चिरकाल तक तुम्हे याद करते हुए बैठा रह सकता हूँ , चट्टान बन जाने की हद तक और, यंहा तक की, इंतज़ार के अनंत अनत युगों तक
धुप छाह अंधड़ पानी सहते हुए बिखर सकता हूँ , बह जाने को नदी नाले से होते हुए नीले समुद्र में रेत बन कर ताकि कभी तुम उधर से गुजरो तो तुम्हारे पांवों का स्पर्श पा सकूं
क्या खूब ख्याल है......! ग़ालिब, मीर की भी आँखें नम हो जाएँ इसे पढ़ कर ....!
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