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गुफ्तगू करती निगोड़ी हवाओं को सुना है-
गुफ्तगू करती निगोड़ी हवाओं को सुना है-
हमने तनहा रातों में तेरी आहों को सुना है
तू कुछ कहे न कहे हमने तेरे धड़कते हुए
हर सांस हर एहसास हर जज़्बात को सुना है
मुकेश इलाहाबादी -------------------------
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