुम्हारी दूधिया हँसी को
पा लेना चाहता हूँ
हमेशा - हमेशा के लिए

मुकेश इलाहाबादी --------

सुबह होते ही सीने में खिल उठता है गुलमोहर की तरह

सुबह होते ही सीने में खिल उठता है गुलमोहर की तरह
फिर दिन भर वही शख्स महकता है गुलमोहर की तरह
उसकी बातें उसकी हंसी उसकी शोखी उसकी मस्त अदा
झूमता है कोई शामो सहर मेरे आंगन गुलमोहर की तरह
मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------