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भागती-दौडती ज़िन्दगी के बीच
भागती-दौडती
ज़िन्दगी के बीच
तुम,
एक ठहरा और
ठिठका हुआ बिंदु हो
जिसके परिवृत्त में
परिक्रमारत हूँ - मै .....
किसी अभिशप्त गृह सा
जीवन की वयः संधि से
या फिर --
पछले जन्मो से ही
या कि ,,,,
सृष्टि के उन्मेष काल से ही ---
मुकेश इलाहाबादी -----------------
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